Saturday, 4 July 2020

तंज़-ओ-मिज़ाह (हास्य और व्यंग) शायरी की दुनिया.....आनंद कक्कड़

सृष्टि में सिर्फ आदमी ही एक ऐसा प्राणी है जो हंस सकता है। शायद इसी लिए उसे सबसे ज्यादा दुख झेलने पड़ते हैं। हो सकता है इसी वजह से उसे हंसने हसने का ढंग ईजाद करना पड़ा हो.....Friedrich Nietzsche (1844-1990).

उर्दू अदब के एक बड़े आलोचक रशीद म्हाफ सिद्दीकी साहिब कहते है कि "जो कौम अपनी खामियों को जिस हद तक तंज़-ओ-ज़राफ़त का निशाना बनाने और इस तौर ओआर इनकी इस्लाह (सुधार) करने का हौसला रखती है उसी हद तक उसकी बड़ाई दूसरी क़ौमौ में मुसल्लम (सर्वमान्य) होती हैं"।

"उर्दू के तन्ज़िया-ओ-मिज़ाहिया अदब को दुनिया की किसी भी ज़ुबान के अदब के मुक़ाबले में रखा जा सकता है".....शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी ने ये अपने रिसर्च पेपर में लिखा। उर्दू गद्य में हास्य-व्यंग्य का अनमोल साहित्य मौजूद है मगर उर्दू शायरी में अभी हास्य व्यंग्य कविता में बहुत से गुंजाइशें बाकी हैं।

इतिहास पलट के अगर देखें तो सबसे पहले पहले हमरीं नज़र जाफ़र ज़टल्ली (1665-1738) पर ठहरती है जिनके सिर इस विधा का पहला शायर होने का सेहरा बंधता है।

इसके बाद इस विधा को आगे बढ़ाया जनाब महजूर, सौदा, मीर ज़ाहिक, नासिख़, मुसहफ़ी, और इंशा जैसे उस्तादों का ज़िक्र पढ़ने को मिलता है। उच्च कोटि के शायर होने के बावजूद इनके कलाम अश्लीलता और गाली गलौच से भरे हुए करते थे, जो अब उपलब्ध नही हैं। इस विधा में फूंक फूंक कर कदम रखने पड़ता है। ज़रा ज़ुरूरत से ज्यादा शोख़ी दिखाई तो फूहड़ता, नंगापन व अश्लीलता कलाम का रस बिगड़ देती है। इसी लिए इसे दोधारी तलवार कहा गया है और ये फ़न आम नही है। बड़े बड़े संजीदा शायर भी इससे किनारा कर जाते हैं। 
हास्य नज़्मों व गद्य का बड़ा संग्रह हमें अख़बार "अवध पंच (1877-1913) में देखने को मिलता है। जो हमें अपने देश की सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और नैतिक असमानताओ और विसंगतियों पर चोट करता दिखता था। संपादक मुंशी सज़्ज़ाद हुसैन के अलावा इस अखबार को मिर्ज़ा महबूब बेग, सितम ज़रीफ़, अहमद अली शौक, पंडित त्रिभुवन नाथ "हिज़्र", ज्वाला प्रसाद 'बर्क़' और जनाब अकबर इलाहाबादी ने आने धारधार लेखनी से सजाया। 'अवध पंच' ने हास्य-व्यंग के शोख, तीखे, रंगीन और चुटकुलों से उर्दू ज़ुबाँ को एक नया लबो-लहज़ा प्रदान किया। इसमें छपी रचनाएं समाज में चर्चा को प्रोत्साहित करती थी। इस अखबार का योगदान इतिहास का हिस्सा है।

मिर्ज़ा ग़ालिब (1797-189) की शायरी स्वयं पर कटाक्षों और तंज़ से भरी पड़ी है। बड़ी संजीदा बात भी वो बड़ी कुशक्त से व्यंग्यात्मक होते हुए भी अदब-तहज़ीब का दामन कभी चिढ़ते नही थे। उनके अपने दोस्तों को लिखे ख़तों को पढ़े तो आप उनके अंदर उनके उच्चकोटि के हास्य बोध (sense of humour) का एहसास होता है। नज़ीर अकबराबादी (1735-1839) और अकबर इलाहाबादी (1846-1921) ने अपनी हास्य व्यंग्य शयरी के ज़रिए समाज की कमियों और बुराइयों के पर्दाफाश करते रहे और इस कारण जान मानस में उनकी लोकप्रियता आज भी बरकरार है। आम जममानस से जुड़े विषयों जैसे मेलों, मिठाइयों, तमाशों, त्योहारों, जानवरों व चिड़ियों आदि पर अपनी सूक्ष्म दृष्टि से देखकर उसे हल्के फुल्के हास्य रचनाओं के रूप में पेश किया। समाज सुधार के आरती उनकी रचनाएं समर्पित थी। नज़ीर अकबराबादी इस कड़ी का दूसरा बड़ा नाम है, जिनकी रचनाओं में शगुफ़्तगी और ज़राफत (हास्य) में तल्ख़ी की ऐसी मिलावट पढ़ने को मिलती है जो बेमिसाल है।
 उदाहरण के तौर अपर उनकी मशहूर नज़्म "आदमीनामा" पढ़ा जा सकता है। ये रचना comparative satire ( तुकाबुली तंज़) की बेहतरीन मिसाल है।

उर्दू की तन्ज़िया और मज़ाहिया शायरों में जनाब अकबर इलाहाबादी अलग खड़े दिखाई देते हैं । उनके जैसा सलीकेदार हास्य व तंज़ जिस दिलकश अंदाज़ और असरदार तरीके से पेश किया वो न कभी पहले हुआ था न बाद में। विषयों की विविधता थी आपकी रचनाओं में- गांधी, कर्ज़न, वाइज़, कल्लू, मौलवी, शराब आदि। लफ़्ज़ों के उलटफेर से जादू पैदा करने में माहिर जनाब अंग्रेज़ी के शब्दों को भी जोड़ लिया करते थे। ये तज़ुर्बे उन्हें सबसे पृथक करता है। इन रचनाओं के बूते जिन ऊचाइयों को अकबर इलाहाबादी ने छुआ उस मक़ाम तक कोई दूसरा शायर नही पहुँच पाया। 
इनके बाद एक लंबी फेहरिस्त है शायरों की जिन्होंने इस परंपरा को आगे बढ़ाया- ज़रीफ़ लखनवी , ज़िया-उल-हक़ कासिमी , हाज़ी लकबक, मज़ीद लाहौरी, मिस्टर देहेलवी, दिलावर फ़िगार, राजा नक़वी वाही, आदि। 

चुनिंदा शेर जो आपको मुस्कुराने पर विवश कर देंगे-

गुनाहगार  वां छूट जाएंगे सारे
जहन्नुम को भर देंगे शायर हमारे
-हाली

डिनर से तुम को फ़ुर्सत कम यहाँ फ़ाक़े से कम ख़ाली 
चलो बस हो चुका मिलना न तुम ख़ाली न हम ख़ाली 
अकबर इलाहाबादी

मज़हब को शायरों  के  न  पूछें  जनाबे-शेख़
जिस वक़्त जो खयाल है, मज़हब भी है वही

तू भी ग्रेजुएट है में भी ग्रेजुएट
इल्मी मुबाहसे* हों ज़रा वास आ के लेट
*विद्वतापूर्ण चर्चा

लिपट भी जा, न रुक 'अकबर' गज़ब की ब्यूटी है
'नहीं नहीं' वे न जा, ये हया की ड्यूटी है

-अकबर इलाहाबादी

हाकिमे-रिश्वत सितां, फ़िक्रे-गिरफ़्तारी न कर
कर रिहाई की कोई आसान सूरत छूट जा
में बताओ तुझको तदबीरे-रिहाई मुझसे पूछ
ले के रिश्वत फंस गया है दे के रिश्वत छूट जा
- दिलावर फ़िगार

उठ्ठे कहाँ बैठे कहाँ कब आए गए कब 
बेगम की तरह तुम भी हिसाबात करो हो 
- अमीरुल इस्लाम हाशमी

जी आये तेरे दफ़्तर में दबा कर दे उसे रगड़ा
इसी खुफिया कमाई से बेड़ाल जाती हैं तक़दीरें
-ज़िया-उल-हक़ कासिमी

आपको चाय पिलाई है बड़े इख़लास से
काम से कम दस बारह ग़ज़लें तो सुनने दीजिये
-चक्कर निज़ामाबादी

उर्दू की रोटियों से भरते हैं पेट, लेकिन
बच्चों को पेट में ही इंगलिश पढ़ा रहे हैं
आख़िर "ज़फ़र" लिखोगे कब अपनी आपबीती
उर्दू में कितने कव्वे गंगा नाहा रहे हैं
-ज़फ़र कमाली

इश्क़ में राय बुज़ुर्गों से नही ली जाती
आग बुझते हुए शोलों से नही ली जाती
-मुनव्वर राना

बूढ़ों के साथ लोग कहाँ तक वफ़ा करे
लेकिन न मौत आये तो बूढ़े भी क्या करें
अकबर इलाहाबादी

अब वो कह रहे हैं कि मेरे बुज़ुर्ग हो
कुछ भी न हुआ शेव करने से फायदा
-हाज़ी लक लक

रिन्दों की जूतियों को उड़ा ले गए शेख़ जी
ज़ालिम ने मैक़दे को भी मस्ज़िद बना दिया
-बृजलाल राणा

जदीद दौर सजायेगा घर में तसवीरें
कहीं छुपा के ख़ुदा का कलाम रख देगा
-जां निसार अख़्तर

पोथी पढ़ पढ़ जग मुआ पंडित भय न कोय
टी वी का दो आखरा पढ़े सो पंडित होए
टी वी के संग नाश्ता टी वी के संग लंच
सब सदस्य इस गांव के टी वी है सरपंच
दोहे चकनाचूर क्यों, ग़ज़लें लहूलुहान
सोंचे टी वी देखकर ग़ालिब का दीवान
- नूर मिहम्मद "नूर"

है मेज़बानी का ये तकाज़ा
की आए मेहमां तो मुस्कुरा दो
मगर ताबियात ये चाहती है
गले मिलो और गला दबा दो
-इनायत अली ख़ान

आम तेरी ये ख़ुश-नसीबी है 
वर्ना लंगड़ों पे कौन मरता है 
जान जाने को है और रक़्स में परवाना है 
कितना रंगीन मोहब्बत तिरा अफ़्साना है
उस वक़्त मुझ को दावत-ए-जाम-ओ-सुबू मिली 
जिस वक़्त मैं गुनाह के क़ाबिल नहीं रहा 
भाबी, भतीजे, फ़ेन हज़ारों अज़ीज़ हैं
जबतक क़दम हक़ीरके उनडर क्रीज़ हैं
( एक क्रिकेट खिलाड़ी जब तक खेलता है तब तक उसको सब चाहते हैं)

बोला दुकानदार के क्या चाहिए तुम्हें
जो भी कहोगे मेरी दुकाँ पर वो पाओगे
मैंने कहा के कुत्ते के खाने का केक है
बोला यहीं पे खाओगे या लेके जाओगे

दिल लुटे, जाँ को मिटे ख़ासा ज़माना हो गया
ख़त्म दुनिया से मोहब्बत का फ़साना हो गया
कान में झुक कर कहा टेगोर के इक़बाल ने
ईलू-ईलू हिन्द का क़ौमी तराना हो गया

हीटर से शोला हुस्न का भड़काया जाएगा
अब इश्क़ भी मशीन से फ़रमाया जाएगा
शोहर भी इक मशीन है समझाया जाएगा
आशिक़ को भी मशीन से तड़पाया जाएगा
कुछ दिन के बाद देखना साइंसी देन से
जन्नत को भेजे जाएँगे मुरदे प्लेन से

ख़त आशिक़ी के लिखती नहीं दिल के ख़ून से
मिलने का वादा करती हैं अब टेलीफ़ून से
-सागर ख़य्यामी

बे-रुख़ी को भी नवाज़िश की अदा कहना पड़ा 
मस्लहत थी ज़हर पी कर भी दवा कहना पड़ा 
बे-वक़ूफ़ी के अनोखे कारनामे देख कर 
अच्छे-ख़ासे लीडरों को भी गधा कहना पड़ा 
वक़्त-ए-निकाह हम भी थे दूल्हा बने हुए 
बुलवाया औरतों ने सलामी के वास्ते 
हम रुख़्सती के वक़्त यही कह के चल पड़े 
लाई हयात आए क़ज़ा ले चली चले 
इस मर्तबा भी आए हैं नंबर तिरे तो कम 
रुस्वाइयों का क्या मिरी दफ़्तर बनेगा तू 
बेटे के मुँह पे दे के चपत बाप ने कहा 
फिर फ़ेल हो गया है मिनिस्टर बनेगा तू 
ख़ुश-नसीबी के नज़र आते हैं आसार, चलो 
चलो दिलदार चलो चाँद के पार चलो 
चाँद के पार सुना है कि फ़ज़ा अच्छी है 
सुर्ख़ हो जाओगी तुम आब-ओ-हवा अच्छी है 
जिस जगह हम हैं यहाँ से तो ज़रा अच्छी है 
मान लो राय हमारी ब-ख़ुदा अच्छी है 
आए दिन तुम तो यहाँ रहती हो बीमार चलो 
चलो दिलदार चलो चाँद के पार चलो 
तुम कुँवारी रह के शौहर ढूँडती रह जाओगी 
देख लेना ज़िंदगी भर ढूँडती रह जाओगी 
जल्द से जल्द अपने घर में नौकरी दे दो मुझे 
वर्ना बे-क़ीमत का नौकर ढूँडती रह जाओगी 
-पापुलर मेरठी

वर्तमान समय में हास्य कविताएं व कवि ज़रा आगे निकल गए है जहां तक उर्दू मज़ाहिया शायरों की बात है। आज की मज़ाहिया शायरी में आम लोगों व आम जन जीवन के विषयों को बड़े हल्के फुल्के या कहें बड़े ही मज़ाहिया अंदाज़ से लिखने और पेश करने का चलन है। जनाब आदिल लखनवी, सागर ख़य्यामी, पापुलर मेरठी, शौक़ बहराइची, मज़ीद लाहौरी, यूनुस नाज़िम, शौक़त थानवी आदि।

बर्बाद गुलिस्तां करने को बस एक ही उल्लू काफी था
हर शाख पे उल्लू बैठा है अंजामे-गुलिस्तां क्या होगा
शौक़ बहराइची

मिरी मजबूरियों ने नाज़ुकी का ख़ून कर डाला 
हर इक गोभी-बदन को गुल-बदन लिखना पड़ा मुझ को 
-अमीरुल इस्लाम हाशमी

प्रोफ़ेसर ही जब आते हों हफ़्ता-वार कॉलेज में 
तो ऊँचा क्यूँ न हो तालीम का मेआर कॉलेज में
-इनाम-उल-हक़ जावेद

विगत तीन दशकों में अगर झांके तो करीब 100 के करीब शायर मिलेंगे जिन्होंने जिला, प्रदेश, और देश विदेश के स्टार पर अपनी पहचान बना रखी है। 
आदिल लखनवी, सगयर ख़य्यामी और पापुलर मेरठी इन शायरों की लिस्ट में सबसे ऊपर हैं।

साग़र ख़्य्यामी ने भी हँसने और मुस्कुराने की एहमियत को समझा और अपनी संजीदा शायरी को छोड़कर जिसे वो जोहर नाम से लिखा करते थे, तंज़िया और मज़ाहिया शायरी शुरू कर दी। देखते ही देखते को पूरे मुल्क में अपने इस फ़न की बदौलत पहचाने जाने लगे। उनके कलाम में भरपूर मिज़ाह और तंज़ हुआ करता था। साथ ही लखनवी ज़ुबान का चटख़ारा और इनका अंदाज़े बयाँ, ये सब मिलकर सुनने वालों को क़हक़हे लगाने पर मजबूर कर दिया करते थे।

मज़ाहिया ग़ज़लें

कस्मसाने की इजाज़त नहीं दी जाएगी 
बिलबिलाने की इजाज़त नहीं दी जाएगी 

एक रक़्क़ास ने गा गा के सुनाई ये ख़बर 
नाच गाने की इजाज़त नहीं दी जाएगी 

इस से अंदेशा-ए-फ़र्दा* की जुएँ झड़ती हैं 
सर खुजाने की इजाज़त नहीं दी जाएगी 
*Fear of tomorrow
इस से तज्दीद-ए-तमन्ना* की हवा आती है 
दुम हिलाने की इजाज़त नहीं दी जाएगी 
*Renewal of desire
उस के रुख़्सार पे है और तिरे होंट पे तिल 
तिलमिलाने की इजाज़त नहीं दी जाएगी 

ये शरीअ'त* का नहीं गैस का बिल है बेगम 
बिलबिलाने की इजाज़त नहीं दी जाएगी 
*धार्मिक कानून
-इनायत अली ख़ाँ

इश्क़ अब मेल से बे-मेल हुआ जाता है 
मेरा ग़म उन के लिए खेल हुआ जाता है 

मश्ग़ला अश्क-फ़िशानी का था पहले भी मगर 
अब तो ये शग़्ल धका-पेल हुआ जाता है 

हुस्न और इश्क़ का झगड़ा भी कोई झगड़ा है 
वो लड़ाई हुई ये मेल हुआ जाता है 

हुस्न यूँ ख़ुश है कि है तीसरे बच्चे का नुज़ूल 
इश्क़ यूँ ख़ुश है कि पचमेल हुआ जाता है 

गुँध के फूलों में तिरे सर्व से क़द पर गेसू 
ख़ुशनुमा फूली-फली बेल हुआ जाता है 

हुक्म बेगम के चला करते हैं जेलर की तरह 
अब मिरा घर भी मुझे जेल हुआ जाता है 

इस क़दर सर्फ़ इलाही मिरे ख़ून-ए-दिल का 
अब मोहब्बत का बजट फ़ेल हुआ जाता है 

कहीं बुझ सकता है 'माचिस' ये मोहब्बत का चराग़ 
जिस्म का ख़ून ही जब तेल हुआ जाता है 
- माचिस लखनवी

ग़ुस्से में बीवी ये बोली शौहर से 
तुम ने तो बस ज़ुल्म मुझी पर ढाए हैं 

मैं ही तुम को फूटी आँख नहीं भाती 
तुम ने सब से प्यार के पेच लड़ाए हैं 

शौहर बोला बात अगर ये सच्ची है 
फिर ये बच्चे किस के घर से आए हैं 

बंटी बबली सोनू मोनू क्या तुम ने 
इंटरनेट से डाउन-लोड कराए हैं 

इतना भी मा'लूम नहीं है क्या तुम को 
फूल ये किस की कोशिश ने महकाए हैं 

इंटरनेट का सरवर कब से डाउन है 
सारे बच्चे पेन-ड्राईव से आए हैं 
- अहमद अल्वी

सारी जफ़ाएँ सारे करम याद आ गए 
जैसे भी याद आए हों हम याद आ गए 

जब भी कहीं से प्यार मिला या ख़ुशी मिली 
दुनिया के दर्द-ओ-रंज-ओ-अलम याद आ गए 

देखीं हैं जब भी गुल के क़रीं चंद तितलियाँ 
कितने ख़याल-ओ-ख़्वाब बहम याद आ गए 

लिक्खा था तुम ने ख़त में कि तुम ने भुला दिया 
क्या हादसा हुआ है कि हम याद आ गए 

परदेस में जो आई नज़र नर्गिसी निगाह 
इक बा-वफ़ा के दीदा-ए-नम याद आ गए 

मुद्दत हुई है बिछड़े हुए अपने-आप से 
देखा जो आज तुम को तो हम याद आ गए 

सुलझाईं जब भी ज़ीस्त की 'साग़र' ने गुत्थियाँ 
नागाह तेरी ज़ुल्फ़ के ख़म याद आ गए 
-साग़र ख़य्यामी

तंज़-ओ-मिज़ाह की शायरी समय-काल के साथ साथ चलती है और रंग बदलती रहती है। सामयिक विषयों पर उसकी पैनी नज़र रहती है। इस में हंसने हंसाने और ज़िंदगी की तलख़ियों को क़हक़हे में उड़ाने की सकत भी होती है । साथ ही हँसी मज़ाक की आड़ में या लहज़े में शायर ज़िंदगी की ना-हमवारियों और इंसानों के ग़लत रवय्यों  वो सब कह जाता है जिस के इज़हार की आम ज़िंदगी में तवक़्क़ो भी नहीं की जा सकती। उपरोक्त शायरी पढ़िए और ज़िंदगी के उन दिल-चस्प पहलुओं का लुफ्त लीजिये और मुस्कुराते रहिये। 

आनन्द कक्कड़