Saturday, 4 July 2020

तंज़-ओ-मिज़ाह (हास्य और व्यंग) शायरी की दुनिया.....आनंद कक्कड़

सृष्टि में सिर्फ आदमी ही एक ऐसा प्राणी है जो हंस सकता है। शायद इसी लिए उसे सबसे ज्यादा दुख झेलने पड़ते हैं। हो सकता है इसी वजह से उसे हंसने हसने का ढंग ईजाद करना पड़ा हो.....Friedrich Nietzsche (1844-1990).

उर्दू अदब के एक बड़े आलोचक रशीद म्हाफ सिद्दीकी साहिब कहते है कि "जो कौम अपनी खामियों को जिस हद तक तंज़-ओ-ज़राफ़त का निशाना बनाने और इस तौर ओआर इनकी इस्लाह (सुधार) करने का हौसला रखती है उसी हद तक उसकी बड़ाई दूसरी क़ौमौ में मुसल्लम (सर्वमान्य) होती हैं"।

"उर्दू के तन्ज़िया-ओ-मिज़ाहिया अदब को दुनिया की किसी भी ज़ुबान के अदब के मुक़ाबले में रखा जा सकता है".....शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी ने ये अपने रिसर्च पेपर में लिखा। उर्दू गद्य में हास्य-व्यंग्य का अनमोल साहित्य मौजूद है मगर उर्दू शायरी में अभी हास्य व्यंग्य कविता में बहुत से गुंजाइशें बाकी हैं।

इतिहास पलट के अगर देखें तो सबसे पहले पहले हमरीं नज़र जाफ़र ज़टल्ली (1665-1738) पर ठहरती है जिनके सिर इस विधा का पहला शायर होने का सेहरा बंधता है।

इसके बाद इस विधा को आगे बढ़ाया जनाब महजूर, सौदा, मीर ज़ाहिक, नासिख़, मुसहफ़ी, और इंशा जैसे उस्तादों का ज़िक्र पढ़ने को मिलता है। उच्च कोटि के शायर होने के बावजूद इनके कलाम अश्लीलता और गाली गलौच से भरे हुए करते थे, जो अब उपलब्ध नही हैं। इस विधा में फूंक फूंक कर कदम रखने पड़ता है। ज़रा ज़ुरूरत से ज्यादा शोख़ी दिखाई तो फूहड़ता, नंगापन व अश्लीलता कलाम का रस बिगड़ देती है। इसी लिए इसे दोधारी तलवार कहा गया है और ये फ़न आम नही है। बड़े बड़े संजीदा शायर भी इससे किनारा कर जाते हैं। 
हास्य नज़्मों व गद्य का बड़ा संग्रह हमें अख़बार "अवध पंच (1877-1913) में देखने को मिलता है। जो हमें अपने देश की सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और नैतिक असमानताओ और विसंगतियों पर चोट करता दिखता था। संपादक मुंशी सज़्ज़ाद हुसैन के अलावा इस अखबार को मिर्ज़ा महबूब बेग, सितम ज़रीफ़, अहमद अली शौक, पंडित त्रिभुवन नाथ "हिज़्र", ज्वाला प्रसाद 'बर्क़' और जनाब अकबर इलाहाबादी ने आने धारधार लेखनी से सजाया। 'अवध पंच' ने हास्य-व्यंग के शोख, तीखे, रंगीन और चुटकुलों से उर्दू ज़ुबाँ को एक नया लबो-लहज़ा प्रदान किया। इसमें छपी रचनाएं समाज में चर्चा को प्रोत्साहित करती थी। इस अखबार का योगदान इतिहास का हिस्सा है।

मिर्ज़ा ग़ालिब (1797-189) की शायरी स्वयं पर कटाक्षों और तंज़ से भरी पड़ी है। बड़ी संजीदा बात भी वो बड़ी कुशक्त से व्यंग्यात्मक होते हुए भी अदब-तहज़ीब का दामन कभी चिढ़ते नही थे। उनके अपने दोस्तों को लिखे ख़तों को पढ़े तो आप उनके अंदर उनके उच्चकोटि के हास्य बोध (sense of humour) का एहसास होता है। नज़ीर अकबराबादी (1735-1839) और अकबर इलाहाबादी (1846-1921) ने अपनी हास्य व्यंग्य शयरी के ज़रिए समाज की कमियों और बुराइयों के पर्दाफाश करते रहे और इस कारण जान मानस में उनकी लोकप्रियता आज भी बरकरार है। आम जममानस से जुड़े विषयों जैसे मेलों, मिठाइयों, तमाशों, त्योहारों, जानवरों व चिड़ियों आदि पर अपनी सूक्ष्म दृष्टि से देखकर उसे हल्के फुल्के हास्य रचनाओं के रूप में पेश किया। समाज सुधार के आरती उनकी रचनाएं समर्पित थी। नज़ीर अकबराबादी इस कड़ी का दूसरा बड़ा नाम है, जिनकी रचनाओं में शगुफ़्तगी और ज़राफत (हास्य) में तल्ख़ी की ऐसी मिलावट पढ़ने को मिलती है जो बेमिसाल है।
 उदाहरण के तौर अपर उनकी मशहूर नज़्म "आदमीनामा" पढ़ा जा सकता है। ये रचना comparative satire ( तुकाबुली तंज़) की बेहतरीन मिसाल है।

उर्दू की तन्ज़िया और मज़ाहिया शायरों में जनाब अकबर इलाहाबादी अलग खड़े दिखाई देते हैं । उनके जैसा सलीकेदार हास्य व तंज़ जिस दिलकश अंदाज़ और असरदार तरीके से पेश किया वो न कभी पहले हुआ था न बाद में। विषयों की विविधता थी आपकी रचनाओं में- गांधी, कर्ज़न, वाइज़, कल्लू, मौलवी, शराब आदि। लफ़्ज़ों के उलटफेर से जादू पैदा करने में माहिर जनाब अंग्रेज़ी के शब्दों को भी जोड़ लिया करते थे। ये तज़ुर्बे उन्हें सबसे पृथक करता है। इन रचनाओं के बूते जिन ऊचाइयों को अकबर इलाहाबादी ने छुआ उस मक़ाम तक कोई दूसरा शायर नही पहुँच पाया। 
इनके बाद एक लंबी फेहरिस्त है शायरों की जिन्होंने इस परंपरा को आगे बढ़ाया- ज़रीफ़ लखनवी , ज़िया-उल-हक़ कासिमी , हाज़ी लकबक, मज़ीद लाहौरी, मिस्टर देहेलवी, दिलावर फ़िगार, राजा नक़वी वाही, आदि। 

चुनिंदा शेर जो आपको मुस्कुराने पर विवश कर देंगे-

गुनाहगार  वां छूट जाएंगे सारे
जहन्नुम को भर देंगे शायर हमारे
-हाली

डिनर से तुम को फ़ुर्सत कम यहाँ फ़ाक़े से कम ख़ाली 
चलो बस हो चुका मिलना न तुम ख़ाली न हम ख़ाली 
अकबर इलाहाबादी

मज़हब को शायरों  के  न  पूछें  जनाबे-शेख़
जिस वक़्त जो खयाल है, मज़हब भी है वही

तू भी ग्रेजुएट है में भी ग्रेजुएट
इल्मी मुबाहसे* हों ज़रा वास आ के लेट
*विद्वतापूर्ण चर्चा

लिपट भी जा, न रुक 'अकबर' गज़ब की ब्यूटी है
'नहीं नहीं' वे न जा, ये हया की ड्यूटी है

-अकबर इलाहाबादी

हाकिमे-रिश्वत सितां, फ़िक्रे-गिरफ़्तारी न कर
कर रिहाई की कोई आसान सूरत छूट जा
में बताओ तुझको तदबीरे-रिहाई मुझसे पूछ
ले के रिश्वत फंस गया है दे के रिश्वत छूट जा
- दिलावर फ़िगार

उठ्ठे कहाँ बैठे कहाँ कब आए गए कब 
बेगम की तरह तुम भी हिसाबात करो हो 
- अमीरुल इस्लाम हाशमी

जी आये तेरे दफ़्तर में दबा कर दे उसे रगड़ा
इसी खुफिया कमाई से बेड़ाल जाती हैं तक़दीरें
-ज़िया-उल-हक़ कासिमी

आपको चाय पिलाई है बड़े इख़लास से
काम से कम दस बारह ग़ज़लें तो सुनने दीजिये
-चक्कर निज़ामाबादी

उर्दू की रोटियों से भरते हैं पेट, लेकिन
बच्चों को पेट में ही इंगलिश पढ़ा रहे हैं
आख़िर "ज़फ़र" लिखोगे कब अपनी आपबीती
उर्दू में कितने कव्वे गंगा नाहा रहे हैं
-ज़फ़र कमाली

इश्क़ में राय बुज़ुर्गों से नही ली जाती
आग बुझते हुए शोलों से नही ली जाती
-मुनव्वर राना

बूढ़ों के साथ लोग कहाँ तक वफ़ा करे
लेकिन न मौत आये तो बूढ़े भी क्या करें
अकबर इलाहाबादी

अब वो कह रहे हैं कि मेरे बुज़ुर्ग हो
कुछ भी न हुआ शेव करने से फायदा
-हाज़ी लक लक

रिन्दों की जूतियों को उड़ा ले गए शेख़ जी
ज़ालिम ने मैक़दे को भी मस्ज़िद बना दिया
-बृजलाल राणा

जदीद दौर सजायेगा घर में तसवीरें
कहीं छुपा के ख़ुदा का कलाम रख देगा
-जां निसार अख़्तर

पोथी पढ़ पढ़ जग मुआ पंडित भय न कोय
टी वी का दो आखरा पढ़े सो पंडित होए
टी वी के संग नाश्ता टी वी के संग लंच
सब सदस्य इस गांव के टी वी है सरपंच
दोहे चकनाचूर क्यों, ग़ज़लें लहूलुहान
सोंचे टी वी देखकर ग़ालिब का दीवान
- नूर मिहम्मद "नूर"

है मेज़बानी का ये तकाज़ा
की आए मेहमां तो मुस्कुरा दो
मगर ताबियात ये चाहती है
गले मिलो और गला दबा दो
-इनायत अली ख़ान

आम तेरी ये ख़ुश-नसीबी है 
वर्ना लंगड़ों पे कौन मरता है 
जान जाने को है और रक़्स में परवाना है 
कितना रंगीन मोहब्बत तिरा अफ़्साना है
उस वक़्त मुझ को दावत-ए-जाम-ओ-सुबू मिली 
जिस वक़्त मैं गुनाह के क़ाबिल नहीं रहा 
भाबी, भतीजे, फ़ेन हज़ारों अज़ीज़ हैं
जबतक क़दम हक़ीरके उनडर क्रीज़ हैं
( एक क्रिकेट खिलाड़ी जब तक खेलता है तब तक उसको सब चाहते हैं)

बोला दुकानदार के क्या चाहिए तुम्हें
जो भी कहोगे मेरी दुकाँ पर वो पाओगे
मैंने कहा के कुत्ते के खाने का केक है
बोला यहीं पे खाओगे या लेके जाओगे

दिल लुटे, जाँ को मिटे ख़ासा ज़माना हो गया
ख़त्म दुनिया से मोहब्बत का फ़साना हो गया
कान में झुक कर कहा टेगोर के इक़बाल ने
ईलू-ईलू हिन्द का क़ौमी तराना हो गया

हीटर से शोला हुस्न का भड़काया जाएगा
अब इश्क़ भी मशीन से फ़रमाया जाएगा
शोहर भी इक मशीन है समझाया जाएगा
आशिक़ को भी मशीन से तड़पाया जाएगा
कुछ दिन के बाद देखना साइंसी देन से
जन्नत को भेजे जाएँगे मुरदे प्लेन से

ख़त आशिक़ी के लिखती नहीं दिल के ख़ून से
मिलने का वादा करती हैं अब टेलीफ़ून से
-सागर ख़य्यामी

बे-रुख़ी को भी नवाज़िश की अदा कहना पड़ा 
मस्लहत थी ज़हर पी कर भी दवा कहना पड़ा 
बे-वक़ूफ़ी के अनोखे कारनामे देख कर 
अच्छे-ख़ासे लीडरों को भी गधा कहना पड़ा 
वक़्त-ए-निकाह हम भी थे दूल्हा बने हुए 
बुलवाया औरतों ने सलामी के वास्ते 
हम रुख़्सती के वक़्त यही कह के चल पड़े 
लाई हयात आए क़ज़ा ले चली चले 
इस मर्तबा भी आए हैं नंबर तिरे तो कम 
रुस्वाइयों का क्या मिरी दफ़्तर बनेगा तू 
बेटे के मुँह पे दे के चपत बाप ने कहा 
फिर फ़ेल हो गया है मिनिस्टर बनेगा तू 
ख़ुश-नसीबी के नज़र आते हैं आसार, चलो 
चलो दिलदार चलो चाँद के पार चलो 
चाँद के पार सुना है कि फ़ज़ा अच्छी है 
सुर्ख़ हो जाओगी तुम आब-ओ-हवा अच्छी है 
जिस जगह हम हैं यहाँ से तो ज़रा अच्छी है 
मान लो राय हमारी ब-ख़ुदा अच्छी है 
आए दिन तुम तो यहाँ रहती हो बीमार चलो 
चलो दिलदार चलो चाँद के पार चलो 
तुम कुँवारी रह के शौहर ढूँडती रह जाओगी 
देख लेना ज़िंदगी भर ढूँडती रह जाओगी 
जल्द से जल्द अपने घर में नौकरी दे दो मुझे 
वर्ना बे-क़ीमत का नौकर ढूँडती रह जाओगी 
-पापुलर मेरठी

वर्तमान समय में हास्य कविताएं व कवि ज़रा आगे निकल गए है जहां तक उर्दू मज़ाहिया शायरों की बात है। आज की मज़ाहिया शायरी में आम लोगों व आम जन जीवन के विषयों को बड़े हल्के फुल्के या कहें बड़े ही मज़ाहिया अंदाज़ से लिखने और पेश करने का चलन है। जनाब आदिल लखनवी, सागर ख़य्यामी, पापुलर मेरठी, शौक़ बहराइची, मज़ीद लाहौरी, यूनुस नाज़िम, शौक़त थानवी आदि।

बर्बाद गुलिस्तां करने को बस एक ही उल्लू काफी था
हर शाख पे उल्लू बैठा है अंजामे-गुलिस्तां क्या होगा
शौक़ बहराइची

मिरी मजबूरियों ने नाज़ुकी का ख़ून कर डाला 
हर इक गोभी-बदन को गुल-बदन लिखना पड़ा मुझ को 
-अमीरुल इस्लाम हाशमी

प्रोफ़ेसर ही जब आते हों हफ़्ता-वार कॉलेज में 
तो ऊँचा क्यूँ न हो तालीम का मेआर कॉलेज में
-इनाम-उल-हक़ जावेद

विगत तीन दशकों में अगर झांके तो करीब 100 के करीब शायर मिलेंगे जिन्होंने जिला, प्रदेश, और देश विदेश के स्टार पर अपनी पहचान बना रखी है। 
आदिल लखनवी, सगयर ख़य्यामी और पापुलर मेरठी इन शायरों की लिस्ट में सबसे ऊपर हैं।

साग़र ख़्य्यामी ने भी हँसने और मुस्कुराने की एहमियत को समझा और अपनी संजीदा शायरी को छोड़कर जिसे वो जोहर नाम से लिखा करते थे, तंज़िया और मज़ाहिया शायरी शुरू कर दी। देखते ही देखते को पूरे मुल्क में अपने इस फ़न की बदौलत पहचाने जाने लगे। उनके कलाम में भरपूर मिज़ाह और तंज़ हुआ करता था। साथ ही लखनवी ज़ुबान का चटख़ारा और इनका अंदाज़े बयाँ, ये सब मिलकर सुनने वालों को क़हक़हे लगाने पर मजबूर कर दिया करते थे।

मज़ाहिया ग़ज़लें

कस्मसाने की इजाज़त नहीं दी जाएगी 
बिलबिलाने की इजाज़त नहीं दी जाएगी 

एक रक़्क़ास ने गा गा के सुनाई ये ख़बर 
नाच गाने की इजाज़त नहीं दी जाएगी 

इस से अंदेशा-ए-फ़र्दा* की जुएँ झड़ती हैं 
सर खुजाने की इजाज़त नहीं दी जाएगी 
*Fear of tomorrow
इस से तज्दीद-ए-तमन्ना* की हवा आती है 
दुम हिलाने की इजाज़त नहीं दी जाएगी 
*Renewal of desire
उस के रुख़्सार पे है और तिरे होंट पे तिल 
तिलमिलाने की इजाज़त नहीं दी जाएगी 

ये शरीअ'त* का नहीं गैस का बिल है बेगम 
बिलबिलाने की इजाज़त नहीं दी जाएगी 
*धार्मिक कानून
-इनायत अली ख़ाँ

इश्क़ अब मेल से बे-मेल हुआ जाता है 
मेरा ग़म उन के लिए खेल हुआ जाता है 

मश्ग़ला अश्क-फ़िशानी का था पहले भी मगर 
अब तो ये शग़्ल धका-पेल हुआ जाता है 

हुस्न और इश्क़ का झगड़ा भी कोई झगड़ा है 
वो लड़ाई हुई ये मेल हुआ जाता है 

हुस्न यूँ ख़ुश है कि है तीसरे बच्चे का नुज़ूल 
इश्क़ यूँ ख़ुश है कि पचमेल हुआ जाता है 

गुँध के फूलों में तिरे सर्व से क़द पर गेसू 
ख़ुशनुमा फूली-फली बेल हुआ जाता है 

हुक्म बेगम के चला करते हैं जेलर की तरह 
अब मिरा घर भी मुझे जेल हुआ जाता है 

इस क़दर सर्फ़ इलाही मिरे ख़ून-ए-दिल का 
अब मोहब्बत का बजट फ़ेल हुआ जाता है 

कहीं बुझ सकता है 'माचिस' ये मोहब्बत का चराग़ 
जिस्म का ख़ून ही जब तेल हुआ जाता है 
- माचिस लखनवी

ग़ुस्से में बीवी ये बोली शौहर से 
तुम ने तो बस ज़ुल्म मुझी पर ढाए हैं 

मैं ही तुम को फूटी आँख नहीं भाती 
तुम ने सब से प्यार के पेच लड़ाए हैं 

शौहर बोला बात अगर ये सच्ची है 
फिर ये बच्चे किस के घर से आए हैं 

बंटी बबली सोनू मोनू क्या तुम ने 
इंटरनेट से डाउन-लोड कराए हैं 

इतना भी मा'लूम नहीं है क्या तुम को 
फूल ये किस की कोशिश ने महकाए हैं 

इंटरनेट का सरवर कब से डाउन है 
सारे बच्चे पेन-ड्राईव से आए हैं 
- अहमद अल्वी

सारी जफ़ाएँ सारे करम याद आ गए 
जैसे भी याद आए हों हम याद आ गए 

जब भी कहीं से प्यार मिला या ख़ुशी मिली 
दुनिया के दर्द-ओ-रंज-ओ-अलम याद आ गए 

देखीं हैं जब भी गुल के क़रीं चंद तितलियाँ 
कितने ख़याल-ओ-ख़्वाब बहम याद आ गए 

लिक्खा था तुम ने ख़त में कि तुम ने भुला दिया 
क्या हादसा हुआ है कि हम याद आ गए 

परदेस में जो आई नज़र नर्गिसी निगाह 
इक बा-वफ़ा के दीदा-ए-नम याद आ गए 

मुद्दत हुई है बिछड़े हुए अपने-आप से 
देखा जो आज तुम को तो हम याद आ गए 

सुलझाईं जब भी ज़ीस्त की 'साग़र' ने गुत्थियाँ 
नागाह तेरी ज़ुल्फ़ के ख़म याद आ गए 
-साग़र ख़य्यामी

तंज़-ओ-मिज़ाह की शायरी समय-काल के साथ साथ चलती है और रंग बदलती रहती है। सामयिक विषयों पर उसकी पैनी नज़र रहती है। इस में हंसने हंसाने और ज़िंदगी की तलख़ियों को क़हक़हे में उड़ाने की सकत भी होती है । साथ ही हँसी मज़ाक की आड़ में या लहज़े में शायर ज़िंदगी की ना-हमवारियों और इंसानों के ग़लत रवय्यों  वो सब कह जाता है जिस के इज़हार की आम ज़िंदगी में तवक़्क़ो भी नहीं की जा सकती। उपरोक्त शायरी पढ़िए और ज़िंदगी के उन दिल-चस्प पहलुओं का लुफ्त लीजिये और मुस्कुराते रहिये। 

आनन्द कक्कड़

Saturday, 27 June 2020

Digital Shayari Class Series: Week 8 Module 8 : आलेख 4 तरही ग़ज़ल व मुशायरा : आलेख 5 :दूसरे की ज़मीन पर अपनी खेती





तरही मुशायरा -
एक ऐसा मुशायरा जहाँ पहले से ही कोई एक पंक्ति बता दी जाए और सभी शाइर अपनी अपनी ग़ज़ल्स उसी पंक्ति को ले कर लिखें| इस पंक्ति को ही तरही का मिसरा कहते हैं|
तरही मुशायरा एक तरह से सकारात्मक मानसिकता की प्रतियोगिता है जो पुराने समय से आयोजित की जाती रही है
जिसमें उस्ताद शायर का एक मिस्रा दिया जाता था और सुखनवर उस मिसरे पर अपने शेर कहते थे और ग़ज़ल मुशायरे में पढ़ते थे।
तरही ग़ज़ल का यह उदाहरण देखिए -
१. फ़ैज़ अहमद फ़ैज़-
आप की याद आती रही रात भर''
चाँदनी दिल दुखाती रही रात भर
गाह जलती हुई गाह बुझती हुई
शम-ए-ग़म झिलमिलाती रही रात भर
कोई ख़ुशबू बदलती रही पैरहन
कोई तस्वीर गाती रही रात भर
फिर सबा साया-ए-शाख़-ए-गुल के तले
कोई क़िस्सा सुनाती रही रात भर
जो न आया उसे कोई ज़ंजीर-ए-दर
हर सदा पर बुलाती रही रात भर
एक उम्मीद से दिल बहलता रहा
इक तमन्ना सताती रही रात भर
२. मखदूम मोहिउद्दीन
आपकी याद आती रही रात भर
चश्म-ए-नम मुस्कुराती रही रात भर
रात भर दर्द की शम्मा जलती रही
गम की लौ थरथराती रही रात भर
बांसुरी की सुरीली सुहानी सदा
याद बन बनके आती रही रात भर
याद की चाँद दिल में उतरती रही
चाँदनी जगमगाती रही रात भर
कोई दीवाना गलियों में फिरता रहा
कोई आवाज़ आती रही रात भर
चूँकि उस्ताद शायर की ग़ज़ल में रदीफ़ और काफिया निर्धारित हो चुका होता था इस लिए ये जरूरी नहीं समझा जाता था की काफिया और रदीफ़ बताया जाए, सुखनवर उसी रदीफ़ और काफिये पर अपने शेर कहते थे
जो यह यकीन रखता था की वह इस मिसरे पर उम्दा ग़ज़ल कह सकता है वही ग़ज़ल कहता था तरही मुशायरे में बिना इस्लाह करवाए ग़ज़ल पढ़नी होती थी 
मगर अब थोडा सा बदलाव हुआ है और लोग हवा से मिसरे भी निकाल लेते हैं, इसमें कोई बुराई नहीं है मगर एक दिक्कत ये आती है की अगर काफिया और रदीफ़ न बताया गया हो तो सभी अपने हिसाब से काफिया और रदीफ़ को चुनने को स्वतन्त्र हो जाते हैं जो इस मुशायरे के केंद्र भाव (प्रतियोगिता) को ख़त्म कर देता है।

आलेख नो 5

ग़ज़ल दूसरों की ज़मीन पर अपनी खेती
देवमणि पांडेय

इस बार आपके लिए देवमणि पांडेय का इक लेख प्रस्तुत कर रहे है आशा है आपको पसंद आएगा यह पहले ही उनके ब्लॉग पर प्रकाशित हो चुका है जो इस विषय पर सटीक लेख है।
-आनंद कक्कड़ (सयोजक कहकशाँ)

जनाब देवमणि पांडेय जी ने लिखा कि "हमारे एक दोस्त का कहना है कि ग़ज़ल दूसरों की ज़मीन पर अपनी खेती है। बतौर शायर आप भले ही दावा करें कि आपने नई ज़मीन ईजाद की है मगर सच यही है कि आप दूसरों की ज़मीन पर ही शायरी की फ़सल उगाते हैं। कोई ऐसा क़ाफ़िया, रदीफ़ या बहर बाक़ी नहीं है जिसका इस्तेमाल शायरी में न हुआ हो। कोई-कोई ज़मीन तो ऐसी है जिसका बहुत ज़्यादा इस्तेमाल हो चुका है और लगातार होता रहेगा। मसलन शायद ही कोई ऐसा शायर हो जिसने मोमिन साहब की इस ज़मीन पर ग़ज़ल की फ़सल न उगाई हो-

तुम मेरे पास होते हो गोया जब कोई दूसरा नहीं होता तुम हमारे किसी तरह न हुए वर्ना दुनिया में क्या नहीं होता

सौ साल पहले की बात है। शहर लखनऊ में एक शायर हुए अर्सी लखनवी। मुशायरों में उनका एक शेर काफ़ी मक़बूल हुआ था –
कफ़न दाबे बगल में घर से में निकला हूँ मैं ऐ अर्सी
न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए

डॉ.बशीर बद्र ने फ़न का कमाल दिखाया, ऊपर का मिसरा हटाया और बड़ी ख़ूबसूरती से अपना मिसरा लगाया। आप जानते ही हैं कि यही ख़ूबसूरत शेर आगे चलकर जनाब बशीर बद्र का पहचान पत्र बन गया -

उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो
न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए

मुझे लगता है की ख़याल की सरहदें नहीं होतीं। यानी दुनिया में कोई भी दो शायर एक जैसा सोच सकते हैं। एक ही ज़मीन पर जाने-अनजाने दो फ़नकार शायरी की एक जैसी फ़सल उगा सकते हैं। अपने स्कूली दिनों में यानी 35 साल पहले किसी का अशआर सुना था जो अब तक याद है-
भीग जाती हैं जो पलकें कभी तनहाई में / काँप उठता हूँ कोई जान न ले ये भी डरता हूँ मेरी आँखों में / तुझे देख के कोई पहचान न ले

पाकिस्तान की मशहूर शायरा परवीन शाकिर का भी इसी ख़याल पर एक शेर नज़र आया –
काँप उठती हूँ मैं ये सोच के तनहाई में
मेरे चेहरे पे तेरा नाम न पढ़ ले कोई

ख़यालों की ये समानता इशारा करती है कि सोच की सरहदें इंसान द्वारा बनाई गई मुल्क की सरहदों से अलग होती हैं। शायर कैफ़ी आज़मी ने नौजवानी के दिनों में एक ग़ज़ल कही थी। वो इस तरह है -
मैं ढूँढ़ता जिसे हूँ वो जहाँ नहीं मिलता
नई ज़मीन नया आसमाँ नहीं मिलता
वो तेग़ मिल गई जिससे हुआ है क़त्ल मेरा
किसी के हाथ का इस पर निशां नहीं मिलता

निदा फ़ाज़ली साहब जवान हुए तो उन्होंने कैफ़ी साहब के सिलसिले को इस तरह आगे बढ़ाया -

कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता
कभी ज़मी तो कभी आसमां नहीं मिलता

फ़िल्म ‘आहिस्ता-आहिस्ता’ में शामिल निदा साहब की यह ग़ज़ल भूपिंदर सिंह की आवाज़ में इतनी ज्यादा पसंद की गई कि लोग कैफ़ी साहब की ग़ज़ल भूल गए।
मुशायरे के मंच पर भी दिलचस्प प्रयोग मिलते हैं। कभी-कभी दो शायर एक दूसरे की मौजूदगी में एक ही ज़मीन में एक जैसा नज़र आने वाले शेर पढ़ते हैं। सामयीन ऐसी शायरी का बड़ा लुत्फ़ उठाते हैं।
शायर मुनव्वर राना का एक शेर इस तरह मुशायरों में सामने आया -
उन घरों में जहाँ मिट्टी के घड़े रहते हैं
क़द में छोटे हैं मगर लोग बड़े रहते हैं

डॉ.राहत इंदौरी अपने निराले अंदाज़ में अपना परचम इस तरह लहराया-
ये अलग बात कि ख़ामोश खड़े रहते हैं
फिर भी जो लोग बड़े हैं वो बड़े रहते है

दोनों शायरों को मुबारकबाद दीजिए कि उन्होंने अपने इल्मो-हुनर से लोगों को बड़ा बनाया। मुंबई में मुशायरे के मंच पर सबसे पहले हसन कमाल ने ये कलाम सुनाया-
ग़ुरूर टूट गया है, ग़ुमान बाक़ी है
हमारे सर पे अभी आसमान बाक़ी है

इसके बाद डॉ.राहत इंदौरी ने फ़ैसला सुनाया-
वो बेवकूफ़ ज़मीं बाँटकर बहुत ख़ुश है
उसे कहो कि अभी आसमान बाक़ी है

उसके बाद राजेश रेड्डी के तरन्नुम ने कमाल दिखाया – जितनी बँटनी थी बँट गई ये ज़मीं
अब तो बस आसमान बाक़ी है

राजेश रेड्डी बा-कमाल शायर हैं, उनके बारे में मशहूर है कि वे बड़ी पुरानी ज़मीन में बड़ा नया शेर कहते हैं। मसलन जोश मल्सियानी का शेर है-
बुत को लाए हैं इल्तिजा करके
कुफ़्र टूटा ख़ुदा ख़ुदा करके

राजेश रेड्डी ने इस पुरानी ज़मीन में नई फ़सल उगाने का ऐसा कमाल दिखाया कि उनके फ़न को जगजीत सिंह जैसे मक़बूल सिंगर ने अपने सुर से सजाया-
घर से निकले थे हौसला करके
लौट आए ख़ुदा ख़ुदा करके

अभी तक ये तय नहीं हो पाया है कि इस ज़मीन का असली मालिक कौन है। मैंने शायर निदा फ़ाज़ली से इसका ज़िक्र किया। वे मुस्कराए- 'अभी तक इन…..को पता ही नहीं है कि आसमान बँट चुका है।
इनको एक हवाई जहाज़ में बिठाकर कहो कि बिना परमीशन लिए किसी दूसरे मुल्क में दाख़िल हो जाएं। फ़ौरन पता चल जाएगा कि आसमान बँटा है या नहीं।

नौजवान शायर आलोक श्रीवास्तव का ‘माँ’ पर एक शेर है जो उनके काव्य संकलन 'आमीन' में प्रकाशित एक ग़ज़ल में शामिल है- बाबू जी गुज़रे, आपस में सब चीज़ें तक़्सीम हुई तब- मैं घर में सबसे छोटा था, मेरे हिस्से आई अम्मा माँ पर शायर मुनव्वर राना का एक मतला है जिसे असीमित लोकप्रियता हासिल हुई-
किसी के हिस्से में मकां आया,या कोई दुकां आई मैं घर में सबसे छोटा था, मेरे हिस्से में माँ आई

मुझे नहीं पता कि इस पर राना साहब का कमेंट क्या है मगर आलोक का दावा है कि उनके शेर के पाँच साल बाद राना जी का मतला नज़र आया। सदियों से ग़ज़ल के क्षेत्र में हमेशा कुछ न कुछ रोचक प्रयोग होते रहते हैं । कभी शायरों के ख़याल टकरा जाते हैं तो कभी मिसरे।
ख़ुदा-ए-सुख़न मीर ने लिखा था –
बेख़ुदी ले गई कहाँ हमको
देर से इंतज़ार है अपना
इसी ख़याल को ग़ालिब साहब ने अपने अंदाज़ में से आगे बढ़ाया –
हम वहाँ हैं जहाँ से हमको भी
ख़ुद हमारी ख़बर नहीं आती

'ऐ मेरे वतन के लोगो' फेम गीतकार स्व.पं.प्रदीप से एक बार मैंने पूछा था कि अगर दो रचनाकारों के ख़याल आपस में टकराते हैं तो क्या ये ग़ल़त बात है ? उन्होंने जवाब दिया कि कभी-कभी एक रचनाकार की रचना में शामिल सोच दूसरे रचनाकार को इतनी ज़्यादा अच्छी लगती है कि वह सोच के इस सिलसिले को आगे बढ़ाना चाहता है। यानी वह अपने पहले के रचनाकार की बेहतर सोच का सम्मान करना चाहता है।
चरक दर्शन का सूत्र है- चरैवेति चरैवेति, यानी चलो रे…चलो रे…।
कविवर रवींद्रनाथ टैगोर ने इस ख़याल को आगे बढ़ाया-
'इकला चलो रे।' लोगों को और मुझे भी अकेले चलने का ख़याल बहुत पसंद आया।  कवि प्रदीप ने आगे कहा कि मैंने इस ख़याल का सम्मान करते हुए एक गीत लिखा और मेरा गीत भी बहुत पसंद किया गया-

चल अकेला… चल अकेला… चल अकेला…
तेरा मेला पीछे छूटा साथी चल अकेला…

एक कहावत है- 'साहित्य से ही साहित्य उपजता है।' मित्रो ! 'भावों की भिड़न्त' का आरोप महाकवि निराला पर भी लग चुका है। आपसे मेरा अनुरोध है कि ख़यालों के टकराने और दूसरों की ज़मीन पर अपनी फ़सल उगाने के बारे में आप एक सार्थक बहस शुरू करें ताकि आपके विचारों की रोशनी में आने वाली पीढ़ी अपना रास्ता तय कर सके। "

सभार लेखक- देवमणि पांडेय सुलतानपुर (यूपी) में जन्मे देवमणि पांडेय हिन्दी और संस्कृत में प्रथम श्रेणी एम.ए. हैं। अखिल भारतीय स्तर पर लोकप्रिय कवि और मंच संचालक के रूप में सक्रिय हैं। अब तक दो काव्यसंग्रह प्रकाशित हो चुके हैं- "दिल की बातें" और "खुशबू की लकीरें"। मुम्बई में एक केंद्रीय सरकारी कार्यालय में कार्यरत पांडेय जी ने फ़िल्म 'पिंजर', 'हासिल' और 'कहाँ हो तुम' के अलावा कुछ सीरियलों में भी गीत लिखे हैं। फ़िल्म 'पिंजर' के गीत "चरखा चलाती माँ" को वर्ष 2003 के लिए 'बेस्ट लिरिक आफ दि इयर' पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। संपर्क 09821082126 के जरिए किया जा सकता है। देवमणि पांडेय की अन्य रचनाओं को यहां क्लिक करके पढ़ा जा सकता है |
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Digital Shayari Class Series: Week 8 Module 8 : Introduction of Module

Details of module..8...

Digital Shayari Class Series: Week 8 Module 8 : वीडियो 3 : मुग़लिया दौर और आज के मुशायरे की झलक:




shashi Mushayra  [film Mirza Ghalib clip]



rahat indauri in dubai mushayra



krishna bihari Noor in dubai mushayra
Videos courtsy ; youtube

Digital Shayari Class Series: Week 8 Module 8 : वीडियो : अनवर जलालपुरी के निज़ामत की झलक



Mushayra clip courtsy:: YOU TUBE

Digital Shayari Class Series: Week 8 Module 8 : वीडियो 2 : तरही ग़ज़ल - आपकी याद आती रही रात भर.....


Refer videos of Tarhi Ghazals

Aap ki yaad aati rahi raat bhar.....by Makhdoom[film gaman]



Aap ki yaad aati rahi raat bhar.....Ghazal by Faiz [singer Dr Radhika chopra]


Digital Shayari Class Series: Week 8 Module 8 : आलेख 3 : खो गयी मुशायरे की आवाज़ अनवर जलालपुरी.



खो गयी मुशायरे की आवाज़ अनवर जलालपुरी.
दोस्तों थम गई हरदिल अज़ीज़ जनाब अनवर जलालपुरी की पुरअसर आवाज़ उनके बेवक्त इंतेक़ाल से। लेख में उर्दू साहित्य से जुड़ी तमाम शख्सियतों के उद्गार आपको पढ़ने मिलेंगे, जिससे आप अनवर साहब की शख्सियत से रूबरू होंगे...आनंद कक्कड़
अपनी आवाज़ के जादू व शायरी से मुशायरे की निज़ामत को अलग अंदाज से बयान करना श्रोताओं को दिलकश आवाज़ से बांधे रखना, उबने पर जोश वाली शायरी से जोश भर देना यह कमाल है अनवर जलालपुरी के अंदाजे बयां का। आज उर्दू साहित्य से जुड़ा हर पाठक व श्रोता अनवर जलालपुरी के नाम से सभी वाकिफ है। वर्ष 1968 से अनार साहब ने निज़ामत का सिलसिला शुरू किया। उनका तकरीरी महारत का सफर अलीगढ़ कॉलेज शुरू हो गया था जो अंततः निज़ामत में परिवर्तित हो गया। हालांकि वे स्वीकारते हैं कि वे मलिक ज़ादा मंज़ूर और उमर कुरैशी की निज़ामत से प्रभावित रहे।
आइये जानें अनवर जलालपुरी को उनके करीबी दोस्त जनाब हिदायतुल्ला खान साहब के श्रद्धांजलि लेख के अंशो द्वारा...
" मुशायरे की कामयाबी में अगर शायर, ग़ज़ल, नज़्म और अच्छे सामईन दरकार है तो अच्छे नाज़िम के बिना भी मुशायरा कामियाब नहीं हो सकता। नाज़िम को मुशायरे का कप्तान भी कह सकते हैं और अनवर जलालपुरी ने अपनी कप्तानी में कई मुशायरों को कामयाब बनाया है, लेकिन अब मुशायरे का डायस मायूस खड़ा अपने उस कप्तान को याद कर रहा है। उसे पता है उसने जो खोया है, वो वापस नहीं आने वाला है।
अनवर जलालपुरी के पास बात कहने का सलीका था, लफ्ज़ थे, लहज़ा था और वो जानते थे, लफ्ज़ कैसे इस्तमाल किए जाते हैं। जब भी वो बोलना शुरू करते तो लगता जैसे लफ्ज़ तो उनके मुरीद हैं और दौड़े चले आते हैं। कब कहां, क्या ओर कैसे कहना है, इसी उस्तादी ने उन्हें हिंदुस्तानी नहीं, दुनिया का सबसे बड़ा नाजिम बना दिया था।
वो सिर्फ अच्छे नाज़िम नहीं, शायर भी थे और फिर बहतरीन इंसान भी, जो कहने की ताकत रखते थे और उनका मिजाज़ भी सूफियाना था, पर जज़्बाती थे।
राहत इंदौरी से याद आया, उनका और अनवर जलालपुरी का याराना बहुत मजबूत था और शायद कम ही लोग जानते हैं, अनवर जलालपुरी के घर रहकर ही राहत इंदौरी ने एमए किया था, जिसका ज़िक्र राहत इंदौरी करते हुए कहते हैं- मैंने बीए तो कर लिया था, एमए करना चाहता था और जब उसका इजहार मैंने अनवर भाई के सामने किया तो उन्होंने अवध यूनिवर्सिटी से मुझे एमए करा दिया, उन्हीं के वहां रहकर मैंने यह सब किया था। उनका जाना वो खला है, जिसे अब हमेशा साथ ही रखना पड़ेगा। वो सिर्फ अच्छे नाज़िम, शायर ही नहीं, दोस्त और भाई भी थे। हमने मुशायरे की आवाज खो दी है।
जलालपुरी के सिर्फ दिल पर हमला नहीं हुआ, दिमाग भी तड़क गया और सारी कोशिशें नाकाम हो गई। जिस आवाज में मुशायरों को ताकत दी है, शायरों का हौसला बढ़ाया है और निजामत को नए आयाम दिए हैं, अब वो डायस पर कभी दिखाई नहीं देगी। अनवर जलालपुरी अंदर से तो तभी टूट गए थे, जब वो लंदन से लौटे थे। उनका शेर भी है - कोई पूछेगा जिस दिन वाकई ये जिंदगी क्या है... जमीं से एक मुट्ठी खाक लेकर हम उड़ा देंगे।
उन्होंने कई मुशायरे बनाए हैं और अभी हिंदुस्तान में तो उनके बराबरी का कोई नाजिम नहीं था। फिर उनकी पहचान सिर्फ नाजिम की भी नहीं रही थी, शायर भी वो अच्छे थे। हालात पर उन्होंने हमेशा अपनी बात कही और उसे शायरी का जरिया भी बनाया - अब नाम ही नहीं, काम का कायल है जमाना... अब नाम किसी शख्स का रावण न मिलेगा। एक शेर है - मैंने लिक्खा है उसे मरियम और सीता की तरह... जिस्म को उसके अजंता नहीं लिक्खा मैंने।
अभी तो वो इसलिए भी सुर्खियों में थे कि गीता पर उन्होंने बड़ा काम किया, उसको शायरी में ढाल दिया था और इसको लेकर उनके शो भी हो रहे थे। उन्हें बुलाया जाता है, गीता पढ़वाई जाती और गजल में ढली गीता खूब पसंद की जा रही थी।
जब इस मामले में अनवर जलालपुरी से बात हुई तो उनका कहना था- अंदर से आवाज आती थी, कुछ नया करना है। मुझे पढ़ने का बहरहाल शौक रहा है। कुरान के साथ मैंने गीता को भी पढ़ा है। बाइबिल भी मेरी लायब्रेरी में मौजूद है और मुझे अहसास हुआ कि सारी किताबें एक ही अंदाज में बात करती हैं और गीता ने मुझे खासा मुत्तासिर किया है।
जो बातें कुरान में हैं, उसका सार गीता में भी मौजूद है। उसके बाद जरूरी हो गया था कि इसे शायरी में भी बदला जाए और मैंने ये मुश्किल काम कर दिया, पर जब आप इस तरह के काम करते हैं तो वो अपने आप हो जाते हैं। कोई ताकत है, जो इसे करा लेती है। उर्दू में ढले गीता के श्लोक किस तरह बन पड़े हैं - हां, धृतराष्ट्र आंखों से महरूम थे... मगर ये न समझो कि मासूम थे। इधर कृष्ण अर्जुन से हैं हमकलाम... सुनाते हैं इंसानियत का पैगाम। अजब हाल अर्जुन की आंखों का था... था सैलाब अश्कों का रुकता भी क्या। बढ़ी उलझनें और बेचैनियां... लगा उनको घेरे हैं दुश्वारियां। तो फिर कृष्ण ने उससे पूछा यही... बता किससे सीखी है ये बुजदिली।
अनवर जलालपुरी का सियासत में भी दखल था और मायावती के वो करीब रहे। जब वो मुख्यमंत्री थीं तो इनके पास कैबिनेट मंत्री का दर्जा था और इन्होंने काम भी किए, लेकिन अखिलेश सरकार के आते ही वो पीछे हो गए, क्योंकि कोई गुंजाइश बची नहीं थी, पर उनका असल काम तो शायरी था, मुशायरे की वो आबरू थे। वैसे भी उन्होंने लंबा अरसा यहां गुजारा था और उनका शेर है - मुसलसल धूप में चलना, चरागों की तरह जलना... ये हंगामे तो मुझको वक्त से पहले थका देंगे। जाते-जाते अनवर जलालपुरी कह गए थे... प्यारे! तुम से नाराज तो हूं पर मुझे पता है तुम बुलाओगे और मैं मना नहीं कर पाऊंगा...!""
जितने भी मुशायरों का संचालन अनवर जलालपुरी ने किया वे सब अब ना सिर्फ श्रोताओं की यादों का हिस्सा हैं बल्कि शायरों की वही ज़हनों में वो ताज़ा हैं।
मेरी जंग का एक सिपाही कम हुआ
मेरे लिए एक बड़ी व्यक्तिगत क्षति है। मुझे जब सुबह उनके जाने की जानकारी मिली तो गहरा सदमा लगा। मेरी जंग का एक सिपाही कम हो गया है। हिंदुस्तान की तहजीब के जो लोग साझा संस्कृति को बचाने की कोशिशों में लगे हैं वो उन लोगों में सबसे आगे खड़े रहे। कभी विवादों में नहीं रहे, कभी चमक-दमक में नहीं फंसे। उनका अपना एक किरदार है। जो अदब को पसंद करने वाले लोग हैं वो सब उनके इर्द-गिर्द हैं। उनके साथ इतनी यादें जुड़ी हैं कि एक लम्हें में कभी उनको याद नहीं कर सकता। बस उनके लिए दुआ कर सकता हूं। 
- प्रो0 वसीम बरेलवी, शायर
 
अनवर साहब जितने बड़े नाजिम थे, उतने बड़े शायर थे
अनवर साहब जितने बड़े नाजिम थे, उतने भी बड़े शायर थे। शायरी की ऐसी कोई सिम्त नहीं जिसे उन्होंने न छुआ हो। उनका जाना अदब का बड़ा नुकसान है। मुझे नहीं लगता कि हम इस खाली जगह को कभी भर पाएंगे। लेकिन दुआ करेंगे कि अल्लाह उन्हें जन्नत अता फरमाए। वो ऐसे दानिश्वर हैं जिसका साथ रहना सबको भाता था। 
- राहत इंदौरी, शायर

...मौत हो ऐसी की दुनिया देर तक मातम करे
मेरा एक शेर है,
जिंदगी ऐसे जियो कि दुश्मनों को रश्क हो,
मौत हो ऐसी की दुनिया देर तक मातम करे
अनवर साहब का जाना भी कुछ ऐसा ही है। मेरा उनका ४० साल का ताल्लुक है। अनवर ज्लाल्पुरी सञ्चालन के शाहजहानी व्यक्तित्व का नाम है। वो बेहतरीन शायर, आलोचक, गद्य लेखक और इन सबसे बढ़कर एक बेहतरीन इंसान थे। उनके साथ कई यात्राएं कीं, ये अदब का बड़ा नुकसान है। कुदरत ने अनवर साहब को सञ्चालन का जो फन और सलीका दिया वो हर किसी के पास नहीं है। उनकी लोचदार आवाज़ को दुनिया हमेशा याद करेगी। 
- डॉ. नवाज देवबंदी
उनके जाने के बारे में जुबान नहीं, जो कहेगी हमारी आंख कहेगी
उनके जाने के बारे में मेरी जुबान कुछ नहीं बोल सकती। जो कहेगी हमारी आंख कहेगी। मेरे लिए उनका जाना मेरे साथी का जाना है। जिस खूबी के लिए उन्हें जाना जाता है वो है उनकी निजामत। मुशायरों के मंच पर निजामत में उनका नाम केवल इसलिए लिया जाता है क्योंकि वो शायरी की आत्मा को पढ़ना जानते थे। वो जानते हैं कि तहजीबों को कैसे जिंदा रखा जाता है, कैसे एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को पहुंचाया जाता है। कम-से-कम तीन पीढ़ीयों के श्रोताओं और शायरों के जुड़ने की कड़ी का नाम अनवर जलालपुरी है। 
- मंसूर उस्मानी, मशहूर नाजिम
मेरी अनवर साहब से दो बार व्यक्तिगत रूप से मुलाकात हुई मेरे अज़ीज़ मित्र संजय  मेहरोत्रा जी के घर जलालपुर व उनके एक घरेलू समारोह में। अनवर साहब की मिलनसारी व सहजता सदैव याद रहेगी। ....आनन्द कक्कड़

Digital Shayari Class Series: Week 8 Module 8 : आलेख 2 : मुशायरे की शब्दावली



कहकशाँ दोस्तों की लिए कुछ आम सुने जाने वाले शब्दों की फहरिस्त [लिस्ट] पेश है जो कभी प्रत्यक्ष या स्क्रीन पर मुशायरा सुनते समय आपको उसका हिस्सा बनने में मदद देगी। शायद ही कहीं ऐसी लिस्ट छपी हो, उम्मीद है पसंद आएगी......आनंद कक्कड़
मोहोतरम = महोदय
श्रीमान, मोहतरमा=महोदय, श्रेस्ठ महिला, 
जनाब-ए-आली=मान्य महोदय, your highness  खैरमक़दम है = स्वागत है, 
मतला पेश है= ग़ज़ल का पहला शेर प्रस्तुत है,  शेर= couplet, 
मुक़र्रर = फिर से, दोबारा (शेर को पुनः सुनने के लिए शायर से अनुरोध करना), 
अर्ज़ किया है= ग़ज़ल पेश करने से पूर्व श्रोताओं के ध्यान अपनी तरफ करके के लिये शायर कहता है। वाह वाह = शेर पर दाद देना, 
सदारत= अध्यक्षता, 
वकार = महिमा, गरिमा, 
आपकी जानिब= आप की तरफ (attention), निज़ामत = मुशायरे का संचालनकर्ता, 
शोअरा= शायर, 
तब्-ए-शोअरा = temperament of poets, सामईन= श्रोतागण,
शम्मा-ए- महफ़िल = lamp of assembly (किसी शायर को पढ़ने के लिए जानते समय प्रयोग होता है कि अब आप महफ़िल को रोशन कीजिये अपने कलाम से), 
अहल-ए-महफ़िल = people of assembly, अहल-ये-नज़र = people of vision (अहले नज़र' से मुराद ऐसे लोग हैं जिन्हें 'बोध' प्राप्त है, जो सही बात को ग़लत बात से अलग करके देखने की योग्यता रखते हैं)
तरन्नुम से पेश है = गाकर ग़ज़ल सुनना, 
तहत में पेश करना = पढ़ कर ग़ज़ल सुनना, शिरकत = सम्मिलित होने, 
मौसूफ़ा = योग्य (नाहिला जे लिए प्रयोग), 
ज़ेर ज़बर और पेश की गलतियां= ग़ज़ल व्याकरण और उच्चारण की गलतियां। 
नशिस्त = gathering/ assembly 
मुशायरा लूट लिया = श्रोताओं पर अपनी रचना से शायर का छा जाना, 
मुन्तज़िम= प्रबंधक, 
इल्तिज़ा है = requesting you, 
क़ामयाब मुशायरा = सफल आयोजन,
दा’वत-ए-सुख़न = शायरी पेश करने का स्वागत, अहल-ए-सुख़न = कवि, शायर, 
शरीक़ होइए = शेर को समझिये ध्यान दीजिये, दाद= appreciation, अच्छे कलाम की प्रशंसा करना, 
मिसरा उठाइये = शायर शेर की पहली लाईन पर विशेष ध्यान देने के किये कहता है जिससे पूरा शेर श्रोता समझें। 
मुशायरे का इख़्तिताम= समाप्ति
मक़्ता पेश है= ग़ज़ल का आखिरी शेर जिसमें शायर का तख़ल्लुस (उपनाम) आता है।


Digital Shayari Class Series: Week 8 Module 8 : आलेख 1 : उर्दू शायरीकी मंचीय प्रस्तुति- मुशायरे का इतिहास एवं बदलता रूप





मुशायरा तब और अब

मुशायरा, (उर्दू: مشاعره) उर्दु भाषा की एक काव्य गोष्ठी है। मुशायरा शब्द हिन्दी में उर्दू से आया है और यह उस महफ़िल (محفل) की व्याख्या करता है जिसमें विभिन्न शायर शिरकत कर अपना अपना काव्य पाठ करते हैं। मुशायरा उत्तर भारत और पाकिस्तान की संस्कृति का अभिन्न अंग है और इसे प्रतिभागियों द्वारा मुक्त आत्म अभिव्यक्ति के एक माध्यम (मंच) के रूप में सराहा जाता है।
वक़्त के साथ साथ मुशायरे के बदलते रंग को आप इस लेख से खास समाज पाए होंगे। इस लेख में हम एक निगाह इसके इतिहास और वर्तमान स्वरूप पर निदा फ़ाज़ली के विचार जानेंगे।
मुशायरे का आरंभ कब और कैसे हुआ यह निश्चयपूर्वक कह पाना कठिन है। प्राप्त जानकारी के आधार पर यही कहा जा सकता है कि मुशायरा साथ मिल-बैठकर गाने और कविता पाठ करने की प्राचीन परंपरा का विकसित और व्यवस्थित रूप है। इस परंपरा का इतिहास अगम है। यह परंपरा किसी न किसी रूप में हर देश, काल और जाति में प्रचलित रही होगी। सभ्य सामाजिक जीवन से इसका गहरा संबंध जान पड़ता है। कविता पाठ का प्रचलन अरब में इस्लाम के प्रवर्तन के पूर्व भी था।
फिर दसवीं शताब्दी में ईरान में सुनियोजित तरही मुशायरों की शुरूआत हुई । ये दरबारी मुशायरे थे और इन्हें बादशाहों का प्रश्रय प्राप्त था। जन साधारण से इनका कोई संबंध नहीं था। राज्याश्रय में मुखरित होने के कारण मुख्य रूप से प्रशंसात्मक काव्य यानि कसीदा (दे.) कहने की प्रवृत्ति फली फूली। ग़ज़लें भी कही गई। भारत में फारसी ढंग के इन मुशायरों का प्रारंभ सोलहवीं शताब्दी में हुआ। मुगलों के शासनकाल में बहुत से ईरानी शायर भारत आए और यहाँ फारसी में दरबारी मुशायरों  का आयोजन होने लगा। इस समय तक पढ़े-लिखे लोगों की भाषा फारसी ही मानी जाती थी। मगर अठारहवीं शताब्दी में रेख्ता (उर्दू) ने अभूतपूर्व उन्नति की। मीर (दे.), सौदा (दे.) और दर्द (दे.) ने रेख्ता में अपना कलाम कहकर उसे साहित्यिक भाषा का दर्जा दिलाया और इस भाषा में मुशायरे भी होने लगे जिन्हें आरंभ में मुराख्ना कहा गया। पहले ये भी दरवारों से संबद्ध थे मगर कालांतर में मुशावरों का सार्वलौकिक रूप विकसित हुआ। दिल्ली के शायर बाहर निकले और लखनऊ,
रामपुर, हैदराबाद, टौंडा इत्यादि रियासतों में भी तरही मुशायरे की परंपरा का आरंभ हुआ। मुशायरों को सुरुचिपूर्ण बनाने के लिए नियम निश्चित हुए। शायरों का श्रोताओं के बैठने-उठने, दाद देने, गज़ल पढ़ने, आभार प्रदर्शित करने के ढंग तय हुए।
मुशायरे का संचालन मीर मुशायरा का उत्तरदायित्व था और मीर-मुशायरा बहुधा स्वयं बादशाह,
नवाब या शाही परिवार का कोई सदस्य होता। सार्वजनिक मुशायरों में भी अध्यक्ष बादशाह ही होता है। इस बादशाही प्रश्रय के फलस्वरूप उर्दू शायरों में गुटबंदी और अपने प्रतिद्वंद्वी को नीचा दिखाने की कुप्रवृत्ति को प्रोत्साहन मिला और मुशायरे पहलवानी के अखाड़े बन गए। मगर इस सबके बावजूद इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि मुशायरों ने उर्दू भाषा को परिमार्जित और परिवर्धित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
धीरे-धीरे लोग तरही मुशायरों से ऊबने लगे। सो सन् 1867 ई. में लाहौर में अंजुमन-ए-उर्दू ने मुनाज़मों यानि नज़्मों के पाठ का सूत्रपात किया। इसमें शायरों को नज़्म (द.) का शीर्षक दे दिया जाता था। छपाई का प्रसार होने पर तहरीरी मुशायरे होने लगे। इसमें पत्र-पत्रिका का संपादक एक मिसरा देकर ग़ज़लें आमंत्रित करता था। अच्छी रचनाएँ प्रकाशित की जाती थीं। इन मुशायरों में महफ़िली मुशायरों की त्रुटियाँ नहीं थीं। फिर रेडियो पर मुशायरों का प्रसारण प्रारंभ हुआ। वर्तमान युग में गैर तरही मुशायरों को अधिक मान्यता मिली है। इसमें शायर की कल्पना की उड़ान पर बंधन नहीं रहता। आज भी विभिन्न प्रांतों में समय-समय पर अनेक संस्थाओं द्वारा मुशायरों का आयोजन होता है। टी.वी. और रेडियो पर इनके प्रसारण की व्यवस्था की जाती है। इस संबंध में हर साल 26 जनवरी को लाल किले में होने वाला मुशायरा विशेष रूप से उल्लेखनीय है। उर्दू शायरी को लोकप्रिय बनाने में मुशायरों की भूमिका सर्वमान्य है।

पुराना मुशायरों और नए मुशायरों का फ़र्क
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मुशायरे का संबंध अच्छी और गंभीर शायरी से कितना है यह एक चर्चा का विषय है.

शायर और लेखक जनाब निदा फ़ाज़ली के लफ़्ज़ों मे......""हमारी संस्कृति में संतों की मौखिक परंपरा रही है. कबीर दास स्वयं को अपढ़ कहते थे, परंतु ढाई अक्षर प्रेम के काव्य रूप से वह संगत में बैठने वालों को ज्ञान प्रदान करते थे. ग़ालिब से पहले मीर और उनके बाद मीर दर्द के घरों में मुशायरे हुआ करते थे.
इन सभाओं में शायर और श्रोता एक स्थान पर जमा होते थे और ग़ज़लें सुनाते थे, मीर दर्द, मीर तकी मीर के समकालीन सूफ़ी शायर थे. उनका युग 19वीं शताब्दी है, मीर दर्द के दौर में दिल्ली दो बार लूटी गई. एक बार ईरान के नादिर शाह के हाथों और दूसरी बार अफगानिस्तान के अहमद शाह दुर्रानी ने इसे वीरान किया.
इन दोनों आक्रमणों ने केवल तबाही ही नहीं मचाई, औरंगज़ेब के बाद भारत में मुगल सल्तनत की दिन प्रतिदिन गिरती हुई साख़ को भी महत्वहीन बना दिया.
इन हमलों से घबराकर मीर और उनके साथ कई और नामी गिरामी शायर दिल्ली छोड़ के वाजिद अली शाह के लखनऊ में जा बसे. अकेले मीर दर्द ही ऐसे थे, जो उजड़ती दिल्ली को छोड़ने को तैयार नहीं हुए. उन्हीं के घर मुशायरे में एक बार एक मुगल शहज़ादा भी शायरी के शौक़ में आ गया.
वह टांगें फैलाए हुए था अचनाक मीर दर्द की नज़र उसकी इस असभ्य हरकत पर पड़ी, उन्होंने टोकते हुए उससे कहा, साहबज़ादे यह अदब की महफिल है और इसमें टांगे इस तरह फैलाकर बैठना बेअदबी है. शहज़ादे ने कहा, 'मैं मजबूर हूँ...मेरी टांगों में तकलीफ़ है', मीर दर्द ने फौरन जवाब दिया-'मियाँ तकलीफ़ को घर में आराम दिया जाता है, महफ़िल में, महफ़िल के आदाब का ख़्याल किया जाता है.'

वो ज़माना-ये ज़माना

उस ज़माने में मुशायर तहज़ीब के केंद्र हुआ करते थे. आख़िरी मुगल बहादुर शाह ज़फ़र के लालकिले के मुशायरे अब इतिहास का हिस्सा हैं...इन मुशायरों में ग़ालिब सुनाते थे और ज़ौक सुनते थे, बहादुरशाह जफ़र ग़ज़ल पढ़ते थे और सुनने वालों में मोमिन खाँ, ग़ालिब, शेफ्ता और युवा शायर दाग़ होते थे...उन दिनों सुनाने वालों और सुनने वालों के बीच में इतनी दूरी नहीं होती थी जितनी आज नज़र आती है.
आज कच्ची उम्र की कन्याएँ, दूसरों से लिखवाई कविताएँ सुनाती हैं और छा जाती हैं, उनमें कुछ ऐसे शायर भी होते हैं जो छपी छपाई ख़बरों को कविता बनाकर सुनाते हैं और श्रोताओं से तालियाँ पिटवाते हैं, ऐसे मुशायरों में एक और बात देखने को मिलती है, और वह है भावुक क़िस्म की सांप्रदायिकता.
अच्छी-सच्ची शायरी के दर्शन अब मुशायरों में कम ही होते हैं, शेर हो या कविता हो, उसे सुनकर समझने के लिए थोड़े समय की ज़रूरत होती है, और स्टेज से पढ़ी जाने वाली ग़ज़ल के लिए श्रोताओं के पास इतना समय नहीं होता, वे फास्ट फूड की तरह शीघ्र स्वाद की आदत के शिकार हैं. समय की बढ़ती स्पीड के अनुसार, श्रोताओं को भी ऐसी रचनाओं में आनंद आता है जिसको सुनने में, किसी प्रकार का मानसिक या शारीरिक कष्ट नहीं...!
एक बार एक संयोजक ने मुझसे प्रश्न किया था आप मुशायरों में शरीक होने के लिए इतने ज़्यादा पैसे क्यों मांगते हैं, मेरा जवाब था, 'मैं इतनी रक़म की इसलिए डिमांड करता हूँ कि मुझे एक साथ दो काम करने पड़ते हैं-अपनी कविताएँ सुनाने के साथ दूसरों को सुनना भी पड़ता है. अगर मुझे सिर्फ़ अपनी कविताएँ सुनानी हों तो रक़म की डिमांड आधी भी हो सकती है.'
मुशायरों की ऐसी हालत हर जगह नज़र आती है. कविताएँ कम सुनाई जाती है, हाव-भाव या गलेबाज़ी से दिखाई ज़्यादा जाती है जिसकी वजह से मुशायरा तमाशा बन जाता है.""
स्तरीय मुशायरे आज भी विश्व स्तर पर आयोजित किए जाते है और कस्बे व कमेटी स्टार पर भी। टेलीविजन पर मुशायरों का प्रसारण आज आम बात है जो शायरों को सीधा श्रोताओं से जोड़ता है। दूसरे Social Media (फेस बुक, व्हाट्सएप्प व इंस्टाग्राम आदि) में मुशायरे व उनकी क्लिप्स का वायरल होने एक आम बात है। साथ ही Youtube पर मुशायरे बहुतायत में उपलब्ध है जो इनकी लोकप्रियता लगातार बढ़ाते है। Open space, खुला मंच व पर्सनल वीडियो के जरिये भी शायर अपनी शायरी सरलता से श्रीताओ तक ले जा पा रहा है जो एक तरह से मुशायरा ही है।

लतीफ़ा
कामयाब मुशायरा?
हरी चंद अख़्तर
मसूरी के मुशायरे से वापसी पर जगन्नाथ आज़ाद, हरिचंद अख़्तर, बिस्मिल सईदी टोंकी कुछ और शाइ’रों के साथ सफ़र कर रहे थे। हरिचंद अख़्तर ने बातचीत के दौरान कहा मसूरी का मुशायरा बहुत बेकार रहा है।
आज़ाद साहिब इज़हार-ए-हैरत करते हुए बोले, “अख़्तर साहिब मुशायरा तो बहुत कामयाब था।”
इस पर अख़्तर साहिब बोले:
“न शुअ’रा की आपस में लड़ाई हुई, न गाली गलौच हुई, न मुआ’वज़े की कमी बेशी का झगड़ा हुआ, और न ही होटल वालों की कोई चीज़ गुम हुई। क्या ख़ाक कामयाब मुशायरा था।”
शायरी के तारा मसीह और अमरोहा के भुट्टो
बशीर बद्र
अमरोहा में मुशायरा बहुत सुकून से चल रहा था। शायर भी मुतमइन और सुनने वाले भी ख़ुश कि बीच मजमे से एक बहुत मा’क़ूल शख़्सियत वाले साहिब उठे और खड़े हो कर आ’दिल लखनवी की तरफ़ इशारा करके बोले,
“डाक्टर साहिब, वो शायर जिनकी सूरत तारा मसीह (जिस जल्लाद ने वज़ीर-ए-आज़म पाकिस्तान ज़ुल्फ़क़ार अली भुट्टो को फांसी दी थी) के हू-ब-हू है, उन्हें पढ़वा दीजिए।”
बशीर बद्र ने अपनी मख़सूस मुस्कुराहट के साथ आ’दिल लखनवी को दा’वत-ए-सुख़न देते हुए कहा,
“मैं शायरी के तारा मसीह से दरख़्वास्त करता हूँ कि तशरीफ़ लाएं और अमरोहा के ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो का काम तमाम कर दें।”
सिंह की अनोखी दाद
कँवर महेंद्र सिंह बेदी सहर
दिल्ली के एक मुशायरे में कँवर महिन्द्र सिंह बेदी ने शायरों को डायस पर बुलाया तो तर्तीब ऐसी रखी कि शायरात उनके क़रीब रहें। मुशायरे के बाद ख़लीक़ अंजुम बेदी साहिब से कहने लगे कि आप जब किसी शायरा को दाद देते हैं तो आपका हाथ लहराने के बजाय उसकी पीठ पर ज़्यादा देर तक सरकता रहता है। बेदी साहिब ने फ़ौरन जवाब दिया:
“दाद देने का यही अंदाज़ तो दाद तलब है।”
प्रस्तुति: आनन्द कक्कड़

Saturday, 20 June 2020

Kahkashan Digital Masters Class Week 7 Module 7










Week 7 Module 7 Ustad Apoorv "ashesh" video on वज़्न/ मात्रा भार क्या है

Week 7 Module 7 Ustad Apoorv "ashesh" video on - बहर क्या है?

Week 7 Module 7 ग़ज़ल के बारे में- ग़ज़ल से संबंधित शब्द (vol1)




ग़ज़ल के बारे में- ग़ज़ल से संबंधित शब्द (vol1)
क्रम १ - ग़ज़ल से सम्बंधित शब्द और उनके अर्थ (उदाहरण सहित)


ग़ज़ल-
एक समान रदीफ़ (समांत) तथा भिन्न भिन्न क़वाफ़ी(क़ाफ़िया का बहुवचन) (तुकांत) से सुसज्जित एक ही वज़्न
(मात्रा क्रम) अथवा बह्'र (छंद) में लिखे गए अश'आर(शे'र का बहुवचन) समूह को ग़ज़ल कहते हैं। जिसमें शायर किसी चिंतन विचार अथवा भावना को प्रकट करता है।
शाइर / सुख़नवर = उर्दू काव्य लिखने वाला
शाईरी = उर्दू काव्य लेखन
ग़ज़लगो = ग़ज़ल लिखने वाला
ग़ज़लगोई = ग़ज़ल लिखने की प्रक्रिया
शे'र-
रदीफ़ तथा क़ाफ़िया से सुसज्जित एक ही वज़्न ( मात्रा क्रम) अर्थात बह्'र में लिखी गई दो पंक्तियाँ जिसमें किसी चिंतन विचार अथवा भावना को प्रकट किया गया हो | 
उदाहरण स्वरूप दो अश'आर (शे'र का बहुवचन) प्रस्तुत हैं -
फ़क़ीराना आये सदा कर चले
मियाँ ख़ुश रहो हम दु'आ कर चले ||१||
वह क्या चीज़ है आह जिसके लिए
हर इक चीज़ से दिल उठा कर चले ||२|| - (मीर तक़ी मीर)
अश'आर - शे'र का बहुवचन
फ़र्द - एक शे'र
(पुराने समय में फर्द विधा प्रचिलित थी जो ग़ज़ल की उपविधा थी। जैसे आज कतअ का मुसम्मन रूप प्रचिलित है अर्थात अब कतअ ४ मिसरों में कही जाती है । पुरानी कतआत में २ से अधिक अशआर भी मिलते हैं)
आज अगर शायर कहता है कि कतअ पढता हूँ तो श्रोता समझ जाते हैं कि शायर चार मिसरों की रचना पढ़ेगा, उसी प्रकार एक स्वतंत्र शेर को फर्द कहा जाता है जब कोई शायर कहता था कि फर्द पढता हूँ तो श्रोता समझ जाते थे कि अब शायर कुछ स्वतंत्र शेर पढ़ने वाला है|
अशआर कहने से यह पता चलता है कि सभी शेर एक जमीन के हैं और फर्द से पता चलता है कि सभी शेर अलग अलग जमीन से हैं ।
मिसरा -
शे'र की प्रत्येक पंक्ति को मिसरा कहते हैं, इस प्रकार एक शे'र में दो पंक्तियाँ अर्थात दो मिसरे होते हैं-
(1) मिसरा -ए- उला- शे'र की पहली पंक्ति को मिसरा -ए- उला कहते हैं 'उला' का शब्दिक अर्थ है 'पहला'
उदाहरण -
हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए <-- मिसरा -ए- उला
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए - (दुष्यंत कुमार)
(2) मिसरा -ए- सानी = शे'र की दूसरी पंक्ति को मिसरा -ए- सानी कहते हैं 'सानी' का शब्दिक अर्थ है 'दूसरा'
उदाहरण -
हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए <-- मिसरा ए सानी
रदीफ़-
वह समांत शब्द अथवा शब्द समूह जो मतले (ग़ज़ल का पहला शे'र) के दोनों मिसरों के अंत में आता है तथा अन्य अश'आर के मिसरा -ए- सानी अर्थात दूसरी पंक्ति के अंत में आता है और पूरी ग़ज़ल में एक सा रहता है उसे रदीफ़ कहते हैं
उदाहरण = आग के दरमियान से निकला
मैं भी किस इम्तिहान से निकला
चाँदनी झांकती है गलियों में
कोई साया मकान से निकला - (शकेब जलाली)
प्रस्तुत अश'आर में से 'निकला' रदीफ़ है
क़ाफ़िया -
वह शब्द जो प्रत्येक शे'र में रदीफ़़ के ठीक पहले आता है और सम तुकांतता के साथ हर शे'र में बदलता रहता है उसे क़ाफ़िया कहते हैं, शे'र का आकर्षण क़ाफ़िये पर ही टिका होता है क़ाफ़िये का जितनी सुंदरता से निर्वहन किया जायेगा शे'र उतना ही प्रभावशाली होगा
उदाहरण = किस महूरत में दिन निकलता है
शाम तक सिर्फ हाथ मलता है
वक़्त की दिल्लगी के बारे में
सोचता हूँ तो दिल दहलता है -(बाल स्वरूप राही)
अब हम रदीफ़ की पहचान कर सकते हैं इसलिए स्पष्ट है कि प्रस्तुत अश'आर में 'है' शब्द रदीफ़़ है तथा उसके पहले के शब्द निकलता, मलता, दहलता सम तुकान्त शब्द हैं तथा प्रत्येक शे'र में बदल रहे हैं इसलिए यह क़ाफ़िया है।
मतला -
ग़ज़ल का पहला शे'र जिसके दोनों मिसरों में क़ाफ़िया रदीफ़़ होता है उसे मतला कहते हैं
उदाहरण -
बहुत रहा है कभी लुत्फ़-ए-यार हम पर भी
गुज़र चुकी है ये फ़स्ल-ए-बहार हम पर भी || मतला ||
ख़ता किसी कि हो लेकिन खुली जो उनकी ज़बाँ
तो हो ही जाते हैं दो एक वार हम पर भी || दूसरा शे'र || - (अकबर इलाहाबादी)
हुस्ने मतला = यदि ग़ज़ल में मतला के बा'द और मतला हो तो उसे हुस्ने मतला कहा जाता है।
उदाहरण-
जिक्र तबस्सुम का आते ही लगते हैं इतराने लोग
और ज़रा सी ठेस लगी तो जा पहुंचे मैख़ाने लोग || मतला ||
मेरी बस्ती में रहते हैं ऐसे भी दीवाने लोग
रात के आँचल पर लिखते हैं दिन भर के अफ़साने लोग || हुस्ने मतला ||
- (अतीक इलाहाबादी)
प्रस्तुत अश'आर में पहला शे'र मतला है तथा दुसरे शे'र के मिसरा उला (पहली पंक्ति) में भी रदीफ़़ क़ाफ़िया का निर्वहन हुआ है इसलिए यह शे'र हुस्ने मतला है।
तख़ल्लुस - उर्दू काव्य विधाओं की रचनाओं के अंत में नाम अथवा उपनाम लिखने का प्रचलन है | उपनाम को उर्दू में तख़ल्लुस कहते हैं |
उदाहरण -
हुई मुद्दत कि 'ग़ालिब' मर गया पर याद आता है
वो हर इक बात पर कहना कि, यूँ होता तो क्या होता - (असदउल्लाह ख़ान 'ग़ालिब')
इस शे'र में शायर ने अपने तख़ल्लुस 'ग़ालिब' का प्रयोग किया है|
मक़्ता = ग़ज़ल के आख़िरी शे'र को मक़्ता कहते हैं इस शे'र में शायर कभी कभी अपना तख़ल्लुस (उपनाम) लिखता है|
उदाहरण -
अजनबी रात अजनबी दुनिया
तेरा "मजरूह" अब किधर जाये - (मजरूह सुल्तानपुरी)
यह मजरूह सुल्तानपुरी की ग़ज़ल का आख़िरी शे'र है जिसमें शायर ने अपने तख़ल्लुस 'मजरूह' (शाब्दिक अर्थ - घायल) का सुन्दर प्रयोग किया है।
मुरद्दफ़ ग़ज़ल अर्थात रदीफ़़वार -
वो ग़ज़ल जिसमें रदीफ़़ होता है उसे मुरद्दफ़ ग़ज़ल कहते हैं।
उदाहरण -
उनसे मिले तो मीना-ओ-साग़र लिए हुए
हमसे मिले तो जंग का तेवर लिए हुए
लड़की किसी ग़रीब की सड़कों पे आ गई
गाली लबों पे हाथ में पत्थर लिए हुए - (जमील हापुडी)
प्रस्तुत अश'आर में 'लिए हुए' रदीफ़़ है इसलिए यह मुरद्दफ़ ग़ज़ल है।
ग़ैर मुरद्दफ़ ग़ज़ल = जिस ग़ज़ल में रदीफ़ नहीं होता है उसे ग़ैर मुरद्दफ़ ग़ज़ल कहते हैं।
उदाहरण -
जाने वाले तुझे कब देख सकूं बारे दीगर
रोशनी आँख की बह जायेगी आसूं बन कर
रो रहा था कि तेरे साथ हँसा था बरसों
हँस रहा हूँ कि कोई देख न ले दीदा-ए-तर - (शाज़ तमकनत)
प्रस्तुत अश'आर के पहले शे'र में मिसरे 'दीगर', 'कर' शब्द से समाप्त हुए हैं जो कि समतुकांत हैं तथा अलग अलग हैं।
इसलिए स्पष्ट है कि यह रदीफ़़ के न हो कर क़ाफ़िया के शब्द हैं और इस शे'र में रदीफ़ नहीं है इस प्रकार आगे के शे'र में भी क़ाफ़िया को निभाते हुए तर शब्द आया है इससे सुनिश्चित होता है कि यह ग़ैर मुरद्दफ़ ग़ज़ल है |
मुसल्सल ग़ज़ल-
ग़ज़ल का प्रत्येक शे'र अपने आप में पूर्ण होता है तथा शायर ग़ज़ल के प्रत्येक शे'र में अलग अलग भाव को व्यक्त कर सकता है परन्तु जब किसी ग़ज़ल के सभी अश'आर एक ही भाव को केन्द्र मान कर लिखे गए हों तो ऐसी ग़ज़ल को मुसल्सल ग़ज़ल कहते हैं|
ग़ैर मुसल्सल ग़ज़ल-
ग़ज़ल के प्रत्येक शे'र अलग अलग भाव को व्यक्त करें तो ऐसी ग़ज़ल को ग़ैर मुसल्सल ग़ज़ल कहते हैं

Week 7 Module 7 ग़ज़ल के बारे में ....शायरी लेखन से संबंधित शब्द (vol 2)



ग़ज़ल के बारे में ....शायरी लेखन से संबंधित शब्द (vol 2)

लाम-
लाम का अर्थ होता है “लघु” और इसे १ मात्रा के लिए प्रयोग करते हैं |
('लाम' उर्दू का एक हर्फ़ है जो हिंदी के "ल" के सामान है)
उदाहरण = अ = १ ('लाम' ग़ज़ल की सबसे छोटी इकाई है )
गाफ-
गाफ का अर्थ होता है दीर्घ और इसे २ मात्रा के लिए प्रयोग करते हैं| {उर्दू का हर्फ़ गाफ़ हिंदी में "ग"}
उदाहरण = आ =२ (यह भी ग़ज़ल की सबसे छोटी इकाई है )
वज़्न -
मात्रा क्रम, किसी शब्द के मात्रा क्रम को उस शब्द का वज़्न कहा जाता है
उदाहरण - कुछ शब्दों का मात्रिक विन्यास देखें
शब्द – वज़्न “
सदा - फ़अल (१२) लघु दीर्घ
सादा - फैलुन (२२) दीर्घ दीर्घ
साद - फ़ाअ (२१) दीर्घ लघु
हरा - फ़अल (१२) लघु दीर्घ
राह - फ़ाअ (२१) दीर्घ लघु
हारा - फैलुन (२२) दीर्घ दीर्घ
रुक्न -
गण, घटक, पद, निश्चित मात्राओं का पुंज| जैसे हिंदी छंद शास्त्र में गण होते हैं, यगण (२२२), तगण (२२१) आदि उस तरह ही उर्दू छन्द शास्त्र 'अरूज़' में कुछ घटक होते हैं जो रुक्न कहलाते हैं|
बहुवचन=अरकान
उदाहरण - फ़ा, फ़ेल, फ़अल , फ़ऊल, फ़इलुन, फ़ाइलुन फ़ाइलातुन, मुफ़ाईलुन आदि
रुक्न के भेद - १ - सालिम रुक्न २- मुज़ाहिफ रुक्न
(१) सालिम रुक्न - अरूज़शास्त्र में सालिम अरकान की संख्या आठ कही गई है अन्य रुक्न इन मूल अरकान में दीर्घ को लघु करके अथवा मात्रा को कम करके बने हैं ये 7 मूल अरकान निम्न हैं
रुक्न - रुक्न का नाम - मात्रा
फ़ईलुन - मुतक़ारिब - १२२
फ़ाइलुन - मुतदारिक - २१२
मुफ़ाईलुन - हजज़ - १२२२
फ़ाइलातुन - रमल - २१२२
मुस्तफ़्यलुन - रजज़ - २२१२
मुतफ़ाइलुन - कामिल - ११२१२
मफ़ाइलतुन - वाफ़िर - १२११२
(२) मुज़ाहिफ रुक्न - परिवर्तित रुक्न| मुज़ाहिफ़ शब्द ज़िहाफ़ से बना है| जब किसी मूल रुक्न से किसी मात्रा को कम करके अथवा घटा कर एक नया रुक्न प्राप्त करते हैं तो उसे मुज़ाहिफ़ रुक्न कहते हैं
उदाहरण = हजज़ के मूल रुक्न मुफ़ाईलुन (१२२२) की तीसरी मात्रा को लघु करने से मुफ़ाइलुन (१२१२) रुक्न बनता है जो हजज़ का एक मुज़ाहिफ़ रुक्न है.
रजज़ का मूल रुक्न हैं मुस्तफ़्यलुन(२२१२), इस मूल रुक्न से मफ़ाइलुन(१२१२), फ़ाइलुन (२१२), मफ़ऊलुन (२२२) आदि उप रुक्न बनाया जा सकता है|
प्रत्येक मूल रुक्न से उप रुक्न बनाये गए हैं तथा अरूज़ानुसार इनकी संख्या सुनिश्चित है।
अरकान-
रुक्न का बहुवचन, रुक्न के दोहराव से जो समूह से निर्मित होते है उसे अरकान कहते हैं, यह छंद का सूत्र होता है और किसी रुक्न का शे'र में कितनी बार और कैसे प्रयोग हुआ है इससे ग़ज़ल की बह्'र का वास्तविक रूप सामने आता है
उदाहरण -
“फ़ाइलातुन”(२१२२) रमल का मूल रुक्न है।
फ़ाइलातुन / फ़ाइलातुन / फ़ाइलातुन / फ़ाइलातुन (२१२२/२१२२/२१२२/२१२२)
यह रुक्नों का एक समूह है जिसमें रमल के मूल रुक्न फ़ाइलातुन को चार बार रखा गया है ऐसा करने से एक बह्'र(छंद) का निर्माण होता है जिसे “बह्'र-ए-रमल मुसम्मन सालिम” कहते हैं| इस अरकान पर शे'र लिखा/कहा जा सकता है |
बह्'र - छंद, वह लयात्मकता जिस पर ग़ज़ल लिखी/ कही जाती है।
उदाहरण - बह्'र -ए- रमल, बह्'र -ए- हजज़, बह्'र -ए- रजज़ आदि
जुज़ -
रुक्न के खंड करने पर हमें जुज़ प्राप्त होते है अर्थात जुज़ एक इकाई है जिससे रुक्न का निर्माण होता है| जुज़ मात्रा के योग से बनता है और यह दूसरी सबसे छोटी इकाई है।
उदाहरण = फ़ाइलातुन(२१२२) तीन जुज़ से बना हैं (२+१२+२) इसमें पहला जुज़ २ मात्रिक है दूसरा जुज़ १२ मात्रिक है तथा तीसरा जुज़ फिर से दो मात्रिक है इस प्रकार फ़ाइलातुन को तोडने पर इस प्रकार टूटेगा = फ़ा + इला + तुन
रब्त = अंतर्संबंध
ज़िहाफ़ = रुक्न से मात्रा घटना या बढ़ना
ज़िहाफ़ = रुक्न से मात्रा घटाने अथवा बढ़ाने की क्रिया
मात्रा गणना -
ग़ज़ल में मात्रा गणना का एक स्पष्ट सरल और सीधा नियम है कि इसमें शब्दों को जैसा बोला जाता है (शुद्ध उच्चारण) मात्रा भी उस हिसाब से ही गिनाते हैं| हिन्दी में कमल = क/म/ल = १११ होता है मगर ग़ज़ल विधा में इस तरह मात्रा गणना नहीं करते बल्कि उच्चारण के अनुसार गणना करते हैं|
उच्चारण करते समय हम क+मल बोलते हैं इसलिए ग़ज़ल में ‘कमल’ = १२ होता है यहाँ पर ध्यान देने की बात यह है कि “कमल” का ‘“मल’” शाश्वत दीर्घ है अर्थात ज़रुरत के अनुसार गज़ल में ‘कमल’ शब्द की मात्रा को १११ नहीं माना जा सकता यह हमेशा १२ ही रहेगा।
‘उधर’- उच्च्चरण के अनुसार 'उधर' बोलते समय पहले उ बोलते हैं फिर धर बोलने से पहले पल भर रुकते हैं और फिर धर कहते हैं इसलिए इसके मात्रा गिनाते समय भी ऐसे ही गिनेंगे
अर्थात – उ+धर = उ १ धर २ = १२
मात्रा गिराने का नियम -
ग़ज़ल की मात्रा गणना के नियम में एक छूट मिलाती है जिसमें कुछ शब्दों को दीर्घ मात्रिक होते हुए भी उच्चारण अनुसार लघु मात्रिक मान लिया जाता है| यह छूट कम से कम लेनी चाहिए तथा ग़ज़ल लिखते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि कम से कम शब्दों की मात्रा को घटाया जाये|
उदाहरण - 'कोई' का वज़्न फैलुन(२२) होता है परन्तु इसे कुई - फ़अल (१२) तथा कोइ फ़ालु(२१) के वज़्न में भी प्रयोग किया जा सकता है इसे 'मात्रा का गिरना' कहते हैं |
इज़ाफ़त -
उर्दू भाषा में इज़ाफ़त का नियम है जिसके द्वारा दो शब्दों को अंतर सम्बंधित किया जाता है
उदाहरण - ‘नादाँ दिल’ को ‘दिल-ए-नादाँ’, कहा जा सकता है
इज़ाफ़त के पश्चात उर्दू लिपि में शब्द को जोड़ कर लिखा जाता है जैसे ‘दिल का दर्द’ को ‘दर्दे दिल’ लिखा जाता है| जिस व्यंजन में इज़ाफ़त के बाद 'ए' स्वर को योजित किया जाता है उसे लघु मात्रिक गिना जाता है अर्थात दर्दे दिल का वज़्न दर्२ दे१ दिल२ = फ़ाइलुन (२१२) होगा| परन्तु छूट है कि इज़ाफ़त को दीर्घ मात्रिक भी मान सकते हैं अर्थात दर्२ दे२ दिल२ = मफ्ऊलुन (२२२) भी किया जा सकता है|
अत्फ़ {वाव-ए-अत्फ़} -
उर्दू भाषा में जब दो शब्दों के बीच 'व' 'तथा' 'और' आदि शब्दों का प्रयोग किया जाता है तो वहाँ अत्फ़ का प्रयोग भी किया जा सकता है|
उदाहरण - 'सुब्ह और शाम' को 'सुब्हो शाम' कहा जा सकता है| इज़ाफ़त की तरह उर्दू के सुब्हो शाम को हिन्दी में सुब्ह-ओ-शाम लिखा जाता है और पढते समय इसे सुब्हो शाम के उच्चारण में पढ़ा जाता है| सुब्ह-ओ-शाम का वज़्न फ़ाइलातु (२१२१) होगा जिसे फ़ाईलातु(२२२१) भी माना जा सकता है|
अलिफ़ वस्ल -
नियम है कि यदि किसी शब्द के अंत में बिना मात्रा का व्यंजन आ रहा है और उसके तुरंत बा'द का शब्द दीर्घ स्वर से शुरू हो रहा है तो व्यंजन और स्वर का योग किया जा सकता है सकता है |
उदाहरण - रात आ = रा/त/आ = २१ २ को रात+आ = राता = २२ भी किया जा सकता है।
तक़्ती'अ -
मात्रा गणना, वह तरीक़ा जिसके द्वारा यह परखा जाता है कि शे'र निश्चित छंद (बह्'र) में है अथवा नहीं| बा-बह्'र ग़ज़ल लिखने के लिए तक़्ती'अ (मात्रा गणना) ही एक मात्र अचूक उपाय है, यदि शे'र की तक़्ती'अ करनी आ गई तो देर सवेर बह्'र में लिखना भी आ जाएगा क्योकि जब किसी शायर को पता हो कि मेरा लिखा शे'र बेबह्'र है तभी उसे सही करने का प्रयास करेगा और तब तक करेगा जब तक वह शे'र बाबह्'र न हो जाए| किसी शे'र की तक़्ती'अ करने के लिए पहले शे'र को लिखते हैं फिर उसके नीचे उसका रुक्न लिखते हैं तथा एक एक शब्द का रुक्न से मिलान करते हैं इस प्रकार पता चल जाता है कि शे'र निश्चित अरकान के अनुरूप है अथवा नहीं।
उदाहरण -
भरी बज़्म में राज़ की बात कह दी
बड़ा बे अदब हूँ सज़ा चाहता हूँ
-(अल्लामा इक़बाल)
इस शे'र को इस प्रकार तक्तीअ किया जायेगा
भरी बज़् / म में रा / ज़ की बा / त कह दी
फ़ईलुन / फ़ईलुन / फ़ईलुन / फ़ईलुन
(१२२ / १२२ / १२२ / १२२)
-------------------------------------------------------
बड़ा बे / अदब हूँ / सज़ा चा / हता हूँ
फ़ईलुन / फ़ईलुन / फ़ईलुन / फ़ईलुन
(१२२ / १२२ / १२२ / १२२)
इस प्रकार सिद्ध होता है कि शे'र में प्रत्येक रुक्न में वज़्न के अनुसार ही शब्दों को रखा गया है और यह ग़ज़ल बह्'र ए मुतक़ारिब मुसम्मन सालिम के अनुसार बाबह्'र है।
मुफ़रद सालिम बह्'र -
वो मूल बह्'र जिनमें कोई मात्रा घट बढ़ न की गई हो।
उदाहरण -
मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन (१२२२ १२२२ १२२२ १२२२)
बह्'र का नाम - बह्'र -ए- हजज़ मुसम्मन सालिम
मुफ़रद मुज़ाहिफ़ बह्'र -
जब मूल रुक्न की बह्'र में कोई मात्रा घट बढ़ की गई हो तथा उप बह्'र बनाई गई हो तो उसे मुफ़रद मुज़ाहिफ़ बह्'र कहते हैं।
उदाहरण -
फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन (२१२२ २१२२ २१२२ २१२२) के आख़िरी रुक्न के आख़िरी दीर्घ को लुप्त कर देने से हमें रमल बह्'र की एक मुज़ाहिफ़ सूरत प्राप्त होती है
फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलुन (२१२२ २१२२ २१२२ २१२)
बह्'र का नाम - बह्'र ए रमल मुसम्मन महज़ूफ़
मुरक्कब सालिम बह्'र -
वो बह्'र जो दो मूल अरकान के योग से बनी हो तथा जिनमें कोई मात्रा घट बढ़ न की गई हो
उदाहरण - बह्'र ए मुजारे मुफ़ाईलुन फ़ाइलातुन मुफ़ाईलुन फ़ाइलातुन (१२२२ २१२२ १२२२ २१२२)
मुरक्कब मुज़ाहिफ़ बह्'र -
वो बह्'र जो दो मूल अरकान के योग से बनी हो तथा कोई घट बढ़ करके उससे उप बह्'र बनाई गई हो उसे मुरक्कब मुज़ाहिफ़ बह्'र कहते हैं|
उदाहरण -
बह्'र -ए- मुजारे जिसका मूल रुक्न मुफ़ाईलुन फ़ाइलातुन मुफ़ाईलुन फ़ाइलातुन (१२२२ २१२२ १२२२ २१२२) है ।
इसके अरकान में कुछ मात्राओं को लुप्त कर के एक बहु प्रचिलित उप बह्'र बनाई गयी है - मुफ़ाइलुन फ़इलातुन मुफ़ाइलुन फैलुन (१२१२ ११२२ १२१२ २२) बनती है ।यह एक मुरक्कब मुज़ाहिफ़ बह्'र जिसका नाम है - मुजारे मुसम्मन मक्बूज, मख्बून, मक्बूज, मह्जूफो मक्तूअ
मुसना -
मुसना का शाब्दिक अर्थ है दो टुकड़े वाला| जिस बह्'र के दोनों मिसरों में कुल दो अरकान हों अर्थात जिस शे'र के एक मिसरे में मात्र एक रुक्न हो उस ग़ज़ल की बह्'र के नाम के साथ मुसना लिखते हैं।
उदाहरण -
रात गर हूँ
फिर सहर हूँ
संग वालों
फल शज़र हूँ
हसरतों की
रहगुज़र हूँ - (वीनस केसरी)
प्रस्तुत अश'आर के प्रत्येक शे'र में मात्र दो अरकान का प्रयोग हुआ है अतः एक मिसरे में मात्र एक रुक्न फ़ाइलातुन (२१२२) है इस प्रकार इस बह्'र के नाम के साथ मुसना लिखा जायेगा| इस बह्'र का नाम है - रमल मुसना सालिम
मुरब्बा -
मुरब्बा का शाब्दिक अर्थ है चौकोर, जिसका चार पहलू हो, चार कोण| जिस बह्'र के दोनों मिसरों में कुल चार अरकान हों अर्थात जिस शे'र के एक मिसरे में २ अरकान हों उस ग़ज़ल की बह्'र के नाम के साथ मुरब्बा लिखते हैं
मुसद्दस -
मुसद्दस का शाब्दिक अर्थ है छः पहलू वाला| जिस बह्'र के दोनों मिसरों में कुल छः रुक्न हों अर्थात जिस शे'र के एक मिसरे में तीन अरकान हों उस ग़ज़ल की बह्'र के नाम के साथ मुसद्दस लिखते हैं।
उदाहरण
जिस्म तक बेच डाले गए
पेट फिर भी न पाले गए
जितने आवारा थे शह्'र में
रहबरी दे के टाले गए - (जमील हापुडी)
प्रस्तुत अश'आर के प्रत्येक शे'र में छः अरकान का प्रयोग हुआ है अतः एक मिसरे में तीन अरकान फ़ाइलुन (२१२) हैं इस प्रकार इस बह्'र के नाम के साथ मुसद्दस लिखा जायेगा| इस बह्'र का नाम है - "मुतदारिक मुसद्दस सालिम"
मुसम्मन -
मुसम्मन का शाब्दिक अर्थ है आठ पहलू वाला| जिस बह्'र के दोनों मिसरों में कुल आठ अरकान हों अर्थात जिस शे'र के एक मिसरे में चार अरकान हों उस ग़ज़ल की बह्'र के नाम के साथ मुसम्मन लिखते हैं।
उदाहरण -
आज उस नाज़ुक अदा की याद फिर आयी बहुत
जिससे मेरी एक मुद्दत थी शनासाई बहुत
राहे उल्फ़त में निकालना था तकाज़ा-ए-जुनूं
वैसे मैं भी जानता था होगी रुसवाई बहुत - (पाशा रहमान)
प्रस्तुत अश'आर के प्रत्येक शे'र में आठ अरकान का प्रयोग हुआ है अतः एक मिसरे में चार अरकान फ़ाइलातुन (२१२२) हैं इस प्रकार इस बह्'र के नाम के साथ मुसद्दस लिखा जायेगा| आख़िरी रुक्न में फ़ाइलातुन जिहाफ़ द्वारा को फ़ाइलुन किया गया है इसलिए इस बह्'र का नाम है - रमल मुसम्मन मह्जूफ़
जुज़ के भेद-
जुज़ के तीन भेद हैं
१- सबब २- वतद ३- फ़ासला
सबब के भेद -
१- सबब ए ख़फ़ीफ़ - जिस जुज़ में दो स्वतंत्र लघु होते हैं उसे सबब ए खफीफ कहते हैं (११)
२- सबब ए सकील - जिस जुज़ में एक दीर्घ होता है उसे सबब ए सकील कहते हैं (२)
वतद के भेद-
(१)-वतद ए मुजमुअ - जिस जुज़ में पहले एक स्वतंत्र लघु फिर एक दीर्घ होता है उसे वतद ए मजमुअ कहते हैं (१२)
(२)- वतद ए मफरुक - जिस जुज़ में पहले एक दीर्घ फिर एक स्वतंत्र लघु होता है उसे वतद ए मजमुअ कहते हैं (२१)
फासला के भेद-
(१)- फ़ासला ए सुगरा - जिस जुज़ में पहले दो स्वतंत्र लघु फिर एक दीर्घ होता है उसे फ़ासला ए सुगरा कहते हैं (११२)
(२)- फ़ासला ए कुवरा - जिस जुज़ में पहले दो स्वतंत्र लघु फिर एक लघु व एक दीर्घ होता है उसे फ़ासला ए कुवरा कहते हैं (१११२)
अज्ज़ा = जुज़ के बहुवचन को 'अज्ज़ा' कहते हैं
अज्ज़ा -ए- रुक्न - मिसरे के अरकान को जब तोडते हैं तो हमें अज्ज़ा -ए- रुक्न प्राप्त होता है।
उदाहरण का शे'र –
हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए
- (दुष्यंत कुमार)
अज्ज़ा -ए- रुक्न - एक शेर में 6 खंड (हिस्से) होते हैं जैसे-
हो गई है / पीर पर्वत / सी पिघलनी / चाहिए (मिसरा -ए- उला)
इस हिमालय / से कोई गं / गा निकलनी / चाहिए (मिसरा -ए- सानी)
अज्ज़ा –ए- रुक्न के भेद - एक शे'र को अज्ज़ा -ए- रुक्न के अनुसार से ६ खंड में बांटा जाता है
१- सदर २- अरूज़ ३- हश्व ४- इब्तिदा ५- जरब ६- हश्व
(१) सदर - (शाब्दिक अर्थ – प्रारम्भ) शे'र के मिसरा-ए-उला के पहले रुक्न को रुक्न-ए-सदर कहते है क्योकि यहाँ से शे'र का प्रारंभ होता है |
उदाहरण –
हो गई है / पीर पर्वत / सी पिघलनी / चाहिए (उला)
इस हिमालय / से कोई गं / गा निकलनी / चाहिए (सानी)
इस शे'र में हो गई है शब्द मिसरा-ए-उला के पहले रुक्न में आ रहा है| यह रुक्न ए सदर है।
(२) अरूज़ - (शाब्दिक अर्थ – उत्कर्ष) शे'र के मिसरा-ए-उला के अंतिम रुक्न को रुक्न-ए-अरूज़ कहते हैं क्योकि यहाँ शे'र का उत्कर्ष होता है |
उदाहरण –
हो गई है / पीर पर्वत / सी पिघलनी / चाहिए (उला)
इस हिमालय / से कोई गं / गा निकलनी / चाहिए (सानी)
इस शे'र में चाहिए शब्द मिसरा-ए-उला के आख़िरी रुक्न में आ रहा है| यह रुक्न-ए-अरूज़ है
(३) हश्व - (शाब्दिक अर्थ – विकास) किसी शे'र के मिसरा ए उला के पहले खंड (सदर) तथा अंतिम खंड (अरूज़) के बीच में जितने भी खंड होते हैं उन्हें हश्व कहते हैं क्योकि यहाँ शे'र का विकास होता है |उदाहरण –
हो गई है / पीर पर्वत / सी पिघलनी / चाहिए (उला)
इस हिमालय / से कोई गं / गा निकलनी / चाहिए (सानी)
इस शे'र में पीर पर्वत / सी पिघलनी शब्द मिसरा-ए-उला के रुक्न-ए-सदर तथा रुक्न-ए-अरूज़ के बीच में आ रहा है | यह रुक्न-ए-हाश्व हैं
(४) इब्तिदा - (शाब्दिक अर्थ – आरम्भ) किसी शे'र के मिसरा ए सानी के पहले खंड को इब्तिदा कहते है क्योकि शायर शे'र लिखते समय पहले दूसरी पंक्ति लिखता है और बाद में पहली पंक्ति की गिरह लगता है तो देखा जाए तो शे'र लिखने की शुरुआत इसी खंड से होती है |
उदाहरण –
हो गई है / पीर पर्वत / सी पिघलनी / चाहिए (उला)
इस हिमालय / से कोई गं / गा निकलनी / चाहिए (सानी)
इस शे'र में इस "हिमालय" शब्द मिसरा-ए-सानी के पहले रुक्न में आ रहा है| यह रुक्न-ए-इब्तिदा है
(५) ज़रब - (शाब्दिक अर्थ – अंत) किसी शे'र के मिसरा ए सानी के अंतिम खंड को ज़रब कहते हैं क्योकि यहाँ शे'र का अंत होता है |
उदाहरण –
हो गई है / पीर पर्वत / सी पिघलनी / चाहिए (उला)
इस हिमालय / से कोई गं / गा निकलनी / चाहिए (सानी)
इस शे'र में "चाहिए" शब्द मिसरा-ए-सानी के आख़िरी रुक्न में आ रहा है| यह रुक्न-ए-ज़रब है
(६) हश्व - (शाब्दिक अर्थ – विकास) किसी शे'र के मिसरा ए सानी के पहले खंड (इब्तिदा) तथा अंतिम खंड (ज़रब) के बीच में जितने भी खंड होते हैं उन्हें भी हश्व कहते हैं क्योकि यहाँ भी शे'र का विकास होता है।
उदाहरण –
हो गई है / पीर पर्वत / सी पिघलनी / चाहिए (उला)
इस हिमालय / से कोई गं / गा निकलनी / चाहिए (सानी)
इस शे'र में "से कोई गं / गा" निकलनी शब्द मिसरा-ए-सानी के रुक्न-ए-इब्तिदा तथा रुक्न-ए-ज़रब के बीच में आ रहा है | यह रुक्न-ए-हाश्व हैं।
हश्वैन - हश्व का बहुवचन
( हश्व एक रुक्न, दो अथवा कई अरकान का भी हो सकता है।
उदाहरण -
अरकान में एक हश्व-
दिल ए नादाँ / तुझे हुआ / क्या है (उला)
आखिर इस दर् / द की दवा / क्या है (सानी)
- (असद उल्ला खां 'ग़ालिब')
अरकान में दो हश्व-
संभलने ही / नहीं देती / रवानी क्या / किया जाये (उला)
गुजरने को / है मेरे सर / से पानी क्या / किया जाये (सानी)
जो मिसरा केवल दो अरकान का होता है उसमें हश्व नहीं होता है |
उदाहरण -
देख नफ़रत से न देख
हम पे आवाज़ें न कस
- (रहमत अमरोहवी)
देख नफ़रत / से न देख (उला)
सदर / अरूज़
हम पे आवा / जें न कस (सानी)
इब्तिदा / ज़रब
अज्ज़ा –ए- रुक्न-
सुकूं भी ख़्वाब हुआ, नींद भी है कम कम फिर
क़रीब आने लगा दूरियों का मौसम फिर
-(परवीन शाकिर)
सुकूं भी ख़्वा / ब हुआ, नीं / द भी है कम / कम फिर (उला)
सदर / हश्व / हश्व / अरूज़
क़रीब आ / ने लगा दू / रियों का मौस / म फिर (सानी)
इब्तिदा / हश्व / हश्व / ज़रब

Week 7 Module 7 आलेख 1- वज़्न (मात्रा भार) की गणना



आलेख 1- 
वज़्न (मात्रा भार) की गणना

छंदबद्ध रचना के लिये मात्राभार की गणना का ज्ञान आवश्यक है।
मात्राभार दो प्रकार का होता है– वर्णिक भार और वाचिक भार। 
वर्णिक भार में प्रत्येक वर्ण का भार अलग-अलग यथावत लिया जाता है जैसे– विकल का वर्णिक भार = 111 या ललल जबकि वाचिक भार में उच्चारण के अनुरूप वर्णों को मिलाकर भार की गणना की जाती है जैसे विकल का उच्चारण वि कल है, विक ल नहीं, इसलिए विकल का वाचिक भार है – 12 या लगा। वर्णिक भार की गणना करने के लिए कुछ निश्चित नियम हैं।
वर्णिक भार की गणना-
---------------------------
(1) ह्रस्व स्वरों की मात्रा 1 होती है जिसे लघु कहते हैं, जैसे - अ, इ, उ, ऋ की मात्रा 1 है। लघु को 1 या । या ल से व्यक्त किया जाता है।
(2) दीर्घ स्वरों की मात्रा 2 होती है जिसे गुरु कहते हैं, जैसे-आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ की मात्रा 2 है। गुरु को 2 या S या गा से व्यक्त किया जाता है।
(3) व्यंजनों की मात्रा 1 होती है , जैसे -क,ख,ग,घ / च,छ,ज,झ / ट,ठ,ड,ढ,ण / त,थ,द,ध,न / प,फ,ब,भ,म /य,र,ल,व,श,ष,स,ह।
वास्तव में व्यंजन का उच्चारण स्वर के साथ ही संभव है, इसलिए उसी रूप में यहाँ लिखा गया है। अन्यथा क्, ख्, ग् … आदि को व्यंजन कहते हैं, इनमें अकार मिलाने से क, ख, ग ... आदि बनते हैं जो उच्चारण योग्य होते हैं।
(4) व्यंजन में ह्रस्व इ, उ, ऋ की मात्रा लगने पर उसका मात्राभार 1 ही रहता है।
(5) व्यंजन में दीर्घ स्वर आ, ई, ए, ऐ, ओ, औ की मात्रा लगने पर उसका मात्राभार 2 हो जाता है।
(6) किसी भी वर्ण में अनुनासिक लगने से मात्राभार में कोई अन्तर नहीं पडता है, जैसे – रँग = 11, चाँद = 21, माँ = 2, आँगन = 211, गाँव = 21
(7) लघु वर्ण के ऊपर अनुस्वार लगने से उसका मात्राभार 2 हो जाता है, जैसे– रंग = 21, अंक = 21, कंचन = 211, घंटा = 22, पतंगा = 122
(8) गुरु वर्ण पर अनुस्वार लगने से उसके मात्राभार में कोई अन्तर नहीं पडता है, जैसे – नहीं = 12, भींच = 21, छींक = 21,
कुछ विद्वान इसे अनुनासिक मानते हैं लेकिन मात्राभार यही मानते हैं।
(9) संयुक्ताक्षर का मात्राभार 1 (लघु) होता है, जैसे – स्वर = 11, प्रभा = 12, श्रम = 11, च्यवन = 111
(10) संयुक्ताक्षर में ह्रस्व मात्रा लगने से उसका मात्राभार 1 (लघु) ही रहता है, जैसे– प्रिया = 12, क्रिया = 12, द्रुम = 11, च्युत = 11, श्रुति = 11, स्मित = 11
(11) संयुक्ताक्षर में दीर्घ मात्रा लगने से उसका मात्राभार 2 (गुरु) हो जाता है, जैसे – भ्राता = 22, श्याम = 21, स्नेह = 21, स्त्री = 2, स्थान = 21
(12) संयुक्ताक्षर से पहले वाले लघु वर्ण का मात्राभार 2 (गुरु) हो जाता है, जैसे – नम्र = 21, सत्य = 21, विख्यात = 221
(13) संयुक्ताक्षर के पहले वाले गुरु वर्ण के मात्राभार में कोई अन्तर नहीं पड़ता है, जैसे– हास्य = 21, आत्मा = 22, सौम्या = 22, शाश्वत = 211, भास्कर = 211
(14) संयुक्ताक्षर सम्बन्धी नियम (12) के कुछ अपवाद भी हैं, जिसका आधार पारंपरिक उच्चारण है, अशुद्ध उच्चारण नहीं।
जैसे– तुम्हें = 12, तुम्हारा/तुम्हारी/तुम्हारे = 122, जिन्हें = 12, जिन्होंने = 122, कुम्हार = 122, कन्हैया = 122, मल्हार = 121, कुल्हाड़ी = 122, इनमें संयुक्ताक्षर से पहले वाला लघु वर्ण लघु ही बना रहता है।
अपवाद की व्याख्या –
इन अपवादों में संयुक्ताक्षर का पूर्ववर्ती अक्षर सदैव ऐसा व्यंजन होता है जिसका ‘ह’ के साथ योग करके कोई नया अक्षर हिन्दी वर्ण माला में नहीं बनाया गया है, इसलिए जब इस पूर्ववर्ती व्यंजन का ‘ह’ के साथ योग कर कोई संयुक्ताक्षर बनता हैं तो उसका व्यवहार संयुक्ताक्षर जैसा न होकर एक नए वर्ण जैसा हो जाता है और इसीलिए उसपर संयुक्ताक्षर के नियम लागू नहीं होते हैं। उदाहरण के लिए न् म् ल् का ‘ह’ के साथ योग करने से बनने वाले संयुक्ताक्षर म्ह न्ह ल्ह ‘एक वर्ण’ जैसा व्यवहार करते है जिससे उनके पहले आने वाले लघु का भार 2 नहीं होता अपितु 1 ही रहता है। यहाँ पर यह भी उल्लेखनीय है कि हिन्दी वर्णमाला के कवर्ग, चवर्ग, टवर्ग, तवर्ग और पवर्ग में पहले व्यंजन में ‘ह’ का योग करने से दूसरा व्यंजन तथा तीसरे व्यंजन में ‘ह’ का योग करने से चौथा व्यंजन बनता है।
उदाहरणार्थ -
क् + ह = ख , ग् + ह = घ
च् + ह = छ , ज् + ह = झ
ट् + ह = ठ , ड् + ह = ढ
त् + ह = थ , द् + ह = ध
प् + ह = फ , ब् + ह = भ किन्तु -
न् + ह = न्ह , म् + ह = म्ह , ल् + ह = ल्ह (कोई नया वर्ण नहीं, तथापि व्यवहार नए वर्ण जैसा)
   
कुछ उदाहरण ऐसे भी हैं जिनपर उपर्युक्त व्याख्या लागू नहीं होती है, जैसे नन्हा = 22, कुल्हड़ = 211, अल्हड़ = 211 आदि।
वाचिक भार की गणना-
----------------------------
     वाचिक भार की गणना करने में ‘उच्चारण के अनुरूप’ दो लघु वर्णों को मिलाकर एक गुरु मान लिया जाता है। उदहरणार्थ निम्न शब्दों के वाचिक भार और वर्णिक भार का अंतर दृष्टव्य है -
उदाहरण                     वाचिक भार         वर्णिक भार
कल, दिन, तुम, यदि आदि           2 / गा            11 / लल    
अमर, विकल आदि                 12 / लगा          111 / ललल
उपवन, मघुकर आदि              22 / गागा          1111 / लललल
नीरज, औषधि आदि                22 / गागा            211 / गालल
चलिए, सुविधा आदि               22 / गागा          112 / ललगा
आइए, माधुरी आदि                 212 / गालगा         212 / गालगा
सुपरिचित, अविकसित आदि          122 (212 नहीं)       11111 / ललललल
मनचली, किरकिरी आदि             212 (122 नहीं)       1112 / लललगा
असुविधा, सरसता आदि             122 (212 नहीं)       1112 / लललगा
कलन की कला
     जब हम किसी काव्य पंक्ति के मात्राक्रम की गणना करते हैं तो इस क्रिया को कलन कहते हैं, उर्दू में इसे तख्तीअ कहा जाता है। किसी काव्य पंक्ति का कलन करने के पूर्व यह समझ लेना आवश्यक है वह पंक्ति मात्रिक छंद पर आधारित है या फिर वर्णिक छंद पर। यदि पंक्ति मात्रिक छंद पर आधारित है तो कलन में वाचिक भार का प्रयोग किया जाता है  और उसे वाचिक कलन कहते हैं तथा यदि पंक्ति वर्णिक छंद पर आधारित है तो कलन में वर्णिक भार का प्रयोग किया जाता है और उसे वर्णिक कलन कहते हैं। एक बात और, काव्य पंक्ति का कलन करते समय मात्रापतन का ध्यान रखना भी आवश्यक है अर्थात जिस गुरु वर्ण में मात्रापतन है उसका भार लघु अर्थात 1 ही माना जाएगा। उदाहरणों से यह बात पूर्णतः स्पष्ट हो जायेगी।
वर्णिक कलन
इसे समझने के लिए महाकवि रसखान की एक पंक्ति लेते हैं -
मानुस हौं तो वही रसखान बसौं ब्रज गोकुल गाँव के ग्वारन
यह पंक्ति वर्णिक छंद किरीट सवैया पर आधारित है, इसलिए हम इसका कलन करने में वर्णिक भार का ही प्रयोग करेंगे।
पहले हम सभी शब्दों का वर्णिक भार अलग-अलग देखते हैं -
मानुस (211) हौं (2) तो’ (1) वही (12) रसखान (1121) बसौं (12) ब्रज (11) गोकुल (211) गाँव (21) के’ (1) ग्वारन (211)
इस कलन में प्रत्येक वर्ण का अलग-अलग भार यथावत लिखा गया है, मात्रापतन के कारण ‘तो’ और ‘के’ का भार लघु या 1 लिया गया है। यह वर्णिक  छंद गणों पर आधारित है, इसलिए इसके मात्राक्रम का विभाजन गणों के अनुरूप निम्नप्रकार करते हैं -
मानुस/ हौं तो’ व/ही रस/खान ब/सौं ब्रज/ गोकुल/ गाँव के’/ ग्वारन
211/ 211/ 211/ 211/ 211/ 211/ 211/ 211 (अंकावली)
गालल गालल गालल गालल गालल गालल गालल गालल (लगावली)
भानस भानस भानस भानस भानस भानस भानस भानस (गणावली)
वाचिक कलन
इसे समझने के लिए हम डॉ. कुँवर बेचैन के गीत की एक पंक्ति का उदाहरण लेते हैं -
नदी बोली समंदर से मैं तेरे पास आयी हूँ
यह पंक्ति मात्रिक छंद (विधाता) पर आधारित है, इसलिए वाचिक भार का प्रयोग करते हुए इसका कलन निम्नप्रकार करते हैं -
नदी (12) बोली (22) समंदर (122) से (2) मैं’ (1) तेरे (22) पास (21) आयी (22) हूँ (2)
इस कलन में उच्चारण के अनुरूप ‘समंदर’ के अंतिम दो लघु 11 को मिलाकर एक गुरु 2 माना गया है (वाचिक भार) तथा दबाकर उच्चारण करने के कारण ‘मैं’ का भार गुरु न मानकर लघु माना गया है (मात्रापतन)।
पारंपरिक ढंग से इस कलन को हम ऐसे भी लिख सकते हैं -
नदी बोली/ समंदर से/ मैं’ तेरे पा/स आयी हूँ 1222/    1222/   1222/   1222 (अंकावली)
लगागागा लगागागा लगागागा लगागागा (लगावली)
यमातागा यमातागा यमातागा यमातागा (स्वरावली)
विशेष
छंदस काव्य की रचना प्रायः लय के आधार पर ही जाती है जो किसी उपयुक्त काव्य को उन्मुक्त भाव से गाकर अनुकरण से आत्मसात होती है। बाद में मात्राभार की सहायता से अपने बनाये काव्य का कलन करने से त्रुटियाँ सामने आ जाती हैं और उनका परिमार्जन हो जाता है और दूसरे के काव्य का निरीक्षण और परिमार्जन करने में भी कलन बहुत उपयोगी होता है।
संदर्भ
1 छंद विधान, लेखक- आचार्य रामदेव लाल विभोर, प्रकाशक- प्रतिष्ठा साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्था, 558/28 घ, सुंदर नगर, आलमबाग, लखनऊ 226005
2 छंद प्रभाकर, लेखक- जगन्नाथ प्रसाद 'भानुकवि', प्रकाशक- उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, राजर्षि पुरुषोत्तमदास टंडन हिन्दी भवन, 6, महात्मा गांघी मार्ग, हजरतगंज, लखनऊ
3 गीतिका दर्पण, लेखक- ओम नीरव , प्रकाशक- सुभांजलि प्रकाशन, 28/11, अलीगंज कॉलोनी, टी पी नगर, कानपुर - 208023

Week 7 Module 7 आलेख 2- तकतीअ और बहर [ग़ज़ल : शिल्प और संरचना]



आलेख 2- 
तकतीअ और बहर [ग़ज़ल : शिल्प और संरचना] - सतपाल 'ख्याल'
ग़ज़ल लिखने की कला का सबसे अहम पहलू है- बहर का ज्ञान।
बहर की यदि बात करें तो फ़ारसी के ये भारी भरकम शब्द जैसे फ़ाइलातुन, मसतफ़ाइलुन या तमाम बहरों के नाम आप को याद करने की ज़रूरत नही है। ये सब उबाऊ है इसे दिलचस्प बनाने की कोशिश करनी है।
आप समझें कि संगीतकार जैसे गीतकार को एक धुन दे देता है कि इस पर गीत लिखो.. गीतकार उस धुन को बार-बार गुनगुनाता है और अपने शब्द उस मीटर / धुन / ताल में फिट कर देता है बस.. गीतकार को संगीत सीखने की ज़रूरत नहीं है उसे तो बस धुन को पकड़ना है।
ये तमाम बहरें जिनका हमने ज़िक्र किया ये आप समझें एक किस्म की धुनें हैं। आपने देखा होगा छोटा सा बच्चा टी.वी पर गीत सुनके गुनगुनाना शुरू कर देता है वैसे ही आप भी इन बहरों की लय या ताल कॊ पकड़ें और शुरू हो जाइये। हाँ बस आपको शब्दों का वज़्न करना ज़रूर सीखना है जो आप उदाहरणों से समझ जाएंगे।
हम शब्द को उस आधार पर तोड़ेंगे जिस आधार पर हम उसका उच्चारण करते हैं। शब्द की सबसे छोटी इकाई होती है वर्ण, तो शब्दों को हम वर्णों मे तोड़ेंगे।  
वर्ण-
वर्ण वह ध्वनि हैं जो किसी शब्द को बोलने में एक समय में हमारे मुँह से निकलती है और ध्वनियाँ केवल दो ही तरह की होती हैं या तो लघु (छोटी)  या दीर्घ (बड़ी)। अब हम कुछ शब्दों को तोड़कर देखते हैं और समझते हैं, जैसे:
"आकाश"
ये तीन वर्णो से मिलकर बना है- आ+ का+ श
अब छोटी और बड़ी आवाज़ों के आधार पर या आप कहें कि गुरु और लघु के आधार पर हम इन्हें चिह्नित कर लेंगे. गुरु के लिए "2 " और लघु के लिए " 1" का इस्तेमाल करेंगे. जैसे:
सि+ता+रों के आ+गे ज+हाँ औ+र भी हैं.
(1+2+2 1+ 2+2 1+2+2 1+ 2+2)
अब हम इस एक-दो के समूहों को अगर ऐसे लिखें.
122 122 122 122 
हम अब यहाँ से आगे चलते हैं बहरो की तरफ़। मगर उससे पहले कुछ परिभाषाएँ देख लें जो आगे प्रयोग होंगी- 
तकटीअ:-
======
वो विधि जिस के द्वारा हम किसी मिसरे या शे'र को अरकानों के तराज़ू मे तौलते हैं, ये विधि तकतीअ कहलाती है। तकतीअ से पता चलता है कि शे'र किस बहर में है या ये बहर से खारिज़ है। सबसे पहले हम बहर का नाम लिख देते हैं।, फिर वो सालिम है या मुज़ाहिफ़ है. मसम्मन ( आठ अरकान ) की है इत्यादि.
अरकान और ज़िहाफ़:
=============
अरकानों के बारे में तो हम जान गए हैं कि आठ अरकान जो बनाये गए जो आगे चलकर बहरों का आधार बने. ये इन आठ अरकानों में कोशिश की गई की तमाम आवाज़ों के संभावित नमूनों को लिया जाए।
रुक्न या अरकान (रुक्न का बहुवचन)
======================
शेर का वज़्न करने के लिए कुछ अल्फ़ाज़ सुनिश्चित हैं जिन्हें अरकान कहते है। जिनके विभिन्न संयोजन से बहर बनती हैं। यहां लघु(१) व दीर्घ (२) के हिसाब से 8 अरकान दिए जा रहे हैं-
आठ बेसिक अरकान:
=============
1. फ़ा-इ-ला-तुन (2-1-2-2)   2. मु-त-फ़ा-इ-लुन(1-1-2-1-2)
3. मस-तफ़-इ-लुन(2-2-1-2)   4. मु-फ़ा-ई-लुन(1-2-2-2)
5. मु-फ़ा-इ-ल-तुन (1-2-1-1-2)  6.मफ़-ऊ-ला-त(2-2-2-1)
7. फ़ा-इ-लुन(2-1-2) और 8. फ़-ऊ-लुन(1-2-2)
ज़िहाफ़ इन अरकानों के ही टूटे हुए रूप को कहते हैं जैसे:फ़ाइलातुन(२१२२) से फ़ाइलुन(२१२).
मसम्मन और मुसद्द्स:
=============
लंबाई के लिहाज़ से बहरें दो तरह की होती हैं मसम्मन और मुसद्द्स. जिस बहर के एक मिसरे में चार और शे'र में आठ अरकान हों उसे मसम्मन बहर कहा जाता है और जिनमें एक मिसरे मे तीन शे'र में छ: उन बहरों को मुसद्द्स कहा जाता है. जैसे:
सितारों के आगे जहाँ और भी हैं
(122 122 122 122)
अभी इश्क़ के इम्तिहाँ और भी हैं.
(122 122 122 122)
यह आठ अरकान वाली बहर है तो यह मसम्मन बहर है.
मफ़रिद या मफ़रद और मुरक्कब बहरें:
=======================
जिस बहर में एक ही रुक्न इस्तेमाल होता है वो मफ़रद और जिनमे दो या अधिक अरकान इस्तेमाल होते हैं वो मुरक्कब कहलातीं हैं जैसे:
सितारों के अगे यहाँ और भी हैं
(122 122 122 122)
ये मफ़रद बहर है क्योंकि सिर्फ फ़ऊलुन ४ बार इस्तेमाल हुआ है।
अगर दो अरकान रिपीट हों तो उस बहर को बहरे-शिकस्ता कहते हैं जैसे:-
फ़ाइलातुन फ़ऊलुन फ़ाइलातुन फ़ऊलुन
अब अगर मैं बहर को परिभाषित करूँ तो आप कह सकते हैं कि बहर एक मीटर है, एक लय है, एक ताल है जो अरकानों या उनके ज़िहाफ़ों के साथ एक निश्चित तरक़ीब से बनती है. असंख्य बहरें बन सकती है एक समूह से।
जैसे एक समूह है:
122 122 122 122
इसके कई रूप हो सकते हैं जैसे:
122 122 122 12
122 122 122 1
122 122
122 122 1
सबसे पहली बहार है: बहरे-मुतका़रिब
1.मुत़कारिब (122x4) मसम्मन सालिम
(चार फ़ऊलुन )
*सितारों के आगे जहाँ और भी हैं
अभी इश्क़ के इम्तिहां और भी हैं.
*कोई पास आया सवेरे-सवेरे
मुझे आज़माया सवेरे-सवेरे.
ये दोनों शे'र बहरे-मुतकारिब में हैं और ये बहुत मक़बूल बहर है. बहर का सालिम शक्ल में इस्तेमाल हुआ है यानि जिस शक्ल में बहर के अरकान थे उसी शक्ल मे इस्तेमाल हुए.ये मसम्मन बहर है इसमे आठ अरकान हैं एक शे'र में.तो हम इसे लिखेंगे: बहरे-मुतका़रिब मफ़रद मसम्मन सालिम.अगर बहर के अरकान सालिम या शु्द्ध शक्ल में इस्तेमाल होते हैं तो बहर सालिम होगी अगर वो असल शक्ल में इस्तेमाल न होकर अपनी मुज़ाहिफ शक्ल में इस्तेमाल हों तो बहर को मुज़ाहिफ़ कह देते हैं.सालिम मतलब जिस बहर में आठ में से कोई एक बेसिक अरकान इस्तेमाल हुआ हो. हमने पिछले लेख मे आठ बेसिक अरकान का ज़िक्र किया था जो सारी बहरों का आधार है.मुज़ाहिफ़ मतलब अरकान की बिगड़ी हुई शक्ल.जैसे फ़ाइलातुन सालिम शक्ल है और फ़ाइलुन मुज़ाहिफ़. सालिम शक्ल से मुज़ाहिफ़ शक्ल बनाने के लिए भी एक तरकीब है जिसे ज़िहाफ़ कहते हैं.तो हर बहर या तो सालिम रूप में इस्तेमाल होगी या मुज़ाहिफ़ मे, कई बहरें सालिम और मुज़ाहिफ़ दोनों रूप मे इस्तेमाल होती हैं. अरकानों से ज़िहाफ़ बनाने की तरकीब बाद में बयान करेंगे.हम हर बहर के मुज़ाहिफ़ और सालिम रूप की उदाहरणों का उनके गुरु लघु तरकीब से, अरकानों के नाम देकर समझेंगे जो मैं समझता हूँ कि आसान होगा, नहीं तो ये खेल पेचीदा हो जाएगा.
बहरे-मुतका़रिब मुज़ाहफ़ शक्लें:-
1. फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊ
(फ़ऊ या फ़+अल)
122 122 122 12
गया दौरे-सरमायादारी गया
तमाशा दिखा कर मदारी गया.(इक़बाल)
दिखाई दिए यूँ कि बेखुद किया
हमें आप से भी जुदा कर चले.(मीर)
(ये महज़ूफ ज़िहाफ़ का नाम है)
2: फ़ऊल फ़ालुन x 4
121 22 x4
(सौलह रुक्नी)
ज़ेहाल-ए-मिस्कीं मकुन तग़ाफ़ुल दुराये नैना बनाये बतियाँ
कि ताब-ए-हिज्राँ न दारम ऐ जाँ न लेहु काहे लगाये छतियाँ
हज़ार राहें जो मुड़के देखीं कहीं से कोई सदा न आई.
बड़ी वफ़ा से निभाई तूने हमारी थोड़ी सी बेवफ़ाई.
3: फ़ऊल फ़ालुन x 2
121 22 x 2
वो ख़त के पुरज़े उड़ा रहा था.
हवाओं का रुख दिखा रहा था.
4:फ़ालुन फ़ऊलुन x2 - (22 122 x2)
नै मुहरा बाक़ी नै मुहरा बाज़ी
जीता है रूमी हारा है काज़ी (इकबाल)
5: फ़ाइ फ़ऊलुन- 21 122 x 2
सोलह रुक्नी- 21 122 x4
6:चार फ़ेलुन या आठ रुक्नी- 22 22 22 22
इस बहर में एक छूट है इसे आप इस रूप में भी इस्तेमाल कर सकते हैं.
211 2 11 211 22
दूसरा, चौथा और छटा गुरु लघु से बदला जा सकता है-
एक मुहव्ब्त लाख खताएँ
वजह-ए-सितम कुछ हो तो बताएँ.
अपना ही दुखड़ा रोते हो
किस पर अहसान जताते हो.(ख्याल)
7: सोलह रुक्नी- 22 22 22 22 22 22 22 2(11)
यहाँ पर हर गुरु की जग़ह दो लघु आ सकते हैं सिवाए आठवें गुरु के ।
* दूर है मंज़िल राहें मुशकिल आलम है तनहाई का
आज मुझे अहसास हुआ है अपनी शिकस्ता पाई का.(शकील)
* एक था गुल और एक थी बुलबुल दोनों चमन में रहते थे
है ये कहानी बिल्कुल सच्ची मेरे नाना कहते थे.(आनंद बख्शी)
* पत्ता-पत्ता बूटा-बूटा हाल हमारा जाने है
जाने न जाने गुल ही न जाने बाग़ तो सारा जाने है.(मीर)
और..
एक ये प्रकार है-
22 22 22 22 22 22 22
इसमे हर गुरु की जग़ह दो लघु इस्तेमाल हो सकते हैं.
8: फ़ालुन फ़ालुन फ़ालुन फ़े- 22 22 22 2
अब इसमे छूट भी है इस को इस रूप में भी इस्तेमाल कर सकते हैं-
211 211 222
* मज़हब क्या है इस दिल में
इक मस्जिद है शिवाला है
अब मुद्दे की बात करते हैं आप समझ लें कि मैं संगीतकार हूँ और आप गीतकार या ग़ज़लकार तो मैं आपको एक धुन देता हूँ जो बहरे-मुतकारिब मे है. आप उस पर ग़ज़ल कहने की कोशिश करें. इस बहर को याद रखने के लिए आप चाहे इसे :-
फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन
(122 122 122 122)
या
छमाछम छमाछम छमाछम छमाछम
या
तपोवन तपोवन तपोवन तपोवन
कुछ भी कह लें महत्वपूर्ण है इसका वज़्न, बस...
1.बहरे- मुत़कारिब
(122x4)
(चार फ़ऊलुन )
एक बहुत ही मशहूर गीत है जो इस बहर मे है वो है-
अ+के+ले अ+के+ले क+हाँ जा र+हे हो
(1+2+2 1+2+2 1+2+2 1+2+2)
मु+झे सा+थ ले लो ज+हाँ जा र+हे हो
(1+2+2 1+ 2+2 1+2+ 2 1+2+2)
अब आप कोशिश कर सकते हैं. इसे गुनगुनाएँ और ग़ज़ल कहने की कोशिश करें।
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