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Saturday, 4 July 2020
तंज़-ओ-मिज़ाह (हास्य और व्यंग) शायरी की दुनिया.....आनंद कक्कड़
Saturday, 27 June 2020
Digital Shayari Class Series: Week 8 Module 8 : आलेख 4 तरही ग़ज़ल व मुशायरा : आलेख 5 :दूसरे की ज़मीन पर अपनी खेती
एक ऐसा मुशायरा जहाँ पहले से ही कोई एक पंक्ति बता दी जाए और सभी शाइर अपनी अपनी ग़ज़ल्स उसी पंक्ति को ले कर लिखें| इस पंक्ति को ही तरही का मिसरा कहते हैं|
चाँदनी दिल दुखाती रही रात भर
शम-ए-ग़म झिलमिलाती रही रात भर
कोई तस्वीर गाती रही रात भर
कोई क़िस्सा सुनाती रही रात भर
हर सदा पर बुलाती रही रात भर
इक तमन्ना सताती रही रात भर
चश्म-ए-नम मुस्कुराती रही रात भर
गम की लौ थरथराती रही रात भर
याद बन बनके आती रही रात भर
चाँदनी जगमगाती रही रात भर
कोई आवाज़ आती रही रात भर
ग़ज़ल दूसरों की ज़मीन पर अपनी खेती
देवमणि पांडेय
इस बार आपके लिए देवमणि पांडेय का इक लेख प्रस्तुत कर रहे है आशा है आपको पसंद आएगा यह पहले ही उनके ब्लॉग पर प्रकाशित हो चुका है जो इस विषय पर सटीक लेख है।
-आनंद कक्कड़ (सयोजक कहकशाँ)
जनाब देवमणि पांडेय जी ने लिखा कि "हमारे एक दोस्त का कहना है कि ग़ज़ल दूसरों की ज़मीन पर अपनी खेती है। बतौर शायर आप भले ही दावा करें कि आपने नई ज़मीन ईजाद की है मगर सच यही है कि आप दूसरों की ज़मीन पर ही शायरी की फ़सल उगाते हैं। कोई ऐसा क़ाफ़िया, रदीफ़ या बहर बाक़ी नहीं है जिसका इस्तेमाल शायरी में न हुआ हो। कोई-कोई ज़मीन तो ऐसी है जिसका बहुत ज़्यादा इस्तेमाल हो चुका है और लगातार होता रहेगा। मसलन शायद ही कोई ऐसा शायर हो जिसने मोमिन साहब की इस ज़मीन पर ग़ज़ल की फ़सल न उगाई हो-
तुम मेरे पास होते हो गोया जब कोई दूसरा नहीं होता तुम हमारे किसी तरह न हुए वर्ना दुनिया में क्या नहीं होता
सौ साल पहले की बात है। शहर लखनऊ में एक शायर हुए अर्सी लखनवी। मुशायरों में उनका एक शेर काफ़ी मक़बूल हुआ था –
कफ़न दाबे बगल में घर से में निकला हूँ मैं ऐ अर्सी
न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए
डॉ.बशीर बद्र ने फ़न का कमाल दिखाया, ऊपर का मिसरा हटाया और बड़ी ख़ूबसूरती से अपना मिसरा लगाया। आप जानते ही हैं कि यही ख़ूबसूरत शेर आगे चलकर जनाब बशीर बद्र का पहचान पत्र बन गया -
उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो
न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए
मुझे लगता है की ख़याल की सरहदें नहीं होतीं। यानी दुनिया में कोई भी दो शायर एक जैसा सोच सकते हैं। एक ही ज़मीन पर जाने-अनजाने दो फ़नकार शायरी की एक जैसी फ़सल उगा सकते हैं। अपने स्कूली दिनों में यानी 35 साल पहले किसी का अशआर सुना था जो अब तक याद है-
भीग जाती हैं जो पलकें कभी तनहाई में / काँप उठता हूँ कोई जान न ले ये भी डरता हूँ मेरी आँखों में / तुझे देख के कोई पहचान न ले
पाकिस्तान की मशहूर शायरा परवीन शाकिर का भी इसी ख़याल पर एक शेर नज़र आया –
काँप उठती हूँ मैं ये सोच के तनहाई में
मेरे चेहरे पे तेरा नाम न पढ़ ले कोई
ख़यालों की ये समानता इशारा करती है कि सोच की सरहदें इंसान द्वारा बनाई गई मुल्क की सरहदों से अलग होती हैं। शायर कैफ़ी आज़मी ने नौजवानी के दिनों में एक ग़ज़ल कही थी। वो इस तरह है -
मैं ढूँढ़ता जिसे हूँ वो जहाँ नहीं मिलता
नई ज़मीन नया आसमाँ नहीं मिलता
वो तेग़ मिल गई जिससे हुआ है क़त्ल मेरा
किसी के हाथ का इस पर निशां नहीं मिलता
निदा फ़ाज़ली साहब जवान हुए तो उन्होंने कैफ़ी साहब के सिलसिले को इस तरह आगे बढ़ाया -
कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता
कभी ज़मी तो कभी आसमां नहीं मिलता
फ़िल्म ‘आहिस्ता-आहिस्ता’ में शामिल निदा साहब की यह ग़ज़ल भूपिंदर सिंह की आवाज़ में इतनी ज्यादा पसंद की गई कि लोग कैफ़ी साहब की ग़ज़ल भूल गए।
मुशायरे के मंच पर भी दिलचस्प प्रयोग मिलते हैं। कभी-कभी दो शायर एक दूसरे की मौजूदगी में एक ही ज़मीन में एक जैसा नज़र आने वाले शेर पढ़ते हैं। सामयीन ऐसी शायरी का बड़ा लुत्फ़ उठाते हैं।
शायर मुनव्वर राना का एक शेर इस तरह मुशायरों में सामने आया -
उन घरों में जहाँ मिट्टी के घड़े रहते हैं
क़द में छोटे हैं मगर लोग बड़े रहते हैं
डॉ.राहत इंदौरी अपने निराले अंदाज़ में अपना परचम इस तरह लहराया-
ये अलग बात कि ख़ामोश खड़े रहते हैं
फिर भी जो लोग बड़े हैं वो बड़े रहते है
दोनों शायरों को मुबारकबाद दीजिए कि उन्होंने अपने इल्मो-हुनर से लोगों को बड़ा बनाया। मुंबई में मुशायरे के मंच पर सबसे पहले हसन कमाल ने ये कलाम सुनाया-
ग़ुरूर टूट गया है, ग़ुमान बाक़ी है
हमारे सर पे अभी आसमान बाक़ी है
इसके बाद डॉ.राहत इंदौरी ने फ़ैसला सुनाया-
वो बेवकूफ़ ज़मीं बाँटकर बहुत ख़ुश है
उसे कहो कि अभी आसमान बाक़ी है
उसके बाद राजेश रेड्डी के तरन्नुम ने कमाल दिखाया – जितनी बँटनी थी बँट गई ये ज़मीं
अब तो बस आसमान बाक़ी है
राजेश रेड्डी बा-कमाल शायर हैं, उनके बारे में मशहूर है कि वे बड़ी पुरानी ज़मीन में बड़ा नया शेर कहते हैं। मसलन जोश मल्सियानी का शेर है-
बुत को लाए हैं इल्तिजा करके
कुफ़्र टूटा ख़ुदा ख़ुदा करके
राजेश रेड्डी ने इस पुरानी ज़मीन में नई फ़सल उगाने का ऐसा कमाल दिखाया कि उनके फ़न को जगजीत सिंह जैसे मक़बूल सिंगर ने अपने सुर से सजाया-
घर से निकले थे हौसला करके
लौट आए ख़ुदा ख़ुदा करके
अभी तक ये तय नहीं हो पाया है कि इस ज़मीन का असली मालिक कौन है। मैंने शायर निदा फ़ाज़ली से इसका ज़िक्र किया। वे मुस्कराए- 'अभी तक इन…..को पता ही नहीं है कि आसमान बँट चुका है।
इनको एक हवाई जहाज़ में बिठाकर कहो कि बिना परमीशन लिए किसी दूसरे मुल्क में दाख़िल हो जाएं। फ़ौरन पता चल जाएगा कि आसमान बँटा है या नहीं।
नौजवान शायर आलोक श्रीवास्तव का ‘माँ’ पर एक शेर है जो उनके काव्य संकलन 'आमीन' में प्रकाशित एक ग़ज़ल में शामिल है- बाबू जी गुज़रे, आपस में सब चीज़ें तक़्सीम हुई तब- मैं घर में सबसे छोटा था, मेरे हिस्से आई अम्मा माँ पर शायर मुनव्वर राना का एक मतला है जिसे असीमित लोकप्रियता हासिल हुई-
किसी के हिस्से में मकां आया,या कोई दुकां आई मैं घर में सबसे छोटा था, मेरे हिस्से में माँ आई
मुझे नहीं पता कि इस पर राना साहब का कमेंट क्या है मगर आलोक का दावा है कि उनके शेर के पाँच साल बाद राना जी का मतला नज़र आया। सदियों से ग़ज़ल के क्षेत्र में हमेशा कुछ न कुछ रोचक प्रयोग होते रहते हैं । कभी शायरों के ख़याल टकरा जाते हैं तो कभी मिसरे।
ख़ुदा-ए-सुख़न मीर ने लिखा था –
बेख़ुदी ले गई कहाँ हमको
देर से इंतज़ार है अपना
इसी ख़याल को ग़ालिब साहब ने अपने अंदाज़ में से आगे बढ़ाया –
हम वहाँ हैं जहाँ से हमको भी
ख़ुद हमारी ख़बर नहीं आती
'ऐ मेरे वतन के लोगो' फेम गीतकार स्व.पं.प्रदीप से एक बार मैंने पूछा था कि अगर दो रचनाकारों के ख़याल आपस में टकराते हैं तो क्या ये ग़ल़त बात है ? उन्होंने जवाब दिया कि कभी-कभी एक रचनाकार की रचना में शामिल सोच दूसरे रचनाकार को इतनी ज़्यादा अच्छी लगती है कि वह सोच के इस सिलसिले को आगे बढ़ाना चाहता है। यानी वह अपने पहले के रचनाकार की बेहतर सोच का सम्मान करना चाहता है।
चरक दर्शन का सूत्र है- चरैवेति चरैवेति, यानी चलो रे…चलो रे…।
कविवर रवींद्रनाथ टैगोर ने इस ख़याल को आगे बढ़ाया-
'इकला चलो रे।' लोगों को और मुझे भी अकेले चलने का ख़याल बहुत पसंद आया। कवि प्रदीप ने आगे कहा कि मैंने इस ख़याल का सम्मान करते हुए एक गीत लिखा और मेरा गीत भी बहुत पसंद किया गया-
चल अकेला… चल अकेला… चल अकेला…
तेरा मेला पीछे छूटा साथी चल अकेला…
एक कहावत है- 'साहित्य से ही साहित्य उपजता है।' मित्रो ! 'भावों की भिड़न्त' का आरोप महाकवि निराला पर भी लग चुका है। आपसे मेरा अनुरोध है कि ख़यालों के टकराने और दूसरों की ज़मीन पर अपनी फ़सल उगाने के बारे में आप एक सार्थक बहस शुरू करें ताकि आपके विचारों की रोशनी में आने वाली पीढ़ी अपना रास्ता तय कर सके। "
सभार लेखक- देवमणि पांडेय सुलतानपुर (यूपी) में जन्मे देवमणि पांडेय हिन्दी और संस्कृत में प्रथम श्रेणी एम.ए. हैं। अखिल भारतीय स्तर पर लोकप्रिय कवि और मंच संचालक के रूप में सक्रिय हैं। अब तक दो काव्यसंग्रह प्रकाशित हो चुके हैं- "दिल की बातें" और "खुशबू की लकीरें"। मुम्बई में एक केंद्रीय सरकारी कार्यालय में कार्यरत पांडेय जी ने फ़िल्म 'पिंजर', 'हासिल' और 'कहाँ हो तुम' के अलावा कुछ सीरियलों में भी गीत लिखे हैं। फ़िल्म 'पिंजर' के गीत "चरखा चलाती माँ" को वर्ष 2003 के लिए 'बेस्ट लिरिक आफ दि इयर' पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। संपर्क 09821082126 के जरिए किया जा सकता है। देवमणि पांडेय की अन्य रचनाओं को यहां क्लिक करके पढ़ा जा सकता है |
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Digital Shayari Class Series: Week 8 Module 8 : आलेख 3 : खो गयी मुशायरे की आवाज़ अनवर जलालपुरी.
...मौत हो ऐसी की दुनिया देर तक मातम करे
मौत हो ऐसी की दुनिया देर तक मातम करे
Digital Shayari Class Series: Week 8 Module 8 : आलेख 2 : मुशायरे की शब्दावली
Digital Shayari Class Series: Week 8 Module 8 : आलेख 1 : उर्दू शायरीकी मंचीय प्रस्तुति- मुशायरे का इतिहास एवं बदलता रूप
फिर दसवीं शताब्दी में ईरान में सुनियोजित तरही मुशायरों की शुरूआत हुई । ये दरबारी मुशायरे थे और इन्हें बादशाहों का प्रश्रय प्राप्त था। जन साधारण से इनका कोई संबंध नहीं था। राज्याश्रय में मुखरित होने के कारण मुख्य रूप से प्रशंसात्मक काव्य यानि कसीदा (दे.) कहने की प्रवृत्ति फली फूली। ग़ज़लें भी कही गई। भारत में फारसी ढंग के इन मुशायरों का प्रारंभ सोलहवीं शताब्दी में हुआ। मुगलों के शासनकाल में बहुत से ईरानी शायर भारत आए और यहाँ फारसी में दरबारी मुशायरों का आयोजन होने लगा। इस समय तक पढ़े-लिखे लोगों की भाषा फारसी ही मानी जाती थी। मगर अठारहवीं शताब्दी में रेख्ता (उर्दू) ने अभूतपूर्व उन्नति की। मीर (दे.), सौदा (दे.) और दर्द (दे.) ने रेख्ता में अपना कलाम कहकर उसे साहित्यिक भाषा का दर्जा दिलाया और इस भाषा में मुशायरे भी होने लगे जिन्हें आरंभ में मुराख्ना कहा गया। पहले ये भी दरवारों से संबद्ध थे मगर कालांतर में मुशावरों का सार्वलौकिक रूप विकसित हुआ। दिल्ली के शायर बाहर निकले और लखनऊ,
रामपुर, हैदराबाद, टौंडा इत्यादि रियासतों में भी तरही मुशायरे की परंपरा का आरंभ हुआ। मुशायरों को सुरुचिपूर्ण बनाने के लिए नियम निश्चित हुए। शायरों का श्रोताओं के बैठने-उठने, दाद देने, गज़ल पढ़ने, आभार प्रदर्शित करने के ढंग तय हुए।
नवाब या शाही परिवार का कोई सदस्य होता। सार्वजनिक मुशायरों में भी अध्यक्ष बादशाह ही होता है। इस बादशाही प्रश्रय के फलस्वरूप उर्दू शायरों में गुटबंदी और अपने प्रतिद्वंद्वी को नीचा दिखाने की कुप्रवृत्ति को प्रोत्साहन मिला और मुशायरे पहलवानी के अखाड़े बन गए। मगर इस सबके बावजूद इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि मुशायरों ने उर्दू भाषा को परिमार्जित और परिवर्धित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
धीरे-धीरे लोग तरही मुशायरों से ऊबने लगे। सो सन् 1867 ई. में लाहौर में अंजुमन-ए-उर्दू ने मुनाज़मों यानि नज़्मों के पाठ का सूत्रपात किया। इसमें शायरों को नज़्म (द.) का शीर्षक दे दिया जाता था। छपाई का प्रसार होने पर तहरीरी मुशायरे होने लगे। इसमें पत्र-पत्रिका का संपादक एक मिसरा देकर ग़ज़लें आमंत्रित करता था। अच्छी रचनाएँ प्रकाशित की जाती थीं। इन मुशायरों में महफ़िली मुशायरों की त्रुटियाँ नहीं थीं। फिर रेडियो पर मुशायरों का प्रसारण प्रारंभ हुआ। वर्तमान युग में गैर तरही मुशायरों को अधिक मान्यता मिली है। इसमें शायर की कल्पना की उड़ान पर बंधन नहीं रहता। आज भी विभिन्न प्रांतों में समय-समय पर अनेक संस्थाओं द्वारा मुशायरों का आयोजन होता है। टी.वी. और रेडियो पर इनके प्रसारण की व्यवस्था की जाती है। इस संबंध में हर साल 26 जनवरी को लाल किले में होने वाला मुशायरा विशेष रूप से उल्लेखनीय है। उर्दू शायरी को लोकप्रिय बनाने में मुशायरों की भूमिका सर्वमान्य है।
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इन दोनों आक्रमणों ने केवल तबाही ही नहीं मचाई, औरंगज़ेब के बाद भारत में मुगल सल्तनत की दिन प्रतिदिन गिरती हुई साख़ को भी महत्वहीन बना दिया.
इन हमलों से घबराकर मीर और उनके साथ कई और नामी गिरामी शायर दिल्ली छोड़ के वाजिद अली शाह के लखनऊ में जा बसे. अकेले मीर दर्द ही ऐसे थे, जो उजड़ती दिल्ली को छोड़ने को तैयार नहीं हुए. उन्हीं के घर मुशायरे में एक बार एक मुगल शहज़ादा भी शायरी के शौक़ में आ गया.
वह टांगें फैलाए हुए था अचनाक मीर दर्द की नज़र उसकी इस असभ्य हरकत पर पड़ी, उन्होंने टोकते हुए उससे कहा, साहबज़ादे यह अदब की महफिल है और इसमें टांगे इस तरह फैलाकर बैठना बेअदबी है. शहज़ादे ने कहा, 'मैं मजबूर हूँ...मेरी टांगों में तकलीफ़ है', मीर दर्द ने फौरन जवाब दिया-'मियाँ तकलीफ़ को घर में आराम दिया जाता है, महफ़िल में, महफ़िल के आदाब का ख़्याल किया जाता है.'
वो ज़माना-ये ज़माना
उस ज़माने में मुशायर तहज़ीब के केंद्र हुआ करते थे. आख़िरी मुगल बहादुर शाह ज़फ़र के लालकिले के मुशायरे अब इतिहास का हिस्सा हैं...इन मुशायरों में ग़ालिब सुनाते थे और ज़ौक सुनते थे, बहादुरशाह जफ़र ग़ज़ल पढ़ते थे और सुनने वालों में मोमिन खाँ, ग़ालिब, शेफ्ता और युवा शायर दाग़ होते थे...उन दिनों सुनाने वालों और सुनने वालों के बीच में इतनी दूरी नहीं होती थी जितनी आज नज़र आती है.
अच्छी-सच्ची शायरी के दर्शन अब मुशायरों में कम ही होते हैं, शेर हो या कविता हो, उसे सुनकर समझने के लिए थोड़े समय की ज़रूरत होती है, और स्टेज से पढ़ी जाने वाली ग़ज़ल के लिए श्रोताओं के पास इतना समय नहीं होता, वे फास्ट फूड की तरह शीघ्र स्वाद की आदत के शिकार हैं. समय की बढ़ती स्पीड के अनुसार, श्रोताओं को भी ऐसी रचनाओं में आनंद आता है जिसको सुनने में, किसी प्रकार का मानसिक या शारीरिक कष्ट नहीं...!
एक बार एक संयोजक ने मुझसे प्रश्न किया था आप मुशायरों में शरीक होने के लिए इतने ज़्यादा पैसे क्यों मांगते हैं, मेरा जवाब था, 'मैं इतनी रक़म की इसलिए डिमांड करता हूँ कि मुझे एक साथ दो काम करने पड़ते हैं-अपनी कविताएँ सुनाने के साथ दूसरों को सुनना भी पड़ता है. अगर मुझे सिर्फ़ अपनी कविताएँ सुनानी हों तो रक़म की डिमांड आधी भी हो सकती है.'
मुशायरों की ऐसी हालत हर जगह नज़र आती है. कविताएँ कम सुनाई जाती है, हाव-भाव या गलेबाज़ी से दिखाई ज़्यादा जाती है जिसकी वजह से मुशायरा तमाशा बन जाता है.""
कामयाब मुशायरा?
हरी चंद अख़्तर
आज़ाद साहिब इज़हार-ए-हैरत करते हुए बोले, “अख़्तर साहिब मुशायरा तो बहुत कामयाब था।”
इस पर अख़्तर साहिब बोले:
“न शुअ’रा की आपस में लड़ाई हुई, न गाली गलौच हुई, न मुआ’वज़े की कमी बेशी का झगड़ा हुआ, और न ही होटल वालों की कोई चीज़ गुम हुई। क्या ख़ाक कामयाब मुशायरा था।”
बशीर बद्र
“डाक्टर साहिब, वो शायर जिनकी सूरत तारा मसीह (जिस जल्लाद ने वज़ीर-ए-आज़म पाकिस्तान ज़ुल्फ़क़ार अली भुट्टो को फांसी दी थी) के हू-ब-हू है, उन्हें पढ़वा दीजिए।”
बशीर बद्र ने अपनी मख़सूस मुस्कुराहट के साथ आ’दिल लखनवी को दा’वत-ए-सुख़न देते हुए कहा,
“मैं शायरी के तारा मसीह से दरख़्वास्त करता हूँ कि तशरीफ़ लाएं और अमरोहा के ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो का काम तमाम कर दें।”
कँवर महेंद्र सिंह बेदी सहर
“दाद देने का यही अंदाज़ तो दाद तलब है।”
Saturday, 20 June 2020
Week 7 Module 7 ग़ज़ल के बारे में- ग़ज़ल से संबंधित शब्द (vol1)
एक समान रदीफ़ (समांत) तथा भिन्न भिन्न क़वाफ़ी(क़ाफ़िया का बहुवचन) (तुकांत) से सुसज्जित एक ही वज़्न
(मात्रा क्रम) अथवा बह्'र (छंद) में लिखे गए अश'आर(शे'र का बहुवचन) समूह को ग़ज़ल कहते हैं। जिसमें शायर किसी चिंतन विचार अथवा भावना को प्रकट करता है।
शाईरी = उर्दू काव्य लेखन
ग़ज़लगो = ग़ज़ल लिखने वाला
ग़ज़लगोई = ग़ज़ल लिखने की प्रक्रिया
रदीफ़ तथा क़ाफ़िया से सुसज्जित एक ही वज़्न ( मात्रा क्रम) अर्थात बह्'र में लिखी गई दो पंक्तियाँ जिसमें किसी चिंतन विचार अथवा भावना को प्रकट किया गया हो |
उदाहरण स्वरूप दो अश'आर (शे'र का बहुवचन) प्रस्तुत हैं -
मियाँ ख़ुश रहो हम दु'आ कर चले ||१||
वह क्या चीज़ है आह जिसके लिए
हर इक चीज़ से दिल उठा कर चले ||२|| - (मीर तक़ी मीर)
फ़र्द - एक शे'र
(पुराने समय में फर्द विधा प्रचिलित थी जो ग़ज़ल की उपविधा थी। जैसे आज कतअ का मुसम्मन रूप प्रचिलित है अर्थात अब कतअ ४ मिसरों में कही जाती है । पुरानी कतआत में २ से अधिक अशआर भी मिलते हैं)
आज अगर शायर कहता है कि कतअ पढता हूँ तो श्रोता समझ जाते हैं कि शायर चार मिसरों की रचना पढ़ेगा, उसी प्रकार एक स्वतंत्र शेर को फर्द कहा जाता है जब कोई शायर कहता था कि फर्द पढता हूँ तो श्रोता समझ जाते थे कि अब शायर कुछ स्वतंत्र शेर पढ़ने वाला है|
अशआर कहने से यह पता चलता है कि सभी शेर एक जमीन के हैं और फर्द से पता चलता है कि सभी शेर अलग अलग जमीन से हैं ।
शे'र की प्रत्येक पंक्ति को मिसरा कहते हैं, इस प्रकार एक शे'र में दो पंक्तियाँ अर्थात दो मिसरे होते हैं-
उदाहरण -
हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए <-- मिसरा -ए- उला
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए - (दुष्यंत कुमार)
उदाहरण -
हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए <-- मिसरा ए सानी
वह समांत शब्द अथवा शब्द समूह जो मतले (ग़ज़ल का पहला शे'र) के दोनों मिसरों के अंत में आता है तथा अन्य अश'आर के मिसरा -ए- सानी अर्थात दूसरी पंक्ति के अंत में आता है और पूरी ग़ज़ल में एक सा रहता है उसे रदीफ़ कहते हैं
मैं भी किस इम्तिहान से निकला
चाँदनी झांकती है गलियों में
कोई साया मकान से निकला - (शकेब जलाली)
प्रस्तुत अश'आर में से 'निकला' रदीफ़ है
वह शब्द जो प्रत्येक शे'र में रदीफ़़ के ठीक पहले आता है और सम तुकांतता के साथ हर शे'र में बदलता रहता है उसे क़ाफ़िया कहते हैं, शे'र का आकर्षण क़ाफ़िये पर ही टिका होता है क़ाफ़िये का जितनी सुंदरता से निर्वहन किया जायेगा शे'र उतना ही प्रभावशाली होगा
शाम तक सिर्फ हाथ मलता है
वक़्त की दिल्लगी के बारे में
सोचता हूँ तो दिल दहलता है -(बाल स्वरूप राही)
ग़ज़ल का पहला शे'र जिसके दोनों मिसरों में क़ाफ़िया रदीफ़़ होता है उसे मतला कहते हैं
उदाहरण -
बहुत रहा है कभी लुत्फ़-ए-यार हम पर भी
गुज़र चुकी है ये फ़स्ल-ए-बहार हम पर भी || मतला ||
तो हो ही जाते हैं दो एक वार हम पर भी || दूसरा शे'र || - (अकबर इलाहाबादी)
उदाहरण-
जिक्र तबस्सुम का आते ही लगते हैं इतराने लोग
और ज़रा सी ठेस लगी तो जा पहुंचे मैख़ाने लोग || मतला ||
मेरी बस्ती में रहते हैं ऐसे भी दीवाने लोग
रात के आँचल पर लिखते हैं दिन भर के अफ़साने लोग || हुस्ने मतला ||
- (अतीक इलाहाबादी)
उदाहरण -
हुई मुद्दत कि 'ग़ालिब' मर गया पर याद आता है
वो हर इक बात पर कहना कि, यूँ होता तो क्या होता - (असदउल्लाह ख़ान 'ग़ालिब')
इस शे'र में शायर ने अपने तख़ल्लुस 'ग़ालिब' का प्रयोग किया है|
उदाहरण -
अजनबी रात अजनबी दुनिया
तेरा "मजरूह" अब किधर जाये - (मजरूह सुल्तानपुरी)
यह मजरूह सुल्तानपुरी की ग़ज़ल का आख़िरी शे'र है जिसमें शायर ने अपने तख़ल्लुस 'मजरूह' (शाब्दिक अर्थ - घायल) का सुन्दर प्रयोग किया है।
वो ग़ज़ल जिसमें रदीफ़़ होता है उसे मुरद्दफ़ ग़ज़ल कहते हैं।
उदाहरण -
उनसे मिले तो मीना-ओ-साग़र लिए हुए
हमसे मिले तो जंग का तेवर लिए हुए
लड़की किसी ग़रीब की सड़कों पे आ गई
गाली लबों पे हाथ में पत्थर लिए हुए - (जमील हापुडी)
प्रस्तुत अश'आर में 'लिए हुए' रदीफ़़ है इसलिए यह मुरद्दफ़ ग़ज़ल है।
उदाहरण -
जाने वाले तुझे कब देख सकूं बारे दीगर
रोशनी आँख की बह जायेगी आसूं बन कर
रो रहा था कि तेरे साथ हँसा था बरसों
हँस रहा हूँ कि कोई देख न ले दीदा-ए-तर - (शाज़ तमकनत)
प्रस्तुत अश'आर के पहले शे'र में मिसरे 'दीगर', 'कर' शब्द से समाप्त हुए हैं जो कि समतुकांत हैं तथा अलग अलग हैं।
इसलिए स्पष्ट है कि यह रदीफ़़ के न हो कर क़ाफ़िया के शब्द हैं और इस शे'र में रदीफ़ नहीं है इस प्रकार आगे के शे'र में भी क़ाफ़िया को निभाते हुए तर शब्द आया है इससे सुनिश्चित होता है कि यह ग़ैर मुरद्दफ़ ग़ज़ल है |
ग़ज़ल का प्रत्येक शे'र अपने आप में पूर्ण होता है तथा शायर ग़ज़ल के प्रत्येक शे'र में अलग अलग भाव को व्यक्त कर सकता है परन्तु जब किसी ग़ज़ल के सभी अश'आर एक ही भाव को केन्द्र मान कर लिखे गए हों तो ऐसी ग़ज़ल को मुसल्सल ग़ज़ल कहते हैं|
ग़ज़ल के प्रत्येक शे'र अलग अलग भाव को व्यक्त करें तो ऐसी ग़ज़ल को ग़ैर मुसल्सल ग़ज़ल कहते हैं
Week 7 Module 7 ग़ज़ल के बारे में ....शायरी लेखन से संबंधित शब्द (vol 2)
लाम का अर्थ होता है “लघु” और इसे १ मात्रा के लिए प्रयोग करते हैं |
('लाम' उर्दू का एक हर्फ़ है जो हिंदी के "ल" के सामान है)
उदाहरण = अ = १ ('लाम' ग़ज़ल की सबसे छोटी इकाई है )
गाफ का अर्थ होता है दीर्घ और इसे २ मात्रा के लिए प्रयोग करते हैं| {उर्दू का हर्फ़ गाफ़ हिंदी में "ग"}
उदाहरण = आ =२ (यह भी ग़ज़ल की सबसे छोटी इकाई है )
मात्रा क्रम, किसी शब्द के मात्रा क्रम को उस शब्द का वज़्न कहा जाता है
उदाहरण - कुछ शब्दों का मात्रिक विन्यास देखें
शब्द – वज़्न “
सदा - फ़अल (१२) लघु दीर्घ
सादा - फैलुन (२२) दीर्घ दीर्घ
साद - फ़ाअ (२१) दीर्घ लघु
हरा - फ़अल (१२) लघु दीर्घ
राह - फ़ाअ (२१) दीर्घ लघु
हारा - फैलुन (२२) दीर्घ दीर्घ
गण, घटक, पद, निश्चित मात्राओं का पुंज| जैसे हिंदी छंद शास्त्र में गण होते हैं, यगण (२२२), तगण (२२१) आदि उस तरह ही उर्दू छन्द शास्त्र 'अरूज़' में कुछ घटक होते हैं जो रुक्न कहलाते हैं|
बहुवचन=अरकान
उदाहरण - फ़ा, फ़ेल, फ़अल , फ़ऊल, फ़इलुन, फ़ाइलुन फ़ाइलातुन, मुफ़ाईलुन आदि
रुक्न - रुक्न का नाम - मात्रा
फ़ईलुन - मुतक़ारिब - १२२
फ़ाइलुन - मुतदारिक - २१२
मुफ़ाईलुन - हजज़ - १२२२
फ़ाइलातुन - रमल - २१२२
मुस्तफ़्यलुन - रजज़ - २२१२
मुतफ़ाइलुन - कामिल - ११२१२
मफ़ाइलतुन - वाफ़िर - १२११२
रजज़ का मूल रुक्न हैं मुस्तफ़्यलुन(२२१२), इस मूल रुक्न से मफ़ाइलुन(१२१२), फ़ाइलुन (२१२), मफ़ऊलुन (२२२) आदि उप रुक्न बनाया जा सकता है|
प्रत्येक मूल रुक्न से उप रुक्न बनाये गए हैं तथा अरूज़ानुसार इनकी संख्या सुनिश्चित है।
रुक्न का बहुवचन, रुक्न के दोहराव से जो समूह से निर्मित होते है उसे अरकान कहते हैं, यह छंद का सूत्र होता है और किसी रुक्न का शे'र में कितनी बार और कैसे प्रयोग हुआ है इससे ग़ज़ल की बह्'र का वास्तविक रूप सामने आता है
“फ़ाइलातुन”(२१२२) रमल का मूल रुक्न है।
फ़ाइलातुन / फ़ाइलातुन / फ़ाइलातुन / फ़ाइलातुन (२१२२/२१२२/२१२२/२१२२)
यह रुक्नों का एक समूह है जिसमें रमल के मूल रुक्न फ़ाइलातुन को चार बार रखा गया है ऐसा करने से एक बह्'र(छंद) का निर्माण होता है जिसे “बह्'र-ए-रमल मुसम्मन सालिम” कहते हैं| इस अरकान पर शे'र लिखा/कहा जा सकता है |
उदाहरण - बह्'र -ए- रमल, बह्'र -ए- हजज़, बह्'र -ए- रजज़ आदि
रुक्न के खंड करने पर हमें जुज़ प्राप्त होते है अर्थात जुज़ एक इकाई है जिससे रुक्न का निर्माण होता है| जुज़ मात्रा के योग से बनता है और यह दूसरी सबसे छोटी इकाई है।
उदाहरण = फ़ाइलातुन(२१२२) तीन जुज़ से बना हैं (२+१२+२) इसमें पहला जुज़ २ मात्रिक है दूसरा जुज़ १२ मात्रिक है तथा तीसरा जुज़ फिर से दो मात्रिक है इस प्रकार फ़ाइलातुन को तोडने पर इस प्रकार टूटेगा = फ़ा + इला + तुन
ज़िहाफ़ = रुक्न से मात्रा घटना या बढ़ना
ज़िहाफ़ = रुक्न से मात्रा घटाने अथवा बढ़ाने की क्रिया
ग़ज़ल में मात्रा गणना का एक स्पष्ट सरल और सीधा नियम है कि इसमें शब्दों को जैसा बोला जाता है (शुद्ध उच्चारण) मात्रा भी उस हिसाब से ही गिनाते हैं| हिन्दी में कमल = क/म/ल = १११ होता है मगर ग़ज़ल विधा में इस तरह मात्रा गणना नहीं करते बल्कि उच्चारण के अनुसार गणना करते हैं|
उच्चारण करते समय हम क+मल बोलते हैं इसलिए ग़ज़ल में ‘कमल’ = १२ होता है यहाँ पर ध्यान देने की बात यह है कि “कमल” का ‘“मल’” शाश्वत दीर्घ है अर्थात ज़रुरत के अनुसार गज़ल में ‘कमल’ शब्द की मात्रा को १११ नहीं माना जा सकता यह हमेशा १२ ही रहेगा।
‘उधर’- उच्च्चरण के अनुसार 'उधर' बोलते समय पहले उ बोलते हैं फिर धर बोलने से पहले पल भर रुकते हैं और फिर धर कहते हैं इसलिए इसके मात्रा गिनाते समय भी ऐसे ही गिनेंगे
अर्थात – उ+धर = उ १ धर २ = १२
ग़ज़ल की मात्रा गणना के नियम में एक छूट मिलाती है जिसमें कुछ शब्दों को दीर्घ मात्रिक होते हुए भी उच्चारण अनुसार लघु मात्रिक मान लिया जाता है| यह छूट कम से कम लेनी चाहिए तथा ग़ज़ल लिखते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि कम से कम शब्दों की मात्रा को घटाया जाये|
उदाहरण - 'कोई' का वज़्न फैलुन(२२) होता है परन्तु इसे कुई - फ़अल (१२) तथा कोइ फ़ालु(२१) के वज़्न में भी प्रयोग किया जा सकता है इसे 'मात्रा का गिरना' कहते हैं |
उर्दू भाषा में इज़ाफ़त का नियम है जिसके द्वारा दो शब्दों को अंतर सम्बंधित किया जाता है
उदाहरण - ‘नादाँ दिल’ को ‘दिल-ए-नादाँ’, कहा जा सकता है
उर्दू भाषा में जब दो शब्दों के बीच 'व' 'तथा' 'और' आदि शब्दों का प्रयोग किया जाता है तो वहाँ अत्फ़ का प्रयोग भी किया जा सकता है|
नियम है कि यदि किसी शब्द के अंत में बिना मात्रा का व्यंजन आ रहा है और उसके तुरंत बा'द का शब्द दीर्घ स्वर से शुरू हो रहा है तो व्यंजन और स्वर का योग किया जा सकता है सकता है |
उदाहरण - रात आ = रा/त/आ = २१ २ को रात+आ = राता = २२ भी किया जा सकता है।
मात्रा गणना, वह तरीक़ा जिसके द्वारा यह परखा जाता है कि शे'र निश्चित छंद (बह्'र) में है अथवा नहीं| बा-बह्'र ग़ज़ल लिखने के लिए तक़्ती'अ (मात्रा गणना) ही एक मात्र अचूक उपाय है, यदि शे'र की तक़्ती'अ करनी आ गई तो देर सवेर बह्'र में लिखना भी आ जाएगा क्योकि जब किसी शायर को पता हो कि मेरा लिखा शे'र बेबह्'र है तभी उसे सही करने का प्रयास करेगा और तब तक करेगा जब तक वह शे'र बाबह्'र न हो जाए| किसी शे'र की तक़्ती'अ करने के लिए पहले शे'र को लिखते हैं फिर उसके नीचे उसका रुक्न लिखते हैं तथा एक एक शब्द का रुक्न से मिलान करते हैं इस प्रकार पता चल जाता है कि शे'र निश्चित अरकान के अनुरूप है अथवा नहीं।
उदाहरण -
भरी बज़्म में राज़ की बात कह दी
बड़ा बे अदब हूँ सज़ा चाहता हूँ
-(अल्लामा इक़बाल)
भरी बज़् / म में रा / ज़ की बा / त कह दी
फ़ईलुन / फ़ईलुन / फ़ईलुन / फ़ईलुन
(१२२ / १२२ / १२२ / १२२)
-------------------------------------------------------
बड़ा बे / अदब हूँ / सज़ा चा / हता हूँ
फ़ईलुन / फ़ईलुन / फ़ईलुन / फ़ईलुन
(१२२ / १२२ / १२२ / १२२)
इस प्रकार सिद्ध होता है कि शे'र में प्रत्येक रुक्न में वज़्न के अनुसार ही शब्दों को रखा गया है और यह ग़ज़ल बह्'र ए मुतक़ारिब मुसम्मन सालिम के अनुसार बाबह्'र है।
वो मूल बह्'र जिनमें कोई मात्रा घट बढ़ न की गई हो।
उदाहरण -
मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन (१२२२ १२२२ १२२२ १२२२)
बह्'र का नाम - बह्'र -ए- हजज़ मुसम्मन सालिम
जब मूल रुक्न की बह्'र में कोई मात्रा घट बढ़ की गई हो तथा उप बह्'र बनाई गई हो तो उसे मुफ़रद मुज़ाहिफ़ बह्'र कहते हैं।
उदाहरण -
फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन (२१२२ २१२२ २१२२ २१२२) के आख़िरी रुक्न के आख़िरी दीर्घ को लुप्त कर देने से हमें रमल बह्'र की एक मुज़ाहिफ़ सूरत प्राप्त होती है
फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलुन (२१२२ २१२२ २१२२ २१२)
बह्'र का नाम - बह्'र ए रमल मुसम्मन महज़ूफ़
वो बह्'र जो दो मूल अरकान के योग से बनी हो तथा जिनमें कोई मात्रा घट बढ़ न की गई हो
उदाहरण - बह्'र ए मुजारे मुफ़ाईलुन फ़ाइलातुन मुफ़ाईलुन फ़ाइलातुन (१२२२ २१२२ १२२२ २१२२)
वो बह्'र जो दो मूल अरकान के योग से बनी हो तथा कोई घट बढ़ करके उससे उप बह्'र बनाई गई हो उसे मुरक्कब मुज़ाहिफ़ बह्'र कहते हैं|
उदाहरण -
बह्'र -ए- मुजारे जिसका मूल रुक्न मुफ़ाईलुन फ़ाइलातुन मुफ़ाईलुन फ़ाइलातुन (१२२२ २१२२ १२२२ २१२२) है ।
इसके अरकान में कुछ मात्राओं को लुप्त कर के एक बहु प्रचिलित उप बह्'र बनाई गयी है - मुफ़ाइलुन फ़इलातुन मुफ़ाइलुन फैलुन (१२१२ ११२२ १२१२ २२) बनती है ।यह एक मुरक्कब मुज़ाहिफ़ बह्'र जिसका नाम है - मुजारे मुसम्मन मक्बूज, मख्बून, मक्बूज, मह्जूफो मक्तूअ
मुसना का शाब्दिक अर्थ है दो टुकड़े वाला| जिस बह्'र के दोनों मिसरों में कुल दो अरकान हों अर्थात जिस शे'र के एक मिसरे में मात्र एक रुक्न हो उस ग़ज़ल की बह्'र के नाम के साथ मुसना लिखते हैं।
उदाहरण -
रात गर हूँ
फिर सहर हूँ
संग वालों
फल शज़र हूँ
हसरतों की
रहगुज़र हूँ - (वीनस केसरी)
मुरब्बा का शाब्दिक अर्थ है चौकोर, जिसका चार पहलू हो, चार कोण| जिस बह्'र के दोनों मिसरों में कुल चार अरकान हों अर्थात जिस शे'र के एक मिसरे में २ अरकान हों उस ग़ज़ल की बह्'र के नाम के साथ मुरब्बा लिखते हैं
मुसद्दस का शाब्दिक अर्थ है छः पहलू वाला| जिस बह्'र के दोनों मिसरों में कुल छः रुक्न हों अर्थात जिस शे'र के एक मिसरे में तीन अरकान हों उस ग़ज़ल की बह्'र के नाम के साथ मुसद्दस लिखते हैं।
उदाहरण
जिस्म तक बेच डाले गए
पेट फिर भी न पाले गए
जितने आवारा थे शह्'र में
रहबरी दे के टाले गए - (जमील हापुडी)
मुसम्मन का शाब्दिक अर्थ है आठ पहलू वाला| जिस बह्'र के दोनों मिसरों में कुल आठ अरकान हों अर्थात जिस शे'र के एक मिसरे में चार अरकान हों उस ग़ज़ल की बह्'र के नाम के साथ मुसम्मन लिखते हैं।
उदाहरण -
आज उस नाज़ुक अदा की याद फिर आयी बहुत
जिससे मेरी एक मुद्दत थी शनासाई बहुत
राहे उल्फ़त में निकालना था तकाज़ा-ए-जुनूं
वैसे मैं भी जानता था होगी रुसवाई बहुत - (पाशा रहमान)
जुज़ के तीन भेद हैं
१- सबब २- वतद ३- फ़ासला
१- सबब ए ख़फ़ीफ़ - जिस जुज़ में दो स्वतंत्र लघु होते हैं उसे सबब ए खफीफ कहते हैं (११)
२- सबब ए सकील - जिस जुज़ में एक दीर्घ होता है उसे सबब ए सकील कहते हैं (२)
(१)-वतद ए मुजमुअ - जिस जुज़ में पहले एक स्वतंत्र लघु फिर एक दीर्घ होता है उसे वतद ए मजमुअ कहते हैं (१२)
(२)- वतद ए मफरुक - जिस जुज़ में पहले एक दीर्घ फिर एक स्वतंत्र लघु होता है उसे वतद ए मजमुअ कहते हैं (२१)
(१)- फ़ासला ए सुगरा - जिस जुज़ में पहले दो स्वतंत्र लघु फिर एक दीर्घ होता है उसे फ़ासला ए सुगरा कहते हैं (११२)
(२)- फ़ासला ए कुवरा - जिस जुज़ में पहले दो स्वतंत्र लघु फिर एक लघु व एक दीर्घ होता है उसे फ़ासला ए कुवरा कहते हैं (१११२)
हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए
- (दुष्यंत कुमार)
हो गई है / पीर पर्वत / सी पिघलनी / चाहिए (मिसरा -ए- उला)
इस हिमालय / से कोई गं / गा निकलनी / चाहिए (मिसरा -ए- सानी)
१- सदर २- अरूज़ ३- हश्व ४- इब्तिदा ५- जरब ६- हश्व
उदाहरण –
हो गई है / पीर पर्वत / सी पिघलनी / चाहिए (उला)
इस हिमालय / से कोई गं / गा निकलनी / चाहिए (सानी)
उदाहरण –
हो गई है / पीर पर्वत / सी पिघलनी / चाहिए (उला)
इस हिमालय / से कोई गं / गा निकलनी / चाहिए (सानी)
इस शे'र में चाहिए शब्द मिसरा-ए-उला के आख़िरी रुक्न में आ रहा है| यह रुक्न-ए-अरूज़ है
हो गई है / पीर पर्वत / सी पिघलनी / चाहिए (उला)
इस हिमालय / से कोई गं / गा निकलनी / चाहिए (सानी)
इस शे'र में पीर पर्वत / सी पिघलनी शब्द मिसरा-ए-उला के रुक्न-ए-सदर तथा रुक्न-ए-अरूज़ के बीच में आ रहा है | यह रुक्न-ए-हाश्व हैं
उदाहरण –
हो गई है / पीर पर्वत / सी पिघलनी / चाहिए (उला)
इस हिमालय / से कोई गं / गा निकलनी / चाहिए (सानी)
इस शे'र में इस "हिमालय" शब्द मिसरा-ए-सानी के पहले रुक्न में आ रहा है| यह रुक्न-ए-इब्तिदा है
उदाहरण –
हो गई है / पीर पर्वत / सी पिघलनी / चाहिए (उला)
इस हिमालय / से कोई गं / गा निकलनी / चाहिए (सानी)
इस शे'र में "चाहिए" शब्द मिसरा-ए-सानी के आख़िरी रुक्न में आ रहा है| यह रुक्न-ए-ज़रब है
उदाहरण –
हो गई है / पीर पर्वत / सी पिघलनी / चाहिए (उला)
इस हिमालय / से कोई गं / गा निकलनी / चाहिए (सानी)
( हश्व एक रुक्न, दो अथवा कई अरकान का भी हो सकता है।
उदाहरण -
अरकान में एक हश्व-
दिल ए नादाँ / तुझे हुआ / क्या है (उला)
आखिर इस दर् / द की दवा / क्या है (सानी)
- (असद उल्ला खां 'ग़ालिब')
संभलने ही / नहीं देती / रवानी क्या / किया जाये (उला)
गुजरने को / है मेरे सर / से पानी क्या / किया जाये (सानी)
उदाहरण -
देख नफ़रत से न देख
हम पे आवाज़ें न कस
- (रहमत अमरोहवी)
सदर / अरूज़
हम पे आवा / जें न कस (सानी)
इब्तिदा / ज़रब
सुकूं भी ख़्वाब हुआ, नींद भी है कम कम फिर
क़रीब आने लगा दूरियों का मौसम फिर
-(परवीन शाकिर)
सदर / हश्व / हश्व / अरूज़
इब्तिदा / हश्व / हश्व / ज़रब
Week 7 Module 7 आलेख 1- वज़्न (मात्रा भार) की गणना
मात्राभार दो प्रकार का होता है– वर्णिक भार और वाचिक भार।
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(1) ह्रस्व स्वरों की मात्रा 1 होती है जिसे लघु कहते हैं, जैसे - अ, इ, उ, ऋ की मात्रा 1 है। लघु को 1 या । या ल से व्यक्त किया जाता है।
(2) दीर्घ स्वरों की मात्रा 2 होती है जिसे गुरु कहते हैं, जैसे-आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ की मात्रा 2 है। गुरु को 2 या S या गा से व्यक्त किया जाता है।
(3) व्यंजनों की मात्रा 1 होती है , जैसे -क,ख,ग,घ / च,छ,ज,झ / ट,ठ,ड,ढ,ण / त,थ,द,ध,न / प,फ,ब,भ,म /य,र,ल,व,श,ष,स,ह।
वास्तव में व्यंजन का उच्चारण स्वर के साथ ही संभव है, इसलिए उसी रूप में यहाँ लिखा गया है। अन्यथा क्, ख्, ग् … आदि को व्यंजन कहते हैं, इनमें अकार मिलाने से क, ख, ग ... आदि बनते हैं जो उच्चारण योग्य होते हैं।
(4) व्यंजन में ह्रस्व इ, उ, ऋ की मात्रा लगने पर उसका मात्राभार 1 ही रहता है।
(5) व्यंजन में दीर्घ स्वर आ, ई, ए, ऐ, ओ, औ की मात्रा लगने पर उसका मात्राभार 2 हो जाता है।
(6) किसी भी वर्ण में अनुनासिक लगने से मात्राभार में कोई अन्तर नहीं पडता है, जैसे – रँग = 11, चाँद = 21, माँ = 2, आँगन = 211, गाँव = 21
(7) लघु वर्ण के ऊपर अनुस्वार लगने से उसका मात्राभार 2 हो जाता है, जैसे– रंग = 21, अंक = 21, कंचन = 211, घंटा = 22, पतंगा = 122
(8) गुरु वर्ण पर अनुस्वार लगने से उसके मात्राभार में कोई अन्तर नहीं पडता है, जैसे – नहीं = 12, भींच = 21, छींक = 21,
कुछ विद्वान इसे अनुनासिक मानते हैं लेकिन मात्राभार यही मानते हैं।
(9) संयुक्ताक्षर का मात्राभार 1 (लघु) होता है, जैसे – स्वर = 11, प्रभा = 12, श्रम = 11, च्यवन = 111
(10) संयुक्ताक्षर में ह्रस्व मात्रा लगने से उसका मात्राभार 1 (लघु) ही रहता है, जैसे– प्रिया = 12, क्रिया = 12, द्रुम = 11, च्युत = 11, श्रुति = 11, स्मित = 11
(11) संयुक्ताक्षर में दीर्घ मात्रा लगने से उसका मात्राभार 2 (गुरु) हो जाता है, जैसे – भ्राता = 22, श्याम = 21, स्नेह = 21, स्त्री = 2, स्थान = 21
(12) संयुक्ताक्षर से पहले वाले लघु वर्ण का मात्राभार 2 (गुरु) हो जाता है, जैसे – नम्र = 21, सत्य = 21, विख्यात = 221
(13) संयुक्ताक्षर के पहले वाले गुरु वर्ण के मात्राभार में कोई अन्तर नहीं पड़ता है, जैसे– हास्य = 21, आत्मा = 22, सौम्या = 22, शाश्वत = 211, भास्कर = 211
(14) संयुक्ताक्षर सम्बन्धी नियम (12) के कुछ अपवाद भी हैं, जिसका आधार पारंपरिक उच्चारण है, अशुद्ध उच्चारण नहीं।
जैसे– तुम्हें = 12, तुम्हारा/तुम्हारी/तुम्हारे = 122, जिन्हें = 12, जिन्होंने = 122, कुम्हार = 122, कन्हैया = 122, मल्हार = 121, कुल्हाड़ी = 122, इनमें संयुक्ताक्षर से पहले वाला लघु वर्ण लघु ही बना रहता है।
इन अपवादों में संयुक्ताक्षर का पूर्ववर्ती अक्षर सदैव ऐसा व्यंजन होता है जिसका ‘ह’ के साथ योग करके कोई नया अक्षर हिन्दी वर्ण माला में नहीं बनाया गया है, इसलिए जब इस पूर्ववर्ती व्यंजन का ‘ह’ के साथ योग कर कोई संयुक्ताक्षर बनता हैं तो उसका व्यवहार संयुक्ताक्षर जैसा न होकर एक नए वर्ण जैसा हो जाता है और इसीलिए उसपर संयुक्ताक्षर के नियम लागू नहीं होते हैं। उदाहरण के लिए न् म् ल् का ‘ह’ के साथ योग करने से बनने वाले संयुक्ताक्षर म्ह न्ह ल्ह ‘एक वर्ण’ जैसा व्यवहार करते है जिससे उनके पहले आने वाले लघु का भार 2 नहीं होता अपितु 1 ही रहता है। यहाँ पर यह भी उल्लेखनीय है कि हिन्दी वर्णमाला के कवर्ग, चवर्ग, टवर्ग, तवर्ग और पवर्ग में पहले व्यंजन में ‘ह’ का योग करने से दूसरा व्यंजन तथा तीसरे व्यंजन में ‘ह’ का योग करने से चौथा व्यंजन बनता है।
क् + ह = ख , ग् + ह = घ
च् + ह = छ , ज् + ह = झ
ट् + ह = ठ , ड् + ह = ढ
त् + ह = थ , द् + ह = ध
प् + ह = फ , ब् + ह = भ किन्तु -
न् + ह = न्ह , म् + ह = म्ह , ल् + ह = ल्ह (कोई नया वर्ण नहीं, तथापि व्यवहार नए वर्ण जैसा)
कुछ उदाहरण ऐसे भी हैं जिनपर उपर्युक्त व्याख्या लागू नहीं होती है, जैसे नन्हा = 22, कुल्हड़ = 211, अल्हड़ = 211 आदि।
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वाचिक भार की गणना करने में ‘उच्चारण के अनुरूप’ दो लघु वर्णों को मिलाकर एक गुरु मान लिया जाता है। उदहरणार्थ निम्न शब्दों के वाचिक भार और वर्णिक भार का अंतर दृष्टव्य है -
कल, दिन, तुम, यदि आदि 2 / गा 11 / लल
अमर, विकल आदि 12 / लगा 111 / ललल
उपवन, मघुकर आदि 22 / गागा 1111 / लललल
नीरज, औषधि आदि 22 / गागा 211 / गालल
चलिए, सुविधा आदि 22 / गागा 112 / ललगा
आइए, माधुरी आदि 212 / गालगा 212 / गालगा
सुपरिचित, अविकसित आदि 122 (212 नहीं) 11111 / ललललल
मनचली, किरकिरी आदि 212 (122 नहीं) 1112 / लललगा
असुविधा, सरसता आदि 122 (212 नहीं) 1112 / लललगा
जब हम किसी काव्य पंक्ति के मात्राक्रम की गणना करते हैं तो इस क्रिया को कलन कहते हैं, उर्दू में इसे तख्तीअ कहा जाता है। किसी काव्य पंक्ति का कलन करने के पूर्व यह समझ लेना आवश्यक है वह पंक्ति मात्रिक छंद पर आधारित है या फिर वर्णिक छंद पर। यदि पंक्ति मात्रिक छंद पर आधारित है तो कलन में वाचिक भार का प्रयोग किया जाता है और उसे वाचिक कलन कहते हैं तथा यदि पंक्ति वर्णिक छंद पर आधारित है तो कलन में वर्णिक भार का प्रयोग किया जाता है और उसे वर्णिक कलन कहते हैं। एक बात और, काव्य पंक्ति का कलन करते समय मात्रापतन का ध्यान रखना भी आवश्यक है अर्थात जिस गुरु वर्ण में मात्रापतन है उसका भार लघु अर्थात 1 ही माना जाएगा। उदाहरणों से यह बात पूर्णतः स्पष्ट हो जायेगी।
इसे समझने के लिए महाकवि रसखान की एक पंक्ति लेते हैं -
मानुस हौं तो वही रसखान बसौं ब्रज गोकुल गाँव के ग्वारन
यह पंक्ति वर्णिक छंद किरीट सवैया पर आधारित है, इसलिए हम इसका कलन करने में वर्णिक भार का ही प्रयोग करेंगे।
पहले हम सभी शब्दों का वर्णिक भार अलग-अलग देखते हैं -
मानुस (211) हौं (2) तो’ (1) वही (12) रसखान (1121) बसौं (12) ब्रज (11) गोकुल (211) गाँव (21) के’ (1) ग्वारन (211)
मानुस/ हौं तो’ व/ही रस/खान ब/सौं ब्रज/ गोकुल/ गाँव के’/ ग्वारन
211/ 211/ 211/ 211/ 211/ 211/ 211/ 211 (अंकावली)
गालल गालल गालल गालल गालल गालल गालल गालल (लगावली)
भानस भानस भानस भानस भानस भानस भानस भानस (गणावली)
इसे समझने के लिए हम डॉ. कुँवर बेचैन के गीत की एक पंक्ति का उदाहरण लेते हैं -
नदी बोली समंदर से मैं तेरे पास आयी हूँ
यह पंक्ति मात्रिक छंद (विधाता) पर आधारित है, इसलिए वाचिक भार का प्रयोग करते हुए इसका कलन निम्नप्रकार करते हैं -
नदी (12) बोली (22) समंदर (122) से (2) मैं’ (1) तेरे (22) पास (21) आयी (22) हूँ (2)
इस कलन में उच्चारण के अनुरूप ‘समंदर’ के अंतिम दो लघु 11 को मिलाकर एक गुरु 2 माना गया है (वाचिक भार) तथा दबाकर उच्चारण करने के कारण ‘मैं’ का भार गुरु न मानकर लघु माना गया है (मात्रापतन)।
पारंपरिक ढंग से इस कलन को हम ऐसे भी लिख सकते हैं -
नदी बोली/ समंदर से/ मैं’ तेरे पा/स आयी हूँ 1222/ 1222/ 1222/ 1222 (अंकावली)
लगागागा लगागागा लगागागा लगागागा (लगावली)
यमातागा यमातागा यमातागा यमातागा (स्वरावली)
छंदस काव्य की रचना प्रायः लय के आधार पर ही जाती है जो किसी उपयुक्त काव्य को उन्मुक्त भाव से गाकर अनुकरण से आत्मसात होती है। बाद में मात्राभार की सहायता से अपने बनाये काव्य का कलन करने से त्रुटियाँ सामने आ जाती हैं और उनका परिमार्जन हो जाता है और दूसरे के काव्य का निरीक्षण और परिमार्जन करने में भी कलन बहुत उपयोगी होता है।
1 छंद विधान, लेखक- आचार्य रामदेव लाल विभोर, प्रकाशक- प्रतिष्ठा साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्था, 558/28 घ, सुंदर नगर, आलमबाग, लखनऊ 226005
2 छंद प्रभाकर, लेखक- जगन्नाथ प्रसाद 'भानुकवि', प्रकाशक- उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, राजर्षि पुरुषोत्तमदास टंडन हिन्दी भवन, 6, महात्मा गांघी मार्ग, हजरतगंज, लखनऊ
3 गीतिका दर्पण, लेखक- ओम नीरव , प्रकाशक- सुभांजलि प्रकाशन, 28/11, अलीगंज कॉलोनी, टी पी नगर, कानपुर - 208023
Week 7 Module 7 आलेख 2- तकतीअ और बहर [ग़ज़ल : शिल्प और संरचना]
बहर की यदि बात करें तो फ़ारसी के ये भारी भरकम शब्द जैसे फ़ाइलातुन, मसतफ़ाइलुन या तमाम बहरों के नाम आप को याद करने की ज़रूरत नही है। ये सब उबाऊ है इसे दिलचस्प बनाने की कोशिश करनी है।
आप समझें कि संगीतकार जैसे गीतकार को एक धुन दे देता है कि इस पर गीत लिखो.. गीतकार उस धुन को बार-बार गुनगुनाता है और अपने शब्द उस मीटर / धुन / ताल में फिट कर देता है बस.. गीतकार को संगीत सीखने की ज़रूरत नहीं है उसे तो बस धुन को पकड़ना है।
ये तमाम बहरें जिनका हमने ज़िक्र किया ये आप समझें एक किस्म की धुनें हैं। आपने देखा होगा छोटा सा बच्चा टी.वी पर गीत सुनके गुनगुनाना शुरू कर देता है वैसे ही आप भी इन बहरों की लय या ताल कॊ पकड़ें और शुरू हो जाइये। हाँ बस आपको शब्दों का वज़्न करना ज़रूर सीखना है जो आप उदाहरणों से समझ जाएंगे।
हम शब्द को उस आधार पर तोड़ेंगे जिस आधार पर हम उसका उच्चारण करते हैं। शब्द की सबसे छोटी इकाई होती है वर्ण, तो शब्दों को हम वर्णों मे तोड़ेंगे।
वर्ण वह ध्वनि हैं जो किसी शब्द को बोलने में एक समय में हमारे मुँह से निकलती है और ध्वनियाँ केवल दो ही तरह की होती हैं या तो लघु (छोटी) या दीर्घ (बड़ी)। अब हम कुछ शब्दों को तोड़कर देखते हैं और समझते हैं, जैसे:
"आकाश"
ये तीन वर्णो से मिलकर बना है- आ+ का+ श
अब छोटी और बड़ी आवाज़ों के आधार पर या आप कहें कि गुरु और लघु के आधार पर हम इन्हें चिह्नित कर लेंगे. गुरु के लिए "2 " और लघु के लिए " 1" का इस्तेमाल करेंगे. जैसे:
सि+ता+रों के आ+गे ज+हाँ औ+र भी हैं.
(1+2+2 1+ 2+2 1+2+2 1+ 2+2)
अब हम इस एक-दो के समूहों को अगर ऐसे लिखें.
122 122 122 122
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वो विधि जिस के द्वारा हम किसी मिसरे या शे'र को अरकानों के तराज़ू मे तौलते हैं, ये विधि तकतीअ कहलाती है। तकतीअ से पता चलता है कि शे'र किस बहर में है या ये बहर से खारिज़ है। सबसे पहले हम बहर का नाम लिख देते हैं।, फिर वो सालिम है या मुज़ाहिफ़ है. मसम्मन ( आठ अरकान ) की है इत्यादि.
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अरकानों के बारे में तो हम जान गए हैं कि आठ अरकान जो बनाये गए जो आगे चलकर बहरों का आधार बने. ये इन आठ अरकानों में कोशिश की गई की तमाम आवाज़ों के संभावित नमूनों को लिया जाए।
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शेर का वज़्न करने के लिए कुछ अल्फ़ाज़ सुनिश्चित हैं जिन्हें अरकान कहते है। जिनके विभिन्न संयोजन से बहर बनती हैं। यहां लघु(१) व दीर्घ (२) के हिसाब से 8 अरकान दिए जा रहे हैं-
आठ बेसिक अरकान:
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1. फ़ा-इ-ला-तुन (2-1-2-2) 2. मु-त-फ़ा-इ-लुन(1-1-2-1-2)
3. मस-तफ़-इ-लुन(2-2-1-2) 4. मु-फ़ा-ई-लुन(1-2-2-2)
5. मु-फ़ा-इ-ल-तुन (1-2-1-1-2) 6.मफ़-ऊ-ला-त(2-2-2-1)
7. फ़ा-इ-लुन(2-1-2) और 8. फ़-ऊ-लुन(1-2-2)
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लंबाई के लिहाज़ से बहरें दो तरह की होती हैं मसम्मन और मुसद्द्स. जिस बहर के एक मिसरे में चार और शे'र में आठ अरकान हों उसे मसम्मन बहर कहा जाता है और जिनमें एक मिसरे मे तीन शे'र में छ: उन बहरों को मुसद्द्स कहा जाता है. जैसे:
(122 122 122 122)
अभी इश्क़ के इम्तिहाँ और भी हैं.
(122 122 122 122)
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जिस बहर में एक ही रुक्न इस्तेमाल होता है वो मफ़रद और जिनमे दो या अधिक अरकान इस्तेमाल होते हैं वो मुरक्कब कहलातीं हैं जैसे:
(122 122 122 122)
122 122 122 122
इसके कई रूप हो सकते हैं जैसे:
122 122 122 12
122 122 122 1
122 122
122 122 1
अभी इश्क़ के इम्तिहां और भी हैं.
मुझे आज़माया सवेरे-सवेरे.
1. फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊ
(फ़ऊ या फ़+अल)
122 122 122 12
तमाशा दिखा कर मदारी गया.(इक़बाल)
हमें आप से भी जुदा कर चले.(मीर)
121 22 x4
(सौलह रुक्नी)
कि ताब-ए-हिज्राँ न दारम ऐ जाँ न लेहु काहे लगाये छतियाँ
बड़ी वफ़ा से निभाई तूने हमारी थोड़ी सी बेवफ़ाई.
121 22 x 2
वो ख़त के पुरज़े उड़ा रहा था.
हवाओं का रुख दिखा रहा था.
जीता है रूमी हारा है काज़ी (इकबाल)
सोलह रुक्नी- 21 122 x4
इस बहर में एक छूट है इसे आप इस रूप में भी इस्तेमाल कर सकते हैं.
211 2 11 211 22
दूसरा, चौथा और छटा गुरु लघु से बदला जा सकता है-
एक मुहव्ब्त लाख खताएँ
वजह-ए-सितम कुछ हो तो बताएँ.
किस पर अहसान जताते हो.(ख्याल)
यहाँ पर हर गुरु की जग़ह दो लघु आ सकते हैं सिवाए आठवें गुरु के ।
आज मुझे अहसास हुआ है अपनी शिकस्ता पाई का.(शकील)
है ये कहानी बिल्कुल सच्ची मेरे नाना कहते थे.(आनंद बख्शी)
जाने न जाने गुल ही न जाने बाग़ तो सारा जाने है.(मीर)
और..
एक ये प्रकार है-
22 22 22 22 22 22 22
इसमे हर गुरु की जग़ह दो लघु इस्तेमाल हो सकते हैं.
अब इसमे छूट भी है इस को इस रूप में भी इस्तेमाल कर सकते हैं-
211 211 222
* मज़हब क्या है इस दिल में
इक मस्जिद है शिवाला है
फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन
(122 122 122 122)
या
छमाछम छमाछम छमाछम छमाछम
या
तपोवन तपोवन तपोवन तपोवन
1.बहरे- मुत़कारिब
(122x4)
(चार फ़ऊलुन )
अ+के+ले अ+के+ले क+हाँ जा र+हे हो
(1+2+2 1+2+2 1+2+2 1+2+2)
मु+झे सा+थ ले लो ज+हाँ जा र+हे हो
(1+2+2 1+ 2+2 1+2+ 2 1+2+2)















