Saturday, 27 June 2020

Digital Shayari Class Series: Week 8 Module 8 : आलेख 1 : उर्दू शायरीकी मंचीय प्रस्तुति- मुशायरे का इतिहास एवं बदलता रूप





मुशायरा तब और अब

मुशायरा, (उर्दू: مشاعره) उर्दु भाषा की एक काव्य गोष्ठी है। मुशायरा शब्द हिन्दी में उर्दू से आया है और यह उस महफ़िल (محفل) की व्याख्या करता है जिसमें विभिन्न शायर शिरकत कर अपना अपना काव्य पाठ करते हैं। मुशायरा उत्तर भारत और पाकिस्तान की संस्कृति का अभिन्न अंग है और इसे प्रतिभागियों द्वारा मुक्त आत्म अभिव्यक्ति के एक माध्यम (मंच) के रूप में सराहा जाता है।
वक़्त के साथ साथ मुशायरे के बदलते रंग को आप इस लेख से खास समाज पाए होंगे। इस लेख में हम एक निगाह इसके इतिहास और वर्तमान स्वरूप पर निदा फ़ाज़ली के विचार जानेंगे।
मुशायरे का आरंभ कब और कैसे हुआ यह निश्चयपूर्वक कह पाना कठिन है। प्राप्त जानकारी के आधार पर यही कहा जा सकता है कि मुशायरा साथ मिल-बैठकर गाने और कविता पाठ करने की प्राचीन परंपरा का विकसित और व्यवस्थित रूप है। इस परंपरा का इतिहास अगम है। यह परंपरा किसी न किसी रूप में हर देश, काल और जाति में प्रचलित रही होगी। सभ्य सामाजिक जीवन से इसका गहरा संबंध जान पड़ता है। कविता पाठ का प्रचलन अरब में इस्लाम के प्रवर्तन के पूर्व भी था।
फिर दसवीं शताब्दी में ईरान में सुनियोजित तरही मुशायरों की शुरूआत हुई । ये दरबारी मुशायरे थे और इन्हें बादशाहों का प्रश्रय प्राप्त था। जन साधारण से इनका कोई संबंध नहीं था। राज्याश्रय में मुखरित होने के कारण मुख्य रूप से प्रशंसात्मक काव्य यानि कसीदा (दे.) कहने की प्रवृत्ति फली फूली। ग़ज़लें भी कही गई। भारत में फारसी ढंग के इन मुशायरों का प्रारंभ सोलहवीं शताब्दी में हुआ। मुगलों के शासनकाल में बहुत से ईरानी शायर भारत आए और यहाँ फारसी में दरबारी मुशायरों  का आयोजन होने लगा। इस समय तक पढ़े-लिखे लोगों की भाषा फारसी ही मानी जाती थी। मगर अठारहवीं शताब्दी में रेख्ता (उर्दू) ने अभूतपूर्व उन्नति की। मीर (दे.), सौदा (दे.) और दर्द (दे.) ने रेख्ता में अपना कलाम कहकर उसे साहित्यिक भाषा का दर्जा दिलाया और इस भाषा में मुशायरे भी होने लगे जिन्हें आरंभ में मुराख्ना कहा गया। पहले ये भी दरवारों से संबद्ध थे मगर कालांतर में मुशावरों का सार्वलौकिक रूप विकसित हुआ। दिल्ली के शायर बाहर निकले और लखनऊ,
रामपुर, हैदराबाद, टौंडा इत्यादि रियासतों में भी तरही मुशायरे की परंपरा का आरंभ हुआ। मुशायरों को सुरुचिपूर्ण बनाने के लिए नियम निश्चित हुए। शायरों का श्रोताओं के बैठने-उठने, दाद देने, गज़ल पढ़ने, आभार प्रदर्शित करने के ढंग तय हुए।
मुशायरे का संचालन मीर मुशायरा का उत्तरदायित्व था और मीर-मुशायरा बहुधा स्वयं बादशाह,
नवाब या शाही परिवार का कोई सदस्य होता। सार्वजनिक मुशायरों में भी अध्यक्ष बादशाह ही होता है। इस बादशाही प्रश्रय के फलस्वरूप उर्दू शायरों में गुटबंदी और अपने प्रतिद्वंद्वी को नीचा दिखाने की कुप्रवृत्ति को प्रोत्साहन मिला और मुशायरे पहलवानी के अखाड़े बन गए। मगर इस सबके बावजूद इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि मुशायरों ने उर्दू भाषा को परिमार्जित और परिवर्धित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
धीरे-धीरे लोग तरही मुशायरों से ऊबने लगे। सो सन् 1867 ई. में लाहौर में अंजुमन-ए-उर्दू ने मुनाज़मों यानि नज़्मों के पाठ का सूत्रपात किया। इसमें शायरों को नज़्म (द.) का शीर्षक दे दिया जाता था। छपाई का प्रसार होने पर तहरीरी मुशायरे होने लगे। इसमें पत्र-पत्रिका का संपादक एक मिसरा देकर ग़ज़लें आमंत्रित करता था। अच्छी रचनाएँ प्रकाशित की जाती थीं। इन मुशायरों में महफ़िली मुशायरों की त्रुटियाँ नहीं थीं। फिर रेडियो पर मुशायरों का प्रसारण प्रारंभ हुआ। वर्तमान युग में गैर तरही मुशायरों को अधिक मान्यता मिली है। इसमें शायर की कल्पना की उड़ान पर बंधन नहीं रहता। आज भी विभिन्न प्रांतों में समय-समय पर अनेक संस्थाओं द्वारा मुशायरों का आयोजन होता है। टी.वी. और रेडियो पर इनके प्रसारण की व्यवस्था की जाती है। इस संबंध में हर साल 26 जनवरी को लाल किले में होने वाला मुशायरा विशेष रूप से उल्लेखनीय है। उर्दू शायरी को लोकप्रिय बनाने में मुशायरों की भूमिका सर्वमान्य है।

पुराना मुशायरों और नए मुशायरों का फ़र्क
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मुशायरे का संबंध अच्छी और गंभीर शायरी से कितना है यह एक चर्चा का विषय है.

शायर और लेखक जनाब निदा फ़ाज़ली के लफ़्ज़ों मे......""हमारी संस्कृति में संतों की मौखिक परंपरा रही है. कबीर दास स्वयं को अपढ़ कहते थे, परंतु ढाई अक्षर प्रेम के काव्य रूप से वह संगत में बैठने वालों को ज्ञान प्रदान करते थे. ग़ालिब से पहले मीर और उनके बाद मीर दर्द के घरों में मुशायरे हुआ करते थे.
इन सभाओं में शायर और श्रोता एक स्थान पर जमा होते थे और ग़ज़लें सुनाते थे, मीर दर्द, मीर तकी मीर के समकालीन सूफ़ी शायर थे. उनका युग 19वीं शताब्दी है, मीर दर्द के दौर में दिल्ली दो बार लूटी गई. एक बार ईरान के नादिर शाह के हाथों और दूसरी बार अफगानिस्तान के अहमद शाह दुर्रानी ने इसे वीरान किया.
इन दोनों आक्रमणों ने केवल तबाही ही नहीं मचाई, औरंगज़ेब के बाद भारत में मुगल सल्तनत की दिन प्रतिदिन गिरती हुई साख़ को भी महत्वहीन बना दिया.
इन हमलों से घबराकर मीर और उनके साथ कई और नामी गिरामी शायर दिल्ली छोड़ के वाजिद अली शाह के लखनऊ में जा बसे. अकेले मीर दर्द ही ऐसे थे, जो उजड़ती दिल्ली को छोड़ने को तैयार नहीं हुए. उन्हीं के घर मुशायरे में एक बार एक मुगल शहज़ादा भी शायरी के शौक़ में आ गया.
वह टांगें फैलाए हुए था अचनाक मीर दर्द की नज़र उसकी इस असभ्य हरकत पर पड़ी, उन्होंने टोकते हुए उससे कहा, साहबज़ादे यह अदब की महफिल है और इसमें टांगे इस तरह फैलाकर बैठना बेअदबी है. शहज़ादे ने कहा, 'मैं मजबूर हूँ...मेरी टांगों में तकलीफ़ है', मीर दर्द ने फौरन जवाब दिया-'मियाँ तकलीफ़ को घर में आराम दिया जाता है, महफ़िल में, महफ़िल के आदाब का ख़्याल किया जाता है.'

वो ज़माना-ये ज़माना

उस ज़माने में मुशायर तहज़ीब के केंद्र हुआ करते थे. आख़िरी मुगल बहादुर शाह ज़फ़र के लालकिले के मुशायरे अब इतिहास का हिस्सा हैं...इन मुशायरों में ग़ालिब सुनाते थे और ज़ौक सुनते थे, बहादुरशाह जफ़र ग़ज़ल पढ़ते थे और सुनने वालों में मोमिन खाँ, ग़ालिब, शेफ्ता और युवा शायर दाग़ होते थे...उन दिनों सुनाने वालों और सुनने वालों के बीच में इतनी दूरी नहीं होती थी जितनी आज नज़र आती है.
आज कच्ची उम्र की कन्याएँ, दूसरों से लिखवाई कविताएँ सुनाती हैं और छा जाती हैं, उनमें कुछ ऐसे शायर भी होते हैं जो छपी छपाई ख़बरों को कविता बनाकर सुनाते हैं और श्रोताओं से तालियाँ पिटवाते हैं, ऐसे मुशायरों में एक और बात देखने को मिलती है, और वह है भावुक क़िस्म की सांप्रदायिकता.
अच्छी-सच्ची शायरी के दर्शन अब मुशायरों में कम ही होते हैं, शेर हो या कविता हो, उसे सुनकर समझने के लिए थोड़े समय की ज़रूरत होती है, और स्टेज से पढ़ी जाने वाली ग़ज़ल के लिए श्रोताओं के पास इतना समय नहीं होता, वे फास्ट फूड की तरह शीघ्र स्वाद की आदत के शिकार हैं. समय की बढ़ती स्पीड के अनुसार, श्रोताओं को भी ऐसी रचनाओं में आनंद आता है जिसको सुनने में, किसी प्रकार का मानसिक या शारीरिक कष्ट नहीं...!
एक बार एक संयोजक ने मुझसे प्रश्न किया था आप मुशायरों में शरीक होने के लिए इतने ज़्यादा पैसे क्यों मांगते हैं, मेरा जवाब था, 'मैं इतनी रक़म की इसलिए डिमांड करता हूँ कि मुझे एक साथ दो काम करने पड़ते हैं-अपनी कविताएँ सुनाने के साथ दूसरों को सुनना भी पड़ता है. अगर मुझे सिर्फ़ अपनी कविताएँ सुनानी हों तो रक़म की डिमांड आधी भी हो सकती है.'
मुशायरों की ऐसी हालत हर जगह नज़र आती है. कविताएँ कम सुनाई जाती है, हाव-भाव या गलेबाज़ी से दिखाई ज़्यादा जाती है जिसकी वजह से मुशायरा तमाशा बन जाता है.""
स्तरीय मुशायरे आज भी विश्व स्तर पर आयोजित किए जाते है और कस्बे व कमेटी स्टार पर भी। टेलीविजन पर मुशायरों का प्रसारण आज आम बात है जो शायरों को सीधा श्रोताओं से जोड़ता है। दूसरे Social Media (फेस बुक, व्हाट्सएप्प व इंस्टाग्राम आदि) में मुशायरे व उनकी क्लिप्स का वायरल होने एक आम बात है। साथ ही Youtube पर मुशायरे बहुतायत में उपलब्ध है जो इनकी लोकप्रियता लगातार बढ़ाते है। Open space, खुला मंच व पर्सनल वीडियो के जरिये भी शायर अपनी शायरी सरलता से श्रीताओ तक ले जा पा रहा है जो एक तरह से मुशायरा ही है।

लतीफ़ा
कामयाब मुशायरा?
हरी चंद अख़्तर
मसूरी के मुशायरे से वापसी पर जगन्नाथ आज़ाद, हरिचंद अख़्तर, बिस्मिल सईदी टोंकी कुछ और शाइ’रों के साथ सफ़र कर रहे थे। हरिचंद अख़्तर ने बातचीत के दौरान कहा मसूरी का मुशायरा बहुत बेकार रहा है।
आज़ाद साहिब इज़हार-ए-हैरत करते हुए बोले, “अख़्तर साहिब मुशायरा तो बहुत कामयाब था।”
इस पर अख़्तर साहिब बोले:
“न शुअ’रा की आपस में लड़ाई हुई, न गाली गलौच हुई, न मुआ’वज़े की कमी बेशी का झगड़ा हुआ, और न ही होटल वालों की कोई चीज़ गुम हुई। क्या ख़ाक कामयाब मुशायरा था।”
शायरी के तारा मसीह और अमरोहा के भुट्टो
बशीर बद्र
अमरोहा में मुशायरा बहुत सुकून से चल रहा था। शायर भी मुतमइन और सुनने वाले भी ख़ुश कि बीच मजमे से एक बहुत मा’क़ूल शख़्सियत वाले साहिब उठे और खड़े हो कर आ’दिल लखनवी की तरफ़ इशारा करके बोले,
“डाक्टर साहिब, वो शायर जिनकी सूरत तारा मसीह (जिस जल्लाद ने वज़ीर-ए-आज़म पाकिस्तान ज़ुल्फ़क़ार अली भुट्टो को फांसी दी थी) के हू-ब-हू है, उन्हें पढ़वा दीजिए।”
बशीर बद्र ने अपनी मख़सूस मुस्कुराहट के साथ आ’दिल लखनवी को दा’वत-ए-सुख़न देते हुए कहा,
“मैं शायरी के तारा मसीह से दरख़्वास्त करता हूँ कि तशरीफ़ लाएं और अमरोहा के ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो का काम तमाम कर दें।”
सिंह की अनोखी दाद
कँवर महेंद्र सिंह बेदी सहर
दिल्ली के एक मुशायरे में कँवर महिन्द्र सिंह बेदी ने शायरों को डायस पर बुलाया तो तर्तीब ऐसी रखी कि शायरात उनके क़रीब रहें। मुशायरे के बाद ख़लीक़ अंजुम बेदी साहिब से कहने लगे कि आप जब किसी शायरा को दाद देते हैं तो आपका हाथ लहराने के बजाय उसकी पीठ पर ज़्यादा देर तक सरकता रहता है। बेदी साहिब ने फ़ौरन जवाब दिया:
“दाद देने का यही अंदाज़ तो दाद तलब है।”
प्रस्तुति: आनन्द कक्कड़

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