Saturday, 20 June 2020

Week 7 Module 7 ग़ज़ल के बारे में- ग़ज़ल से संबंधित शब्द (vol1)




ग़ज़ल के बारे में- ग़ज़ल से संबंधित शब्द (vol1)
क्रम १ - ग़ज़ल से सम्बंधित शब्द और उनके अर्थ (उदाहरण सहित)


ग़ज़ल-
एक समान रदीफ़ (समांत) तथा भिन्न भिन्न क़वाफ़ी(क़ाफ़िया का बहुवचन) (तुकांत) से सुसज्जित एक ही वज़्न
(मात्रा क्रम) अथवा बह्'र (छंद) में लिखे गए अश'आर(शे'र का बहुवचन) समूह को ग़ज़ल कहते हैं। जिसमें शायर किसी चिंतन विचार अथवा भावना को प्रकट करता है।
शाइर / सुख़नवर = उर्दू काव्य लिखने वाला
शाईरी = उर्दू काव्य लेखन
ग़ज़लगो = ग़ज़ल लिखने वाला
ग़ज़लगोई = ग़ज़ल लिखने की प्रक्रिया
शे'र-
रदीफ़ तथा क़ाफ़िया से सुसज्जित एक ही वज़्न ( मात्रा क्रम) अर्थात बह्'र में लिखी गई दो पंक्तियाँ जिसमें किसी चिंतन विचार अथवा भावना को प्रकट किया गया हो | 
उदाहरण स्वरूप दो अश'आर (शे'र का बहुवचन) प्रस्तुत हैं -
फ़क़ीराना आये सदा कर चले
मियाँ ख़ुश रहो हम दु'आ कर चले ||१||
वह क्या चीज़ है आह जिसके लिए
हर इक चीज़ से दिल उठा कर चले ||२|| - (मीर तक़ी मीर)
अश'आर - शे'र का बहुवचन
फ़र्द - एक शे'र
(पुराने समय में फर्द विधा प्रचिलित थी जो ग़ज़ल की उपविधा थी। जैसे आज कतअ का मुसम्मन रूप प्रचिलित है अर्थात अब कतअ ४ मिसरों में कही जाती है । पुरानी कतआत में २ से अधिक अशआर भी मिलते हैं)
आज अगर शायर कहता है कि कतअ पढता हूँ तो श्रोता समझ जाते हैं कि शायर चार मिसरों की रचना पढ़ेगा, उसी प्रकार एक स्वतंत्र शेर को फर्द कहा जाता है जब कोई शायर कहता था कि फर्द पढता हूँ तो श्रोता समझ जाते थे कि अब शायर कुछ स्वतंत्र शेर पढ़ने वाला है|
अशआर कहने से यह पता चलता है कि सभी शेर एक जमीन के हैं और फर्द से पता चलता है कि सभी शेर अलग अलग जमीन से हैं ।
मिसरा -
शे'र की प्रत्येक पंक्ति को मिसरा कहते हैं, इस प्रकार एक शे'र में दो पंक्तियाँ अर्थात दो मिसरे होते हैं-
(1) मिसरा -ए- उला- शे'र की पहली पंक्ति को मिसरा -ए- उला कहते हैं 'उला' का शब्दिक अर्थ है 'पहला'
उदाहरण -
हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए <-- मिसरा -ए- उला
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए - (दुष्यंत कुमार)
(2) मिसरा -ए- सानी = शे'र की दूसरी पंक्ति को मिसरा -ए- सानी कहते हैं 'सानी' का शब्दिक अर्थ है 'दूसरा'
उदाहरण -
हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए <-- मिसरा ए सानी
रदीफ़-
वह समांत शब्द अथवा शब्द समूह जो मतले (ग़ज़ल का पहला शे'र) के दोनों मिसरों के अंत में आता है तथा अन्य अश'आर के मिसरा -ए- सानी अर्थात दूसरी पंक्ति के अंत में आता है और पूरी ग़ज़ल में एक सा रहता है उसे रदीफ़ कहते हैं
उदाहरण = आग के दरमियान से निकला
मैं भी किस इम्तिहान से निकला
चाँदनी झांकती है गलियों में
कोई साया मकान से निकला - (शकेब जलाली)
प्रस्तुत अश'आर में से 'निकला' रदीफ़ है
क़ाफ़िया -
वह शब्द जो प्रत्येक शे'र में रदीफ़़ के ठीक पहले आता है और सम तुकांतता के साथ हर शे'र में बदलता रहता है उसे क़ाफ़िया कहते हैं, शे'र का आकर्षण क़ाफ़िये पर ही टिका होता है क़ाफ़िये का जितनी सुंदरता से निर्वहन किया जायेगा शे'र उतना ही प्रभावशाली होगा
उदाहरण = किस महूरत में दिन निकलता है
शाम तक सिर्फ हाथ मलता है
वक़्त की दिल्लगी के बारे में
सोचता हूँ तो दिल दहलता है -(बाल स्वरूप राही)
अब हम रदीफ़ की पहचान कर सकते हैं इसलिए स्पष्ट है कि प्रस्तुत अश'आर में 'है' शब्द रदीफ़़ है तथा उसके पहले के शब्द निकलता, मलता, दहलता सम तुकान्त शब्द हैं तथा प्रत्येक शे'र में बदल रहे हैं इसलिए यह क़ाफ़िया है।
मतला -
ग़ज़ल का पहला शे'र जिसके दोनों मिसरों में क़ाफ़िया रदीफ़़ होता है उसे मतला कहते हैं
उदाहरण -
बहुत रहा है कभी लुत्फ़-ए-यार हम पर भी
गुज़र चुकी है ये फ़स्ल-ए-बहार हम पर भी || मतला ||
ख़ता किसी कि हो लेकिन खुली जो उनकी ज़बाँ
तो हो ही जाते हैं दो एक वार हम पर भी || दूसरा शे'र || - (अकबर इलाहाबादी)
हुस्ने मतला = यदि ग़ज़ल में मतला के बा'द और मतला हो तो उसे हुस्ने मतला कहा जाता है।
उदाहरण-
जिक्र तबस्सुम का आते ही लगते हैं इतराने लोग
और ज़रा सी ठेस लगी तो जा पहुंचे मैख़ाने लोग || मतला ||
मेरी बस्ती में रहते हैं ऐसे भी दीवाने लोग
रात के आँचल पर लिखते हैं दिन भर के अफ़साने लोग || हुस्ने मतला ||
- (अतीक इलाहाबादी)
प्रस्तुत अश'आर में पहला शे'र मतला है तथा दुसरे शे'र के मिसरा उला (पहली पंक्ति) में भी रदीफ़़ क़ाफ़िया का निर्वहन हुआ है इसलिए यह शे'र हुस्ने मतला है।
तख़ल्लुस - उर्दू काव्य विधाओं की रचनाओं के अंत में नाम अथवा उपनाम लिखने का प्रचलन है | उपनाम को उर्दू में तख़ल्लुस कहते हैं |
उदाहरण -
हुई मुद्दत कि 'ग़ालिब' मर गया पर याद आता है
वो हर इक बात पर कहना कि, यूँ होता तो क्या होता - (असदउल्लाह ख़ान 'ग़ालिब')
इस शे'र में शायर ने अपने तख़ल्लुस 'ग़ालिब' का प्रयोग किया है|
मक़्ता = ग़ज़ल के आख़िरी शे'र को मक़्ता कहते हैं इस शे'र में शायर कभी कभी अपना तख़ल्लुस (उपनाम) लिखता है|
उदाहरण -
अजनबी रात अजनबी दुनिया
तेरा "मजरूह" अब किधर जाये - (मजरूह सुल्तानपुरी)
यह मजरूह सुल्तानपुरी की ग़ज़ल का आख़िरी शे'र है जिसमें शायर ने अपने तख़ल्लुस 'मजरूह' (शाब्दिक अर्थ - घायल) का सुन्दर प्रयोग किया है।
मुरद्दफ़ ग़ज़ल अर्थात रदीफ़़वार -
वो ग़ज़ल जिसमें रदीफ़़ होता है उसे मुरद्दफ़ ग़ज़ल कहते हैं।
उदाहरण -
उनसे मिले तो मीना-ओ-साग़र लिए हुए
हमसे मिले तो जंग का तेवर लिए हुए
लड़की किसी ग़रीब की सड़कों पे आ गई
गाली लबों पे हाथ में पत्थर लिए हुए - (जमील हापुडी)
प्रस्तुत अश'आर में 'लिए हुए' रदीफ़़ है इसलिए यह मुरद्दफ़ ग़ज़ल है।
ग़ैर मुरद्दफ़ ग़ज़ल = जिस ग़ज़ल में रदीफ़ नहीं होता है उसे ग़ैर मुरद्दफ़ ग़ज़ल कहते हैं।
उदाहरण -
जाने वाले तुझे कब देख सकूं बारे दीगर
रोशनी आँख की बह जायेगी आसूं बन कर
रो रहा था कि तेरे साथ हँसा था बरसों
हँस रहा हूँ कि कोई देख न ले दीदा-ए-तर - (शाज़ तमकनत)
प्रस्तुत अश'आर के पहले शे'र में मिसरे 'दीगर', 'कर' शब्द से समाप्त हुए हैं जो कि समतुकांत हैं तथा अलग अलग हैं।
इसलिए स्पष्ट है कि यह रदीफ़़ के न हो कर क़ाफ़िया के शब्द हैं और इस शे'र में रदीफ़ नहीं है इस प्रकार आगे के शे'र में भी क़ाफ़िया को निभाते हुए तर शब्द आया है इससे सुनिश्चित होता है कि यह ग़ैर मुरद्दफ़ ग़ज़ल है |
मुसल्सल ग़ज़ल-
ग़ज़ल का प्रत्येक शे'र अपने आप में पूर्ण होता है तथा शायर ग़ज़ल के प्रत्येक शे'र में अलग अलग भाव को व्यक्त कर सकता है परन्तु जब किसी ग़ज़ल के सभी अश'आर एक ही भाव को केन्द्र मान कर लिखे गए हों तो ऐसी ग़ज़ल को मुसल्सल ग़ज़ल कहते हैं|
ग़ैर मुसल्सल ग़ज़ल-
ग़ज़ल के प्रत्येक शे'र अलग अलग भाव को व्यक्त करें तो ऐसी ग़ज़ल को ग़ैर मुसल्सल ग़ज़ल कहते हैं

No comments:

Post a Comment