रूबाई :- रुबाई मुक्तक है और अपने-आप में पूर्ण भी। इसके चार चरणों में दो बैत होते हैं, इसलिए इसका नाम 'दो-बैती' भी है। रुबाई फ़ारसी का सर्वाधिक लोकप्रिय रचनाविधान है। फ़ारसी में इसे 'तराना' भी कहते हैं।
रुबाई उर्दू की नज़्म-शायरी की विधा है जो चार मिसरों पर आधारित होती है। इन चार मिसरों में पहले, दूसरे और चौथे मिसरों में क़ाफ़िए की समानता होती है। और रूबाई के चारो मिसरे एक ही विषय पर आधारित होते हैं। रुबाई के लिए 24 वज़्न (छंद) तय हैं। किसी रुबाई के सारे मिसरे इन में से किसी एक वज़्न में हो सकते हैं और हर मिसरा अलग वज़्न में भी हो सकता है।
डॉक्टर इक़बाल की एक रुबाई है-
रगों में वो लहू बाक़ी नहीं है
वो दिल वो आरजू बाकी नहीं है
नमाजो-रोज़-ओ-कुर्बानिओ-हज
ये सब बाक़ी है तू बाक़ी नहीं है
शुभ दिन लिए सावन का महीना आया
तब जा के मेरे हाथ नगीना आया
आया मुझा तुलसी पे जो लिखने का ख़याल
कुछ देर ख़यालों को पसीना आया
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ज़रूरतों के तक़ाज़े देख रवय्ये बदल लेते हो ,
सहूलियत के हिसाब से पहिये बदल लेते हो ,
ज़िन्दगी महज़ कोई सवारी या कश्ती तो नहीं ,
जो बस मौज के लिए तुम खेवैये बदल लेते हो ।
— नज़र
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रुबाई अरबी भाषा का शब्द है। रुबाई संगीतपूर्ण काव्यकला है। रुबाई का एक विशेष छन्द होता है। रूप में रुबाई कला के बारे में लिखते हुए कहा गया है कि – " रुबाई की चारों पंक्तियां एक सम्पूर्ण कविता होती है और पहली ही पंक्ति से रुबाई अपनी प्रत्येक पंक्ति द्वारा लहरों की तरह उठती है और चौथी पंक्ति में अंतिम लहर तट को चूम लेती है।"
कहते हैं रुबाई लिखने की कला बड़ी जटिल व सूक्ष्मता से परिपूर्ण होती है जैसे हाथी दांत पर बारीक नक्काशी‚ इसे कहना या लिखना हरेक के बस की बात नहीं। गालिब और इकबाल भी इस क्षेत्र में अच्छी कृतियां न दे सके। फिराक गोरखपुरी को रुबाई लिखने वाले गिने चुने सिद्धहस्तों में गिना गया है। रूप की रुबाइयों में जहाँ यौवन‚ प्रेम और अथाह सौन्दर्य का सागर बहा है वहीं लौकिक में अलौकिक चेतना के समन्वय का दार्शनिक रूप भी दृष्टिगोचर होता है।
'नभ मण्डल गूंजता है तेरे जस से
गुलशन खिलते हैं ग़म के खारो खस से
संसार में ज़िन्दगी लुटाता हुआ रूप
अमृत बरसा रहा है जोबन रस से।'
फिराक की इन संगीतमय रुबाइयों में अपने यौवन से बेखबर कमसिन किशोरी से लेकर‚ प्रेमिका‚ भांवरे लेती परिणीता‚ सुहागरात को लाज से भरी नव वधू‚ सुहागरात के बाद स्नान करती वधु‚ सद्यस्नात: स्त्री‚ विरहिणी‚ भाई को राखी बांधती‚ बच्चे को नहलाती‚ दुलराती मां‚ सारे त्यौहार पूरी श्रद्धा से मनाती हुई गाय को पुचकार कर चारा खिलाती‚ रामायण पढ़ती भारतीय हिन्दू स्त्री के हर रूप की छब बड़े ही भाव भीने शब्दों में बांध कर रख दी गई है। एक एक रुबाई प्रेम और सौन्दर्य का छलकता हुआ अमृत पात्र है।
'माथे की यह कहकशां ये जोबन की लहर
पड़ते ही झपक झपक जाती है नज़र
वो रूप जहां दोनों समय मिलते हों
आँखों में सुहागरात‚ मुखड़े पर सहर
चढ़ती हुई नदी है कि लहराती है
पिघली हुई बिजली है कि बल खाती है
पहलू में लहक के भींच लेती है वो जब
न जाने कहाँ बहा ले जाती है
चढ़ती जमुना का तेज रेला है कि जु.ल्फ
बल खाता हुआ सियाह कौंदा है कि जु.ल्फ
गोकुल की अंधेरी रात देती हुई लौ
घनश्याम की बांसुरी का लहरा है कि ज़ुल्फ
खुश्बू से मशाम आँखों के बस जाते हैं
गुंचे से फिजांओं में बिकस जाते हैं
झुकती है तेरी आँख सर्रेखलवर्तेनाज
या कामिनी के फूल बरस जाते हैं।
गंगा वो बदन कि जिसमें सूरज भी नहाये
जमुना बालों की‚ तान बंसी की उड़ाय
संगम वो कमर‚ आँख ओझल लहराय
तहे–आब सरस्वती की धारा बल खाय'
-फ़िराक़
हरिवंशराय बच्चन जी ने उमर ख़य्याम की रूबाइयों से प्रभावित हो कर मधुशाला के बंद कहे थे...
मुसलमान और हिंदू दो हैं,
एक मगर उनका प्याला
एक मगर उनका मदिरालय,
एक मगर उनकी हाला
दोनों रहते एक न जब तक
मंदिर-मस्जिद को जाता
बैर बढ़ाते मंदिर-मस्जिद,
मेल कराती मधुशाला.....!!
मैं मदिरालय के अंदर हूँ
मेरे हाथों में प्याला
प्याले में मदिरालय
बिंबित करने वाली हाला
इस उधेड़बुन ही में मेरा सारा
जीवन बीत गया
मैं मधुशाला के अंदर
या मेरे अंदर मधुशाला.....!!
- हरिवंशराय बच्चन
(रूबाई पर जनाब निदा फ़ाज़ली साहब का आलेख ज़ुरूर पढ़िए जिसे एक अलग लेख के रूप में ब्लॉग पर रखा गया है ।)
किता / क़ता :- – इसकी दूसरी और चौथी पंक्तिया या पहली, दूसरी और चौथी पंक्ति लयबद्ध होती है इसमें कई शेर और पंक्तियाँ होती है |
प्यार से कहो तो आसमान मांग लो,
रूठ कर कहो तो मुस्कान मांग लो,
तमन्ना यही है कि दोस्ती मत तोड़ना,
फिर चाहें हँसकर हमारी जान मांग लो ।
रेख्ती :- यह एक स्त्रीलिंग शब्द है और इसे ग़ज़ल प्रारूप में लिखा जाता है | इसकी सबसे खासियत और पहचान यह है की इसमें पुरुष शायर औरतो की जबान में शायरी करता है | रेख्ती में शायर औरतो के भाव, उनके जज्बात, दो महिलाओं की बातचीत, औरतो से संबधित मुद्दों पर शेर कहता है और यह सभी शेर औरत की जबान में होते है | ग़ालिब, जौक और मीर तकी मीर रेख्ती कहने में बहुत माहिर थे |
शेर :- यहाँ ग़ज़ल का सबसे अहम हिस्सा होता है इसमें मतला, मक्ता शामिल है | इसके मुख्य हिस्से काफ़िया, रदीफ, बहर है | शेर सिर्फ दो पंक्ति का होता है |
दोहे :- दोहा किसी भी विषय पर लिखा जाता है पर अधिकांशत: दार्शनिक प्रवत्ति का होता है इसे दो पंक्तियों में लिखा जाता है | बेकल उत्साहीऔर निदा फाजली के दोहे बहुत प्रसिद्द है |
तुम बिन चाँद न देख सका टूट गई उम्मीद
बिन दर्पन बिन नैन के कैसे मनाएँ ईद
बेकल उत्साही
आदत से लाचार है आदत नई अजीब
जिस दिन खाया पेट भर सोया नहीं ग़रीब
अख़्तर नज़मी
उस जैसा तो दूसरा मिलना था दुश्वार
लेकिन उस की खोज में फैल गया संसार
निदा फ़ाज़ली
जीवन जीना कठिन है विष पीना आसान
इंसाँ बन कर देख लो ओ 'शंकर' भगवान
शाहिद मीर
हर इक बात में डाले है हिन्दू मुस्लिम की बात
ये ना जाने अल्हड़ गोरी प्रेम है ख़ुद इक ज़ात
जमीलुद्दीन आली
भारी बोझ पहाड़ सा कुछ हल्का हो जाए
जब मेरी चिंता बढ़े माँ सपने में आए
अख़्तर नज़्मी
आज मुझी पर खुल गया मेरे दिल का राज़
आई है हँसते समय रोने की आवाज़
भगवान दास एजाज़
सती तो मैं हो जाऊँगी पर ये मुझे बता
पहले अगर मैं मर गई जलेगा तू भी क्या
क़तील शिफ़ाई
अपनी ख़ुशियाँ भूल जा सब का दर्द ख़रीद
'सैफ़ी' तब जा कर कहीं तेरी होगी ईद
सैफ़ी सिरोंजी
तजकिरा :- इसका आकार काफी बड़ा होता है | उर्दू, फारसी, पंजाबी साहित्य में किसी लेखक की जीवनी को बताने वाली रचना के संग्रह को तज़किरा (यानि कुसुमावली) कहते है|
गीत (का. रु.)
लय, ताल ओर झंकार गीत की पहली अनिवार्यता हैं। गेयता नहीं तो गीत नहीं।
इसका सीधा संबंध श्रवणेन्द्रि से है और यह उसे गति देता है। गीत का स्वरूप
संगीत के अनुकूल होता है, नृत्य इसका पूरक है, और यह पुरुष के लिए स्त्री के
अपार प्रेम का प्रतीक है। यह एक लौकिक और मातृ-सत्तात्मक समाज की अभिव्यक्ति
है। वज़ीर आगा के अनुसार गीत वह स्थल है जब शरीर पहली बार आत्म-बोध
से परिचित होकर थिरक उठता है, यह वह भाव है जो शरीर के गीतात्मक आरोह-अवरोह
पर नृत्य करता है। स्त्री की ओर से पुरुष के प्रति निवेदन के कारण गीत में वैचारिक
तत्व और कल्पना कम, कामना, कसक, व्याकुलता और समर्पण की भावना अधिक
है। संयोग-वियोग और त्याग इसके विषय वस्तु हैं। यह एक उन्मुक्त अभिव्यक्ति
है। अतएव एक प्रकार से नारी के अपने परिवेश से क्षणिक स्वातंत्र्य की इच्छा का
भी द्योतक है। गीत का धरती से गहरा और सशक्त संबंध है। प्रकृति के परिवर्तनशील,
सुंदर विविध रंग, उसका गान, उसका नृत्य, गंध और मृदुलता गीत की पृष्ठभूमि
तैयार करते हैं जिस पर प्रेम के चिन्ह उभरते हैं।
हाफ़िज़ मुहम्मद शीरानी (दे.) के अनुसार अकबर के शासन काल तक रेख़्ता
का अर्थ गीत से लिया जाता था। यद्यपि उसमें संस्कृत के साथ-साथ अरबी और
फ़ारसी शब्दों का समावेश हो चुका था किंतु बुनियादी तौर पर रेख्ता का स्वरूप
हिंदी था और उसमें लिखी गई कविता प्रारंभ में हिंदी गीत के स्वरूप और वातावरण
के अनुकूल थी। उर्दू गीत की परंपरा का प्रवर्तक अमीर खुसरो (दे.) को माना जाता
है। आपके काव्य में पहली पंक्ति फ़ारसी में है और दूसरी जिस हिंदी में लिखी गई
है उससे उर्दू गीत का प्रारंभिक रूप प्रकट होता है। इन पंक्तियों में पुरुष के प्रति
स्त्री के प्रेम की स्पष्ट और बेलाग अभिव्यक्ति हैl
उर्दू शायरों के गीत भी संरचना और व्याकरण के लिहाज से हिंदी गीत के समान होते हैं। उदाहरण के तौर पर वसीम बरेलवी का ये गीत पढ़िए।
गीत
भात चढ़े चूल्हे पे द्वार हुई खट खट।
जुल्मी ने ये भी समझ लिया पनघट।
भात चढ़े चूल्हे पे द्वार हुई खट खट।
आँगन की दूरी समंदर लागे,
पार करू कैसे बोहत डर लागे।
हंडिया में खच्पच तो मन बड़ा संकट ।
भात चढ़े चूल्हे पे द्वार हुई खट खट।
प्यार कहे जा जा लाज कहे न जा;
छोटी सी कुटिया बड़ी मर्यादा।
लछमन की रेखा भई बाबुल चोखट।
भात चूल्हे पे द्वार हुई खट खट।
घर की रसोई पे ममता का पहरा;
चूल्हे पे रक्खा है सपना सुनेहरा।
अन्दर से बाहर तक आहट ही आहट।
भात चढ़े पे द्वार हुई खट खट;
जुल्मी ने ये भी समझ लिया पनघट।
भात चढ़े चूल्हे पे........"
उपरोक्त विवरण से आपको अब उर्दू शायरी की विविधता और समृद्ध परम्परा का परिचित ज़ुरूर हुआ होगा।
आनन्द कक्कड़
सभार व संदर्भ:
A Shahr-ashob of Sauda, translated by Mark Pegors
• विकिपीडिया pages न उर्दू साहित्य
↑ Poetry and Drama: Literary Terms and Concepts, Britannica Educational Publishing, The Rosen Publishing Group, 2011, ISBN 978-1-61530-539-1, ... The qasida (Arabic qas·īdah) is a poetic form that was developed in pre-Islamic Arabia and perpetuated throughout Islamic literary history into the present. It is a laudatory, elegiac, or satiric poem ...
↑ Qasida Poetry in Islamic Asia and Africa: Classical traditions and modern meanings, Stefan Sperl, C. Shackle, BRILL, 1996, ISBN 978-90-04-10295-8, ... The term is derived from the verb qasada, 'to aim at, to intend' ...
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