उर्दू शायरी की चंद बारीकियां: कुछ ज़रूरी शाब्दिक संकेत
आनंद कक्कड़
उर्दू-शायरी का अपना एक ख़ास अंदाज़ व स्वाद है। इसमें एक ख़ास मज़ा है, जो अन्यत्र दुर्लभ
है और शायद यही वजह है कि उर्दू-शायरी हिन्दी-जगत में भी क़द्र तथा जिज्ञासा की दृष्टि से देखी जाती है। लेकिन एक सत्य यह भी है कि हिन्दी पाठक उर्दू-शायरी की चन्द बारीकियों से अनभिज्ञता के कारण उसका पूर्ण आस्वादन चाहकर भी नहीं कर पाता।
अगर इन शाब्दिक संकेतों को आप समझ लें तो उर्दू शयरी की समझ बढ़ जाएगी। ऐसे कुछ शाब्दिक संकेत यहाँ दिए जा
रहे हैं जो उर्दू-शायरी के अध्ययन में पाठकों का मार्ग-दर्शन करेंगे-
है और शायद यही वजह है कि उर्दू-शायरी हिन्दी-जगत में भी क़द्र तथा जिज्ञासा की दृष्टि से देखी जाती है। लेकिन एक सत्य यह भी है कि हिन्दी पाठक उर्दू-शायरी की चन्द बारीकियों से अनभिज्ञता के कारण उसका पूर्ण आस्वादन चाहकर भी नहीं कर पाता।
अगर इन शाब्दिक संकेतों को आप समझ लें तो उर्दू शयरी की समझ बढ़ जाएगी। ऐसे कुछ शाब्दिक संकेत यहाँ दिए जा
रहे हैं जो उर्दू-शायरी के अध्ययन में पाठकों का मार्ग-दर्शन करेंगे-
(1)" -ए- " को 'ज़ेरे-इज़ाफ़त" यानी संबंधन की ई-मात्रा कहते हैं। इज़ाफ़त शब्दजोड़ बनाने की एक फ़ारसी विधि है जो फ़ारसी भाषा से उर्दू में आई है।
-''ए'- का प्रयोग प्रायः का, के, की आदि के लिए किया जाता है। जैसे गम-ए-दोस्त (मित्र का दुख) अथवा तकाज़ा-ए-वक़्त (समय की माँग)। " -ए- " का प्रयोग शेर व ग़ज़ल को खूबसूरत बनाता है और उसके प्रवाह (flow) को सरल।
इसका उपयोग 2 प्रकार के यौगिक-संज्ञा (compound Noun) बनाने में किया जाता है-
• मुज़ाफ़ मुज़ालफे [Noun+ए+Noun]
• मौसूफ़ सिफ़त [Noun+ए+adjective]
-''ए'- का प्रयोग प्रायः का, के, की आदि के लिए किया जाता है। जैसे गम-ए-दोस्त (मित्र का दुख) अथवा तकाज़ा-ए-वक़्त (समय की माँग)। " -ए- " का प्रयोग शेर व ग़ज़ल को खूबसूरत बनाता है और उसके प्रवाह (flow) को सरल।
इसका उपयोग 2 प्रकार के यौगिक-संज्ञा (compound Noun) बनाने में किया जाता है-
• मुज़ाफ़ मुज़ालफे [Noun+ए+Noun]
• मौसूफ़ सिफ़त [Noun+ए+adjective]
मुज़ाफ़ मुज़ालफे - जब लेखक "ए" की मदद से शब्द बनाता है, और संज्ञा+ए+संज्ञा (Noun+ए+Noun) को जोड़ता है तो उस शब्द को मुज़ाफ़ मुज़ालफे कहते हैं।
उदाहरण- दिल-ए-यश इसे दिले-यश भी लिख सकते हैं। यहां देखें कि पहले शब्द में ए की मात्रा बढ़ गयी तो उर्दू में इसे कसरा-ए-इज़ाफ़ी कहते हैं। जैसा कि ऊपर आपने पढ़ा कि -ए- का प्रयोग का, की, के लिए किया जाता है-
हाले गरीब = गरीब का हाल
सज़ा-ए-मौत = मौत की सज़ा
सफ़रे ज़िन्दगी = ज़िन्दगी का सफ़र
नूर-ए-नज़र = आंख का तारा
सदा-ए-आम = लोगों की पुकार
उदाहरण- दिल-ए-यश इसे दिले-यश भी लिख सकते हैं। यहां देखें कि पहले शब्द में ए की मात्रा बढ़ गयी तो उर्दू में इसे कसरा-ए-इज़ाफ़ी कहते हैं। जैसा कि ऊपर आपने पढ़ा कि -ए- का प्रयोग का, की, के लिए किया जाता है-
हाले गरीब = गरीब का हाल
सज़ा-ए-मौत = मौत की सज़ा
सफ़रे ज़िन्दगी = ज़िन्दगी का सफ़र
नूर-ए-नज़र = आंख का तारा
सदा-ए-आम = लोगों की पुकार
मौसूफ़ सिफ़त:
इस प्रकार में लेखक "ए" की मदद से संज्ञा+ए+विश्लेषण (Noun+ए+adjective) को जोड़ता है तो उसे मौसूफ़ सिफ़त कहते हैं। इस प्रकार में *का -की -के* के अर्थ में आपको "ए" नहीं मिलेगा। यानी का की के नही जोड़ेगा शब्दों को ।
जैसे -
दिल-ए- बर्बाद - बर्बाद दिल
गुल ए तर - गीला फूल
मुग़ल-ए-आज़म = महानतम मुगल
चश्मे पुरनम = नमी से भरी आंख
कोहे गिरां = भारी पहाड़
इस प्रकार में लेखक "ए" की मदद से संज्ञा+ए+विश्लेषण (Noun+ए+adjective) को जोड़ता है तो उसे मौसूफ़ सिफ़त कहते हैं। इस प्रकार में *का -की -के* के अर्थ में आपको "ए" नहीं मिलेगा। यानी का की के नही जोड़ेगा शब्दों को ।
जैसे -
दिल-ए- बर्बाद - बर्बाद दिल
गुल ए तर - गीला फूल
मुग़ल-ए-आज़म = महानतम मुगल
चश्मे पुरनम = नमी से भरी आंख
कोहे गिरां = भारी पहाड़
(2) 'और' अथवा 'तथा' के भावार्थ के लिए उर्दू-शायरी में '-ओ-" अथवा सिर्फ़ 'गे' की मात्रा से संयुक्त शब्द बनाए जाते हैं, जैसे-ज़हन-ओ-दिल (मस्तिष्क
तथा हृदय) अथवा तारीकी-ओ-नूर (अँधकार तथा प्रकाश) इत्यादि।
तथा हृदय) अथवा तारीकी-ओ-नूर (अँधकार तथा प्रकाश) इत्यादि।
(3) शब्दों के बिल्कुल सही उच्चारण के लिए कुछ अक्षरों के नीचे बिन्दी डाल दी जाती है और इस प्रकार उस अक्षर का स्वर कुछ हल्का हो जाता है। इस बिंदी को नुक़्ता कहते है। इसकी विस्तृत जानकारी के लिए नुक़्ता पर अगला आलेख व पूर्ण विस्तृत लेख ब्लॉग पर पढ़िए।
(4) इसमें कोई दो राय नहीं कि उर्दू-शायरी के छन्द तथा लय अत्यधिक संवेदनशील तथा प्रवाहमय हैं और इसी प्रवाहमयता तथा संवेदनशीलता को बरकरार रखने के उद्देश्य से कई शब्दों को ज्यों का त्यों न लिखकर कहीं-कहीं किंचित फेर-बदल
के साथ प्रस्तुत किया जाता है, लेकिन इस शाब्दिक परिवर्तन से उन शब्दों व अर्थ में कोई परिवर्तन नहीं होता, जैसे-
यह के स्थान पर- ये
वह के स्थान पर- वो
एक के स्थान पर- इक
तेरे के स्थान पर- तिरे
मेरे के स्थान पर- मिरे
यहाँ के स्थान पर- याँ
वहाँ के स्थान पर- वाँ
पर के स्थान पर- पे
जुनून के स्थान पर- जुनूं
खून के स्थान पर- लूँ
इन्सान के स्थान पर- इन्साँ
सुबह के स्थान पर- सुब्
आसमान के स्थान पर- आसमाँ
दामन के स्थान पर- दामाँ
परीशान के स्थान पर- परीशाँ
ख़ामोशी के स्थान पर- ख़ामुशी
धुंध के स्थान पर- धुंद
इत्यादि। प्रस्तुत परिवर्तित तथा अपरिवर्तित, दोनों प्रकार के शब्द उर्दू शायरी में प्रयुक होते हैं। ये शायर की समझ और ग़ज़ल के ज़ुरूरत के हिसाब से प्रयोग होगा।
इस प्रकार इन सामान्य संकेतों को जानने के बाद बहुत आसानी में
उर्दू-शायरी के मर्म तक पहुँचा जा सकता है।
के साथ प्रस्तुत किया जाता है, लेकिन इस शाब्दिक परिवर्तन से उन शब्दों व अर्थ में कोई परिवर्तन नहीं होता, जैसे-
यह के स्थान पर- ये
वह के स्थान पर- वो
एक के स्थान पर- इक
तेरे के स्थान पर- तिरे
मेरे के स्थान पर- मिरे
यहाँ के स्थान पर- याँ
वहाँ के स्थान पर- वाँ
पर के स्थान पर- पे
जुनून के स्थान पर- जुनूं
खून के स्थान पर- लूँ
इन्सान के स्थान पर- इन्साँ
सुबह के स्थान पर- सुब्
आसमान के स्थान पर- आसमाँ
दामन के स्थान पर- दामाँ
परीशान के स्थान पर- परीशाँ
ख़ामोशी के स्थान पर- ख़ामुशी
धुंध के स्थान पर- धुंद
इत्यादि। प्रस्तुत परिवर्तित तथा अपरिवर्तित, दोनों प्रकार के शब्द उर्दू शायरी में प्रयुक होते हैं। ये शायर की समझ और ग़ज़ल के ज़ुरूरत के हिसाब से प्रयोग होगा।
इस प्रकार इन सामान्य संकेतों को जानने के बाद बहुत आसानी में
उर्दू-शायरी के मर्म तक पहुँचा जा सकता है।
उपसर्ग किसे कहते हैं ?
वे शब्दांश जो किसी मूल शब्द के पूर्व में लगकर नये शब्द का निर्माण करते हैं अर्थात् नये अर्थ का बोध कराते हैं, उन्हें उपसर्ग कहते हैं। ये शब्दांश होने के कारण वैसे इनका स्वतन्त्ररूप से अपना कोई महत्त्व नहीं होता किन्तु शब्द के पूर्व संश्लिष्ट अवस्था में लगकर उस शब्द विशेष के अर्थ में परिवर्तन ला देते हैं।
प्रकार : हिन्दी में उपसर्ग तीन प्रकार के होते हैं
(i) संस्कृत के उपसर्ग
(ii) हिन्दी के उपसर्ग
(iii) विदेशी उपसर्ग
हिन्दी भाषा में अन्य भाषाओं के शब्द भी प्रयुक्त होते हैं फलतः उनके उपसर्गों को हिन्दी में विदेशी उपसर्ग की संज्ञा दी जाती है।
प्रकार : हिन्दी में उपसर्ग तीन प्रकार के होते हैं
(i) संस्कृत के उपसर्ग
(ii) हिन्दी के उपसर्ग
(iii) विदेशी उपसर्ग
हिन्दी भाषा में अन्य भाषाओं के शब्द भी प्रयुक्त होते हैं फलतः उनके उपसर्गों को हिन्दी में विदेशी उपसर्ग की संज्ञा दी जाती है।
अरबी-फारसी के उपसर्ग एवं उनसे बने शब्द-
बे (उपसर्ग) का अर्थ है = रहित या बिना या न होना उदाहरणतः-
बे अदब= अशिष्ट, असभ्य
बे आबरू= नीच, कलंकित अपमानकारक
बे अन्दाज़ा= अन्तहीन, अपार
बे इख्त़ियारी= असहाय
बे इज़्ज़त= अप्रतिष्ठित, मान रहित
बे इत्तिफ़ाक़ी= फूट, मतभेद
बे इन्साफ़= अन्याय
बे अदब= अशिष्ट, असभ्य
बे आबरू= नीच, कलंकित अपमानकारक
बे अन्दाज़ा= अन्तहीन, अपार
बे इख्त़ियारी= असहाय
बे इज़्ज़त= अप्रतिष्ठित, मान रहित
बे इत्तिफ़ाक़ी= फूट, मतभेद
बे इन्साफ़= अन्याय
बा =सहित – बाइज्जत, बामुलायजा, बाअदब, बाकायदा
बद =बुरा – बदबू, बदचलन, बदमाश, बदमिजाज, बदनाम, बदकिस्मत
ब =सहित – बखूबी, बतौर, बशर्त, बदौलत
बिला =बिना – बिलाकसूर, बिलावजह, बिलाकानून
बेश= अत्यधिक – बेश कीमती, बेश कीमत
कम= अल्प – कमअक्ल, कमउम्र, कमजोर, कम समझ, कमबख्त
ला =परे/बिना – लाइलाज, लावारिस, लापरवाह, लापता, लाजवाब
दर= में – दरअसल, दरबार, दरखास्त, दरहकीकत, दरम्यान
हर =प्रत्येक – हरदम, हरवक्त, हररोज, हरहाल, हर घड़ी
खुश+ श्रेष्ठ – खुशनुमा, खुशहाल, खुशबू, खुशखबरी खुशमिजाज
हम= साथ --हमराज, हमदम, हमवतन, हमसफर, हमदर्द
अल= निश्चित – अलगरज, अलविदा, अलबत्ता, अलबेता
गैर =रहित भिन्न – गैर हाजिर, गैरमदर्, गैर वाजिब
नेक =भला – नेकराह, नेकनाम, नेकदिल, नेकनीयत
सर =मुख्य/प्रधान – सरपचं , सरदार, सरताज, सरकार
बद =बुरा – बदबू, बदचलन, बदमाश, बदमिजाज, बदनाम, बदकिस्मत
ब =सहित – बखूबी, बतौर, बशर्त, बदौलत
बिला =बिना – बिलाकसूर, बिलावजह, बिलाकानून
बेश= अत्यधिक – बेश कीमती, बेश कीमत
कम= अल्प – कमअक्ल, कमउम्र, कमजोर, कम समझ, कमबख्त
ला =परे/बिना – लाइलाज, लावारिस, लापरवाह, लापता, लाजवाब
दर= में – दरअसल, दरबार, दरखास्त, दरहकीकत, दरम्यान
हर =प्रत्येक – हरदम, हरवक्त, हररोज, हरहाल, हर घड़ी
खुश+ श्रेष्ठ – खुशनुमा, खुशहाल, खुशबू, खुशखबरी खुशमिजाज
हम= साथ --हमराज, हमदम, हमवतन, हमसफर, हमदर्द
अल= निश्चित – अलगरज, अलविदा, अलबत्ता, अलबेता
गैर =रहित भिन्न – गैर हाजिर, गैरमदर्, गैर वाजिब
नेक =भला – नेकराह, नेकनाम, नेकदिल, नेकनीयत
सर =मुख्य/प्रधान – सरपचं , सरदार, सरताज, सरकार
ना (उपसर्ग) का अर्थ है = नहीं (नकारत्मक)
अन्य उदाहरणस्वरूप "न" के उपसर्ग रूप शब्द देखिए और उनके मानी भी-
नाआश्ना= अजनबी, अपरिचित
नाइत्तिफ़ाक़ी= असहमति, मतभेद
नाइन्साफ़ी= अन्याय
नाउम्मीद= निराशा, आशाहीन
नाक़ाबिल= अयोग्य, अनुपयुक्त, अक्षम
नाकाम= असफल
अन्य उदाहरणस्वरूप "न" के उपसर्ग रूप शब्द देखिए और उनके मानी भी-
नाआश्ना= अजनबी, अपरिचित
नाइत्तिफ़ाक़ी= असहमति, मतभेद
नाइन्साफ़ी= अन्याय
नाउम्मीद= निराशा, आशाहीन
नाक़ाबिल= अयोग्य, अनुपयुक्त, अक्षम
नाकाम= असफल

No comments:
Post a Comment