Saturday, 27 June 2020

Digital Shayari Class Series: Week 8 Module 8 : आलेख 3 : खो गयी मुशायरे की आवाज़ अनवर जलालपुरी.



खो गयी मुशायरे की आवाज़ अनवर जलालपुरी.
दोस्तों थम गई हरदिल अज़ीज़ जनाब अनवर जलालपुरी की पुरअसर आवाज़ उनके बेवक्त इंतेक़ाल से। लेख में उर्दू साहित्य से जुड़ी तमाम शख्सियतों के उद्गार आपको पढ़ने मिलेंगे, जिससे आप अनवर साहब की शख्सियत से रूबरू होंगे...आनंद कक्कड़
अपनी आवाज़ के जादू व शायरी से मुशायरे की निज़ामत को अलग अंदाज से बयान करना श्रोताओं को दिलकश आवाज़ से बांधे रखना, उबने पर जोश वाली शायरी से जोश भर देना यह कमाल है अनवर जलालपुरी के अंदाजे बयां का। आज उर्दू साहित्य से जुड़ा हर पाठक व श्रोता अनवर जलालपुरी के नाम से सभी वाकिफ है। वर्ष 1968 से अनार साहब ने निज़ामत का सिलसिला शुरू किया। उनका तकरीरी महारत का सफर अलीगढ़ कॉलेज शुरू हो गया था जो अंततः निज़ामत में परिवर्तित हो गया। हालांकि वे स्वीकारते हैं कि वे मलिक ज़ादा मंज़ूर और उमर कुरैशी की निज़ामत से प्रभावित रहे।
आइये जानें अनवर जलालपुरी को उनके करीबी दोस्त जनाब हिदायतुल्ला खान साहब के श्रद्धांजलि लेख के अंशो द्वारा...
" मुशायरे की कामयाबी में अगर शायर, ग़ज़ल, नज़्म और अच्छे सामईन दरकार है तो अच्छे नाज़िम के बिना भी मुशायरा कामियाब नहीं हो सकता। नाज़िम को मुशायरे का कप्तान भी कह सकते हैं और अनवर जलालपुरी ने अपनी कप्तानी में कई मुशायरों को कामयाब बनाया है, लेकिन अब मुशायरे का डायस मायूस खड़ा अपने उस कप्तान को याद कर रहा है। उसे पता है उसने जो खोया है, वो वापस नहीं आने वाला है।
अनवर जलालपुरी के पास बात कहने का सलीका था, लफ्ज़ थे, लहज़ा था और वो जानते थे, लफ्ज़ कैसे इस्तमाल किए जाते हैं। जब भी वो बोलना शुरू करते तो लगता जैसे लफ्ज़ तो उनके मुरीद हैं और दौड़े चले आते हैं। कब कहां, क्या ओर कैसे कहना है, इसी उस्तादी ने उन्हें हिंदुस्तानी नहीं, दुनिया का सबसे बड़ा नाजिम बना दिया था।
वो सिर्फ अच्छे नाज़िम नहीं, शायर भी थे और फिर बहतरीन इंसान भी, जो कहने की ताकत रखते थे और उनका मिजाज़ भी सूफियाना था, पर जज़्बाती थे।
राहत इंदौरी से याद आया, उनका और अनवर जलालपुरी का याराना बहुत मजबूत था और शायद कम ही लोग जानते हैं, अनवर जलालपुरी के घर रहकर ही राहत इंदौरी ने एमए किया था, जिसका ज़िक्र राहत इंदौरी करते हुए कहते हैं- मैंने बीए तो कर लिया था, एमए करना चाहता था और जब उसका इजहार मैंने अनवर भाई के सामने किया तो उन्होंने अवध यूनिवर्सिटी से मुझे एमए करा दिया, उन्हीं के वहां रहकर मैंने यह सब किया था। उनका जाना वो खला है, जिसे अब हमेशा साथ ही रखना पड़ेगा। वो सिर्फ अच्छे नाज़िम, शायर ही नहीं, दोस्त और भाई भी थे। हमने मुशायरे की आवाज खो दी है।
जलालपुरी के सिर्फ दिल पर हमला नहीं हुआ, दिमाग भी तड़क गया और सारी कोशिशें नाकाम हो गई। जिस आवाज में मुशायरों को ताकत दी है, शायरों का हौसला बढ़ाया है और निजामत को नए आयाम दिए हैं, अब वो डायस पर कभी दिखाई नहीं देगी। अनवर जलालपुरी अंदर से तो तभी टूट गए थे, जब वो लंदन से लौटे थे। उनका शेर भी है - कोई पूछेगा जिस दिन वाकई ये जिंदगी क्या है... जमीं से एक मुट्ठी खाक लेकर हम उड़ा देंगे।
उन्होंने कई मुशायरे बनाए हैं और अभी हिंदुस्तान में तो उनके बराबरी का कोई नाजिम नहीं था। फिर उनकी पहचान सिर्फ नाजिम की भी नहीं रही थी, शायर भी वो अच्छे थे। हालात पर उन्होंने हमेशा अपनी बात कही और उसे शायरी का जरिया भी बनाया - अब नाम ही नहीं, काम का कायल है जमाना... अब नाम किसी शख्स का रावण न मिलेगा। एक शेर है - मैंने लिक्खा है उसे मरियम और सीता की तरह... जिस्म को उसके अजंता नहीं लिक्खा मैंने।
अभी तो वो इसलिए भी सुर्खियों में थे कि गीता पर उन्होंने बड़ा काम किया, उसको शायरी में ढाल दिया था और इसको लेकर उनके शो भी हो रहे थे। उन्हें बुलाया जाता है, गीता पढ़वाई जाती और गजल में ढली गीता खूब पसंद की जा रही थी।
जब इस मामले में अनवर जलालपुरी से बात हुई तो उनका कहना था- अंदर से आवाज आती थी, कुछ नया करना है। मुझे पढ़ने का बहरहाल शौक रहा है। कुरान के साथ मैंने गीता को भी पढ़ा है। बाइबिल भी मेरी लायब्रेरी में मौजूद है और मुझे अहसास हुआ कि सारी किताबें एक ही अंदाज में बात करती हैं और गीता ने मुझे खासा मुत्तासिर किया है।
जो बातें कुरान में हैं, उसका सार गीता में भी मौजूद है। उसके बाद जरूरी हो गया था कि इसे शायरी में भी बदला जाए और मैंने ये मुश्किल काम कर दिया, पर जब आप इस तरह के काम करते हैं तो वो अपने आप हो जाते हैं। कोई ताकत है, जो इसे करा लेती है। उर्दू में ढले गीता के श्लोक किस तरह बन पड़े हैं - हां, धृतराष्ट्र आंखों से महरूम थे... मगर ये न समझो कि मासूम थे। इधर कृष्ण अर्जुन से हैं हमकलाम... सुनाते हैं इंसानियत का पैगाम। अजब हाल अर्जुन की आंखों का था... था सैलाब अश्कों का रुकता भी क्या। बढ़ी उलझनें और बेचैनियां... लगा उनको घेरे हैं दुश्वारियां। तो फिर कृष्ण ने उससे पूछा यही... बता किससे सीखी है ये बुजदिली।
अनवर जलालपुरी का सियासत में भी दखल था और मायावती के वो करीब रहे। जब वो मुख्यमंत्री थीं तो इनके पास कैबिनेट मंत्री का दर्जा था और इन्होंने काम भी किए, लेकिन अखिलेश सरकार के आते ही वो पीछे हो गए, क्योंकि कोई गुंजाइश बची नहीं थी, पर उनका असल काम तो शायरी था, मुशायरे की वो आबरू थे। वैसे भी उन्होंने लंबा अरसा यहां गुजारा था और उनका शेर है - मुसलसल धूप में चलना, चरागों की तरह जलना... ये हंगामे तो मुझको वक्त से पहले थका देंगे। जाते-जाते अनवर जलालपुरी कह गए थे... प्यारे! तुम से नाराज तो हूं पर मुझे पता है तुम बुलाओगे और मैं मना नहीं कर पाऊंगा...!""
जितने भी मुशायरों का संचालन अनवर जलालपुरी ने किया वे सब अब ना सिर्फ श्रोताओं की यादों का हिस्सा हैं बल्कि शायरों की वही ज़हनों में वो ताज़ा हैं।
मेरी जंग का एक सिपाही कम हुआ
मेरे लिए एक बड़ी व्यक्तिगत क्षति है। मुझे जब सुबह उनके जाने की जानकारी मिली तो गहरा सदमा लगा। मेरी जंग का एक सिपाही कम हो गया है। हिंदुस्तान की तहजीब के जो लोग साझा संस्कृति को बचाने की कोशिशों में लगे हैं वो उन लोगों में सबसे आगे खड़े रहे। कभी विवादों में नहीं रहे, कभी चमक-दमक में नहीं फंसे। उनका अपना एक किरदार है। जो अदब को पसंद करने वाले लोग हैं वो सब उनके इर्द-गिर्द हैं। उनके साथ इतनी यादें जुड़ी हैं कि एक लम्हें में कभी उनको याद नहीं कर सकता। बस उनके लिए दुआ कर सकता हूं। 
- प्रो0 वसीम बरेलवी, शायर
 
अनवर साहब जितने बड़े नाजिम थे, उतने बड़े शायर थे
अनवर साहब जितने बड़े नाजिम थे, उतने भी बड़े शायर थे। शायरी की ऐसी कोई सिम्त नहीं जिसे उन्होंने न छुआ हो। उनका जाना अदब का बड़ा नुकसान है। मुझे नहीं लगता कि हम इस खाली जगह को कभी भर पाएंगे। लेकिन दुआ करेंगे कि अल्लाह उन्हें जन्नत अता फरमाए। वो ऐसे दानिश्वर हैं जिसका साथ रहना सबको भाता था। 
- राहत इंदौरी, शायर

...मौत हो ऐसी की दुनिया देर तक मातम करे
मेरा एक शेर है,
जिंदगी ऐसे जियो कि दुश्मनों को रश्क हो,
मौत हो ऐसी की दुनिया देर तक मातम करे
अनवर साहब का जाना भी कुछ ऐसा ही है। मेरा उनका ४० साल का ताल्लुक है। अनवर ज्लाल्पुरी सञ्चालन के शाहजहानी व्यक्तित्व का नाम है। वो बेहतरीन शायर, आलोचक, गद्य लेखक और इन सबसे बढ़कर एक बेहतरीन इंसान थे। उनके साथ कई यात्राएं कीं, ये अदब का बड़ा नुकसान है। कुदरत ने अनवर साहब को सञ्चालन का जो फन और सलीका दिया वो हर किसी के पास नहीं है। उनकी लोचदार आवाज़ को दुनिया हमेशा याद करेगी। 
- डॉ. नवाज देवबंदी
उनके जाने के बारे में जुबान नहीं, जो कहेगी हमारी आंख कहेगी
उनके जाने के बारे में मेरी जुबान कुछ नहीं बोल सकती। जो कहेगी हमारी आंख कहेगी। मेरे लिए उनका जाना मेरे साथी का जाना है। जिस खूबी के लिए उन्हें जाना जाता है वो है उनकी निजामत। मुशायरों के मंच पर निजामत में उनका नाम केवल इसलिए लिया जाता है क्योंकि वो शायरी की आत्मा को पढ़ना जानते थे। वो जानते हैं कि तहजीबों को कैसे जिंदा रखा जाता है, कैसे एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को पहुंचाया जाता है। कम-से-कम तीन पीढ़ीयों के श्रोताओं और शायरों के जुड़ने की कड़ी का नाम अनवर जलालपुरी है। 
- मंसूर उस्मानी, मशहूर नाजिम
मेरी अनवर साहब से दो बार व्यक्तिगत रूप से मुलाकात हुई मेरे अज़ीज़ मित्र संजय  मेहरोत्रा जी के घर जलालपुर व उनके एक घरेलू समारोह में। अनवर साहब की मिलनसारी व सहजता सदैव याद रहेगी। ....आनन्द कक्कड़

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