Saturday, 20 June 2020

Week 7 Module 7: बहर में ग़ज़ल (ऑडियो)

डॉ बशीर बद्र की लिखी ग़ज़ल

कभी यूँ भी आ मिरी आँख में कि मिरी नज़र को ख़बर न हो

कभी यूँ भी मिरी आँख में कि मिरी नज़र को ख़बर हो

मुझे एक रात नवाज़ दे मगर इस के बा'द सहर हो

वो बड़ा रहीम करीम है मुझे ये सिफ़त भी अता करे

तुझे भूलने की दुआ करूँ तो मिरी दुआ में असर हो

मिरे बाज़ुओं में थकी थकी अभी महव-ए-ख़्वाब है चाँदनी

उठे सितारों की पालकी अभी आहटों का गुज़र हो

ये ग़ज़ल कि जैसे हिरन की आँख में पिछली रात की चाँदनी

बुझे ख़राबे की रौशनी कभी बे-चराग़ ये घर हो

कभी दिन की धूप में झूम के कभी शब के फूल को चूम के

यूँ ही साथ साथ चलें सदा कभी ख़त्म अपना सफ़र हो 

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