Saturday, 30 May 2020

Week 4 Open Forum1 नज़्म एक मुकम्मल कहानी : मक़बूलियत की कसौटी पर नज़्म और ग़ज़ल लोकप्रियता की कसौटी पर: मुशायरे की लोकप्रिय प्रस्तुति : नज़्म का एक और सफर



नज़्म : एक मुकम्मल कहानी

वर्तमान समय में यह शब्द किसी भी विषय पर लिखी गई नए ढंग की कविता के लिए प्रचलित है। 
नज़्म यानी एक मुकम्मल कहानी। नज़्म उर्दू की एक आज़ाद विधा है जिसमे एक ख़याल या बात ( thought / subject)को ही कविता/ नज़्म की शक्ल दी जाती है।
नज़्म का एक शीर्षक होता है। जैसे हम हिंदी में कविता लिखते हैं वैसे ही उर्दू में नज़्म लिखी जाती हैं।नज़्म गज़लों के अनुशासन जैसे बहर, रदीफ़, और क़ाफ़िए की पाबंदियों से मुक्त होती है । यानी ये किसी नियम के साथ या किसी नियम के बिना भी लिखी जा सकती है।  जिस तरह से आज कविता का रूप सिमटकर गद्य कविता (Prose Poetry) में बदलता जा रहा है। ठीक उसी प्रकार नज़्म के साथ भी ऐसा होता प्रतीत हो रहा है। इसकी लंबाई 3 मिसरों से लेकर एक पूरी किताब भी हो सकती है।

मक़बूलियत की कसौटी पर - नज़्म और ग़ज़ल

उर्दू शायरी की सबसे पसंदीदा विधा है ग़ज़ल । जिसके अकेले शेर भी जान मानस के आम बोलचाल भाषा का हिस्सा हैं जो न सिर्फ माहौल को सजाने के काम आते हैं बल्कि बात के असर को भी बढ़ा देते हैं।
जैसा कि आप जानते हैं कि ग़ज़ल का हर शेर अपने आप में कम्पलीट यानी मुकम्मिल है उसका ग़ज़ल के अगले शेर से कोई अमूमन संबंध नही होता है । एक ग़ज़ल में विषय हर शेर में बदल सकने की आज़ादी होती है। इस कारण एक सतरंगी माहौल बनाने में ग़ज़ल सफल है जो पढ़ने और सुनने वाले पर गहरा प्रभाव छोड़ती है। 
ग़ज़ल किताब के बाहर लगभग हर माध्यम में सरलता से एक्सेप्ट की जाती है जैसे मुशायरा, फ़िल्म, TV सीरियल व स्टूडियो मुशायरा और सोशल पटल जैसे Fb, whatsaap, twietter & instagram. यु तुबे पर भी उर्दू शयरी सर्च को अगर देखें तो अधिकतम ग़ज़लें ही ज्यादा पसंद की जाती हैं।

बावजूद इसके कि ग़ज़ल की लोकप्रियता सर्वव्यापी है, नज़्म शायरों की विशेष पसंद मानी जाती है और लगभग 20℅ शायर उम्दा नज़्म भी कहते हैं । ये बात और कि ज्यादातर प्रसिद्धि उन्हें उनकी ग़ज़लों से मिलती है। एक अनुमान के अनुसार मात्र 5 % शायर ही नज़्म के साथ इंसाफ कर पाते हैं और पाठकों को प्रभावित भी। बड़े बड़े शायर भी नज़्म को लेकर संजग रहते हैं। ग़ालिब से लेकर वसीम बरेलवी तक के शायरों पर उपरोक्त कथन लगभग सही साबित होता है। ये आलेख लेखक की अपनी व्यक्तिगत राय है।
साथ ही इसका विपतीत भी बहुत कॉमन है कि अच्छे नज़्मगो ( नज़्म के शायर) अच्छे ग़ज़लगो (ग़ज़ल का शायर) नही होते । उनकी पहचान उनकी नज़्मों से ज्यादा होती है जैसे गुलज़ार व अली सरदार जाफ़री आदि। वहीं बड़े शायरों की एक लंबी फेहरिस्त है जिन्होंने ग़ज़ल और नज़्म दोनो को बखूबी अंजाम दिया है जैसे  फ़ैज़, मज़ाज़, मुनीर नियाज़ी, फ़िराक़ साहब, अहमद फ़राज़, कैफ़ी आज़मी, साहिर लुधियानवी, निदा फ़ाज़ली, शहज़ाद, इक़बाल और जाँनिसार अख़्तर आदि। विभिन्न मुशायरों के वीडियो को आप आसानी से Youtube पर देख कर किसी शायर के नज़्मगो होने का जादू आप स्वयं उठा सकते हैं।  उदाहरण के तौर पर फ़ैज़ की नज़्म मुझसे पहली सी मोहब्बत मेरे महबूब न मांग और हम देखेंगे.........मुनीर नियज़ी की नज़्म ...में थोड़ी देर कर देता हूँ..... कैफ़ी आज़मी की औरत व राम का बनवास......अहमद फ़राज़ की .......और मज़ाज़ लखनवी की नज़्म .....अब मेंरे पास तुम आयी ही तो क्या आयी हो .....आदि को देखना न भूलें।


नज़्म : मुशायरों की पसंदीदा प्रस्तुति

शायर व उसकी रचनाओं की एक कसौटी मुशायरों के मंचों पर भी होती है। जब शायर श्रोताओं से रुबरु होता है तो वह नज़्मों को ही प्रधानता से सुनानें में ज्यादा लुत्फ उठता है। जावेद अख्तर, ताहिर फ़राज़ और मुनव्वर राना साहब से साक्षात्कार के दौरान मेरी उन सबका ये कहना था कि चूंकि ग़ज़ल का एक शेर आपने आप में पूरी कहानी कहता है इसलिए उसमें विषय और उसके विस्तार की संभावनाएं सीमित हैं। अगर शायर एक विषय को तफ़सील से बयान करना चाहता है तो उसे ग़ज़ल में बड़ी कम जगह मिलती है। साथ ही ग़ज़ल कहने के अनुशासन और शैली की पाबंदियां कहीं न कहीं शायर को एक कफ़स की अनुभूति दिलाती हैं और वो हार कर नज़्म की शरण लेता है। जिससे वो अपने उदगार भरपूर तरीके से आज़ादी के साथ बयान कर सके।

अगर मुशायरे की जानिब रुख करें तो अच्छे उर्दू शायर व नज़्मगो जब अपनी नज़्म पढ़ते हैं तो उसके इमोशन में बह से जाते हैं और श्रोता भी उनके साथ इमोशनल हो जाते हैं। उनके चेहरे के हावभाव नज़्म के विषय के मुताबिक उतरते चढ़ते रहते हैं। उनका इतना डूब कर एक विचार की प्रस्तुति नज़्म की प्रस्तुति में चार चांद लगा देता है। इस फर्क को समझना हो तो एक ही शायर को देखिए जिसमें एक मुशायरे में नज़्म का और ग़ज़ल का ।

शायर अक्सर ग़ज़ल को मक़बूलियत दिलाने के लिए उसे तरन्नुम से पेश करते हैं। यहां ये बात भी गौर करने की है कि अक्सर बेहतरीन तरन्नुम हल्की ग़ज़ल को भी सफल प्रस्तुति बना देता है। शायरों के ऐहतराम के चलते यहां उनके नाम नही दिए जा रहे हैं वरना मुशायरों के पहले दौर में कलाम पड़ने वाली शायरात और छोटे शायरों को आप आसानी से ऐसी प्रस्तुति देते देख सकते हैं। बड़े शायर जैसे फ़िराक़, फ़ैज़, फ़राज़, मुनव्वर राना और राहत इंदौरी आदि बिना तरन्नुम के भी बेहद सफल रहे। जिसका कारण साफ है उनका आला दर्ज़े का कलाम।

नज़्म की मंच प्रस्तुति एक खासी जिज्ञासा का विषय हो सकता है आपके लिए।  इसलिए इस लेख में कही गयी बात से संबंधित प्रमाण स्वरूप  3 वीडियो प्रस्तुत है जो नज़्म की असरदार प्रस्तुति और उसके प्रभाव को स्थापित करेंगेl


नज़्म का एक और सफर

उर्दू शायरी में एक साथ कई स्तर पर कई कारवाँ साथ साथ चलते हैं। मेरे प्रायः उर्दू साहित्य की पुस्तकों की रीडरशिप के साथ साथ उसकी संगीतमय प्रस्तुति का एक लंबा इतिहास है जो पिछले 7 दशकों में नित नायर पैरहन बदलती रहती है और हर पीढ़ी के श्रोताओं की ज़ुरूरत को पूरा करती है। ग़ज़लों को जनमानस के ड्राइंग रूम तक ले जाने का श्रेय ग़ज़ल गायकों को जाता है। 50 से 70 के दशक में जिन गायकों ने ग़ज़ल को अपनी गायकी से सजाया उनमें कुन्दन लाल सहगल, बेगम अख्तर, तलत महमूद, मेहदी हसन, नूरजहां, मलिका पुखराज़, सी. यच. आत्मा, गुलाम आदि प्रमुख थे।
नज़्म के बाबत ये सत्य है कि 80' के दशक के पूर्वार्ध में जगजीत सिंह ने इसका आगाज़ अपने पहले रिकॉर्ड  'unforgetables' से किया, जिसकी नज़्म का जादू आज भी ज्यों का त्यों है।
नज़्मों को जन मानस में मक़बूल बनाने में विभिन्न गायकों के साथ फिल्मों का भी बहुत योगदान रहा।
ग़ज़ल व पार्श्वगायक  जगजीत सिंह, भूपिंदर सिंह, मोहम्मद रफ़ी, लता मंगेशकर, इक़बाल बनो, फरीद ख़ानम और टीना सनी इस मुहिम में सर्वोपरि हैं।

कौन भूल सकता है  फ़ैज़ की नज़्में इक़बाल बनो की आवाज़ में और गुलज़ार की आज़ाद नज़्मों को स्वरबद्ध करने की जटिलता को सरलतापूर्वक निभाते जनाब भपिंदर सिंह। जगजीत सिंह ने नज़्मों को न सिर्फ अपनी कॉन्सर्ट का हिस्सा बना दिया था बल्कि विश्वभर के श्रोताओं को नज़्म का दीवाना भी बना दिया। उनकी कोशिश रही कि हर एल्बम /रिकॉर्ड / CD में एक नज़्म ज़ुरूर रखी जाए।
जगजीत सिंह की गाई नज़्म........बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी .......को शायद ही किसी ग़ज़ल श्रोता ने न सुना हो। साथ ही आपकी दूसरी नज़्में भी खासी लोकप्रिय हुई.....वो कागज़ की कश्ती वो बारिश का पानी..., तेरे खुशबू से भरे ख़त मैं जलता कैसे..., बहुत दिनों की बात है...., तुम नही आये थे जब बजी तो तुम आये थे....मेरे दरवाज़े से अब इस चंद को रुखसत कर दो...एक चमेली के मंडवे ताले..... ऐ मलिहाबाद .....सच कहती थी जो भी अम्मी कहती थी..... आदि।
एक विशेष श्रोता वर्ग है जो भूपिंदर सिंह को नज़्म गायकी के लिहाज़ से जगजीत सिंह के ऊपर तहरीज़ देता हैं। जिसका कारण भूपिंदर सिंह का नज़्म सिलेक्शन, संगीत संयोजन और अद्भुद गायकी है। जब गुलज़ार की लिखी नज़्में भूपिंदर की आवाज़ में सुनेंगे तो ऐसा लगेगा कि दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। गुलज़ार की एक दो नज़्में हैं जो दूसरे बड़े ग़ज़ल गायकों ने भी गयी हैं जो भूपिंदर की गई नज़्मों के आगे थोड़ी फ़ीकी सी लगती हैं। अब यहाँ पुनः ये एक व्यक्तिगत पसंद की भी बात है। ये डिबेट श्रोताओं के बीच उसी तरह हित है जैसे नज़्म और ग़ज़ल के रसियों के बीच।

नज़्मों का फिल्मों में प्रयोग कैफ़ी आज़मी और मदन मोहन साहब ने क्या खूब किया फ़िल्म हकीक़त में....मैं ये सोंचकर उसके दर से उठा था.....
साहिर की नज़्मों ने तो खासी धूम मचाई थी ...ये कूंचे ये नीलम घर दिल काशी के (प्यासा), कभी कभी मेरे दिल में, मेरे घर आई एक नन्ही परी, चलो एक बार फिर से अजनबी बन जाएं.... वो सुबह कभी तो आएगी.... आदि।
गुलज़ार साहब नए वक़्तों के सबसे सफल नज़्मगो है जिनकी नज़्में फिल्मों में भी जादू बिखेरती रहती हैं....मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है (इज़ाज़त), एक ही ख्वाब..(किनारा), लबों को चूम लू ( आस्था), इस मोड़ से जाते हैं (ऑधी), एक सदी से बैठी हूँ (लेकिन) आदि।
Youtube और डाउनलोड  के दौर में गुलज़ार साहब के अनेकों एल्बम इन मंचों पर आसानी से उपलब्ध है...............नज़्म , बूढे पहाड़ों पर, सनसेट पॉइंट, वो जो शायर था, अक्सर, मरासिम, कोई बात चले और चांद परोसा है आदि जिसमें स्वयं गुलज़ार साहब ने स्वयं भी नज़्में पढ़ी। श्रोताओं पर उनकी आवाज़ और कलाम का जादू ज़बर्दस्त है। उनकी नज़्में उनकी आवाज़ में सुनना एक सुखद अनुभव है । और अब Youtube पर गुलज़ार साहब के मुशायरों के वीडियो और ऑडियो एल्बम के वीडियो ने उनकी और नज़्म की मक़बूलियत को चार चांद लगा दिए है।

जब जब नज़्म सलीके से मंच पर शायरों द्वारा पढ़ी गयी और फिल्मों में गीत रूप में पेश की गई उसने सफलते के झंडे गाड़े हैं। नज़्म का असर श्रोताओं पर देर तक तरी रहता है और वो शायद नज़्म के एक विषय का होना और उसकी लंबाई है। जैसे जैसे नज़्म आगे बढ़ती है उसका रंग निखरता जाता है।
नज़्म कहने वाले और सुनने वाले इसे ज्यादातर ग़ज़ल से ऊपर रखते हैं । और यह विषय के दशकों से ग़ज़ल और नज़्म के बीच चल रही एक शीत युद्ध जैसा है। जबकि सर्व विदित है कि दोनों का रंग और असर जुदा जुदा है। मगर हाँ जब व्यक्तिगत राय की बात आती है तो सबकी पसंद अलग अलग होना स्वाभाविक है। आप उदाहरण के तौर पर दिए गए वीडियो को ध्यान से देखें और इस कोल्ड वॉर का फैसला आप स्वयं करें।

आनन्द कक्कड़
 

Saturday, 23 May 2020

Week 3 Module 3 Digital Master's Class on Shayari by Kahkashan

पुनः अवलोकन : ग़ज़ल क्या है?.......आनन्द कक्कड़

आइये नज़्म समझें........ मनोज मुंतशिर (वीडियो)













courtesy:YouTube & Manoj Muntashir

नज़्म क्या है..........आनन्द कक्कड़ (Full Article)

नज़्म क्या है !!

नज़्म, उर्दू में एक विधा के रूप में, उन्नीसवीं सदी के आख़िरी दशकों के दौरान पैदा हुई और धीरे धीरे पूरी तरह स्थापित हो गई। वैसे तो उर्दू की हर कविता को नज़्म कहा जा सकता है। पर वर्तमान समय में इसका प्रयोग साधारणतः गज़ल को छोड़कर बाकि कविताओं के लिए होता है। वर्तमान समय में यह शब्द किसी भी विषय पर लिखी गई नए ढंग की कविता के लिए प्रचलित है। 
नज़्म यानी एक मुकम्मल कहानी। नज़्म उर्दू की एक आज़ाद विधा है जिसमे एक ख़याल या बात ( thought / subject)को ही कविता/ नज़्म की शक्ल दी जाती है।
नज़्म का एक शीर्षक होता है। जैसे हम हिंदी में कविता लिखते हैं वैसे ही उर्दू में नज़्म लिखी जाती हैं।नज़्म बहर और क़ाफ़िए में भी होती है और इसके बिना भी। यानी ये किसी नियम के साथ या किसी नियम के बिना भी लिखी जा सकती है।  जिस तरह से आज कविता का रूप सिमटकर गद्य कविता में बदलता जा रहा है। ठीक उसी प्रकार नज़्म के साथ भी ऐसा होता प्रतीत हो रहा है।

ग़ज़ल लिखने वाले को ग़ज़लगो कहते हैं और नज़्म लिखने वाले को नज़्मगो कहते हैं। ग़ज़ल में बड़ी से बड़ी बात को दो मिसरों में कहा जाता है और एक छोटी बात को एक कविता यानी नज़्म के रूप में कहा जा सकता है। एक समीक्षक ने कहा कि नज़्मगो कुँए को तालाब बना देता है और ग़ज़लगो गागर में सागर भर देते हैं।

ग़ज़ल और नज़्म में क्या अंतर होता है !!

• ग़ज़ल में हर शेर में अलग अलग विषय उठा कर उसपे बात की जा सकती है जबकि नज़्म किसी एक ही विषय पर लिखी जाती हैं।

• ग़ज़ल में सारे नियमों के साथ ग़ज़ल को लिखा जाता है जैसे कि: मिसरा, शेर, मतला, क़ाफ़िया, रदीफ़ और मक़्ता का प्रयोग करना अनिवार्य है। जबकि नज़्म इन सब नियमों से आज़ाद होती है।

• नज़्म में यदि कोई नियम न भी हों तो भी वो नज़्म कहलाएगी लेकिन ग़ज़ल में यदि एक भी नियम फॉलो न हुआ तो उसे हम ग़ज़ल नहीं कह सकते।

• ग़ज़ल में बहर का उपयोग अनिवार्य है जिसका मतलब मीटर होता है जो मात्राओं को नियम और सीमा तक ही लगाने की अनुमति देता है जबकि नज़्म में बहर को लेके कोई नियम नहीं हैं।

उदहारणतः गुलज़ार साहब की एक नज़्म पेश है-

आदमी बुलबुला है पानी का
और पानी की बहती सतह पर
टूटता भी है डूबता भी है
फिर उभरता है, फिर से बहता है
न समुंदर निगल सका इस को
न तवारीख़ तोड़ पाई है
वक़्त की हथेली पर बहता
आदमी बुलबुला है पानी का।

आप इसे मुक्त छंद की कविता के रूप में देख सकते हैं।

नज़्म वैसे तीन प्रकार से लिखी जाती रही है। इसके प्रकार के नाम इस तरह है-

1. आज़ाद नज़्म
2. पाबंद नज़्म
3. मुअर्रा नज़्म
3. नासरी नज़्म

Types of nazm

आज़ाद नज़्म- मुक्त छंद कविता को आजाद नज़्म कहते हैं।आजकल सबसे मशहूर नज़्म का रूप है ये। आज़ाद नज़्म वो नज़्म होती है, जिसमें मीटर, काफ़िया और रदीफ़ को ध्यान में रखने की आवश्यकता नहीं होती है। आप चाहे तो इनका प्रयोग भी कर सकते हैं। लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि आप बहर / अरकान से मुक्त होकर इसका ढांचा ही बिगाड़ दें। ऊपर दी गयी गुलज़ार साहब की नज़्म देखिए।

पाबंद नज़्म-
पाबंद नज़्म एक ऐसी नज़्म होती है, जिसमें नियमों की पाबंदी होती है। इस तरह की नज़्म बहर, वज्न में तो होनी ही चाहिए, साथ ही काफ़िया का प्रयोग भी होना चाहिए। निदा फ़ाज़ली की ये नज़्म देखिए-

एक चिड़िया
जामुन की इक शाख़ पे बैठी इक चिड़िया
हरे हरे पत्तों में छप कर गाती है
नन्हे नन्हे तीर चलाए जाती है
और फिर अपने आप ही कुछ उकताई सी
चूँ चूँ करती पर तोले उड़ जाती है
धुँदला धुँदला दाग़ सा बनती जाती है

मैं अपने आँगन में खोया खोया सा
आहिस्ता आहिस्ता घुलता जाता हूँ
किसी परिंदे के पर सा लहराता हूँ
दूर गगन की उजयाली पेशानी पर
धुँदला धुँदला दाग़ सा बनता जाता हूँ

मुअर्रा नज़्म -
इस प्रकार की नज़्म में एक बहर व वज़न को हर मिसरे में दोहराने की पाबंदी होती है। इस नज़्म में काफ़िया और रदीफ़ नही पाए जाते।

नासरी नज़्म-
इसका अर्थ कहीं न कहीं गद्य कविता या english में prose poetry से सम्बंधित है और यह फ्रांसीसी से अंग्रेज़ी भाषा से होकर उर्दू में आया है। इस तरह की नज़्म में काफ़िया, रदीफ़ और वज्न आदि ध्यान में नहीं रखा जाता है। सिर्फ एक ख़्याल को शब्दों के जाल में बन दिया जाता है।

......To be continued.......

नज़्म - हुआ सवेरा........निदा फ़ाज़ली (स्क्रिप्ट & वीडियो )

नज़्म और गयज़ल का फर्क......आनन्द कक्कड़

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नज़्म वीडियो ....याद है पंचम


नज़्म - याद है पंचम..........गुलज़ार

याद है पंचम – Yaad Hai Pancham (Hindi) 

आर डी बर्मन की याद में गुलज़ार ने एक नज़्म लिखी जिसे उन दोनों के एक तीसरे साथी गायक भपिंदर सिंह ने कंपोज़ किया और गया भी । ग़ज़ब की immortal नज़्म बन कर तैयार हुई। भूपिंदर ने आज़ाद नज़्म गाने की महारत हासिल की है। आप सुनकर स्वयं नज़्म के जादू में खो जाएंगे-

नज़्म - याद है पंचम

याद है बारिशों का दिन पंचम
जब पहाड़ी के नीचे वादी में,
धुंध से झाँक कर निकलती हुई,
रेल की पटरियां गुजरती थीं–!
धुंध में ऐसे लग रहे थे हम,
जैसे दो पौधे पास बैठे हों,.
हम बहुत देर तक वहाँ बैठे,
उस मुसाफिर का जिक्र करते रहे,
जिसको आना था पिछली शब, लेकिन
उसकी आमद का वक्त टलता रहा!
देर तक पटरियों पे बैठे हुये
ट्रेन का इंतज़ार करते रहे.
ट्रेन आई, ना उसका वक्त हुआ,
और तुम यों ही दो कदम चलकर,
धुंद पर पाँव रख के चल भी दिए
मैं अकेला हूँ धुंध में पंचम!!

Tuesday, 19 May 2020

आज का शब्द - अर्थ व शब्द शायरी

 आज का शब्द (26/2/20)
 *फ़क़त* (faqat)

शब्दार्थ-
केवल, सिर्फ, Only।

हम तिरे नाम की जपते नहीं माला ही *फ़क़त* 
हम तिरे नाम पे क़ुर्बान भी हो सकते हैं
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अब तक तो इस सफ़र में *फ़क़त* तिश्नगी मिली
सुनते थे रास्ते में समुंदर भी आएगा
- नफ़स अम्बालवी
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इक *फ़क़त* याद है जाना उन का
और कुछ इस के सिवा याद नहीं
- सूफ़ी तबस्सुम
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लिया है दिल ही *फ़क़त* और जान बाक़ी है
अभी तो काम तुम्हें मेहरबान बाक़ी है
- मीर असर
[19/05, 23:48] Anand Kakkar: आज का शब्द (27/2/20)

 *इंतिहा* और *इब्तेदा* 
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 *इंतिहा* (इंतिहा)
शब्दार्थ-
utmost limit, end, extremity, आखिरी 

तिरे इश्क़ की *इंतिहा* चाहता हूँ 
मिरी सादगी देख क्या चाहता हूँ
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मैं तुम्हें आज़माऊँगा अब के 
तुम मोहब्बत की *इंतिहा* करना 
*************************
 
*इब्तिदा* (ibtidaa)
शब्दार्थ-
beginning/ starting/ origin आदि प्रारम्भ, आरम्भ, शुरुआत, आदिकाल

जिसे अंजाम तुम समझती हो 
 *इब्तिदा* है किसी कहानी की 
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बात पहुँची है इक नज़र में कहाँ 
हम तो समझे थे *इब्तिदा* है अभी 

 _दोनो शब्दों का एक साथ प्रयोग-_ 

 *इब्तिदा* की भी इब्तिदा हैं हम 
 *इंतिहा* की भी इंतिहा हैं हम 
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न जीना हाथ में अपने न मरना 
बशर की *इब्तिदा* क्या *इंतिहा* क्या
[19/05, 23:48] Anand Kakkar: आज का शब्द (25/2/20)

 *गाह* (gaah)
शब्दार्थ-
sometimes
कभी, किसी समय, समय, वक्त, स्थान, जगह।।

 *गाह* जलती हुई *गाह* बुझती हुई 
शम-ए-ग़म झिलमिलाती रही रात भर क

 *गाहे* (gaahe)
शब्दार्थ-
sometimes, often
किसी समय, कभी, कभी-कभी 

 *गाहे गाहे* इसे पढ़ा कीजिए 
दिल से बेहतर कोई किताब नहीं 

गहे (gahe)
शब्दार्थ-
at times
‘गाहे का लघु., कभी, किसी समय।

दिल-ए-तबाह की नैरंगियों* का हाल न पूछ 
 *गहे* क़रार बहुत गाह बे-क़रार बहुत 
*deception, trickery,
[19/05, 23:48] Anand Kakkar: आज का शब्द (26/2/20)
 *फ़क़त* (faqat)

शब्दार्थ-
merely, simply, only
बस, खत्म, समाप्त, केवल, सिर्फ, इतिश्री।

हम तिरे नाम की जपते नहीं माला ही *फ़क़त* 
हम तिरे नाम पे क़ुर्बान भी हो सकते हैं
[19/05, 23:48] Anand Kakkar: आज का शब्द 

 *आगही* (aagahii)

शब्दार्थ

awareness / जागरुकता

'सौदा' जो बे-ख़बर है वही याँ* करे है ऐश 
मुश्किल बहुत है उन को जो रखते हैं आगही 
(*यहां)
मोहम्मद रफ़ी सौदा
[19/05, 23:48] Anand Kakkar: आज का शब्द (6/2/20)

अहद ( ahd )

प्रतिज्ञा, वचन, निभाना, पूरा करना, प्रण,युग, काल, समय, 
प्रतिज्ञा, इकरार, वचन, क़ौल

ता फिर न इंतिज़ार में नींद आए उम्र भर 
आने का *अहद* कर गए आए जो ख़्वाब में 

मिर्ज़ा ग़ालिब
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हमारे अहद का ये अलमिया* है 
उजाले तीरगी से डर गए हैं 
* tradegy
[19/05, 23:48] Anand Kakkar: आज का शब्द (1/3/20)

तह
Meaning of काफिर in Hindi. ईश्वर का अस्तित्व न माननेवाला। जो दया धर्म आदि का कुछ भी ध्यान न रखता हो। अत्याचार,अनर्थ या उपद्रव करनेवाला वाली।
कुछ तुम्हारी निगाह काफ़िर थी 
कुछ मुझे भी ख़राब होना था
[19/05, 23:48] Anand Kakkar: आज का शब्द (28/2/20)
 *पुर्सिश* (pursish)

कुशल-मंगल, पूछना
पूछ-ताछ, आदर-सत्कार

 *पुर्सिश* को अगर होंठ तुम्हारे नहीं हिलते 
क्या क़त्ल को भी हाथ तुम्हारा नहीं उठता 

 __अधिकतर *पुर्सिश* किसी दूसरे लफ्ज़ के साथ जुड़कर प्रयोग होता है जैसे_ _पुर्सीश-ए-ग़म, पुर्सीश-ए-हाल, पुर्सीश-ए-करम, पुर्सीश-ए-हालात आदि।__ 

 *पुर्सिश-ए-ग़म* 
शब्दार्थ-
 दुःख के बारे में पूछना

नहीं मौक़ा ये *पुर्सिश-ए-ग़म* का 
देखिए दिल दुखा हुआ है अभी 

 *पुर्सिश-ए-हाल* 
शब्दार्थ-
हाल चाल के बारे में पूछना

 *पुर्सिश-ए-हाल* से ग़म और न बढ़ जाए कहीं 
हम ने इस डर से कभी हाल न पूछा अपना
[19/05, 23:48] Anand Kakkar: आज का शब्द 

आज का शब्द (28/2/20)

 *आगही* (aagahii)
शब्दार्थ
awareness / जागरुकता

'सौदा' जो बे-ख़बर है वही यहाँ करे है ऐश 
मुश्किल बहुत है उन को जो रखते हैं *आगही* 

- मोहम्मद रफ़ी 'सौदा'
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 *आगाह*  (aagaah)

aware, one who knows, acquainted with, alert
जाना हुआ, जानना, परिचित, ज्ञात
ज्ञात, जाना हुआ, सूचित, मुत्तला, परिचित, वाक़िफ़।।

 *आगाह* अपनी मौत से कोई बशर* नहीं 
सामान सौ बरस का है पल की ख़बर नहीं

[* आदमी, human being]
-हैरत इलाहाबादी
[19/05, 23:48] Anand Kakkar: आज का शब्द

अक्स

aks

 

 

عکس

शब्दार्थ

Reverse, Image, Photograph, Reflection

वो अक्स बन के मिरी चश्म-ए-तर में रहता है 
अजीब शख़्स है पानी के घर में रहता है 

बिस्मिल साबरी
[19/05, 23:48] Anand Kakkar: आज का शब्द (13/2/20)

 *लरज़ता* ( laraztaa )

waver, shake, quiver, कपककना


दुआ को हात उठाते हुए *लरज़ता* हूँ 
कभी दुआ नहीं माँगी थी माँ के होते हुए 
- इफ़्तिख़ार आरिफ़
[19/05, 23:48] Anand Kakkar: आज का शब्द (9/3/20)

 *अज़िय्यत* (aziyyat )

trouble, torment, difficulty
कष्ट, यातना, तक्लीफ़

ज़िंदगी एक *अज़िय्यत* है मुझे 
तुझ से मिलने की ज़रूरत है मुझे 
-मीरा

अपनी ख़ामोश तमन्ना की *अज़िय्यत* से निकल 
जो सुनाना है ज़रा खुल के सुना ले मुझ को 

हम दोहरी *अज़िय्यत* के गिरफ़्तार मुसाफ़िर 
पाँव भी हैं शल शौक़-ए-सफ़र भी नहीं जाता 
अहमद फ़राज़

जो ज़िंदाँ में *अज़िय्यत* पर अज़िय्यत मुझ को देता है 
मैं उस ज़ालिम से उम्मीद-ए-रिहाई कर नहीं सकता 
-अफ़ज़ल इलाहाबादी
[19/05, 23:48] Anand Kakkar: आज का शब्द (12/3/20)

 *बेज़ार* (bezaar)
शब्दार्थ-
to be sick of, खिन्न, अप्रसन्न


ज़िंदगी से ये रहा अपनी मुलाक़ात का हाल 
किसी *बेज़ार* से जैसे कोई बेज़ार मिले 
-मख़मूर सईदी

ऐ शख़्स मैं तेरी जुस्तुजू से 
 *बेज़ार* नहीं हूँ थक गया हूँ 
-जौन एलिया

आए जो बज़्म में तो उठा चेहरे से नक़ाब 
परवाने ही को शमा से *बेज़ार* कर चले 
-सौदा
[19/05, 23:48] Anand Kakkar: आज का शब्द (7/3/20)

 *ख़ूगर* {(KHuugar)
शब्दार्थ

accustomed, habituated

रंज से ख़ूगर हुआ इंसाँ तो मिट जाता है रंज 
मुश्किलें मुझ पर पड़ीं इतनी कि आसाँ हो गईं
Ghalib
----------------------------------–--
ख़ूब दिल खोल कर जफ़ा कर लो 
बंदा मुद्दत से इस का *ख़ूगर* है 
-Rana
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क्या कोई ग़म के गँवाने का हुनर हाथ आया 
मुस्कुराते हुए जो रंज के *ख़ूगर* आए 
Jana malik
[19/05, 23:48] Anand Kakkar: आज का शब्द (10/3/20)

 *दरख़्त-ए-राह* (daraKHt-e-raah)
शब्दार्थ-
Tree on the way, रास्ते मे पड़नेवाले दरख़्त 

 *दरख़्त* 
शब्दार्थ- 
पेड़ Tree

 *दरख़्त-ए-राह* बताएँ हिला हिला कर हाथ 
कि क़ाफ़िले से मुसाफ़िर बिछड़ गया है कोई 

जिन से उम्मीद है सहरा में घनी छाँव की 
उन *दरख़्तों* के लिए ढेर सा पानी ले जा
[19/05, 23:48] Anand Kakkar: आज का शब्द

तलबगार

talabgaar

 

 

طلب گار

शब्दार्थ

seeker, claimant, desirous

दुनिया में हूँ दुनिया का तलबगार नहीं हूँ 
बाज़ार से गुज़रा हूँ ख़रीदार नहीं हूँ 

अकबर इलाहाबादी
[19/05, 23:48] Anand Kakkar: आज का शब्द

तदबीर

tadbiir

 

 

تدبیر

शब्दार्थ

solution, arrangement

कुछ इस के सँवर जाने की तदबीर नहीं है 
दुनिया है तिरी ज़ुल्फ़-ए-गिरह-गीर नहीं है 

हफ़ीज़ बनारसी
[19/05, 23:48] Anand Kakkar: आज का शब्द (24/3/20)

 *ताबानी* (taabaanii)
शब्दार्थ-
प्रकाश, आभा, ज्योति, रौशनी, नूर।।

और कुछ दिन गुज़रने दे मेरे 
धूल चाटेगी तेरी *ताबानी* 
सावन शुक्ला

उतर आया है दिल में नूर कोई 
तुम्हें चेहरे की *ताबानी* मुबारक 
मनीष शुक्ला

आ गया कौन ये आज उस के मुक़ाबिल 'असलम' 
आईना टूट गया अक्स की *ताबानी* से 
असलम महमूद
[19/05, 23:48] Anand Kakkar: आज का शब्द (15/3/20)

 *ज़ौक़* [ zauq] 

शब्दार्थ-
taste, मज़ा, रस, आनन्द

वो अपना ज़ौक़ बढ़ाएँ अगर मज़ा उन को 
रऊफ़ 'ख़ैर' के अशआर में नहीं आता 
-रउफ ख़ैर

बढ़ाए जा क़दम ज़ौक़ तलब में 
शिकायत कर न इज्ज़-ओ-ख़स्तगी* की 
(*modesty, humility and weakness)
-अमज़द नजमी

ज़ौक़ बढ़ता है आश्नाई का 
जब वो बेगानगी से मिलता है 
-सय्यद हदीम

*************************
Note-
आख़िरी मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र के उस्ताद और राजकवि .... *शेख़ इब्राहिम ज़ौक* की लाज़वाब शायरी तक आप ज़ुरूर पहुँचे होंगे। 
उस्ताद ने अपनी ग़ज़लों के मकते में अपने तख़ल्लुस (उपनाम) के रूप में *ज़ौक* का इस्तेमाल किया है। उन शेरों के पड़ते वक़्त इसे (zauk) संज्ञा के रूप में लिया जाएगा न कि ऊपर दिए वास्तविक अर्थों में। 
 *शेख़ इब्राहिम ज़ौक़ के कुछ मकते* -

जाते हवा-ए-शौक़ में हैं इस चमन से ' *ज़ौक़* ' 
अपनी बला से बाद-ए-सबा अब कभी चले 

' *ज़ौक़* ' जो मदरसे के बिगड़े हुए हैं मुल्ला 
उन को मय-ख़ाने में ले आओ सँवर जाएँगे 

हर एक शेर में मज़मून-ए-गिर्या* है मेरे 
मिरी तरह से कोई ' *ज़ौक़* ' शेर-ए-तर तो कहे 
(*Sorrowful topic)
[19/05, 23:48] Anand Kakkar: आज का शब्द (20/3/20)

 *परस्तिश* ( parastish )

शब्दार्थ-
worship, devotion
पूजा
पूजा, आराधना, इबादतः । बहुत अधिक प्रेम।

कौन देता है मोहब्बत को *परस्तिश* का मक़ाम 
तुम ये इंसाफ़ से सोचो तो दुआ दो हम को 
-ehsan danish

 *परस्तिश* की याँ तक कि ऐ बुत तुझे 
नज़र में सभों की ख़ुदा कर चले 
-Meer

कौन देता है मोहब्बत को *परस्तिश* का मक़ाम 
तुम ये इंसाफ़ से सोचो तो दुआ दो हम को 
-ehsan danish

भले ख़्वाहिश करूँ तेरी किसी भी शक्ल में लेकिन 
मिरा मक़्सद परस्तिश के सिवा कुछ भी नहीं होता 
-manish mishra
[19/05, 23:48] Anand Kakkar: आज का शब्द-
ज़ब्त-ए-गिर्या (zabt-e-girya)

शब्दार्थ-
control over weeping, crying
आँसू रोकना

ज़ब्त-ए-गिर्या कभी करता हूँ तो फ़रमाते हैं 
आज क्या बात है बरसात नहीं होती है 
-हफ़ीज़ जालंधरी

ज़ब्त-ए-गिर्या से कहीं चाक न हो जाए जिगर 
बूँद आँसू की भी हीरे की कनी होती है 
-जोश मलसियानी

राज़ उल्फ़त का छुपाने के लिए 
ज़ब्त-ए-गिर्या भी किया लब भी सिए 
-बदर जमाली
[19/05, 23:48] Anand Kakkar: आज का शब्द (26/3/20)

*सरापा* [ saraapaa ]

शब्दार्थ
human figure from head to foot
सर से पाँव तक

शाहों की बंदगी में सर भी नहीं झुकाया 
तेरे लिए *सरापा* आदाब हो गए हम 

ताबिश देहलवी

सुना है आग है उस का *सरापा* 
चलो बाहोँ में भर कर देखता हूँ
-jahajeer nayab

सरापा देख कर दिलकश किसी का 
हर इक *मंज़र* वहाँ ठहरा हुआ है 
-Zafar sahni

वो जिस्म जमाल था *सरापा* 
और मुझ को जमाल चाहिए था 
-Jaun Eliea

इक *सरापा* सवाल है दुनिया 
इक मुकम्मल जवाब हैं हम लोग 
-Kuwar singh Bechain

हर आइना था *सरापा* हिजाब मेरे लिए 
मैं अपने आप को देखूँ नज़र वो आता था 
-Mushfiq khwaja
[19/05, 23:48] Anand Kakkar: आज का शब्द (25/3/20)

 *हस्सास* ( hassaas )

शब्दार्थ
sensitive, emotional, possessed of all the five senses
स्वाभिमानी, खुद्दार, संवेदन- शील, हिसवाला।

तेरे अश्कों से कलेजा मिरा कट जाएगा 
मेरी *हस्सास* तबीअत मुझे ले डूबेगी 
-जावेद सबा

सुनता हूँ तड़पते हुए पानी का फ़क़त शोर 
 *हस्सास* बनाया है मुझे तिश्ना-लबी ने 
-रफ़ीक़ राज़

मेरी निगाह आख़िर *हस्सास* क्यूँ है उतनी 
मैं रोज़-ओ-शब बदलते इंसान देखता हूँ 
-कैसर ख़ालिद
[19/05, 23:48] Anand Kakkar: आज का शब्द (27/3/20)

 *माइल* [ maa.il ]

inclined, bent, attracted, bent
आकृष्ट, प्रवृत

उस की आँखों ने ख़ुदा जाने किया क्या जादू 
कि तबीअ'त मिरी *माइल* कभी ऐसी तो न थी 
- बहादुर शाह ज़फ़र

मोहब्बत ने ' *माइल* ' किया हर किसी को 
किसी पर किसी को किसी पर किसी को 
अहमद साइन *माइल* 

फूल ख़ुश्बू हवा शजर बारिश 
एक तेरी तरफ़ ही *माइल* हैं 
फरहत अब्बास शाह
[19/05, 23:48] Anand Kakkar: आज का शब्द (28/3/20)

शय [ shai ]
 शब्दार्थ-
things/ objects
refuge
चीज़

हर *शय* को इंतिहा है यक़ीं है कि वस्ल हो 
अर्सा बहुत खिंचा है मिरी इंतिज़ार का 
अनवर देहेलवी

जाने क्यूँ दिल है परेशाँ 
जाने क्या *शय* खो रही है 
मीनू बक्शी

रंज कोई *शय* न कोई शय ख़ुशी 
मुख़्तलिफ़ एहसास का इक नाम है 
फिगार उन्नवी
[19/05, 23:48] Anand Kakkar: आज का शब्द (31/3/20)

 *ना-फ़हम* ( naa-fahm )

शब्दार्थ-
obscure, beyond understanding
जिसकी समझ मोटी हो, जो बात न समझ सके।

या तो जो *ना-फ़हम* हैं वो बोलते हैं इन दिनों 
या जिन्हें ख़ामोश रहने की सज़ा मालूम है 
-शुजा ख़ावर

हम तो मायूस हैं मगर 'बेख़ुद' 
दिल-ए- *ना-फ़हम* ना-उमीद नहीं 
-बेखुद बदायुनी

इक पहेली की तरह *ना-फ़हम* थे हम भी 'ज़हीर' 
आप की ख़ातिर मगर आसान हो जाना पड़ा 
-ज़हीर

 *ना-फ़हम* कहूँ मैं उसे ऐसा भी नहीं है 
क्या शय है मोहब्बत वो समझता भी नहीं है 
- शायर फतहपुरी
[19/05, 23:48] Anand Kakkar: आज का शब्द [3/4/20]

 *गो* (go)

Although, Though
यद्यपि, चाहे, अगरचे

 *गो* ज़रा सी बात पर बरसों के याराने गए 
लेकिन इतना तो हुआ कुछ लोग पहचाने गए

 *गो* हाथ को जुम्बिश नहीं आँखों में तो दम है 
रहने दो अभी साग़र-ओ-मीना मिरे आगे 
-मिर्ज़ा ग़ालिब

“कल तुमसे जुदा हो जाऊँगा *गो* आज तुम्हारा हिस्सा हूँ   … मैं पल दो पल का शायर हूँ .........”
(कभी कभी नज़्म से)
-साहिर लुधियानवी

वो अपने मतलब की कह रहे हैं ज़बान पर *गो* है बात मेरी ,
है चित भी उन की है पट भी उन की है जीत उन की है मात मेरी ।
-बशीरुद्दीन अहमद देहलवी

लत आशिक़ी की कोई जाए है आशिक़ों से 
 *गो* बादशाह डाँडे *गो* कोतवाल बाँधे 
-  मुसहफी गुलाम हमदानी

 *गो* बरसती नहीं सदा आँखें 
अब्र तो बारह-मास होता है 
-गुलज़ार

 *गो* न समझूँ उस की बातें *गो* न पाऊँ उस का भेद 
पर ये क्या कम है कि मुझ से वो परी-पैकर खुला 
-मिर्ज़ा ग़ालिब

 *गो* चराग़ाँ किए गए ख़ेमे 
पर अंधेरा दिलों में रहता है 
-शाइस्ता यूसुफ़
[19/05, 23:48] Anand Kakkar: आज का शब्द (2/4/20)

 *महशर* (mahshar)

शब्दार्थ-

महाप्रलय , कयामत का दिन । मुसलमानी धर्म के अनुसार वह अंतिम दिन जब ईश्वर सब प्राणियों का न्याय करेगा ।tumult, day of Resurrection

हिसाब अपना यहाँ सब दे रहे हैं 
बपा हर सम्त *महशर* देखता हूँ 
-ग़नी गयूर

वही *महशर* वही मिलने का वा'दा 
वही बूढ़ा बहाना चल रहा है 
-राहत इन्दौरी

फ़ैसला होना है जो कुछ आज होना चाहिए 
मुद्दतें लग जाएँगी *महशर* बपा होते हुए 
-शहजाद अहमद

ये ज़िंदगी कोई *महशर* सही मगर यारो 
सुकून-बख़्श* है हम को यही क़यामत भी 
*granting peace
-सलमान अख्तर

 *महशर* की आफ़तों का धड़का नहीं रहा अब 
सौ हश्र मैं ने देखे दो दिन की ज़िंदगी में 
-नज़्म तबातबाई
[19/05, 23:48] Anand Kakkar: आज का शब्द (1/4/20)

 *आशोब*  [ aashob ]

शब्दार्थ-
upheavel/ affliction/ disturbance/ terror
हलचल, उथल-पुथल, उपद्रव
 बलवा, विप्लव, इन्किलाब ।।

क्या रात के *आशोब* में वो ख़ुद से लड़ा था 
आईने के चेहरे पे ख़राशें सी पड़ी हैं 
-आफ़ताब इक़बाल शमीम

लगीं हैं हज़ारों ही आँखें उधर 
इक *आशोब* है उस के घर की तरफ़ 
-मीर तकी मीर

था क़यामत सुकूत का *आशोब* 
हश्र सा इक बपा रहा मुझ में 
-जान इलिया

ऐसा *आशोब* तो पहले कभी देखा न सुना 
भीड़ गलियों में है लोग अपने मकानों में नहीं 
-असरार ज़ैदी
[19/05, 23:48] Anand Kakkar: आज का शब्द (30/3/20)

दस्तार 

 *दस्तार* (dastaar)

शब्दार्थ- 
turban (generally meant for courtiers)
पगड़ी, अम्मामा।

झुक कर सलाम करने में क्या हर्ज है मगर 
सर इतना मत झुकाओ कि *दस्तार* गिर पड़े 
- इक़बाल अज़ीम

तिरी दस्तार तुझ को ढो रही है 
तिरे काँधों पे तेरा सर नहीं है 
- मयंक पाण्डेय

पाँव रहते नहीं ज़मीं पे तिरे 
हाथ दस्तार पर रहेगा क्या 
-रसा चुगताई

 
[19/05, 23:48] Anand Kakkar: आज का शब्द (6/4/20)

 *अदू* [aduu]

शब्दार्थ- 
दुश्मन, Rival, rivalenemy, foe, शत्रु, बैरी, अत्याचारी


यही है आज़माना तो सतना किसको कहते हैं
 *अदू* के हो लिए जब तुम तो मेरा इम्तिहान क्यो हो
-ग़ालिब

सवाल-ए-वस्ल पर उनको *अदू* का खौफ है इतना
दबे होंठो से देते हैं जवाब अहिस्ता अहिस्ता
-अमीर मीनाई

न मुदारात* हमारी न *अदू* से नफ़रत
न वफ़ा ही तुम्हें आई न जफ़ा ही आई
(*Politeness)
-अज्ञात

अगर *अदू* से तुझे वाक़ई महब्बत है
तो इत्मिनान में ऐ बद-गुमां न डाल मुझे

तिरी खुशी हो *अदू* की खुशी के ताबे क्यों
तिरी खुशी का भी होने लगा मलाल मुझे
-मेला राम "वफ़ा"

मैं इसे दस्त-ए- *अदू** में नहीं जाने दूँगा 
सर की क़ीमत पे भी महँगी नहीं दस्तार मुझे 
(*दुश्मन का हाँथ)
-शहज़ाद कमर

वो आदमी कहाँ है वो इंसान है कहाँ 
जो दोस्त का हो दोस्त *अदू* का *अदू* न हो 
-दाग़ देहलवी
[19/05, 23:48] Anand Kakkar: आज का शब्द (6/4/20)

 *अदू* [aduu]

शब्दार्थ- 
दुश्मन, Rival, rivalenemy, foe, शत्रु, बैरी, अत्याचारी


यही है आज़माना तो सतना किसको कहते हैं
 *अदू* के हो लिए जब तुम तो मेरा इम्तिहान क्यो हो
-ग़ालिब

सवाल-ए-वस्ल पर उनको *अदू* का खौफ है इतना
दबे होंठो से देते हैं जवाब अहिस्ता अहिस्ता
-अमीर मीनाई

न मुदारात* हमारी न *अदू* से नफ़रत
न वफ़ा ही तुम्हें आई न जफ़ा ही आई
(*Politeness)
-अज्ञात

अगर *अदू* से तुझे वाक़ई महब्बत है
तो इत्मिनान में ऐ बद-गुमां न डाल मुझे

तिरी खुशी हो *अदू* की खुशी के ताबे क्यों
तिरी खुशी का भी होने लगा मलाल मुझे
-मेला राम "वफ़ा"

मैं इसे दस्त-ए- *अदू** में नहीं जाने दूँगा 
सर की क़ीमत पे भी महँगी नहीं दस्तार मुझे 
(*दुश्मन का हाँथ)
-शहज़ाद कमर

वो आदमी कहाँ है वो इंसान है कहाँ 
जो दोस्त का हो दोस्त *अदू* का *अदू* न हो 
-दाग़ देहलवी
[19/05, 23:48] Anand Kakkar: आज का शब्द (5/4/20)

 *दयार* (dayaar)

शब्दार्थ-
territory, region
इलाक़ा

आँखों से दिल तक एक जहान-ए-सुकूत है 
सुनते हैं इस *दयार* से जाते रहे हैं हम 
-शहाब जाफरी

हर एक साँस न जाने थी जुस्तुजू किस की 
हर इक *दयार* मुसाफ़िर को बे-दयार मिला 
-निदा फ़ाज़ली

लहजा उस का भी कुछ था अपना सा 
वो भी अपने *दयार* का होगा 
-मोहसिन ज़ैदी

मुश्किल हुआ है रहना हमें इस *दयार* में 
बरसों यहाँ रहे हैं ये अपना नहीं हुआ 
-मुनीर नियाज़ी

लगता नहीं है दिल मिरा उजड़े *दयार* में 
किस की बनी है आलम-ए-ना-पाएदार* में 

(*impermanent world,  unstable state)
- बहादुर शाह ज़फ़र
[19/05, 23:48] Anand Kakkar: आज का शब्द (4/4/20)

 *मुंतज़िर* (muntazir)

शब्दार्थ-
expectant, one who waits, इंतजार करने वाला

मेरे हमसफ़र पुराने मेरे अब भी *मुंतज़िर* हैं
तुम्हें साथ छोड़ना है तो अभी से छोड़ जाओ
-अहमद फ़राज़

है *मुंतज़िर* -ए-हश्र बहुत देर से दुनिया 
घुंघरू तिरे पैरों के सदा क्यूँ नहीं देते 
-अलीम उस्मानी

बिन कहे आऊँगा जब भी आऊँगा
 *मुंतज़िर* आँखों से घबराता हूँ मैं
-शारिक कैफ़ी

जो *मुंतज़िर* न मिला वो तो हम हैं शर्मिंदा
कि हम ने देर लगा दी पलट के आने में..
-जावेद अख़्तर

सवाल करती कई आँखें *मुंतज़िर* हैं यहाँ
जवाब आज भी हम सोच कर नहीं आए
-आशुफ़्ता चंगेज़ी

 *मुंतज़िर* जिनके हम रहे उनको
मिल गए और हमसफ़र, शायद
-फ़राज़
[19/05, 23:48] Anand Kakkar: आज का शब्द [7/4/20]

चार-सू (chaar-suu)

शब्दार्थ-
In Four Directions/ In All Directions हरतरफ, चारों दिशाओँ में


वो कि ख़ुशबू की तरह फैला था मेरे *चार-सू* 
मैं उसे महसूस कर सकता था छू सकता न था 
-आदिम हाशमी

नौमीदी* ओ यास *चार सू* है 
उफ़ किस के उम्मीद-वार हैं हम 
(*helplessness)
-वहशत रज़ा

न गुज़रने पे ज़िंदगी गुज़री 
न ठहरने पे *चार-सू* ठहरे 
-जौन एलिया

तो दोबारा सहर नहीं होनी 
तीरगी* *चार-सू* रहेगी क्या 
(*darkness)
-परवेज़ साहिर

बोलते हैं दिलों के सन्नाटे 
शोर सा ये जो *चार-सू* है अभी 
-अदा जाफरी

 *चार सू* नफ़रतों की है बारिश 
ज़ख़्म दिल का हरा सा रहता है 
-हैरत अफगानिस्तानी

जब गिरे टूट कर तो ये देखा 
 *चार सू* बे-शुमार थे हम तो 
-अरशद अब्बास ज़की
[19/05, 23:48] Anand Kakkar: आज का शब्द (8/2/2020)

 *मयस्सर* (mayassar)

शब्दार्थ- उपलब्धता, availabile

जिस को ख़ुश रहने के सामान *मयस्सर* सब हों 
उस को ख़ुश रहना भी आए ये ज़रूरी तो नहीं 
-अज्ञात

कितनी आसानियाँ *मयस्सर* हैं 
कितना मुश्किल जहाँ में रहना है 
-ख़ालिद महमूद

बस इतनी दूरी *मयस्सर* रहेगी दोनों को 
कि फ़ासला भी कोई दरमियाँ नहीं होना 
-लियाक़त जाफ़री

दुनिया को देखना तो *मयस्सर* नहीं तुझे 
ज़र्रे को देखना है तो दुनिया बना के देख 
-फ़ानी बादायुनी

उन्ही लोगों को है दुनिया *मयस्सर* 
कि जो उस से किनारा कर रहे हैं 
-मुबीन मिर्ज़ा

अब तो उतनी भी *मयस्सर* नहीं मय-ख़ाने में 
जितनी हम छोड़ दिया करते थे पैमाने में 
-दिवाकर राही
[19/05, 23:48] Anand Kakkar: आज का शब्द (7/4/20)

पायमाल (paimaal)

शब्दार्थ-
पाँव तले रौंदा हुआ, पद-दलित दुर्दशाग्रस्त, मुसीबतजदा

तू जिसे जर्रा समझकर कर रहा है *पायमाल* ,
देख उस जर्रे के सीने में कहीं दुनिया न हो।
[19/05, 23:48] Anand Kakkar: आज का शब्द (10/4/20)

 *शग़्ल* [ shaGl ]

शब्दार्थ-
hobby
काम, व्यस्तता

मैं ने पूछा कि है क्या *शग़्ल* तो हँस कर बोले 
आज कल हम तेरे मरने की दुआ करते हैं
- जलाल लखनवी

कुछ तअ'ल्लुक़ रहा न दुनिया से 
 *शग़्ल* ऐसा बता दिया तू ने 
-दाग़ देहलवी

फूल बरसे हैं बा'द मर्ग* उन पर 
 *शग़्ल* करते रहे जो ख़ारों से 
(*मौत)
-शौक़ मोरादाबादी

किसी ख़याल से क्या क्या ख़याल जाग उठे 
ये *शग़्ल* लम्हा-ए-बेकार से निकल आया 
-इसहाक अतहर सिद्दकी

मुख़ालिफ़ीन का अब *शग़्ल* हो गया है यही 
उछालते हैं ये जुमले मिरे उछाले हुए 
-संजय मिधर जौक

जीना है एक *शग़्ल* सो करते रहे हैं हम 
है ज़िंदगी गवाह कि मरते रहे हैं हम 
-अरशद काकवी
[19/05, 23:48] Anand Kakkar: *तौफ़ीक़* [taufiiq ]

शब्दार्थ-
divine guidance, help, Ability, God's grace
सामर्थ्य
दैवयोग से ऐसे कारण पैदा हो जाना जिससे अभिलषित वस्तु की प्राप्ति में सुगमता हो, ईश्वर की कृपा, दैवानुग्रह, सामर्थ्य, शक्ति, उत्साह, उमंग, हौसला, योग्यता


कोई समझे तो एक बात कहूँ 
इश्क़ *तौफीक़* है गुनाह नही
-शैख़  सनौला

ख़ुदा *तौफ़ीक़* देता है जिन्हें वो ये समझते हैं 
कि ख़ुद अपने ही हाथों से बना करती हैं तक़दीरें 
- नामालूम

उस के शैतान को कहाँ *तौफ़ीक़* 
इश्क़ करना गुनाह-ए-आदम है 
-फ़िराक़

मुझे बरसने की *तौफ़ीक़* दे मिरे अल्लाह 
कि अब्र बन के ज़माने पे छा गया हूँ मैं 
-नाज़ कादरी

ख़ुदा तुझ को सुनने की *तौफ़ीक़* दे 
मिरी ख़ामुशी ही मेरा इज़हार है 
-शकील जमाली

आसाँ भी न होगा घर में रहना 
 *तौफ़ीक़* -ए-सफ़र न मिल सकेगी 
-अतहर नफ़ीस

ना मिली *तौफ़ीक़* की करते मदद गरीब की 
वो सेठ साहब जाकर मक्का मदीना हाज़ी बन गए
-मोमिन

ऐ दिल किसे नसीब ये *तौफ़ीक़* -ए-इज़्तिराब*
मिलती है ज़िंदगी में ये राहत कभी कभी 
(गुनाह से माफ़ी की कृपा)
-नासिर काज़मी
[19/05, 23:48] Anand Kakkar: *तौफ़ीक़* [taufiiq ]

शब्दार्थ-
divine guidance, help, Ability, God's grace
सामर्थ्य
दैवयोग से ऐसे कारण पैदा हो जाना जिससे अभिलषित वस्तु की प्राप्ति में सुगमता हो, ईश्वर की कृपा, दैवानुग्रह, सामर्थ्य, शक्ति, उत्साह, उमंग, हौसला, योग्यता


कोई समझे तो एक बात कहूँ  इश्क़ *तौफीक़* है गुनाह नही
-शैख़  सनौला

ख़ुदा *तौफ़ीक़* देता है जिन्हें वो ये समझते हैं 
कि ख़ुद अपने ही हाथों से बना करती हैं तक़दीरें 
- नामालूम

उस के शैतान को कहाँ *तौफ़ीक़* 
इश्क़ करना गुनाह-ए-आदम है 
-फ़िराक़

मुझे बरसने की *तौफ़ीक़* दे मिरे अल्लाह 
कि अब्र बन के ज़माने पे छा गया हूँ मैं 
-नाज़ कादरी

ख़ुदा तुझ को सुनने की *तौफ़ीक़* दे 
मिरी ख़ामुशी ही मेरा इज़हार है 
-शकील जमाली

आसाँ भी न होगा घर में रहना 
 *तौफ़ीक़* -ए-सफ़र न मिल सकेगी 
-अतहर नफ़ीस

ना मिली *तौफ़ीक़* की करते मदद गरीब की 
वो सेठ साहब जाकर मक्का मदीना हाज़ी बन गए
-मोमिन

ऐ दिल किसे नसीब ये *तौफ़ीक़* -ए-इज़्तिराब*
मिलती है ज़िंदगी में ये राहत कभी कभी 
(गुनाह से माफ़ी की कृपा)
-नासिर काज़मी
[19/05, 23:48] Anand Kakkar: आज का शब्द (12/4/20)

 *तसव्वुफ़* [tasavvuf]

शब्दार्थ-
mysticism, the theology of, the mystics of the east, Sufism
ब्रह्मवाद, अध्यात्मवाद, मन की सांसारिक विषयों से विरक्ति, परहेज़गारी, वेदान्त, ज्ञानकांड

ये मसाईल-ए- *तसव्वुफ़* ये तिरा बयान 'ग़ालिब' 
तुझे हम वली समझते जो न बादा-ख़्वार होता 
( * सूफियाना विषय की छुपी मान्यताएं )
-ग़ालिब

हम *तसव्वुफ़* के हुए आलिम* तसव्वुफ़ छोड़ कर 
दिल मोहब्बत से हुआ ख़ाली तो दानिश# आ गई 
[*ज्ञाता, विद्वान#अक्ल/ बुद्धि]
-फ़रहत एहसास 

हम हैं हिन्दी और हमारा मुल्क है हिन्दोस्ताँ 
हिन्द में पैदा *तसव्वुफ़* के ज़बाँ-दाँ* कीजिए 
(*भाषा में निपुण/ expert)
-साहिर देहलवी

शाइ'र-ए-क़ौम पे बन आई है 
किज़्ब* कैसे हो *तसव्वुफ़* में निहाँ 
(*lie, झूठ)
-फहमीदा रियाज़

जो कुछ है अना* में वो टपकता है अना से 
कुछ आप से मैं ज़िक्र-ए- *तसव्वुफ़* नहीं करता 
(*I / ego/ अहम/ मैं)
-मुस्तफ़ा ख़ान शेफ्ता

लोबान के धुएँ में *तसव्वुफ़* के ज़िक्र पर 
पौदों* की तरह हिलते रहे अहल-ए-अंजुमन#
(*plants #महफ़िल के सब लोग people of assembly)
-महमूद इश्की
[19/05, 23:48] Anand Kakkar: आज का शब्द

लबरेज़

labrez

 

 

لبریز

शब्दार्थ

brimful, over-flowing

दर-ओ-दीवार-ए-चमन आज हैं ख़ूँ से लबरेज़ 
दस्त-ए-गुल-चीं से मबादा कोई दिल टूटा है 

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम
[19/05, 23:48] Anand Kakkar: आज का शब्द (11/4/20)

 *कामिल* [ kaamil]

शब्दार्थ- 
मुकम्मल, perfect, पूरा, complete, समूचा,संपूर्ण accomplished, entire
बिलकुल, मुकम्मल, सर्वांगपूर्ण, निपुण 

ये माना ज़िंदगी *कामिल* है लेकिन 
अगर आ जाए जीना जावेदाँ* है 
(*Everlasting)
-ख़ुमार बाराबंकवी

अलग बैठे थे, फिर भी आंख साकी की पड़ी हम पर,
अगर है तिश्नगी *कामिल* तो पैमाने भी आयेंगे।
-मजरूह सुल्तानपुरी

नाकाम कोशिश को मिली है ये सज़ा
न तू हुआ *कामिल* , न पूरा मैं बचा
-तशु चौहान

चाहिए ख़ुद पे यक़ीन-ए- *कामिल* 
हौसला किस का बढ़ाता है कोई 
-अज्ञात

इश्क़ सबका *कामिल* होता है।
बस कहानी अधूरी रह जाती है।
-नामालूम

पुराने को छोड़  नए शामिल करें क्या
जो सफर अधूरा है  *कामिल* करें क्या
-नीरज आहूजा

 *कामिल* मोहब्बत, रहमत...
अधूरी मोहब्बत, इबादत ...
-दीप गेरा

काश ये उर्दू स्कूल के विषयों में  शामिल हुआ होता
तो आज नज़्म लिख पाने में मैं *कामिल* हुआ होता 
- मिलिंद बोसमिया 'नादिर'
[19/05, 23:48] Anand Kakkar: आज का शब्द (13/4/20)

 *ज़ब्त* [ zabt ]

self control
सहन, सहनशीलता, बरदाश्त, क्रम, तर्तीब, प्रबंध, व्यवस्था
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 *ज़ब्त-ए-ग़म* [zabt-e-Gam]
शब्दार्थ- दुख को सहना।
tolerance
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इम्तेहां और तुम मेरे *ज़ब्त* का क्या लोगे
मैने तो धड़कन को भी सीने में छुपा रखा है
-कतील शिफ़ाई

न अपने *ज़ब्त* को रुस्वा करो सता के मुझे 
ख़ुदा के वास्ते देखो न मुस्कुरा के मुझे 
-बिस्मिल अज़ीमाबादी

 *ज़ब्त-ए-ग़म* का सिला न दे जाना
ज़िन्दगी की दुआ न दे जाना
-काबिल अमृतसरी

 *ज़ब्त* कर सकते थे आख़िर ज़ब्त हम करते रहे 
काम था जिन का सितम करना सितम करते रहे 
-तनवीर गौहर

न सकत है *ज़ब्त-ए-ग़म* की न मजाल-ए-अश्क-बारी 
ये अजीब कैफ़ियत है न सुकूँ न बे-क़रारी 
-आमिर उस्मानी

 *जब्त-ए-ग़म* कोई आसान काम नहीं फ़राज़,
आग होते है वो आँसू जो पिए जाते हैं।
-फ़राज़

 *ज़ब्त* का हौसला बहुत था मगर 
उस ने पूछा तो आँख भर भी गई 
-यशब तमन्ना

कहकशाँ दोहे सोहे मोहे - 2