Saturday, 30 May 2020

Week 4 Open Forum1 नज़्म एक मुकम्मल कहानी : मक़बूलियत की कसौटी पर नज़्म और ग़ज़ल लोकप्रियता की कसौटी पर: मुशायरे की लोकप्रिय प्रस्तुति : नज़्म का एक और सफर



नज़्म : एक मुकम्मल कहानी

वर्तमान समय में यह शब्द किसी भी विषय पर लिखी गई नए ढंग की कविता के लिए प्रचलित है। 
नज़्म यानी एक मुकम्मल कहानी। नज़्म उर्दू की एक आज़ाद विधा है जिसमे एक ख़याल या बात ( thought / subject)को ही कविता/ नज़्म की शक्ल दी जाती है।
नज़्म का एक शीर्षक होता है। जैसे हम हिंदी में कविता लिखते हैं वैसे ही उर्दू में नज़्म लिखी जाती हैं।नज़्म गज़लों के अनुशासन जैसे बहर, रदीफ़, और क़ाफ़िए की पाबंदियों से मुक्त होती है । यानी ये किसी नियम के साथ या किसी नियम के बिना भी लिखी जा सकती है।  जिस तरह से आज कविता का रूप सिमटकर गद्य कविता (Prose Poetry) में बदलता जा रहा है। ठीक उसी प्रकार नज़्म के साथ भी ऐसा होता प्रतीत हो रहा है। इसकी लंबाई 3 मिसरों से लेकर एक पूरी किताब भी हो सकती है।

मक़बूलियत की कसौटी पर - नज़्म और ग़ज़ल

उर्दू शायरी की सबसे पसंदीदा विधा है ग़ज़ल । जिसके अकेले शेर भी जान मानस के आम बोलचाल भाषा का हिस्सा हैं जो न सिर्फ माहौल को सजाने के काम आते हैं बल्कि बात के असर को भी बढ़ा देते हैं।
जैसा कि आप जानते हैं कि ग़ज़ल का हर शेर अपने आप में कम्पलीट यानी मुकम्मिल है उसका ग़ज़ल के अगले शेर से कोई अमूमन संबंध नही होता है । एक ग़ज़ल में विषय हर शेर में बदल सकने की आज़ादी होती है। इस कारण एक सतरंगी माहौल बनाने में ग़ज़ल सफल है जो पढ़ने और सुनने वाले पर गहरा प्रभाव छोड़ती है। 
ग़ज़ल किताब के बाहर लगभग हर माध्यम में सरलता से एक्सेप्ट की जाती है जैसे मुशायरा, फ़िल्म, TV सीरियल व स्टूडियो मुशायरा और सोशल पटल जैसे Fb, whatsaap, twietter & instagram. यु तुबे पर भी उर्दू शयरी सर्च को अगर देखें तो अधिकतम ग़ज़लें ही ज्यादा पसंद की जाती हैं।

बावजूद इसके कि ग़ज़ल की लोकप्रियता सर्वव्यापी है, नज़्म शायरों की विशेष पसंद मानी जाती है और लगभग 20℅ शायर उम्दा नज़्म भी कहते हैं । ये बात और कि ज्यादातर प्रसिद्धि उन्हें उनकी ग़ज़लों से मिलती है। एक अनुमान के अनुसार मात्र 5 % शायर ही नज़्म के साथ इंसाफ कर पाते हैं और पाठकों को प्रभावित भी। बड़े बड़े शायर भी नज़्म को लेकर संजग रहते हैं। ग़ालिब से लेकर वसीम बरेलवी तक के शायरों पर उपरोक्त कथन लगभग सही साबित होता है। ये आलेख लेखक की अपनी व्यक्तिगत राय है।
साथ ही इसका विपतीत भी बहुत कॉमन है कि अच्छे नज़्मगो ( नज़्म के शायर) अच्छे ग़ज़लगो (ग़ज़ल का शायर) नही होते । उनकी पहचान उनकी नज़्मों से ज्यादा होती है जैसे गुलज़ार व अली सरदार जाफ़री आदि। वहीं बड़े शायरों की एक लंबी फेहरिस्त है जिन्होंने ग़ज़ल और नज़्म दोनो को बखूबी अंजाम दिया है जैसे  फ़ैज़, मज़ाज़, मुनीर नियाज़ी, फ़िराक़ साहब, अहमद फ़राज़, कैफ़ी आज़मी, साहिर लुधियानवी, निदा फ़ाज़ली, शहज़ाद, इक़बाल और जाँनिसार अख़्तर आदि। विभिन्न मुशायरों के वीडियो को आप आसानी से Youtube पर देख कर किसी शायर के नज़्मगो होने का जादू आप स्वयं उठा सकते हैं।  उदाहरण के तौर पर फ़ैज़ की नज़्म मुझसे पहली सी मोहब्बत मेरे महबूब न मांग और हम देखेंगे.........मुनीर नियज़ी की नज़्म ...में थोड़ी देर कर देता हूँ..... कैफ़ी आज़मी की औरत व राम का बनवास......अहमद फ़राज़ की .......और मज़ाज़ लखनवी की नज़्म .....अब मेंरे पास तुम आयी ही तो क्या आयी हो .....आदि को देखना न भूलें।


नज़्म : मुशायरों की पसंदीदा प्रस्तुति

शायर व उसकी रचनाओं की एक कसौटी मुशायरों के मंचों पर भी होती है। जब शायर श्रोताओं से रुबरु होता है तो वह नज़्मों को ही प्रधानता से सुनानें में ज्यादा लुत्फ उठता है। जावेद अख्तर, ताहिर फ़राज़ और मुनव्वर राना साहब से साक्षात्कार के दौरान मेरी उन सबका ये कहना था कि चूंकि ग़ज़ल का एक शेर आपने आप में पूरी कहानी कहता है इसलिए उसमें विषय और उसके विस्तार की संभावनाएं सीमित हैं। अगर शायर एक विषय को तफ़सील से बयान करना चाहता है तो उसे ग़ज़ल में बड़ी कम जगह मिलती है। साथ ही ग़ज़ल कहने के अनुशासन और शैली की पाबंदियां कहीं न कहीं शायर को एक कफ़स की अनुभूति दिलाती हैं और वो हार कर नज़्म की शरण लेता है। जिससे वो अपने उदगार भरपूर तरीके से आज़ादी के साथ बयान कर सके।

अगर मुशायरे की जानिब रुख करें तो अच्छे उर्दू शायर व नज़्मगो जब अपनी नज़्म पढ़ते हैं तो उसके इमोशन में बह से जाते हैं और श्रोता भी उनके साथ इमोशनल हो जाते हैं। उनके चेहरे के हावभाव नज़्म के विषय के मुताबिक उतरते चढ़ते रहते हैं। उनका इतना डूब कर एक विचार की प्रस्तुति नज़्म की प्रस्तुति में चार चांद लगा देता है। इस फर्क को समझना हो तो एक ही शायर को देखिए जिसमें एक मुशायरे में नज़्म का और ग़ज़ल का ।

शायर अक्सर ग़ज़ल को मक़बूलियत दिलाने के लिए उसे तरन्नुम से पेश करते हैं। यहां ये बात भी गौर करने की है कि अक्सर बेहतरीन तरन्नुम हल्की ग़ज़ल को भी सफल प्रस्तुति बना देता है। शायरों के ऐहतराम के चलते यहां उनके नाम नही दिए जा रहे हैं वरना मुशायरों के पहले दौर में कलाम पड़ने वाली शायरात और छोटे शायरों को आप आसानी से ऐसी प्रस्तुति देते देख सकते हैं। बड़े शायर जैसे फ़िराक़, फ़ैज़, फ़राज़, मुनव्वर राना और राहत इंदौरी आदि बिना तरन्नुम के भी बेहद सफल रहे। जिसका कारण साफ है उनका आला दर्ज़े का कलाम।

नज़्म की मंच प्रस्तुति एक खासी जिज्ञासा का विषय हो सकता है आपके लिए।  इसलिए इस लेख में कही गयी बात से संबंधित प्रमाण स्वरूप  3 वीडियो प्रस्तुत है जो नज़्म की असरदार प्रस्तुति और उसके प्रभाव को स्थापित करेंगेl


नज़्म का एक और सफर

उर्दू शायरी में एक साथ कई स्तर पर कई कारवाँ साथ साथ चलते हैं। मेरे प्रायः उर्दू साहित्य की पुस्तकों की रीडरशिप के साथ साथ उसकी संगीतमय प्रस्तुति का एक लंबा इतिहास है जो पिछले 7 दशकों में नित नायर पैरहन बदलती रहती है और हर पीढ़ी के श्रोताओं की ज़ुरूरत को पूरा करती है। ग़ज़लों को जनमानस के ड्राइंग रूम तक ले जाने का श्रेय ग़ज़ल गायकों को जाता है। 50 से 70 के दशक में जिन गायकों ने ग़ज़ल को अपनी गायकी से सजाया उनमें कुन्दन लाल सहगल, बेगम अख्तर, तलत महमूद, मेहदी हसन, नूरजहां, मलिका पुखराज़, सी. यच. आत्मा, गुलाम आदि प्रमुख थे।
नज़्म के बाबत ये सत्य है कि 80' के दशक के पूर्वार्ध में जगजीत सिंह ने इसका आगाज़ अपने पहले रिकॉर्ड  'unforgetables' से किया, जिसकी नज़्म का जादू आज भी ज्यों का त्यों है।
नज़्मों को जन मानस में मक़बूल बनाने में विभिन्न गायकों के साथ फिल्मों का भी बहुत योगदान रहा।
ग़ज़ल व पार्श्वगायक  जगजीत सिंह, भूपिंदर सिंह, मोहम्मद रफ़ी, लता मंगेशकर, इक़बाल बनो, फरीद ख़ानम और टीना सनी इस मुहिम में सर्वोपरि हैं।

कौन भूल सकता है  फ़ैज़ की नज़्में इक़बाल बनो की आवाज़ में और गुलज़ार की आज़ाद नज़्मों को स्वरबद्ध करने की जटिलता को सरलतापूर्वक निभाते जनाब भपिंदर सिंह। जगजीत सिंह ने नज़्मों को न सिर्फ अपनी कॉन्सर्ट का हिस्सा बना दिया था बल्कि विश्वभर के श्रोताओं को नज़्म का दीवाना भी बना दिया। उनकी कोशिश रही कि हर एल्बम /रिकॉर्ड / CD में एक नज़्म ज़ुरूर रखी जाए।
जगजीत सिंह की गाई नज़्म........बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी .......को शायद ही किसी ग़ज़ल श्रोता ने न सुना हो। साथ ही आपकी दूसरी नज़्में भी खासी लोकप्रिय हुई.....वो कागज़ की कश्ती वो बारिश का पानी..., तेरे खुशबू से भरे ख़त मैं जलता कैसे..., बहुत दिनों की बात है...., तुम नही आये थे जब बजी तो तुम आये थे....मेरे दरवाज़े से अब इस चंद को रुखसत कर दो...एक चमेली के मंडवे ताले..... ऐ मलिहाबाद .....सच कहती थी जो भी अम्मी कहती थी..... आदि।
एक विशेष श्रोता वर्ग है जो भूपिंदर सिंह को नज़्म गायकी के लिहाज़ से जगजीत सिंह के ऊपर तहरीज़ देता हैं। जिसका कारण भूपिंदर सिंह का नज़्म सिलेक्शन, संगीत संयोजन और अद्भुद गायकी है। जब गुलज़ार की लिखी नज़्में भूपिंदर की आवाज़ में सुनेंगे तो ऐसा लगेगा कि दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। गुलज़ार की एक दो नज़्में हैं जो दूसरे बड़े ग़ज़ल गायकों ने भी गयी हैं जो भूपिंदर की गई नज़्मों के आगे थोड़ी फ़ीकी सी लगती हैं। अब यहाँ पुनः ये एक व्यक्तिगत पसंद की भी बात है। ये डिबेट श्रोताओं के बीच उसी तरह हित है जैसे नज़्म और ग़ज़ल के रसियों के बीच।

नज़्मों का फिल्मों में प्रयोग कैफ़ी आज़मी और मदन मोहन साहब ने क्या खूब किया फ़िल्म हकीक़त में....मैं ये सोंचकर उसके दर से उठा था.....
साहिर की नज़्मों ने तो खासी धूम मचाई थी ...ये कूंचे ये नीलम घर दिल काशी के (प्यासा), कभी कभी मेरे दिल में, मेरे घर आई एक नन्ही परी, चलो एक बार फिर से अजनबी बन जाएं.... वो सुबह कभी तो आएगी.... आदि।
गुलज़ार साहब नए वक़्तों के सबसे सफल नज़्मगो है जिनकी नज़्में फिल्मों में भी जादू बिखेरती रहती हैं....मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है (इज़ाज़त), एक ही ख्वाब..(किनारा), लबों को चूम लू ( आस्था), इस मोड़ से जाते हैं (ऑधी), एक सदी से बैठी हूँ (लेकिन) आदि।
Youtube और डाउनलोड  के दौर में गुलज़ार साहब के अनेकों एल्बम इन मंचों पर आसानी से उपलब्ध है...............नज़्म , बूढे पहाड़ों पर, सनसेट पॉइंट, वो जो शायर था, अक्सर, मरासिम, कोई बात चले और चांद परोसा है आदि जिसमें स्वयं गुलज़ार साहब ने स्वयं भी नज़्में पढ़ी। श्रोताओं पर उनकी आवाज़ और कलाम का जादू ज़बर्दस्त है। उनकी नज़्में उनकी आवाज़ में सुनना एक सुखद अनुभव है । और अब Youtube पर गुलज़ार साहब के मुशायरों के वीडियो और ऑडियो एल्बम के वीडियो ने उनकी और नज़्म की मक़बूलियत को चार चांद लगा दिए है।

जब जब नज़्म सलीके से मंच पर शायरों द्वारा पढ़ी गयी और फिल्मों में गीत रूप में पेश की गई उसने सफलते के झंडे गाड़े हैं। नज़्म का असर श्रोताओं पर देर तक तरी रहता है और वो शायद नज़्म के एक विषय का होना और उसकी लंबाई है। जैसे जैसे नज़्म आगे बढ़ती है उसका रंग निखरता जाता है।
नज़्म कहने वाले और सुनने वाले इसे ज्यादातर ग़ज़ल से ऊपर रखते हैं । और यह विषय के दशकों से ग़ज़ल और नज़्म के बीच चल रही एक शीत युद्ध जैसा है। जबकि सर्व विदित है कि दोनों का रंग और असर जुदा जुदा है। मगर हाँ जब व्यक्तिगत राय की बात आती है तो सबकी पसंद अलग अलग होना स्वाभाविक है। आप उदाहरण के तौर पर दिए गए वीडियो को ध्यान से देखें और इस कोल्ड वॉर का फैसला आप स्वयं करें।

आनन्द कक्कड़
 

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