आज का विषय
रक़ीब है जिसके
पर्याय वो /गैर जैसे
किरदार भी हैं
जो प्रेम के
त्रिकोणीय माहौल को मानी
देते हैं। एक
ही स्त्री से
प्रेम करने वाले
दो व्यक्ति एक
दूसरे के रक़ीब
होते हैं। इस
विषय में जो
इमोशन है वो
है रश्क़ {envy} या
जलन व ईर्ष्या
वो भी प्यार
में उस दूसरे
व्यक्ति से जो
प्रेमिका को चाहता
है।
रक़ीब शायरी के मर्म
अथवा विषय को
अपने शेरों में
पेश कीजिये न
कि शब्द शायरी।
आपकी समझ के
लिए निम्न उदाहरणों
को समझें-
इस तरह ज़िंदगी
ने दिया है
हमारा साथ
जैसे कोई निबाह
रहा हो रक़ीब
से
- साहिर
लुधियानवी
बैठे हुए रक़ीब
हैं दिलबर के
आस-पास
काँटों का है
हुजूम गुल-ए-तर के
आस-पास
- जिगर
मुरादाबादी
इस तरह ज़िंदगी
ने दिया है
हमारा साथ
जैसे कोई निबाह
रहा हो रक़ीब
से
- साहिर लुधियानवी
तुम्हारे ख़त में
नया इक सलाम
किस का था
न था रक़ीब
तो आख़िर वो
नाम किस का
था
- दाग़ देहलवी
दिया है दिल
अगर उसको बशर
है क्या कहिए
हुआ रक़ीब तो
हो नामाबर है
क्या कीजे
-मिर्ज़ा ग़ालिब
मैं इसलिये
मनाता नही वस्ल
की खुशी
मेरे रकीब की
न मुझे बददुआ
लगे
कतील
कू-ए-जानाँ
में न ग़ैरों
की रसाई हो
जाए
अपनी जागीर ये या-रब न
पराई हो जाए
इस क़दर दर्द
की आदत सी
हुई है हमको,
दर्द होता है,
अगर दर्द नहीं
होता है
मैं मुज्तरिब
हूँ वस्ल में
खौफ ए रकीब
से
डाला है तुमको
वहम ने किस
पेच ओ ताब
ने
गालिब
इधर आ रक़ीब
मेरे मैं तुझे
गले लगा लूँ
मेरा इश्क़ बे-मज़ा
था तेरी दुश्मनी
से पहले
मुज्तरिब परेशान कन्फ्यूज्ड
अहद ए वफ़ा
भूल गए एक
लम्हे के लिए
एक अहद कम
है वापिस बुलाने
के लिए ..
रक़ीबों के लिए
अच्छा ठिकाना हो
गया पैदा
ख़ुदा आबाद रखे
मैं तो कहता
हूँ जहन्नम को
- बेख़ुद देहलवी
उस ने कहा
है सब्र पड़ेगा
रक़ीब का
ले और बे-क़रार हुआ बे-क़रार दिल
दाग़ देहलवी
जो कोई आवे
है नज़दीक ही
बैठे है तिरे
हम कहाँ तक
तिरे पहलू से
सरकते जावें
मीर हसन
दोज़ख़ ओ जन्नत
हैं अब मेरी
नज़र के सामने
घर रक़ीबों ने बनाया
उस के घर
के सामने
- पंडित दया शंकर
नसीम लखनवी
-कैफ भोपाली
रक़ीब देख सँभल
कर के सामने
आना
बरहना तेग़ हैं
इक दस्त-ए-रोज़गार में हम
- मीर असर
ना कोई
किसी का रकीब
होता है ना
कोई किसी का
हबीब होता है
खुदा की रेहमत
से बन जाते
है रिश्ते जहाँ
जिसका नसीब होता
है
अज्ञात
जमा करते हो
क्यूँ रक़ीबों को
इक तमाशा हुआ, गिला
न हुआ
दर्द मिन्नत कश दवा
न हुआ
मैं न अच्छा
हुआ बुरा न
हुआ
~मिर्ज़ा ग़ालिब
दोस्ती जब किसी
के की जाए
दुश्मनों की भी
राय ली जाए
उल्टी हो गईं
सब तदबीरें कुछ
न दवा ने
काम किया
देखा इस बीमारी-ए-दिल
ने आख़िर काम
तमाम किया
उस नक़्श-ए-पा
के सज्दे ने
क्या क्या किया
ज़लील
मैं कूचा-ए-रक़ीब में भी
सर के बल
गया
-मोमिन ख़ाँ मोमिन
हम भी
दुश्मन तो नही
हैं अपने
गैर को तुझ
से मोहब्बत ही
सही
गालिब
वो हज़ार
दुश्मन ए जाँ
सही , मुझे गैर
फिर भी अज़ीज़
है
जिसे खाक ए
पा तेरी छू
गयी ,वो बुरा
भी हो तो
बुरा नही
[ गैर= रकीब]
जिगर
कितने शीरी है
तेरे लब के
रक़ीब
गालियां खा के
बेमज़ा ना हुआ...!!
ग़ालिब
सदमे उठाएँ रश्क के
कब तक जो
हो सो हो
या तो रक़ीब
ही नहीं या
आज हम नहीं
- लाला माधव राम
जौहर
रस्मे उल्फत को
निभाएं तो निभाएं
कैसे,
हर तरफ आग
है दामन को
बचाएं कैसे ।।
दिल की राहों
में उठाते हैं
जो दुनिया वाले
कोई कह दे
के वो दीवार
गिराएं कैसे ।।
मजरूह सुलतानपुरी
उसके तेवर भी
समझना आसां नहीं,
बात औरों कि
थी हम निगाहों
में थे ||
वसीम बरेलवी
जम्अ करते हो
क्यूं रक़ीबों को
इक तमाशा हुआ गिला
न हुआ
ग़ालिब
ज़ोफ़ में ताना
ए अग़्यार का
शिकवा क्या है
बात कुछ सर
तो नहीं है
कि उठा भी
न सकूं
ग़ालिब
जाना पड़ा रक़ीब
के दर पर
हज़ार बार
ऐ काश जानता
न तिरे रह-गुज़र को मैं
ग़ालिब
ग़ैर क्या जानिये
क्यों मुझको बुरा
कहते हैं
आप कहते हैं
जो ऐसा तो
बजा कहते हैं
उस नक़्शे पा के
सज्दे ने क्या
क्या किया ज़लील
मैं कूचा ए
रक़ीब में भी
सर के बल
गया
सभी इल्ज़ाम मुझे पर
हैं, रकीबों पर
नहीं आते
अजी हो दाग़
कैसे भी
शरीफों पे नहीं
आते
Khushboo
तू मुझे भूल
गया हो तो
पता बतला दूं
कभी फ़ितराक# में तेरे
कोई नख़्चीर भी
था
{ # बंधने की रस्सी. शिकार
}
- Mirza ghalib
हमें नर्गिस का दस्ता
ग़ैर के हाथों
से क्यूँ भेजा
जो आँखें ही दिखानी
थीं दिखाते अपनी
नज़रों से
शेख़ इब्राहीम ज़ौक़
कहते हो कि
हमदर्द किसी का
नहीं सुनते
मैं ने तो
रक़ीबों से सुना
और ही कुछ
है
अमीर मीनाई
शम-ए-मज़ार
थी न कोई
सोगवार था
तुम जिस पे
रो रहे थे
वो किस का
मज़ार था
(सोगवार-sad, grieved)
बेख़ुद देहलवी
सामने उस के
न कहते मगर
अब कहते हैं
लज़्ज़त-ए-इश्क़
गई ग़ैर के
मर जाने से
साहिल के सुकूँ
से किसे इंकार
है लेकिन
तूफ़ान से लड़ने
में मज़ा और
ही कुछ है
-आल-ए-अहमद सूरूर
देता नहीं है
बार रक़ीब-ए-शरीर कूँ
शायद कि बूझता
है हमारे ज़मीर
कूँ
~ वली दक्कनी
मुझ से बिगड़
गए तो रक़ीबों
की बन गई
ग़ैरों में बट
रहा है मिरा
ए'तिबार आज
अहमद हुसैन माइल
रश्क ए अलम
की बात साथ
साथ चल रही...!!
ज़िक्र ए फ़ज़ल
को अब रक़ीब
राज़दाँ हुए..!!
"तितिक्षा
नन्ही"
ख़ूब दुनिया है कि
सूरज से रक़ाबत
थी जिन्हें
उन को हासिल
किसी दीवार का
साया न हुआ
शहरयार
गैरों पे एतबार
का ये भी
सिला मिला..!!
मेरे ही मददगार
उनके ख़ास हो
गए..!!
कितने शीरीं हैं तेरे
लब कि रक़ीब
गालियां खा के
बेमज़ा न हुआ
उस बज़्म में बनती
नहीं मुझसे हया
किये
बैठा रहा ,अगरचे
इशारे हुआ किये
ले मेरे तजरबों
से सबक़ ऐ
मिरे रक़ीब
दो-चार साल
उम्र में तुझ
से बड़ा हूँ
मैं
न अब रक़ीब
न नासेह न
ग़म-गुसार कोई
तुम आश्ना थे तो
थीं आश्नाइयाँ क्या
क्या
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
बीम-ए-रक़ीब
से नहीं करते
विदा-ए-होश
मजबूर याँ तलक
हुए ऐ इख़्तियार
हैफ़
बाहम-दिगर हुए
हैं दिल ओ
दीदा फिर रक़ीब
नज़्ज़ारा ओ ख़याल
का सामाँ किए
हुए
(बाहम-दिगर- एक दूसरे से मिलकर)
मिर्ज़ा ग़ालिब
होश जाते रहे
रक़ीबों के
'दाग़' को और
बावफ़ा कहिये
दाग़ देहलवी
क्या मोजिज़ा किया है
दिले बेक़रार ने
हाल उनका पूछना
पङा हमको रक़ीब
से
(मोजिज़ा=Miracle )
~राकेश 'नुदरत'
हम अपने
इश्क़ की अब
और क्या शहादत
दें
हमें हमारे रक़ीबों ने
मो'तबर जाना
- आलमताब तिश्ना
याद आईं उस
को देख के
अपनी मुसीबतें
रोए हम आज
ख़ूब लिपट कर
रक़ीब से
- हफ़ीज़ जौनपुरी
रफ़ीक़ों से रक़ीब
अच्छे जो जल
कर नाम लेते
हैं
गुलों से ख़ार
बेहतर हैं जो
दामन थाम लेते
हैं
हम अपने इश्क़
की अब और
क्या शहादत दें
हमें हमारे रक़ीबों ने
मो'तबर जाना
- आलमताब तिश्ना
आज से ख़त्म
की जाएगी हर
रियायत को...!!
नज़र ए बद
से हमारे चाँद
की हिफ़ाज़त को..!!
उन रक़ीबों की हैसियत मिटा दी
जाएगी..!!
जिन लबों की
दुहाई दे हवा
क़यामत को...!!
"तितिक्षा
नन्ही"
ख़ुद के ज़मीर-ए-पाक
का, कैसे यकीं
दिलाऊँ तुम्हें,
रक़ीब से रक़ाबत
न् की कभी,
तेरे ज़हनी सुकूँ
के लिए.......!
पंकज सेठ
अपनी गली में
मुझ को न
कर दफ़्न बाद-ए-क़त्ल
मेरे पते से
ख़ल्क़ को क्यूँ
तेरा घर मिले
(ख़ल्क़-Public)
मिर्ज़ा ग़ालिब
वो तो इश्क़
के सौदागर थे
,इसलिए रकीब के
हो गए।
मोहब्बत पाकीज़ा थी हमारी
,इसलिए आज भी
उनके हैं।।
खुशू
इक उम्र
गुज़री है इन्तजार
में,
वो तन्हाई अब भी
इक रकीब सी
है।
कू-ए-जानाँ
में न ग़ैरों
की रसाई हो
जाए
अपनी जागीर ये या-रब न
पराई हो जाए
लाला माधव राम
जौहर
वो जिसे सारे
ज़माने ने कहा
मेरा रक़ीब
मैं ने उस
को हम-सफ़र
जाना कि तू
उस की भी
थी
जिस का तुझ
सा हबीब होवेगा
कौन उस का
रक़ीब होवेगा
- मीर सोज़
याद आईं उस
को देख के
अपनी मुसीबतें
रोए हम आज
ख़ूब लिपट कर
रक़ीब से
- हफ़ीज़ जौनपुरी
रक़ीब देख सँभल
कर के सामने
आना
बरहना तेग़ हैं इक
दस्त-ए-रोज़गार
में हम
[बरहना तेग़=नंगी +तलवार]
- मीर असर
इधर आ रक़ीब
मेरे मैं तुझे
गले लगा लूँ
मेरा इश्क़ बे-मज़ा
था तेरी दुश्मनी
से पहले
- कैफ़
भोपाली
सदमे उठाएँ रश्क के
कब तक जो
हो सो हो
या तो रक़ीब
ही नहीं या
आज हम नहीं
- लाला माधव राम
जौहर
जब कभी उसको
तवज्जो कम पड़ी
तो रंजिशन
वह रक़ाबत में उधर
जाता नहीं था,
पर गया।
मधुप 'महरम'
इस दर्जा रकाबत बढ़ी
दहलीज़ पे तेरी,
कि चाक गरेबां
रफू 'महरम' न
कर सके।
मधुप 'महरम'
तुम्हारे खत में
नया इक सलाम
किस का था।
न था रकीब
तो आख़िर वो
नाम किसका था।।
दाग देहलवी
अपनी जबान से
जो चाहे कह
लें आप
बढ़ बढ के
बोलना नहीं अच्छा
रकीब का
ज़िंदा रहने के
मेरे इमकान हैं
बहुत ,
मेरे रक़ीब यह
सुन के परेशान
हैं बहुत
सईद अहमद सईद
रकीबों के लिए
अच्छा ठिकाना हो
गया है पैदा
,
खुदा आबाद रक्खे
में तो कहता
हूँ जहन्नुम
को।।
बखुद देहलवी
तुमने सवाल तो
उठाए मेरे रक़ीब
पर
हू-ब-हू
मेरे भी तुमसे
सवाल वही हैं
आकाश राहिल
हम तरसते ही तरसते
ही तरसते ही
रहे
वो फ़लाने से फ़लाने
से फ़लाने से
मिले
क्या मिले आप
जो लोगों के
मिलाने से मिले
कैफ भोपाली
उसने कसमें खाई थी,
ज़िंदा है वो
कैसे कह दूं
कि वो गुनाहगार
नहीं
अज्ञात
होश उड़ने लगे रकीबों
के ,
'दाग ' को ओर
बेवफा कहिए।।
दाग
मेरे रक़ीब के
अंदर छिपी अय्यारी
है
मगर इस जंग
में हमारी भीतैयारी है
उसने हाथ मेरा
पकड़ा और दामन...
रकीब का
मसला मोहब्ब्त का कहें
इसे की... खेल
नसीब का
अज्ञात
मै इसलिए मानता नहीं
वस्ल की ख़ुशी,
मेरे रकीब की
ना मुझे बददुआ
लगे।।
कातिल
आप ही से
जब रहा न
मतलब, फिर रकीबों
से मुझ को
क्या मतलब,
मेरी इक बात
में है सौ
पहलू, और सब
का जुदा जुदा
मतलब
वफा के भेष
मे कोई रकीब-ए-शहर
भी है,
हजर के शहर
के कातिल तबीबे
-ए-शहर भी
है।।
अहमद फराज़
जो ग़ैर थे
वो इसी बात
पर हमारे हुए
कि हम से
दोस्त बहुत बे-ख़बर हमारे
हुए
अहमद फराज़
बगैर जंग लड़े
ही शहीद होने
को हैं,
मिरे रकीब कि
मिट्टी पलीद होने
को हैं ||
सरदार आसिफ़
ताकि इबरत करें
और ग़ैर न
देखें तुझ को
जी में आता
है निकलवाइए दो-चार की
आँख
- मीर हसन
उन को भूले
हुए अपने ही
सितम याद आए
जब किसी ग़ैर
ने तड़पाया तो
हम याद आए
- नामालूम
ग़ैर की नज़रों
से बच कर
सब की मर्ज़ी
के ख़िलाफ़
वो तिरा चोरी-छुपे रातों
को आना याद
है
हसरत मोहानी
वो मेरा दुश्मन
ही बन जाए
तो क्या ले
जायेगा
अपने हक़ में
मेरी जानिब से
दुआ ले जायेगा
||
नामालूम
अब किसी से
भी शिकायत न
रही
जाने किस किस
से गिला था
पहले
ग़ैर की नज़रों
से बच कर
सब की मर्ज़ी
के ख़िलाफ़
वो तिरा चोरी-छुपे रातों
को आना याद
है
कमर जलालवी
[ये शेर अनवर
जलालपुरी साहब का
है=
तेरी महफ़िल से उठाता
ग़ैर मुझ को
क्या मजाल
देखता था मैं
कि तू ने
भी इशारा कर
दिया
हसरत मोहानी
वस्ल में ख़ाली
हुई ग़ैर से
महफ़िल तो क्या
शर्म भी जाए
तो मैं जानूँ
कि तन्हाई हुई
अमीर मीनाई
ग़ैर का इश्क़
है कि मेरा
है
साफ़ कह दो
अभी सवेरा है
नूह नारवी
तुम्हारे ख़त में
नया इक सलाम
किस का था
न था रक़ीब
तो आख़िर वो
नाम किस का
था
- दाग़ देहलवी
जबसे अपने क़रीब
हैं 'महरम'
तौर ए अहबाब
रक़ीबाना है।
अहबाब - दोस्त, हबीब का
बहुवचन
ज़िक्र उस परी-जमाल का
जब और जहाँ
छिड़ा
फ़ौरन रक़ीब आ गया
शैतान की तरह
-Sarfaraz shahid
बिगड़े हुए रक़ीब
से वो आए
मेरे घर
इस हुस्न-ए-इत्तिफ़ाक़
का कोई गुमाँ
न था
दावत थी रक़ीब
की मिरे घर
जूती में दाल
क्या बटी है
रियाज़ खैराबादी
मत बख़्त-ए-ख़फ़्ता*
पर मिरे हँस
ऐ रक़ीब तू
होगा तिरे नसीब
भी ये ख़्वाब
देखना
[*सोया हुआ नसीब]
मीर हसन
वो हम-ख़याल
है उस्लूब* उस
का जो भी
हो
रक़ीब ही तो
है चंगेज़ ख़ान
थोड़ी है
[*ढंग, manners, तरीका]
शूज़ा खावर
निशां जो हैं
रक़ाबत के मुहब्बत
से मिटाऊँ तो?
मैं बज़्म ए ग़ैर
में तुमको अगर
अपना जताऊं तो?
मधुप 'महरम'
पत्ता पत्ता बूटा बूटा
हाल हमारा जाने
है
जाने न जाने
गुल ही न
जाने बाग़ तो
सारा जाने है
मीर तकी मीर
इतने क़रीब हो गए
अपने रक़ीब हो
गए
वो भी 'अदीम'
डर गया हम
भी 'अदीम' डर
गए
अदीम हाशमी
सब दोस्त मस्लहत के
दुकानों में बिक
गए
दुश्मन तो पुर-ख़ुलूस अदावत में
अब भी है
(पुर-ख़ुलूस- sincere, generous)
-बाक़ी अहमदपुरी
कोई नज़र में
रहा भी, तो
इस सलीके से
कि मैंने उसके ही
घर का उसे
पता न दिया
वसीम बरेलवी
हम अपने
इश्क़ की अब
और क्या शहादत
दें
हमें हमारे रक़ीबों ने
मो'तबर जाना
आलमताब तिश्ना
कुछ अपने-आप
से ही उसे
कश्मकश न थी
मुझ में भी
कोई शख़्स उसी
का रक़ीब था
--परवीन शाक़िर
ये भी नया
सितम है हिना
तो लगाएँ ग़ैर
और उस की
दाद चाहें वो
मुझ को दिखा
के हाथ
निज़ाम रामपुरी
चले तो पाँव
के नीचे कुचल
गई कोई शय
नशे की झोंक
में देखा नहीं
कि दुनिया है
~शहाब जाफ़री
दोनों ही पक्ष
आए हैं तैयारियों
के साथ
हम गर्दनों के साथ
हैं वो आरियों
के साथ
- कुंअर 'बेचैन'
ख्वाइश ए बाजार
में , रंजिशों का
मज़ा दे गया
।
रक़ीब मरते
मरते भी जीने
की वजह दे
गया ।
जब जब गुज़रे
बीती बातों से
,
कमबख्त ये याद
आया ।
तू था रकीबों
का पहले भी
,
मेरे हिस्से बस फरेब
आया ।
काव्य मिश्रा
ज़माने की परवाह
नही, मैं नफरत
पर सवार हूं
।
रक़ीब की ख्वाइश
हूं , मैं इश्क़
की तलाश हूं
।
डॉ रितिक कंबोज
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