Monday, 11 May 2020

Week 2 Module 2 Chapter 1- ग़ज़ल क्या है?

ग़ज़ल क्या है?
आनन्द कक्कड़

जब कभी यह प्रश्न पूछा जाता हैं कि ग़ज़ल क्या हैं तो सवाल सुन कर मन कुछ उलझन में पड जाता हैं। क्या यह कहना ठीक होगा कि ग़ज़ल जज़्बात और अलफाज़ का एक बेहतरीन गुंचा या मज़्मुआ हैं? या यह कहें कि ग़ज़ल उर्दू शायरी की इज़्ज़त हैं, आबरू है? लेकिन यह सब कहते वक़्त मन में एक प्रश्न उभरता हैं कि क्या यह सच हैं! माना कि ग़ज़ल उर्दू काव्य का एक अत्यंत लोकप्रिय, मधुर, दिलकश औऱ रसीला अंदाज़ हैं मगर यह भी उतना ही सच हैं कि उर्दू साहित्य में ग़ज़ल चर्चा का एक विषय भी बनी रही हैं। 

एक तरफ तो ग़ज़ल इतनी मधुर हैं कि वह लोगों के दिलों के नाज़ुक तारों को छेड देती हैं औऱ दूसरी ओर वही ग़ज़ल कुछ लोगों में कुछ ऐसी भावनाएं पैदा करती हैं कि जनाब कलीमुद्दीन अहमद साहब इसे ‘नंगे-शायरी’ यानी बेहूदी शायरी कहते हैं। जनाब शमीम अहमद शमीम इसे मनहूस शैली की शायरी कहते हैं, और जनाब अज़्मतुल्लाख़ान साहब तो यह कहने में ज़रा भी नहीं हिचकिचाते कि, ‘ग़ज़ल क़ाबिले गर्दन ज़दनी हैं’, यानी इसे जड से उखाड फेंकना चाहिये। वैसे तो ‘ग़ालिब’ भी यह कहते हैं कि-

बक़द्रे शौक़ नहीं ज़र्फे तंगना-ए-ग़ज़ल
कुछ और चाहिये वसुअत मेरे बयां के लिये

(‘मेरे मन की उत्कट भावनाओं को खुलकर व्यक्त करने में ग़ज़ल का पटल बडा ही संकीर्ण हैं। मुझे साफ साफ कहने के लिये किसी और विस्तृत माध्यम की आवश्यक्ता हैं’)

उर्दू के सुप्रसिद्ध साहित्यिक एवं आलोचक रशीद अहमद सिद्दीक़ी साहब ग़ज़ल को ‘आबरू-ए-शायरी’ बडे फख्र के साथ कहते हैं। शायद यही सब बातें हैं कि ग़ज़ल आज तक क़ायम हैं और सामान्यत: सभी वर्गों में काफी हद तक पसंद की जाती हैं।
ग़ज़ल पर्शियन और अरबी भाषाओं से उर्दू में आयी। ग़ज़ल का मतलब हैं औरतों से अथवा औरतों के बारे में बातचीत करना। यह भी कहा जा सकता हैं कि ग़ज़ल का सर्वसाधारण अर्थ हैं माशूक से बातचीत का माध्यम। उर्दू के प्रख्यात साहित्यिक स्वर्गीय रघुपति सहाय ‘फिराक’ गोरखपुरी साहब ने ग़ज़ल की बडी ही भावपूर्ण परिभाषा लिखी हैं। आप कहते हैं कि, ‘जब कोई शिकारी जंगल में कुत्तों के साथ हिरन का पीछा करता हैं और हिरन भागते भागते किसी ऐसी झाडी में फंस जाता हैं जहां से वह निकल नहीं सकता, उस समय उसके कंठ से एक दर्द भरी आवाज़ निकलती हैं। उसी करूण स्वर को ग़ज़ल कहते हैं। इसीलिये विवशता का दिव्यतम रूप में प्रगट होना, स्वर का करूणतम हो जाना ही ग़ज़ल का आदर्श हैं’।

शुरूआत की ग़ज़लें कुछ इसी अंदाज़ की थीं। लगता था मानों वे स्त्रियों के बारे में ही लिखी गई हों। जैसे-

ख़ूबरू ख़ूब काम करते हैं।
इक निगह सू ग़ुलाम करते हैं। ।
-वली दकनी
या
नाज़ुकी उसके लब की क्या कहिये
पंखडी एक गुलाब की सी हैं।
– मीर
 
लेकिन जैसे जैसे समय बीता ग़ज़ल का लेखन पटल बदला, विस्तृत हुआ और अब तो ज़िंदगी का ऐसा कोई पहलू नहीं हैं जिस पर ग़ज़ल न लिखी गई हो।

तुम्हारी शख्सियत से ये सबक़ लेंगी नयी नस्लें 

वही मंज़िल पे पहुँचा हैं जो अपने पाँव चलता हैं।

 - मासूम 

सिगरेट जला के मैं जो ज़रा मुत्मइन हुआ।
चारों तरफ से उसको बुझाने चली हवा। ।
– मिद्हतुल अख़्तर

सिगरेट, गिलास, चाय का कप और नन्हा लैंप।
सामाने-शौक़ हैं ये बहम मेरी मेज़ पर। ।
-ज़हीर ग़ाज़ीपुरी

हिन्दी के अलावा भी कई भारतीय भाषाओं में ग़ज़ल साहित्य की उपलब्धता इस विधा (फॉरमेट) की लोकप्रियता बताती है। 
गज़ल जहां उर्दू साहित्य का प्राण है वही उपशास्त्रीय संगीत में भी इसे उचित स्थान मिला है। बेगम अख़्तर, मेंहदी हसन, ग़ुलाम अली, जगजीत सिंह आदि महान ग़ज़ल गायकों ने पिछले 50 वर्षों से ग़ज़ल की महान सेवा की है। ग़ज़ल गायकों ने इसे जन मानस तक पहुचाने का सरल व सस्ता माध्यम बने। ग़ज़ल के साहित्य परिवेश में आया परिवर्तन जहां ग़ज़ल के शैली को बदल गया वहीं उसके विषय, पाठक, ग़ज़ल गायकी का अंदाज़ व श्रोता भी बदलते चले गए। इतने बदलाओं के बावजूद अगर कुछ नही बदला या ऐसे जाने की जिसका जादू दिन दूना रात चौगना बढ़ता गया वो है ग़ज़ल। 
ग़ज़ल सदा जवान थी और सदा रहेगी....हाँ लिबास और अदाएं वक़्त के हिसाब से बदलेंगी और बदलनी भी चाहिए। जिससे नई पीढ़ी भी गयज़ल के लुत्फ जो उठा सके व अपना सके।

गज़ल के इतिहास, संरचना , प्रकार और बदलते तेवर पर आगे के पाठ्यक्रमों (modules) में चर्चा होगी........आनन्द कक्कड़

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