तसव्वुफ़
[tasavvuf]
[शब्दार्थ- सूफ़ीपन, mysticism, Sufism thelgy, Spiritualism
ब्रह्मवाद,
अध्यात्मवाद, मन की
सांसारिक विषयों से विरक्ति,
परहेज़गारी, वेदान्त]
लगता है कोई जल्वा-नुमा है चराग़ में
इक रंग रौशनी से जुदा है चराग़ में
लौ थरथराई थी कि मैं सज्दे में गिर पड़ा
इक वहम सा हुआ था ख़ुदा है चराग़ में
सीने में जगमगाता है दिल दिल में तेरा इश्क़
गोया कोई चराग़ रखा है चराग़ में
डट तो गया है तेज़ हवाओं के सामने
अब देखना है कितनी अना है चराग़ में
-सैयद अंसार
हम तसव्वुफ़ के हुए
आलिम तसव्वुफ़ छोड़
कर
दिल मोहब्बत से हुआ
ख़ाली तो दानिश#
आ गई
[ज्ञाता, विद्वान #अक्ल/ बुद्धि]
-फ़रहत एहसास
हम हैं हिन्दी
और हमारा मुल्क
है हिन्दोस्ताँ
हिन्द में पैदा
तसव्वुफ़ के ज़बाँ-दाँ* कीजिए
(*भाषा में निपुण/
expert)
-साहिर देहलवी
शाइ'र-ए-क़ौम पे
बन आई है
किज़्ब* कैसे हो
तसव्वुफ़ में निहाँ
(*lie, झूठ)
-फहमीदा रियाज़
जो कुछ है
अना में वो
टपकता है अना
से
कुछ आप से
मैं ज़िक्र-ए-
तसव्वुफ़ नहीं करता
-मुस्तफ़ा ख़ान शेफ्ता
लोबान के धुएँ
में तसव्वुफ़ के
ज़िक्र पर
पौदों की तरह
हिलते रहे अहल-ए-अंजुमन#
( *महफ़िल
के सब लोग )
-महमूद इश्की
अपनी छवि
बनाई के मैं
तो पी के
पास गई
जब छवि
देखी पीहू की
सो अपनी भूल
गई
- अमीर
खुसरो
खुसरो दरिया प्रेम का
सो उल्टी वाकी
धार,
जो उबरा सो
डूब गया, जो
डूबा सो पार........!
हर दरशन देहो
हर आस तुम्हारी,
कर किरपा लोच
पूर हमारी,
चकवी परीत सूरज
मुख लागै, मिल
प्यारे सब दुख
त्यागै.
इक ऎसी अदालत
है, जो रुह
परखती है,
महदूद नहीं रहती
वो सिर्फ़ बयानों
तक
अजनबी शहर के
अजनबी रास्ते, मेरी
तन्हाई पर मुस्कुराते
रहे,
मैं बहुत देर
तक यूं ही
चलता रहा, तुम
बहुत देर तक
याद आते रहे..!!
-डॉ राही मासूम
रज़ा
फिर मुरत्तब किए गए
जज़्बात
इश्क़ को इब्तिदा
में रक्खा गया
....!
कैसी अजीब
शर्त है दीदार
के लिए
आँखें जो बंद
हों तो वो
जल्वा दिखाई दे
बेकार महफ़िलों में तुझे
ढूँढ़ता हूँ मैं
- क़तील
शिफ़ाई
रोज़ गुनाह करता हूँ
,
वो छुपता है अपनी
रहमत से
में मजबूर अपनी आदत
से ,
वो मशहूर अपनी रहमत
से
वसीम' उस से
कहो दुनिया बहुत *महदूद है मेरी
किसी दर का
जो हो जाए
वो फिर दर
दर नहीं जाता..!
{*सीमित}
मुद्दतो
से लापता थे
हम जिंदगी
के कारवाँ में कहीं,
आज फुर्सत से बैठे
जरा
तो खुद से
मुलाकात हुई ...!!!
रंग ए तसव्वुफ़
को सवालात के
ज़रिये
मनन पर मजबूर
करती ग़ज़ल देखें
-अतहर
नफ़ीस
रौनक़-ए-बेश-ओ-कम
किस के होने
से है
मौसम-ए-खुश्क-ओ-नम
किस के होने
से है
किस का चेहरा
बनाती हैं ये
साअतें
वक़्त का ज़ेर-ओ-बम
किस के होने
से है
कौन गुज़रा कि बनते
गए रास्ते
राह का पेच-ओ-ख़म
किस के होने
से है
किस की ख़ातिर
दरीचों से आई
हवा
ये फ़ज़ा यूँ बहम
किस के होने
से है
शाख़-दर-शाख़
पत्तों की ये
ज़िंदगी
आज भी मोहतरम
किस के होने
से है
मौत बर-हक़
है किस के
न होने से
आज
ज़िंदगी दम-ब-दम किस
के होने से
है
किस की ज़ुल्फ़ों
का ए'जाज़
है बू-ए-गुल
ये हवाओं में नम
किस के होने
से है
सुब्ह-ए-शादाबी-ए-जाँ
का क्यूँ है
मलाल
इशरत-ए-शाम-ए-ग़म
किस के होने
से है
वहशत-ए-दिल
को किस ने
सँभाला दिया
ये जुनूँ कम से
कम किस के
होने से है
किस से मंसूब
है हर जफ़ा
हर वफ़ा
ये सितम ये
करम किस के
होने से है
हस्ती अपनी हुबाब
की सी है
।
ये नुमाइश सराब की
सी है ।।
नाज़ुकी उस के
लब की क्या
कहिए,
हर एक पंखुड़ी
गुलाब की सी
है ।
चश्म-ए-दिल
खोल इस आलम
पर,
याँ की औक़ात
ख़्वाब की सी
है ।
बार-बार उस
के दर पे
जाता हूँ,
हालत अब इज्तेराब
की सी है
।
मैं जो बोला
कहा के ये
आवाज़,
उसी ख़ाना ख़राब की
सी है ।
‘मीर’ उन नीमबाज़
आँखों में,
सारी मस्ती शराब की
सी है ।
तूने दीवाना बनाया तो
मैं दीवाना बना
अब मुझे होश
की दुनिया में
तमाशा न बना
- अज्ञात
ख़ुदा का मतलब
है ख़ुद
में आ तू
ख़ुद-आगही
है ख़ुदा-शनासी
ख़ुदा को ख़ुद
से जुदा समझ
कर
भटक रहा
है इधर उधर
क्यूँ
- आमिल
दरवेश
ख़ुसरव' रैन सुहाग
की जागी पी
के संग
तन मेरो मन
पीव को दोउ
भए एक रंग
खुली आँखों नज़र आता
नहीं कुछ
हर इक से
पूछता हूँ वो
गया क्या...
उदासी राह की
कुछ कह रही
है
मुसाफ़िर रास्ते में खो
गया क्या...
ख़ामोश सा शहर
और गुफ़्तगू की
आरज़ू
हम किससे करें बात,
कोई बोलता ही
नहीं
एक सन्नाटा बिछा है
इस जहाँ में
हर तरफ़
आसमाँ-दर-आसमाँ-दर-आसमाँ
क्यूँ रत-जगे
हैं
-अम्बर बहराईची
विरह का मारा
भटका जोगी
कमल पे भौरां
बन मंडराऊ
बाण हिय में
प्रीत को लागो
मिले सजन तो
राख हो जाऊं
मंगल को बजरंग-बली से
तेरा शुक्र मनाऊँ
और शुक्र को तू
अल्लाह से मेरा
मंगल माँगे..
वो भी क्या
दिन थे क्या
ज़माने थे
रोज़ इक ख़्वाब
देख लेते थे...
अब ज़मीं भी जगह
नहीं देती
हम कभी आसमाँ
पे रहते थे...
कस्तूरी कुन्डल बसे, मृग
ढूंढे बन माहिं।
ऐसे घट घट
राम हैं, दुनियां
देखे नाहिं।।
मैंने तन्हाई में जब
उन्हें पुकारा है
एक सदा आयी,
तू हमारा है
- अज्ञात
कह सके कौन
कि ये जल्वागरी
किस की है
पर्दा छोड़ा है वो
उस ने कि
उठाए न बने
मिर्ज़ा ग़ालिब
ज़ाहिर की आँख
से न तमाशा
करे कोई
हो देखना
तो दीदा-ए-दिल वा
करे कोई
तमाशा-ए-दैर-ओ-हरम
देखते हैं
तुझे हर बहाने
से हम देखते
हैं
सारी गली सूनसान
पडी थी बूँद-ए-फना
के पहरे मे
जुदाई के दालान
और आँगन मे
बस इक साया
जिंदा था
शायरी तलब अपनी
शायरी अता उस
की
हौसले से कम
माँगा ज़र्फ़ से
सिवा पाया
-साज़
जग में आ
कर इधर उधर
देखा
तू ही आया
नज़र जिधर देखा
किसको देखा उनकी
सूरत देखकर
जी में आता
है कि सज़दा
कीजिए
-आसी ग़ाज़ीपुरी
हम हैं कब
हम हैं बुतखाना
हम ही हैं
कायनात
होसके तो खुद
को भी एक
बार सज़दा कीजिये
- मजरूह सुल्तानपुरी
मुँह की बात
सुने हर कोई
दिल के दर्द
को जाने कौन
आवाज़ों के बाज़ारों
में ख़ामोशी पहचाने
कौन
सदियों सदियों वही तमाशा
रस्ता रस्ता लम्बी
खोज
लेकिन जब हम
मिल जाते हैं
खो जाता है
जाने कौन
वो मेरा आईना
है और मैं
उसकी परछाईं हूँ
मेरे ही घर
में रहता है
मुझ जैसा ही
जाने कौन
जाने क्या क्या
बोल रहा था
सरहद प्यार किताबें
ख़ून
कल मेरी नींदों
में छुप कर
जाग रहा था
जाने कौन
किरन किरन अलसाता
सूरज पलक पलक
खुलती नींदें
धीमे धीमे बिखर
रहा है ज़र्रा
ज़र्रा जाने कौन
=निदा फ़ाज़ली
वो निकहत के सिवा
पिन्हां,वो गुल
से भी सिवा
उरियां
ये हम हैं
जो कभी जल्वा
,कभी पर्दा समझते
हैं
-असग़र गोण्डवी
अर्ज़-ओ-समा
कहाँ तिरी वुसअत
को पा सके
मेरा ही दिल
है वो कि
जहाँ तू समा
सके
-ख़्वाजा मीर दर्द
सबकी नजरों मे हो
साक़ी ये ज़ुरूरी
है मगर
सबपे साक़ी की
नज़र हो ये
ज़ुरूरी तो नहीं
दिल-ए-हर-क़तरा
है साज़-ए-अनल-बहर
हम उस के
हैं हमारा पूछना
क्या
मुझे तो उनकी
इबादत पे रहम
आता है
जबीं के साथ
जो सजदों में
दिल न झुका
सके
-ख़ुमार बाराबंकवी
कश्तियाँ सब की
किनारे पे पहुँच
जाती हैं
नाख़ुदा जिन का
नहीं उन का
ख़ुदा होता है
ख़ुदा ऐसे एहसास
का नाम है
रहे सामने और दिखाई
न दे
-बशीर बद्र
थकना
भी लाज़मी था
कुछ काम करते
करते
कुछ और थक
गया हूँ आराम
करते करते !
आशिक़ी
से मिलेगा ऐ
ज़ाहिद
बंदगी से ख़ुदा
नहीं मिलता
जिसे पूजा था
हमने वो तो
ख़ुदा ना हो
सका
हम ही इबादत
करते-करते फ़कीर
हो गये
आता है जो
तूफ़ाँ आने दे
कश्ती का ख़ुदा
ख़ुद हाफ़िज़ है
मुमकिन है कि
उठती लहरों में
बहता हुआ साहिल
आ जाए
-बहज़ाद लखनवी
सरापा आरज़ू होने ने
बन्दा कर दिया
हमको
वगरना हम ख़ुदा
थे गर दिल
ए बेमुद्दआ होते
-GHALIB
न सवाल ए
वस्ल,न अर्ज़
ए ग़म,न
शिकायतें, न हिकायतें
तेरे अहद में
दिल ए ज़ार
के सभी अख़्तियार
चले गए
- फ़ैज़
पैग़ाम-ए-हयात-ए-जावेदाँ
था
हर नग़्मा-ए-कृष्ण
बाँसुरी का
~ हसरत मोहानी
बिखरा पड़ा है
तेरे ही घर
में तेरा वजूद
बेकार महफिलो में तुझे
ढूंढता हूँ मैं
जब कि तुझ
बिन नहीं कोई
मौजूद
फिर ये हंगामा
ऐ ख़ुदा क्या
है
तेरे क्या हुए
सबसे जुदा हो
गये
सूफी हो गये
हम तुम खुदा
हो गये
सुनता हूँ वे
लोग बड़े हैं,जो गीता
और वेद पढ़े
हैं,
हमने पूरी रामायण
में शबरी के
दो बेर पढ़े
हैं..
न था कुछ
तो ख़ुदा था,कुछ न
होता तो ख़ुदा
होता
डुबोया मुझको होने ने,
न होता मैं
तो क्या होता।
मुझ को
ख़्वाहिश ही ढूँडने
की न थी
मुझ
में खोया रहा ख़ुदा मेरा
जौन एलिया
गुनाह गिन के
मैं क्यूँ अपने
दिल को छोटा
करूँ
सुना है तेरे
करम का कोई
हिसाब नहीं
-यगाना चंगेज़ी
मुझको ख़ुद से
जुदा न होने
दो
बात ये है
मैं अपने बस
का नहीं!!.
जौन एलिया
ख़ुद को बिखरते
देखते हैं कुछ
कर नहीं पाते
हैं
फिर भी लोग
ख़ुदाओं जैसी बातें
करते हैं
-इफ़्तिख़ार
आरिफ़
आग है पानी
है मिट्टी है
हवा है मुझ
में
और फिर मानना
पड़ता है ख़ुदा
है मुझ में
अब तो ले
दे के वही
शख़्स बचा है
मुझ में
मुझ को मुझ
से जो जुदा
कर के छुपा
है मुझ में
जितने मौसम हैं
सभी जैसे कहीं
मिल जाएँ
इन दिनों कैसे बताऊँ
जो फ़ज़ा है
मुझ में
आइना ये तो
बताता है मैं
क्या हूँ लेकिन
आइना इस पे
है ख़ामोश कि
क्या है मुझ
में
अब तो बस
जान ही देने
की है बारी
ऐ 'नूर'
मैं कहाँ तक
करूँ साबित कि
वफ़ा है मुझ
में
हम तुझ से
किस हवस की
फ़लक जुस्तुजू करे
दिल ही नहीं
रहा है कि
कुछ आरज़ू करें
मिट जाएँ एक
आन में कसरत-नुमाइयाँ
हम आइने के
सामने जब आ
के हू करें
तर-दामनी पे शैख़
हमारी न जाइयो
दामन निचोड़ दें तो
फ़रिश्ते वुज़ू करें
सर-ता-क़दम
ज़बान हैं जूँ
शम्अ गो कि
हम
पर ये कहाँ
मजाल जो कुछ
गुफ़्तुगू करे
हर-चंद आइना
हूँ पर इतना
हूँ ना-क़ुबूल
मुँह फेर ले
वो जिस के
मुझे रू-ब-रू करें
ने गुल को
है सबात न
हम को है
ए'तिबार
किस बात पर
चमन हवस-ए-रंग-ओ-बू करें
है अपनी ये
सलाह कि सब
ज़ाहिदान-ए-शहर
ऐ 'दर्द' आ के
बैअ'त-ए-दस्त-ए-सुबू करें
ख़्वाजा मीर दर्द
हज़ार दर्द शब-ए-आरज़ू
की राह में
है
कोई ठिकाना बताओ कि
क़ाफ़िला उतरे
क़रीब और भी
आओ कि शौक़-ए-दीद
मिटे
शराब और पिलाओ
कि कुछ नशा
उतरे
यूँ ज़िंदगी से कटता
रहा जुड़ता भी
रहा
बच्चा खेलाए जैसे कोई
माँ उछाल के
-नूर
तेरी इनायतों का अजब
रंग ढंग था
तेरे हुज़ूर पा-ए-क़नाअत में लंग
था
सहरा को रौंदने
की हवस पा-ब-गिल
है अब
यूँ था कभी
कि दामन-ए-आफ़ाक़ तंग था
दामन को तेरे
थाम के राहत
बड़ी मिली
अब तक मैं
अपने आप से
मसरूफ़-ए-जंग
था
हँगाम-ए-याद
दिल में न
आहट न दस्तकें
शोरिश-कदे में
रात ख़मोशी का
रंग था
तू आया लौट
आया है गुज़रे
दिनों का नूर
चेहरों पे अपने
वर्ना तो बरसों
का ज़ंग था
रक़्स-ए-जुनूँ
में भी था
तरीक़-ए-हुनर
का ढब
सूफ़ी-ए-बा-सफ़ा था
कोई या मलंग
था
क्या आसमाँ उठाते मोहब्बत
में जब कि
दिल
तार-ए-निगह
में उलझी हुई
इक पतंग था
-अमीर हम्ज़ा साक़िब
जाने क्यूँ रंग-ए-बग़ावत नहीं छुपने
पाता
हम तो ख़ामोश
भी हैं सर
भी झुकाए हुए
हैं
~ सहर अंसारी
काम सब ग़ैर-ज़रूरी हैं जो
सब करते हैं
और हम कुछ
नहीं करते हैं
ग़ज़ब करते हैं
आप की नज़रों
में सूरज की
है जितनी अज़्मत
हम चराग़ों का भी
उतना ही अदब
करते हैं
हम पे हाकिम
का कोई हुक्म
नहीं चलता है
हम क़लंदर हैं शहंशाह
लक़ब करते हैं
देखिए जिस को
उसे धुन है
मसीहाई की
आज कल शहर
के बीमार मतब
करते हैं
ख़ुद को पत्थर
सा बना रक्खा
है कुछ लोगों
ने
बोल सकते हैं
मगर बात ही
कब करते है
एक इक पल
को किताबों की
तरह पढ़ने लगे
उम्र भर जो
न किया हम
ने वो अब
करते हैं
बंदगी हम
ने छोड़ दी है
'फ़राज़'
क्या करें लोग
जब ख़ुदा हो
जाएँ
यहाँ मरने का
मतलब सिर्फ पैरहन
बदलना है !
यहाँ इस
पर जो डूबे
वहां उस पर
ज़िंदा है !!
- अनवर जलालपुरी
खुली छतो के
दिए कब के बुझ
गये होते !
कोई
तो है
जो हवाओं के
पर कतरता है !!
वसीम बरेलवी
कोई पूछेगा जिस दिन
वाक़ई ये ज़िंदगी
क्या है !
ज़मीं से
एक मुट्ठी खाक
लेकर हम उड़ा
देंगें !!
अनवर जलालपुरी
यहाँ मरने का
मतलब सिर्फ पैरहन
बदलना है !
यहाँ इस
पार जो डूबे
वहां उस पर
ज़िंदा है !!
अनवर जलालपुरी
क़ुबूल हो कि
न हो सज्दा
ओ सलाम अपना
तुम्हारे बंदे हैं
हम बंदगी है
काम अपना
-मुबारक अज़ीमाबादी
दिल है क़दमों
पर किसी के
सर झुका हो
या न हो
बंदगी तो अपनी
फ़ितरत है ख़ुदा
हो या न
हो
-जिगर मुरादाबादी
बंदगी का मिरी
अंदाज़ जुदा होता
है
मेरा काबा मेरे
सज्दों में छुपा
होता है
-अज्ञात
यही है ज़िंदगी
अपनी यही है
बंदगी अपनी
कि उन का
नाम आया और
गर्दन झुक गई
अपनी
-माहिर-उल क़ादरी
जवाज़* कोई अगर
मेरी बंदगी का
नहीं
मैं पूछता हूँ तुझे
क्या मिला ख़ुदा
हो कर
[*औचित्य]
-शहज़ाद अहमद
क़ुबूल हो कि
न हो सज्दा
ओ सलाम अपना
तुम्हारे बंदे हैं
हम बंदगी है
काम अपना
-मुबारक अज़ीमाबादी
यही है
इबादत यही दीन
ओ ईमां
कि काम आए
दुनिया में इंसां
के इंसां
आता है
जो तूफ़ाँ आने
दे कश्ती का
ख़ुदा ख़ुद हाफ़िज़
है
मुमकिन है कि
उठती लहरों में
बहता हुआ साहिल
आ जाए
साया न उन
के साथ जो
देखा गया कभी
हम जैसे आसियों
के सरों पर
रहा सदा
[आसियों का अर्थ है पापी or दोषी]
-फ़ैयाज़ वज़ीराबादी
ये भी मेरे
लिए इबादत है
रास्तों में दिए
जलाता हूँ
-सरदार पंछी
तर-दामनी पे शैख़
हमारी न जाइयो
दामन निचोड़ दें तो
फ़रिश्ते वुज़ू करें
[तर दामनी- गीला दामन
कपड़ा,
वज़ू- नमाज़ पढ़ने से पहले
हाथ-मुँह धोने
का क्रिया]
लिखता हूँ इसलिए
कि ,उन को
खबर मिल जाए..
जवाब आए तो
उन की खबर
मिल जाए...!!
रुखे रोशन
का रोशन एक
पहलू भी
नहीं निकला
जिसे मे चांद समझा
था वो जुगनु
भी नही निकला
मेरी खुशियों को मुझमे
ही सिसकते देखा
है।
उसने हर रात
मेरी आँखों को
बरसते देखा है।
इस चाँद की
बेबसी भी मेरे
जैसी ही है
शायद।।
लाखों तारों मे मैने
इसको भी तरसते
देखा है।।
वाकिफ़ तो हम
भी हैं मशहूर
होने के तौर
तरीकों से,
पर ज़िद तो
हमें अपने अंदाज
से जीने की
है !!
बिखरा पड़ा है
तेरे ही घर
में तिरा वजूद
बेकार महफ़िलों में तुझे
ढूँढ़ता हूँ मैं
- क़तील शिफ़ाई
यार को हम
ने जा बजा
देखा
कहीं ज़ाहिर कहीं छुपा
देखा
- नियाज़ बरेलवी
इश्क़ महसूस करना भी
इबादत से कम
नहीं,
ज़रा बताइये, छू कर
खुदा को किसी
ने देखा हैं?
ख़ुदा का मतलब
है ख़ुद में
आ तू ख़ुद-आगही है
ख़ुदा-शनासी
ख़ुदा को ख़ुद
से जुदा समझ
कर भटक रहा
है इधर उधर
क्यू
- आमिल दरवेश
अब इस का
चारा ही क्या
कि अपनी तलब
ही ला-इंतिहा
थी वर्ना
वो आँख जब
भी उठी है
दामान-ए-दर्द
फूलों से भर
गई है
- ज़िया जालंधरी
धूप में निकलो
घटाओं में नहा
कर देखो
ज़िंदगी क्या है
किताबों को हटा
कर देखो
सिर्फ़ आँखों से ही
दुनिया नहीं देखी
जाती
दिल की धड़कन
को भी बीनाई
बना कर देखो
पत्थरों में भी
ज़बाँ होती है
दिल होते हैं
अपने घर के
दर-ओ-दीवार
सजा कर देखो
वो सितारा है चमकने
दो यूँही आँखों
में
क्या ज़रूरी है उसे
जिस्म बना कर
देखो
फ़ासला नज़रों का धोका
भी तो हो
सकता है
वो मिले या
न मिले हाथ
बढ़ा कर देखो
निदा फ़ाज़ली
नमाज़ शुक्र की पढ़ता
है जाम तोड़
के शैख़
वज़ू के वास्ते
लेता है आबरू-ए-शराब
काग़ज़ काग़ज़ हर्फ़
सजाया करता है,
तन्हाई में शहर
बसाया करता है,
कैसा पागल शख्स
है सारी-सारी
रात,
दीवारों को दर्द
सुनाया करता है,
रो देता है
आप ही अपनी
बातों पर,
और फिर खुद
को आप हंसाया
करता है।
तुझी पर कुछ
ऐ बुत नहीं
मुनहसिर
जिसे हम ने
पूजा ख़ुदा कर
दिया
[मुनहसिर=विशेषण,आश्रित, अवलंबित]
खोने की दहशत
और पाने की
चाहत न होती,
तो ना ख़ुदा
होता कोई और
न इबादत होती.
तू मेरे सज्दों
की लाज रख
ले शुऊर-ए-सज्दा नहीं है
मुझ को
ये सर तिरे
आस्ताँ से पहले
किसी के आगे
झुका नहीं है
ये इबादत
है इबादत में
सियासत कैसी
इस में का'बा या
कलीसा नहीं देखा
जाता
लौ थरथराई
थी कि मैं
सज्दे में गिर
पड़ा
इक वहम सा
हुआ था ख़ुदा
है चराग़ में
जो आँसुओं को न
चमकाए वो ख़ुशी
क्या है
न आए मौत
पे ग़ालिब तो
ज़िंदगी क्या है
हमें ख़बर है
न अपनी न
अहल-ए-दुनिया
की
कोई बताए ये
अंदाज़-ए-बे-ख़ुदी क्या है
मैं साथ देता
हूँ यारों का
हद्द-ए-मंज़िल
तक
मैं जानता नहीं दस्तूर-ए-रह-रवी क्या
है
तिरे ख़याल में दिन-रात मस्त
रहता हूँ
ये बंदगी जो नहीं
है तो बंदगी
क्या है
तिरे करम से
मयस्सर है दौलत-ए-कौनैन
तिरा करम है
जभी तक मुझे
कमी क्या है
नए पुराने नशेमन सभी
जला कर अब
निगाह-ए-बर्क़
खड़ी दूर ताकती
क्या है
किसी की चश्म-ए-करम
आप पर नहीं
तो क्यूँ
ये ख़ुद से
पोछिए किरदार में
कमी क्या है
न आई जागती
आँखों के दाएरे
में कभी
ये बद-नसीब
का इक ख़्वाब
है ख़ुशी क्या
है
जो बात कहता
हूँ करते हैं
उस पे हर्फ़-ज़नी
ये दोस्ती है तो
अंदाज़-ए-दुश्मनी
क्या है
क़दम क़दम पे
किए 'चर्ख़' ज़िंदगी
ने मज़ाक़
समझ में आ
न सका क़स्द-ए-ज़िंदगी
क्या है
इश्क़ महसूस करना भी
इबादत से कम
नहीं,
ज़रा बताइये, छू कर
खुदा को किसी
ने देखा हैं?
शिकवा करने गये
थे और इबादत
सी हो गई,
तुझे भुलाने
की जिद्द, अब
तेरी आदत सी
हौ गई..!!
ये ज़रूरी
है कि आँखों
का भरम क़ाएम
रहे
नींद रक्खो या न
रक्खो ख़्वाब मेयारी
रखो
फिर से निकले
हैं तलाश_ए
बंदगी में रोज़े_दार बन
कर..,,
दुआ करना इस
बार हमें रज़ा_ए_ईलाही
मिल जाए..!!
ज़ाहिर की आँख
से न तमाशा
करे कोई
हो देखना तो दीदा-ए-दिल
वा करे कोई
-अल्लामा इक़बाल
दरिया से मौज
मौज से दरिया
जुदा नहीं
हम से जुदा
नहीं है ख़ुदा
और ख़ुदा से
हम
हैरान हूँ तेरा
इबादत में झुका
सर देखकर..,
ऐसा भी क्या
हुआ जो खुदा
याद आ गया….
क़ुर्बतें लाख ख़ूब-सूरत हों
दूरियों में भी
दिलकशी है अभी
- #अहमद फ़राज़
दूरी हुई तो
उस के क़रीं
और हम हुए
ये कैसे फ़ासले
थे जो बढ़ने
से कम हुए
- #अज्ञात
मोहब्बत की तो
कोई हद, कोई
सरहद नहीं होती
हमारे दरमियाँ ये फ़ासले,
कैसे निकल आए
- #ख़ालिद मोईन
भला हम मिले
भी तो क्या
मिले वही दूरियाँ
वही फ़ासले
न कभी हमारे
क़दम बढ़े न
कभी तुम्हारी झिजक
गई
- #बशीर बद्र
बहुत अजीब है
ये क़ुर्बतों की
दूरी भी
वो मेरे साथ
रहा और मुझे
कभी न मिला
- #बशीर बद्र
वो नहीं आएगा
इस महफ़िल में
दूर ही दूर
से सुनता होगा
- #जमीलुद्दीन
आली
मसअला ये है
कि उस के
दिल में घर
कैसे करें
दरमियाँ के फ़ासले
का तय सफ़र
कैसे करें
- #फ़र्रुख़ जाफ़री
फ़ासले ऐसे कि
इक उम्र में
तय हो न
सकें
क़ुर्बतें ऐसी कि
ख़ुद मुझ में
जनम है उस
का
- #बाक़र मेहदी
उसे ख़बर है
कि अंजाम-ए-वस्ल क्या
होगा
वो क़ुर्बतों की तपिश
फ़ासले में रखती
है
- #ख़ालिद यूसुफ़
कितने शिकवे गिले हैं
पहले ही
राह में फ़ासले
हैं पहले ही
- #फ़ारिग़ बुख़ारी
जो पहले रोज़
से दो आँगनों
में था हाइल
वो फ़ासला तो ज़मीन
आसमान में भी
न था
- #जमाल एहसानी
बड़ी कश्मकश है मौला
, थोड़ी रहमत कर
दे,
या तो
ख़्वाब ना दिखा
, या उसे मुकम्मल
कर दे .
कर खुदा की
इबादत भी तू
कुछ इस तरह..
कि तेरा रोज़ा
किसी भूखे को
निवाला दे दे...
कुछ अमल भी
ज़ुरूरी है इबादत
के बाद
सिर्फ सज़दा करने
से जन्नत नही
मिलती
ठंडक
मिली जब रातों
में चराग़ मिले।
बर्फ़ है उसमें
या आग है
चराग़ में।।
virendar singh
दरिया से मौज
मौज से दरिया
जुदा नहीं
हम से जुदा
नहीं है ख़ुदा
और ख़ुदा से
हम
लाइलाजी ही जो
रहती है हमें
आवारगी
कीजिए क्या मीर
साहब,बन्दगी बेचारगी
खुला है झूठ
का बाज़ार आओ
सच बोलें
न हो बला
से ख़रीदार आओ
सच बोलें
क़तील शिफ़ाई
आँखों मे मेरी
ठहरो या दिल
मे उतर जाओ..
घर दोनो
तुम्हारे है तुम
चाहे जिधर जाओ..
क्या कम उस
ख़ुर्शीद रू की
जुस्तजू यारों ने की
लोहू रोते जूं
शफ़क़ पूरब गये
पच्छम गये
किसको मिला जहान
और किसको ख़ुदा
मिला
बर्क़-ए-फ़ना
में हर कोई
ख़ुद से जुदा
मिला
बहुत ख़ामोश होकर हम
उसे देखते हैं,
कहते हैं इबादत
में बोला नहीं
करते हैं!
कोई ख़ुदा हो कि
पथ्थर, जिसे भी
हम चाहें
तमाम उम्र उसी
की इबादतें करनी
सब अपने अपने
क़रीने से मुन्तज़िर
उसके
किसी को शुक्र,किसी को
शिकायतें करनी
हर हक़ीक़त मजाज़ हो
जाये
काफ़िरों की नमाज़
हो जाये
मिन्नत-ए-चारासाज़
कौन करे
दर्द जब जाँ
नवाज़ हो जाये
काश अफ़्शा-ए-राज़
हो जाये.
[अफ़शा ए राज़ = रहस्य
का प्रकटीकरण]
कुछ अमल भी
ज़ुरूरी है इबादत
के बाद
सिर्फ सज़दा करने
से जन्नत नही
मिलती
बे-ज़रूरत भी कर
लिया सज्दा
ये इबादत बड़ी इबादत
है
-सुशील कुमार
इबादत वो है
जिसमें ज़ुरूरतों का ज़िक्र
न हो
सिर्फ और सिर्फ
उसकी रहमतों का
ज़िक्र हो
खुला है झूठ
का बाज़ार आओ
सच बोलें
न हो बला
से ख़रीदार आओ
सच बोलें
यही है मौक़ा-ए-इज़हार
आओ सच बोलें
हमें गवाह बनाया
है वक़्त ने
अपना
ब-नाम-ए-अज़मत-ए-किरदार
आओ सच बोलें
सुना है वक़्त
का हाकिम बड़ा
ही मुंसिफ़ है
पुकार कर सर-ए-दरबार
आओ सच बोलें
तमाम शहर में
क्या एक भी
नहीं मंसूर
कहेंगे क्या रसन-ओ-दार आओ सच
बोलें
बजा के ख़ू-ए-वफ़ा एक भी
हसीं में नहीं
कहाँ के हम
भी वफ़ा-दार
आओ सच बोलें
जो वस्फ़ हम में
नहीं क्यूँ करें
किसी में तलाश
अगर ज़मीर है बेदार
आओ सच बोलें
छुपाए से कहीं
छुपते हैं दाग़
चेहरे के
नज़र है आईना
बरदार आओ सच
बोलें
'क़तील' जिन पे
सदा पत्थरों को
प्यार आया
किधर गए वो
गुनह-गार आओ
सच बोलें
-'क़तील'
वो बड़ा रहीम
ओ करीम है
मुझे ये सिफ़त
भी अता करे
तुझे भूलने की दुआ
करूँ तो मिरी
दुआ में असर
न हो
जो अगर रक़्स
है मिज़ाज तेरा...।
तो सूफियाना है अंदाज
मेरा.....
बाक़ी ही क्या
रहा है तुझे
माँगने के बाद
बस इक दुआ
में छूट गए
हर दुआ से
हम
उसे पाक नज़रों
से चूमना भी
इबादतों में शुमार
है
कोई फूल लाख
क़रीब हो कभी
मैं ने उस
को छुआ नहीं
-बशीर बद्र
तुमसे नहीं तेरे
अंदर बैठे खुदा
से मोहब्बत है
मुझे..
तू तो बस
एक ज़रिया है
मेरी इबादत का…
अच्छा यकीं नहीं
तो किश्ती डूब
के देख
एक तू ही
नाख़ुदा नही ज़ालिम
खुदा भी है
मिरी तस्बीह के दाने
हैं ये
भोली सूरतों वाले
निगाहों में फिराता
हूँ इबादत होती
जाती है
हैरत से देखता
हुआ चेहरा किया
मुझे
सहरा किया कभी
कभी दरिया किया
मुझे
कुछ तो इनायतें
हैं मिरे कारसाज़
की
और कुछ मिरे
मिज़ाज ने तन्हा
किया मुझे
अकरम नक़्काश
फ़साद ए दुनिया
मिटा चुके हैं
हुसूले हस्ती उठा चुके
हैं ।
ख़ुदाई अपने में
पा चुके हैं
मुझे गले यह
लगा चुके हैं
।।
मैं कैसे और
किस सम्त मोड़ता
ख़ुद को
किसी की चाह
न थी दिल
में तेरी चाह
के बाद
- नूर
तुमसे नहीं तेरे
अंदर बैठे खुदा
से मोहब्बत है
मुझे..
तू तो बस
एक ज़रिया है
मेरी इबादत का…
यही है इबादत
यही दीन ओ
ईमां
कि काम आए
दुनिया में इंसां
के इंसां
- अल्ताफ़ हुसैन हाली
उसे पाक नज़रों
से चूमना भी
इबादतों में शुमार
है
कोई फूल लाख
क़रीब हो कभी
मैं ने उस
को छुआ नहीं
-बशीर बद्र
तू गया नमाज़ों
में मैं गया
जवाज़ों में
वो तेरी इबादत
थी ये मेरी
इबादत है
- नाज़िम नक़वी
कब तक रहेगा
रूह पे पैराहन-ए-बदन
कब तक हवा
असीर रहेगी हुबाब
में
[असीर = क़ैद ; हुबाब = बुलबुला]
जीने के साथ
मौत का डर
है लगा हुआ
ख़ुश्की दिखाई दी है
समन्दर को ख़्वाब
में
[ख़ुश्की =
सुखापन]
एक याद है
कि छीन रही
है लबों से
जाम
एक अक्स है
कि काँप रहा
है शराब में
तिरे लिए तो
झुकाना भी सर
इबादत है
अगर झुका न
सके दिल तो
बंदगी क्या है
- असग़र वेलोरी
न मय-कशी
न इबादत हमारी
आदत है
कि सामने कोई काम
आ गया तो
कर लेना..
कोई ख़ुदा हो कि
पत्थर जिसे भी
हम चाहें
तमाम उम्र उसी
की इबादतें करनी
-अहमद फ़राज़
मोहब्बत मेरी क्या
इबादत नहीं है
!
वो इक नूर
है जिसकी सूरत
नहीं है..
हम बुतों से जो
प्यार करते हैं,
नक्ल -ए- परवरदिगार
करते हैं..
मैं अँधेरे में रहूँ
या मैं उजाले
में रहूँ
ऐसा लगता है
कोई देख रहा
है यारो
Krishan bihari Noor
जिसे पूजा था
हमने वो तो
ख़ुदा ना हो
सका
हम ही इबादत
करते-करते फ़कीर
हो गये ..
आशिक़ी से मिलेगा
ऐ ज़ाहिद
बंदगी से ख़ुदा
नहीं मिलता
-दाग़ देहलवी
दिखाई दे न
कभी ये तो
मुम्किनात में है
वो सब वजूद
में है जो
तसव्वुरात में है
मैं जिस हुनर
से हूँ पोशीदा
अपनी ग़ज़लों में
उसी तरह वो
छुपा सारी काएनात
में है
नज़र के ज़ाविए
बदले है और
कुछ भी नहीं
वही है का'बे में
जो 'नूर' सोमनाथ
में है.
तेरे पास में
बैठना भी इबादत
तुझे दूर से
देखना भी इबादत….
न माला, न मंतर,
न पूजा, न
सजदा
तुझे हर घड़ी
सोचना भी इबादत….
हम ने
रोती हुई आँखों
को हसाया है
सदा,
इस से बेहतर
इबादत तो नहीं
होगी हमसे।
खोने की दहशत
और पाने की
चाहत न होती,
तो ना ख़ुदा
होता कोई और
न इबादत होती.
ये दुनिया नफ़रतों के
आख़री स्टेज पे
है
इलाज इस का
मोहब्बत के सिवा
कुछ भी नहीं
है
- चरण सिंह बशर
जवाज़ कोई अगर
मेरी बंदगी का
नहीं
मैं पूछता हूँ तुझे
क्या मिला ख़ुदा
हो कर
शाहों
की बंदगी में
सर भी नहीं
झुकाया
तेरे लिए सरापा
आदाब हो गए
हम
उसे पाक नज़रों
से चूमना भी
इबादतों में शुमार
है
कोई फूल लाख
क़रीब हो कभी
मैं ने उस
को छुआ नहीं
-बशीर बद्र
बे-ज़रूरत भी कर
लिया सज्दा
ये इबादत बड़ी इबादत
है
उस की याद
आई है साँसो
ज़रा आहिस्ता चलो
धड़कनों से भी
इबादत में ख़लल
पड़ता है
मुहब्बत शोर है,
तो, शोर मत
कर
इबादत है अगर,
कुछ, और मत
कर….
नज़ाकत से, नफ़ासत
से, निभाना
ये कच्ची डोर है,
तू जोर मत
कर
जुबानी इबादत ही….काफी
नहीं.
‘खुदा’ सुन रहा
है..खयालात भी..
ख़ौफ़-ए-दोज़ख़
से कभी ख़्वाहिश-ए-जन्नत
से कभी
मुझ को इस
तर्ज़-ए-इबादत
पे हँसी आती
है..
इबादतखानो में क्या
ढूढते हो मुझे..
मैं वहॉ भी
हूॅ जहॉ तुम
गुनाह करते हो..
इलाज ना ढूंढ
तू इश्क का
वो होगा ही
नहीं..
इलाज मर्ज का
होता है इबादत
का नहीं..
यह शेअर इस
तरह से है
मुर्शिद की याद
आयी है
बुतों को पूजने
वालों को क्यूँ
इल्ज़ाम देते हो
डरो उस
से कि जिस
ने उन को
इस क़ाबिल बनाया
है
मख़मूर सईदी
जब भी मुझे
पड़ी ज़रूरत वो
चाह दिखाता है,
मेरे अन्दर ही है
खुदा मेरा मुझे
राह दिखाता है!
रौशन कुमार
दीदार की तलब
के तरीक़ों से
बे-ख़बर
दीदार की तलब
है तो पहले
निगाह माँग
आज़ाद अंसारी
फ़रमाते थे करता
हूँ इबादत में
इबादत
रौशन हो न
क्यूँ चश्म-ए-हुसैन इब्न-ए-अली ..
सामने है जो
उसे लोग बुरा
कहते हैं
जिस को देखा
ही नहीं उस
को ख़ुदा कहते
हैं
हम हैं
काबा हम हैं
बुत-ख़ाना हमीं
हैं काएनात
हो सके तो
ख़ुद को भी
इक बार सज्दा
कीजिए
- मजरूह
सुल्तानपुरी
मुझे तो उन
की इबादत पे
रहम आता है
जबीं के साथ
जो सज्दे में
दिल झुका न
सके
- ख़ुमार बाराबंकवी
प्यार में वह
पल बहुत खूबसूरत
होता है,
जब देखना इबादत और
छूना गुनाह लगता
है
जब सफीना मौज से
टकरा गया
नाख़ुदा को भी
खुद याद आ
गया
-फ़ना कानपुरी
उसी ने चाँद
के पहलू में
इक चिराग रखा
उसी ने दश्त
के ज़र्रों को
आफताब किया
-फ़हीम शनै काज़मी
वही रखेगा मेरे घर
को बलाओं से
महफूज,
जो शजर से
घोसला गिरने नहीं
देता।
कौन जाने रूनुमा
हूँ कौन सी
जानिब से वो
इस लिए सज्दे
पे सज्दा चार-सू करते
रहे
{Tumane=appear}
हम ने रोती
हुई अॉखौ को
हसाया है सदा,
इस से
बेहतर इबादत तो
नहीं होगी हमसे।
सलीका ही नहीं
शायद उसे महसूस
करने का,
जो कहता है
ख़ुदा है तो
नजर आना जरूरी
है।
वसीम
आदम को
मत खुदा कहो
आदम खुदा नही,
लेकिन खुदा के
नूर से आदम
जुदा नहीं।
इबादतखानों में क्या
ढूंढते हो मुझे,
मैं वहाँ भी
हूँ, जहाँ तुम
गुनाह करते हो।
रहमत तेरी मोहताज
है मेरे गुनाहों
की,
मेरे बिना तू
भी खुदा हो
नहीं सकता।
इतना ख़ाली
था अंदरूँ मेरा
कुछ दिनों तो ख़ुदा
रहा मुझ में
जौन एलिया
तुमसे नहीं तेरे
अंदर बैठे खुदा
से मोहब्बत है
मुझे,
तू तो
फ़क़त एक ज़रिया
है मेरी इबादत का!!.
इलाज ना ढ़ूॅढ़
इश्क का वो होगा ही
नहीं,
इलाज मर्ज़ का होता
है, इबादत का नहीं
पहले खुशी..फिर ज़िद्द...फिर आदत
बन जाता है...
इश्क अौर निखर
जाता है जब
इबादत बन जाता
है
जो चाहिए सो माँगिये
अल्लाह से 'अमीर'
उस दर पर
आबरू नही जाती
सवाल से
अमीर मीनाई
ज़िन्दगी कहते हैं
जिस को चार
दिन की बात
है
बस हमेशरहने वाली एक
खुदा की जात
है
खुदा को भूल
गए लोग फ़िक्र-ए-रोज़ी
में,
तलाश रिज्क की है
राजिक का ख़याल
नहीं।
कुछ अमल भी
जरुरी है इबादत
के बाद,
सिर्फ सजदा करने
से जन्नत नहीं
मिलती !!!
ज़रा ये धूप
ढल जाए तो
उन का हाल
पूछेंगे,
यहाँ
कुछ साए अपने
आप को खुदा
बताते हैं.
नीचे आ
गिरती है हर
बार दुआ मेरी,
पता नहीं कितनी
ऊचाई पर खुदा
रहता हैं.
सुनकर ज़माने की
बातें, तू अपनी
अदा मत बदल,
यकीं
रख अपने खुदा
पर, यूँ बार
बार खुदा मत
बदल.
हर ज़र्रा चमकता है
अनवर ए इलाही
से
हर सांस ये
कहती है हम
हैं तो ख़ुदा
भी है
- अकबर इलाहाबादी
ऐ ख़ुदा मैंने
सुना है तू
सबका मालिक है..!!
फिर अमीरी ही गरीबों
की परश्तिश क्यूँ
है..??
तेरे चाहे बिना
एक पत्ता हिल
नहीं सकता..!!
तेरे बन्दे अपनी मर्ज़ी
के मुताल्लिक क्यूँ
है..??
तेरी ताकत-ओ-हुकूमत को करें
सब सजदे..!!
फिर मज़लूमों पे बेरहमी
की बारिश क्यूँ
है..??
तूने हर दिल
में जलाए हैं
मोहब्बत के चराग़..!!
नफरत ओ ख़ार
की हर ज़ुबाँ
पे आतिश क्यूँ
है..??
बिन सुनाए भी तू
सुनता है सदाएँ
सबकी..!!
फिर तेरे दर
पे मन्नतों की
मज़लिश क्यूँ है..??
तेरा पैग़ाम चैन-ओ-अमन की
ख़ातिर है गर..!!
हर एक शख़्श
के दिल में
इतनी रंजिश क्यूँ
है..??
हजारों रूपों में मौजूद
जब तू हर
सू है..!!
मज़हबों और रिवाज़ों
की ये बंदिश
क्यूँ है..??
तेरी नज़र में
बराबर है अग़र
हर आदम..!!
रहमतों से तेरी
महरूम हर मुख़्लिस
क्यूँ है..??
जब हक़ीक़त है के
हर ज़र्रे में
तू रहता है..!!
फिर ज़मीं पर
कहीं मंदिर कहीं
मस्ज़िद क्यूँ है..??
तू मिटा सकता
है दुनिया से
हर बदी बेशक़..!!
फिर भी मग़रूर
तमाशाई-सी ज़िद
क्यूँ है..??
"तितिक्षा
नन्ही"
ख़ुदा
से माँग जो
कुछ मांगना है
ऐ "अकबर'
यही वो दर
है कि
ज़िल्लत नहीं सवाल
के बाद...........!
अकबर इलाहाबादी
कुछ
फर्क नहीं इश्क़
ओ इबादत में
ऐ हुज़ूर..!!
गर पाक़ मोहब्बत
हो तो महबूब
ख़ुदा है...!!
सर झुकता है सजदे
में दिल पहलू
में सदा..!!
अंजाम आख़री वही अंदाज़
जुदा है..!!
"तितिक्षा
नन्ही"
कैसे संभाल रक्खा हैं
एक जात में
इसे !
शश्तर हूँ क़ायनात
के कुल बंदोबस्त
पर
परवेज़ साहिर
[हैरान, हक्का बक्का]
दिन को
धूप में
चलना, शब में
मोम सा जलना,
बस यही कहानी
हैं !
हम फ़क़ीर लोगों
के, फूल से लड़कपन
की, धूल सी जवानी
हैं !!
अनवर जलालपुरी
गुलों के बीच
में मनिंदे खार
मैं भी था
!
फ़क़ीर ही था
मगर शानदार मैं
भी था !!
अनवर जलालपुरी
बहुत खूब
मोहब्बत कर सकते
हो तो खुदा
से करो,
मिट्टी के खिलौनों
से कभी वफ़ा
मिलती नहीं।
मिट जाये गुनाहों
का तसव्वुर ही
जहां से,
अगर हो जाये
यकीन के खुदा
देख रहा है।
बिखरा पड़ा है
तेरे ही घर
में तिरा वजूद
बेकार महफ़िलों में तुझे
ढूँढ़ता हूँ मैं
- क़तील शिफ़ाई
उदास रहती हैं
मुझ में सदाक़तें
मेरी
मैं लब-कुशाई
में ताख़ीर करता
रहता हूँ
बदलता रहता हूँ
गिरते हुए दर-ओ-दीवार
मकान-ए-ख़स्ता
में ता'मीर करता रहता हूँ
..
-SalimAnsari
अपने शहर में
ऐसे बेगाने हम
न थे
थे लोग बहुत
जाने पहचाने कम
न थे
मिलते थे गर्मजोशी
से बाहें उछाल
कर
अपने भी दोस्तों में दीवाने
कम न थे
~ओम निश्चल
ख्याल
में आता है
जब भी उसका
चेहरा;
तो लबों पे
अक्सर फरियाद आती
है;
भूल जाता हूँ
सारे ग़म और
सितम उसके;
जब ही उसकी
थोड़ी सी मोहब्बत
याद आती है।
हवा खिलाफ थी लेकिन
चिराग भी खूब
जला,
खुदा भी अपने
होने का क्या
क्या सबूत देता
है।
खुली छतों के
दिए कब के
बुझ गये होते
!
कोई तो
हैं जो हवाओं
के पर कतरता
है
वसीम बरेलवी
शुक्रिया तेरा कि
ग़म का हौसला
रहने दिया
बे-असर कर
दी दुआ दस्त-ए-दुआ
रहने दिया
मुंसिफ़ी का शोर-ए-महशर
गूँजता रहने दिया
सब दलीलों को सुना
और फ़ैसला रहने
दिया
ऐ ख़ुदा मम्नून हूँ
तेरा कि मेरे
फूल में
तू ने ख़ुशबू-ए-हवस
रंग-ए-वफ़ा
रहने दिया
कुछ इशारे
इतने मुबहम इतने
वाज़ेह इतने शोख़
दास्ताँ सारी सुना
दी मुद्दआ रहने
दिया
एक नाज़-ए-बे-तकल्लुफ़
मेरे तेरे दरमियाँ
दूरियाँ सारी मिटा
दीं फ़ासला रहने
दिया
शुक्रिया तेरा कि
ग़म का हौसला
रहने दिया
बे-असर कर
दी दुआ दस्त-ए-दुआ
रहने दिया
मज़हर इमाम
मुंसिफ़ी" का शोर-ए-महशर•
गूँजता रहने दिया
सब दलीलों को सुना
और फ़ैसला रहने
दिया
[" _इंसाफ
, • कयामत के दिन
का शोर_]
ऐ ख़ुदा मम्नून• हूँ
तेरा कि मेरे
फूल में
तू ने ख़ुशबू-ए-हवस••
रंग-ए-वफ़ा
रहने दिया
[• शुक्रगुज़ार,
••arma f lust_]
कुछ इशारे
इतने मुबहम• इतने
वाज़ेह° इतने शोख़
दास्ताँ सारी सुना
दी मुद्दआ रहने
दिया
[•. धुंधले °साफ
evident]
एक नाज़-ए-बे-तकल्लुफ़•
मेरे तेरे दरमियाँ
दूरियाँ सारी मिटा
दीं फ़ासला रहने
दिया
[• _infrmal, ऊपरी
दिखावे के दूर
होने का मान]
उन को मुख
दिखलाए हैं, जिन
से उस की
प्रीत ।
उनको ही मिलता
है वोह, जो
उस के हैं
मीत ।।
उस दा मुख
इक जोत है,
घुंघट है संसार
।
घुंघट में ओह
छुप्प गया, मुख
पर आंचल डार
।
इक ख़लिश को हासिल ए उम्र
ए रवां रहने
दिया
जान कर हमने
उन्हें नामेह्रबां रहने दिया,
कितने दरवाज़ों के साये
हाथ फैलाते रहे
इश्क़ ने लेकिन
हमें बेख़ानुमां रहने
दिया //( गृह विहीन)
अपने अपने हौसिले
,अपनी तलब की
बात है
चुन लिया हमने
उन्हें, सारा जहां
रहने दिया
ये भी क्या
जीने में जीना
है अदीब उनके
बग़ैर
शम्अ गुल कर
दी गयी ,बाक़ी
धुआं रहने दिया
अदीब सहारनपुरी
जो भी बुरा
भला है, अल्लाह
जानता है
बन्दे के दिल
में क्या है,
अल्लाह जानता है
ये फ़र्श-ओ-अर्श क्या
है, अल्लाह जानता
है
परदों में क्या
छिपा है, अल्लाह
जानता है
जा कर जहाँ
से कोई, वापस
नहीं है आता
वो कौन सी
जगह है, अल्लाह
जानता है
नेकी बदी को
अपनी, कितना ही
तू छिपाये
अल्लाह को पता
है, अल्लाह जानता
है
ये धूप छाँव देखो, ये सुबह-शाम देखो
सब क्यूँ ये हो
रहा है, अल्लाह
जानता है
क़िस्मत के नाम
को तो, सब
जानते हैं लेकिन
क़िस्मत में क्या
लिखा है, अल्लाह
जानता है
-अख़्तर आज़ाद
घर बसा कर
भी मुसाफ़िर के
मुसाफ़िर ठहरे
लोग दरवाज़ों से निकले
कि मुहाजिर ठहरे
- क़ैसर-उल जाफ़री
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