कौन कहता है
आसमान में सुराख
नहीं हो सकता
एक पत्थर तो तबियत
से उछालो यारों
दुष्यंत कुमार
वाक़िफ़ कहाँ ज़माना
हमारी उड़ान से
वो और थे
जो हार गए
आसमान से
फ़हीम जोगापुरी
साहिल से पहले
ग़र्क़ भी होना
है क्या भला
दरिया को
ये ही सोच
मैं पार
कर उठा
-समीर लखनवी
वक़्त की गर्दिशों
का ग़म न
करो
हौसले मुश्किलों में पलते
हैं
महफूजुर्रहमान
आदिल
ज़रा दरिया की तह
तक तो पहुँच
जाने की हिम्मत
कर
तो फिर ऐ
डूबने वाले किनारा
ही किनारा है
बासित भोपाली
हर एक बात
को चुप-चाप
क्यूं सुना जाए
कभी तो हौसला
कर के नहीं
कहा जाए
निदा फ़ाज़ली
कभी महक की
तरह हम गुलों
से उड़ते हैं,
कभी धुए की
तरह परबतों से
उड़ते हैं,
ये
कैंचियाँ हमें उड़ने
से ख़ाक रोकेंगी,
के हम परों
से नहीं हौसलों
से उड़ते हैं
!
राहत इंदौरी
मत बैठ आशियाँ
में परों को
समेट कर
कर हौसला कुशादा फ़ज़ा में उड़ान का
[कुशादा=फैला हुआ, फ़ज़ा=वातावरण, मौसम
महफूजुर्रहमान
आदिल
उस दिन से
पानियों की तरह
बह रहे हैं
हम
जिस दिन से
पत्थरों का इरादा
समझ लिया
सईद अहमद
जिन के मज़बूत
इरादे बने पहचान
उन की
मंज़िलें आप ही
हो जाती हैं
आसान उन की
अलीना इतरत
जाने कितनी उड़ान बाक़ी
है
इस परिंदे में जान
बाक़ी है
राजेश रेड्डी
अगरचे ज़ोर हवाओं
ने डाल रक्खा
है
मगर चराग़ ने लौ
को संभाल रक्खा
है
अहमद फ़राज़
आज बादलों ने फिर
साज़िश की
जहाँ मेरा घर
था वहीं बारिश
की
अगर फलक को
जिद है ,बिजलियाँ
गिराने की
तो हमें भी
ज़िद है ,वहीं
पर आशियाँ बनाने
की
पलट देते हैं
हम मौजे-हवादिस
अपनी जुर्रत से
कि हमने आँधियों
में भी चिराग
अक्सर जलाये हैं
~रामप्रसाद
बिस्मिल
वक़्त रहता नहीं
कहीं टिक कर
आदत इस की
भी आदमी सी
है
गुलज़ार
तीर खाने की
हवस है तो
जिगर पैदा कर
सरफ़रोशी की तमन्ना
है तो सर
पैदा कर
~अमीर मीनाई
हज़ार बर्क़ गिरे लाख
आँधियाँ उट्ठें
वो फूल खिल
के रहेंगे जो
खिलने वाले हैं
साहिर लुधियानवी
मैं न जुगनू
हूँ, दीया हूँ
न कोई तारा
हूँ,
रौशनी वाले मेरे
नाम से जलते
क्यूँ है.
राहत इन्दौरी
हम को मिटा
सके ये ज़माने
में दम नहीं
हम से ज़माना
ख़ुद है ज़माने
से हम नहीं
जिगर मुरादाबादी
जो तूफ़ानों में पलते
जा रहे हैं
वही दुनिया बदलते जा
रहे हैं
जिगर मुरादाबादी
अब हवाएँ ही करेंगी
रौशनी का फ़ैसला
जिस दिए में
जान होगी वो
दिया रह जाएगा
महशर बदायुनी
न हम-सफ़र
न किसी हम-नशीं से
निकलेगा
हमारे पाँव का
काँटा हमीं से
निकलेगा
-राहत इंदौरी
ख्वाव टूटे है
मगर हौसले जिंदा
हैं
हम वो हैं
जहाँ मुशकिलें शर्मिंदा
है
अज्ञात
वक़्त की गर्दिशों
का ग़म न
करो
हौसले मुश्किलों में पलते
हैं
महफूजुर्रहमान
आदिल
आसमां इतनी बुलंदी
पे जो इतराता
है
भूल जाता है
ज़मीं से ही
नज़र आता है
वसीम बरेलवी
हर रोज़ गिर
कर भी
मुकम्मल खङे हैं
ऐ ज़िन्दगी देख,
मेरे हौंसले तुझसे भी
बड़े हैं
👆 अज्ञात
हौसले भी किसी
हकीम से कम
नहीं होते
हर तकलीफ में ताकत
की दवा देते
हैं
मुजम्मिल
उसी ने बख़्शा
हैमुझकोशुऊ'र जीने
का
जो मुश्किलों की घड़ी
बार बार आई
है
महफूजुर्रहमान
आदिल
मेरे जुनूँ का नतीजा
ज़रूर निकलेगा,
इसी सियाह समुंदर से
नूर निकलेगा।
अमीर आगा किज़लबाश
जिन के मज़बूत
इरादे बने पहचान
उन की
मंज़िलें आप ही
हो जाती हैं
आसान उन की
अलीना इतरत
प्यासो रहो न
दश्त में बारिश
के मुंतज़िर
मारो ज़मीं पे पाँव
कि पानी निकल
पड़े
इक़बाल साजिद
खुद चलो, तो
चलो, आसरा कौन
दे
भीड़ के दौर
में रास्ता कौन
दे
वसीम वरेलवी
अभी से पाँव
के छाले न
देखो
अभी यारो सफ़र
की इब्तिदा है
एजाज़ रहमानी
यह ज़माना अकेले मुसाफिर
का है
इस ज़माने को फिर
रहनुमा कौन दे
वसीम वरेलवी
मेरे टूटे हौसले
के पर निकलते
देख कर
आदिल मंसूरी
तूफ़ानों से आँख
मिलाओ, सैलाबों पर वार
करो
मल्लाहों का चक्कर
छोड़ो, तैर के
दरिया पार करो
-राहत इंदौरी
हमारे फन की
बदौलत हमें तलाश
करे
मजा तो जब
है कि शोहरत
हमें तलाश करे
-मुनव्वर राना
मेरी बच्चों तुम्हें कितनी
ही मैं असानियाँ
दे दूँ
बिना ठोकर लग
कोई सफर पूरा
नहीं होता ||
वसीम वरेलवी
भँवर से लड़ो
तुंद लहरों से
उलझो
कहाँ तक चलोगे
किनारे किनारे
[तुंद=तेज़]
रज़ा हमदानी
अगर ऐ नाखुदा
तूफान से लड़ने
का दमखम है,
इधर कश्ती को मत
लाना, इधर पानी
बहुत कम है।
-नमलूम ( शायद -निहाल सेहरारवी)
आशियाँ फूंका है बिजली
ने जहाँ सौ
मर्तबा,
फिर उन्हीं शाखों पै,
तरहे-आशियाँ रखता
हूँ मैं।
-निहाल सेहरारवी
अभी चले ही
न थे और
सांस टूट गयी
मुसाफिरत से ज़ियादा
थकान पड़ाव में
है
क़मर जलालपुरी
जनाब बड़ा
ही उम्दा कलाम
हैI
फिर देखना फिज़ूल है
कद आसमान का।।
डरना नहीं यहाँ
तू किसी भी
चुनौती से।
बस तू ही
सिकन्दर है सारे
ज़हान का।।
-देवेन्द्र
शर्मा देव
पड़े रहो यूँ
ही सहमे हुए
दियों कि तरह
अगर हवाओं के पर
बांधना नहीं आता
वसीम बरेलवी
प्यासो रहो न
दश्त में बारिश
के मुंतज़िर
मारो ज़मीं पे पाँव
कि पानी निकल
पड़े
इक़बाल साजिद
इरादे-कोहशिकन फौलाद जैसे
दस्तोबाजू है,
मैं लंगर उठाने
वाला हूँ तूफां
को बता देना।
[इरादे-कोहशिकन =पर्वत को तोड़ने वाला
इरादा या संकल्प]
- ना मालूम
ज़र्रा
ए ख़ाक हूँ,
परवाज़ की हसरत
है मुझे
आँधियों तेज़ चलो
और उड़ा लो
मुझको
अज्ञात
ऐ मौज-ए-बला उन
को भी ज़रा
दो चार थपेड़े
हल्के से
कुछ लोग अभी
तक साहिल से
तूफ़ाँ का नज़ारा
करते हैं
मुईन अहसन जज़्बी
मैं कल का
भरोसा नहीं करता
साक़ी
मुमकिन है कि
कल जाम रहे
मैं न रहूँ
सदीकल क़ादरी
किनारो से मुझे
ऐ नाख़ुदाओ दूर
ही रखना
वहां लेकर चलो
तूफ़ां जहां से
उठने वाला है
अली जलीली
तुंदी-ए-बाद-ए-मुख़ालिफ़
से न घबरा
ऐ उक़ाब
ये तो चलती
है तुझे ऊँचा
उड़ाने के लिए
उक़ाब=eagle\
सय्यद सादिक़ हुसैन
रख हौसला वो मंज़र
भी आएगा
प्यासे के पास
चल के समंदर
भी आयेंगा
थक कर ना
बैठ ए मंजिल
के मुसाफिर
मंजिल भी मिलेगी
और मिलने का
मज़ा भी आएगा
मैं ये मानता
हूँ मेरे दिए, तेरी
अँधियो ने बुझा
दिये
मगर एक जुगनू
हवाओं में अभी
रोशनी का इमाम
है
बशीर बद्र
मंजिल उन्ही को मिलती है
जिनके सपनो में
जान होती है
पंख से कुछ
नहीं होता
हौसलों से उड़ान
होती है
नहीं तेरा नशेमन
क़स्र-ए-सुल्तानी
के गुम्बद पर
तू शाहीं है बसेरा
कर पहाड़ों की
चटानों में
अल्लामा इक़बाल
सुल्तान भी बन
जाये तो, दिल
में फ़कीर जिंदा
रख,
हौसले के तरकश
में कोशिश का
वो तीर जिंदा
रख,
हार जा चाहे
जिंदगी में सब
कुछ,
मगर फिर से
जीतने की उम्मीद
जिंदा रख।
दिल से निकलेगी
न मर कर
भी वतन की
उल्फ़त
मेरी मिट्टी से भी
ख़ुशबू-ए-वफ़ा
आएगी
Lal chand falak
यूँही मंज़िल मिलती है
कब रह-रौ
को
मंसूबों को आग
दिखाना पड़ता ह
समीर 'लखनवी'
जिंदगी की असली
उड़ान अभी बाकी
है;
जिंदगी के कई
इम्तिहान अभी बाकी
हैं;
अभी तो नापी
है मुटठी भर
ज़मीन आपने;
आगे अभी सारा
आसमान बाकी है।
उल्फत भी अजब
शै है, जो
दर्द वही दरमां,
पानी में नहीं
गिरता जलता हुआ
परवाना।
[दरमां= दवा, इलाज, उपचार]
'आर्जू' लखनवी
जल भी जा
बदनसीब परवाने,
शम्अ की जिन्दगी
दराज नहीं
[ दराज लंबी, तवील]
-अब्दुल हमीद अदम
रंज तो बेदिली
से आता है
इश्क़ दरियादिली से आता
है
मौत बरहक़ है, इसको
क्या सोचें
हौसला ज़िन्दगी से आता
है
अपूर्व'अशेष'
आज कांटें हैं अगर
तेरे मुकद्दर में
तो क्या,
कल तेरा भर
जाएगा फूलों से
दामन गम न
कर।
-'निहाल' सेहरारवी
इक नई बुनियाद
डालेंगे तजस्सुम की 'शफा'
हर गुबारे-कारवां में
कारवाँ ढूढ़ेंगे हम
[तजस्सुम खोज, तलाश]
-'शफा' ग्वालियरी
बरहक़ सच, अपरिहार्य,
अवश्यंभावी
जो सफर की
शुरुआत करते हैं,
वो मंज़िल को पार
करते हैं,
एकबार चलने का
होंसला तो रखो,
मुसाफिरों का तो
रस्ते भी इंतज़ार
करते हैं।
ये राहें ले ही
जाएंगी मंज़िल तक होंसला
रख,
कभी सुना है
कि अंधेरो ने
सवेरा होने ना
दिया।
कई मील रेत
को काट कर
कोई मौज फूल
खिला गई
कोई पेड़ प्यास
से मर रहा
है नदी के
पास खड़ा हुआ
बशीर बद्र
जलाने वाले जलाते
ही हैं चराग़
आख़िर
ये क्या कहा
कि हवा तेज़
है ज़माने की
-जमील मज़हरी
साहिल के सुकूँ
से किसे इंकार
है लेकिन
तूफ़ान से लड़ने
में मज़ा और
ही कुछ है
-आल-ए-अहमद
सूरूर
यक़ीन हो तो
कोई रास्ता निकलता
है
हवा की ओट
भी ले कर
चराग़ जलता है
मंज़ूर हाशमी
इन अंधेरों से परे
इस शब-ए-ग़म से
आगे
इक नई सुब्ह
भी है शाम-ए-अलम
से आगे
सदा एक ही
रुख़ नहीं नाव
चलती
चलो तुम उधर
को हवा हो
जिधर की
-अल्ताफ़ हुसैन हाली
जंग में कागज़ी
अफ़राद से क्या
होता है
हौसले लड़ते हैं, तादाद
से क्या होता
है
राहत इंदौरी
निकाल लाया हूँ
एक पिंजरे से
इक परिंदा
अब इस परिंदे
के दिल से
पिंजरा निकालना है
जिस-जिस पर
ये जग हँसा
है,
उसीने इतिहास रचा है….......ll
अफ़राद
मुश्किलों में न
हिम्मत गँवाया करें...!!
फिर भले बारहा
चोट खाया करें..!!
वक़्त जिनका नहीं आज..
कल आएगा...!!
हौसलों की बुलंदी
प जाया करें..!!
"तितिक्षा
नन्ही"
परिंद ऊँची उड़ानों
की धुन में
रहता है
मगर ज़मीं की हदों
में बसर भी
करता है
जुगनुओं ने फिर
अँधेरों से लड़ाई
जीत ली
चाँद-सूरज घर
के रौशनदान में
रक्खे रहे
राहत इंदौरी
निकल के दूर क़फ़स
से भी पर
समेटे है,
परिंदा ख़ौफ़ में
परवाज़ भला कैसे
करे।
मधुप 'महरम'
लोग कहते हैं
बदलता है ज़माना
सब को
मर्द वो हैं
जो ज़माने को
बदल देते हैं
हार हो जाती
है जब मान
लिया जाता है
जीत तब होती
है जब ठान
लिया जाता है
देख ज़िंदाँ से परे
रंग-ए-चमन
जोश-ए-बहार
रक़्स करना है
तो फिर पाँव
की ज़ंजीर न
देख
वक़्त की गर्दिशों
का ग़म न
करो
हौसले मुश्किलों में पलते
हैं
रोशनी को जले
या जले मुंतज़िर..!!
जब हवा चल
पड़ी लौ हुई
मुंतशिर..!!
पर इबादत में कोई
ख़लल क्यूँ पड़े..!!
ख़म करे दम
कहाँ था हवाओं
में फिर..!!
"तितिक्षा
नन्ही"
ये मिरा ज़र्फ़
है तूने इसे
समझा क्या है
ज़िद पे पीने
की जो आ
जाऊं तो दरिया
क्या है
उसे गुमाँ है कि
मेरी उड़ान कुछ
कम है
मुझे यक़ीं है कि
ये आसमान कुछ
कम है
अज्ञात
खिरदमंदों से क्या
पुछूँ कि मेरी
इब्तिदा क्या है
कि मैं इस
फिक्र में रहता
हूँ मेरी इन्तिहा
क्या है,
खुदी को कर
बुलन्द इतना कि
हर तकदीर से
पहले
खुदा बंदे से
खुद पूछे बता
तेरी रजा क्या
है?
[खिरदमंद= बुद्धिमान, अक्लमंद]
-मोहम्मद इकबाल
हद से बड़ी
उड़ान की ख्वाहिश
तो यूँ लगा
जैसे कोई परों
को कतरता चला
गया
मंज़िल समझ के
बैठ गये जिनको
चंद लोग
मैं एैसे रास्तों
से गुज़रता चला
गया
जिन्दगी अपनी जब
इस शक्ल से
गुजरी 'गालिब',
हम भी क्या
याद करेंगे कि
खुदा रखते थे।
-मिर्जा 'गालिब'
जुनूँ है ज़हन
में तो हौसले
तलाश करो
मिसाले-आबे-रवाँ
रास्ते तलाश करो
ये इज़्तराब रगों में
बहुत ज़रूरी है
उठो सफ़र के
नए सिलसिले तलाश
करो
जो नफस तेरी
याद में गुजरे,
वह बंदगी में शुमार
होता है।
[नफस= सांस, शुमार= गिनती]
-अब्दुल हमीद अदम
किसी चराग़ का
इसमें कमाल कैसा
है
समीर 'लखनवी'
तू पँख ले
ले, मुझे सिर्फ
हौसला दे दे
।
फिर आँधियों को मेरा
नाम और पता
दे दे
झुका दो सर
उसी पर आ
जाये जो सामने
जर्रा,
कि जब सिज्दा
ही करना है
तो कैदे-आस्ताँ
क्यो हो।
ना मालूम
उसे गुमाँ है कि
मेरी उड़ान कुछ
कम है
मुझे यक़ीं है कि
ये आसमान कुछ
कम है
Nafas Amblavi
अगर जो घर
के लिए रेल
मिल गई होती
न इस तरह
उसे वो फिर
कुचल गई होती
जो तुम ये
जानते हमें भी
भूख लगती है
आग चूल्हे में हमारे
भी जल गई
होती
हमें न खेत
है, न मुखौटा,
न कोई आंगन
हमे न कुर्सी
कोई तुम-सी
मिल गई होती
कमाल नियामत है कुन्द
अक्ल उस पे
तेरी
ज़रा जो चलती,
पोल उसकी खुल
गई होती
गरीबी है 'भरत'
तो ज़िंदगी भी
मौत ही है
न जाती आज
जान कल निकल
गई होती
— भरत तिवारी
आप गैरों की बात
करते हैं हमने
अपने भी आजमाए
हैं,
लोग कांटों से बचके
चलते हैं, हमने
फूलों से जख्म
खाए हैं।
-'बेताब' अलीपुरी
जिन्दगी में कभी
किसी बुरे दिन
से रूबरू हो
जाओ तो!!
इतना होंसला जरुर रखना
कि दिन बुरा
था जिन्दगी नहीं
जिन हौसलो से मेरा
जुनूं मुतमईन न
था
वो हौसले ज़माने के
मेयार हो गये
(मेयार
__standards)
अलीना इतरत
गो आबले हैं
पाँव में फिर
भी ऐ रहरवो
मंज़िल की जुस्तुजू
है तो जारी
रहे सफ़र
नूर क़ुरैशी
वाक़िफ़ कहाँ ज़माना
हमारी उड़ान से
वो और थे
जो हार गए
आसमान से
जानकारी दुरुस्त करने के
लिए धन्यवाद भाई
🙏
अपना ज़माना आप बनाते
हैं अहले दिल
हम वो नही
कि जिनको ज़माना
बनाता है
अज्ञात
जिन हौसलों से मेरा
जुनूँ मुतमइन न
था
वो हौसले ज़माने के
मेयार हो गए
-नामालूम
मौजों की सियासत
से मायूस न
हो 'फ़ानी'
गिर्दाब की हर
तह में साहिल
नज़र आता है
फ़ानी बदायुनी
मैं आँधियों के पास
तलाश-ए-सबा
में हूँ
तुम मुझ से
पूछते हो मिरा
हौसला है क्या
अदा जाफ़री
वक्त की गर्दिशो
का गम न
करो
हौसले मुश्किलो में ही
पलते है
नामालूम
मुझे ये खौफ
दे ऐ माली
की मुझी पर
नज़र तेरी
बस इतना नहीं
काफी की सजदा
कर लिया मैंने
— वसीम बरेलवी
दामन झटक के
वादी-ए-ग़म
से गुज़र गया
उठ उठ के
देखती रही गर्द-ए-सफ़र
मुझे
कुछ नहीं जो
आदमी के ज़ोर
से बाहर हुए...!!
जब समंदर में गुज़र
की हासिल ए
गौहर हुआ..!!
मिट गया अल्फ़ाज़
नामुमकिन किताब ए जीस्त
से..!!
इम्तहानों की तपिश
झेली तभी ताहिर
हुआ..!!
"तितिक्षा
नन्ही"
कुछ समझकर ही हुआ
हूँ मौजे-दरिया
का हरीफ,
वरना मैं भी
जानता हूँ आफियत
साहिल में है।
[आफियत= सुकून, सुख, चैन, आराम]
वहशत कलकतवी
कहो नाखुदा से उठा
दे वह लंगर,
मैं तूफां की जिद
देखना चाहता हूँ।
ना मालूम
हर गम ने,
हर सितम ने,नया हौसला
दिया,
मुझको मिटाने वालो ने,
मुझको बना दिया
!
शायर मजरूह सुल्तानपुरी
ये राहें ले ही
जाएंगी मंज़िल तक, हौसला
रख,
कभी सुना है अंधेरो
ने सवेरा होने
ना दिया।
दस्त-ओ-पा
रखते हैं और
बे-कार क्यों
बैठे रहें
हम उठेंगे अपनी क़िस्मत
को बनाने के
लिए
सय्यद सादिक़ हुसैन
अंजाम-ए-कशाकश
होगा कुछ देखें
तो तमाशा दीवाने
या ख़ाक उड़ेगी
गर्दूं पर या
फ़र्श पे तारे
निकलेंगे
अलीम मसरूर
रात का अंजाम
भी मालूम है
मुझ को 'सुरूर'
लाख अपनी हद
से गुज़रे ता-सहर जाएगी
रात
सुरूर बाराबंकवी
हौसला कम किसी
में होता है
जीत कल, ख़ुद
ही हार जाने
का
फ़रहत शहज़ाद
जो सफर की
शुरुआत करते हैं,
वो मंजिलों को पार
करते हैं,
एकबार चलने का
होंसला तो रखो,
रास्ते भी मुसाफिरों
का इंतज़ार
करते हैं।
ये कह के
दिल ने मिरे
हौसले बढ़ाए हैं
ग़मों की धूप
के आगे ख़ुशी
के साए हैं
तिलिस्म-ए-ख़्वाब-ए-ज़ुलेख़ा
ओ दाम-ए-बर्दा-फ़रोश
हज़ार तरह के
क़िस्से सफ़र में
होते हैं
ये कैंचियाँ हमें खाक
उड़ने से रोकेंगी
हम परो से
नही हौसलो से
उड़ा करते हैं
ख्वाब टूटे हैं
मगर हौसले जिन्दा
है
हम वो हैं
जहाँ मुश्किलें शर्मिन्दा
हैं
अज्ञात
जिनमें अकेले चलने का
होंसला होता हैं,
उनके पीछे एक
दिन काफिला होता
हैं…!!!
बदन में साँस
लेता है समुंदर
मिरी कश्ती हवा पर
चल रही है
किशन कुमार वक़ार
अश्क-ए-हसरत
है आज तूफ़ाँ-ख़ेज़
कश्ती-ए-चश्म
की तबाही है
दरिया के तलातुम
से तो बच
सकती है कश्ती
कश्ती में तलातुम
हो तो साहिल
न मिलेगा
मलिकज़ादा मंज़ूर अहमद
ना छोड़ होंसला
ऐ दोस्त वो
मंज़र भी आएगा,
प्यासे के पास
चलकर खुद समंदर
आएगा…!!!
प्यासो रहो न
दश्त में बारिश
के मुंतज़िर
मारो ज़मीं पे पाँव
कि पानी निकल
पड़े
इक़बाल साजिद
बढ़ के तूफ़ान
को आग़ोश में
ले ले अपनी
डूबने वाले तिरे
हाथ से साहिल
तो गया
अब्दुल हमीद अदम
दिल में उमंग
और इरादा कोई
तो हो
बे-कैफ़ ज़िंदगी
में तमाशा कोई
तो हो
[बे-कैफ़=joyless]
ख़लील मामून
जब हौसला बना लिया
है ऊँची उड़ान
का,
फिर फ़िज़ूल है कद
देखना आसमान का।
पहाड़ भाँप रहा
था मिरे इरादे
को
वो इस लिए
भी कि तेशा
मुझे उठाना था
[तेशा= Axe कुल्हाडी]
--अख्तर शुमार
जिंदगी की उदास
राहों पर कभी
यूं भी होता
है,,,
इंसान ख़ुद रो
देता है, किसी
को हौसला देते
हुए.!!
मंजिल उन्हीं को मिलती
है,
जिनके सपनों में जान
है।
पंख से कुछ
नहीं होता,
हौसलो से ही
‘उड़ान‘ है।.”
जी में आता
है उलट दें
उन के चेहरे
से नक़ाब
हौसला करते हैं
लेकिन हौसला ही
नहीं होता
मंजिल न दे
चिराग न दे
हौसला तो दे
तिनके का ही
सही तू मगर
आसरा तो दे
ख़ुद से लिखने
का इख़्तियार भी
दे
वर्ना क़िस्मत की तख़्तियाँ
ले जा
ख़ुर्शीद अकबर
समा जाता है
सारा आसमां इक
आँख के तिल
में,
किसी के अज्म
को मत आँक
उसके कद्दो क़ामत
से
हो सकती है
ज़िन्दगी में मुहब्बत
दोबारा भी
बस हौसला चाहिए फिर
से बर्बाद होने
का
बाल-ओ-पर
हों क़वी# तो
क्या हासिल
जब उड़ानों का हौसला
ही नहीं
Feather & wings
#strong
Doctor Azam
पसीने की स्याही
से जो लिखते
हैं इरादें को,
उसके मुक्कद्दर के सफ़ेद
पन्ने कभी कोरे
नही होते…
आले अहमद
सूरूर
जला
जला के बुझाता
था। वो मुंडेरों
पर,
उसे दिए से
नहीं रोशनी से
नफ़रत थी........
शायर नामालूम
गर्दिशों से ड़रकर
तू हौसला ना
हार ज़िन्दगी,
देख लेना लौटकर
फिर आएगी बहार,
ज़िन्दगी ।.
मेरे हौसलों को परखने
की गुस्ताख़ी न
करना,
पहले भी कई
तूफानों का रुख
मोड़ चुका हूं
मैं…!!!
अनवर सदीद
ख़ाक हूँ लेकिन
सरापा नूर है
मेरा वजूद
इस ज़मीं पर चाँद
सूरज का नुमाइंदा
हूँ मैं
नहीं है मेरे
मुक़द्दर में रौशनी
न सही
ये खिड़की खोलो ज़रा
सुब्ह की हवा
ही लगे
बशीर बद्र
वहीं हकदार हैं किनारों
के,
जो बदल दे
बहाव धारों के
।
तेरी अकड़ तो
दो दिन की
कहानी है ..
अपना हौसला तो बचपन
से ख़ानदानी है..
जिन्दगी में कभी
किसी बुरे दिन
से रूबरू हो
जाओ तो!!
इतना हौसला ज़रूर रखना
कि बुरा
दिन था, जिन्दगी
नहीं
मुसीबत का पहाड़
आख़िर किसी दिन
कट ही जाएगा
मुझे सर मार
कर तेशे से
मर जाना नहीं
आता
बना लेता है
मौज-ए-ख़ून-ए-दिल
से इक चमन
अपना
वो पाबंद-ए-क़फ़स
जो फ़ितरतन आज़ाद
होता है
असग़र गोंडवी
दरों को चुनता
हूँ दीवार से
निकलता हूँ
मैं ख़ुद को
जीत के इस
हार से निकलता
हूँ
शोएब निज़ाम
वो हमें जिस क़दर आज़माते रहे
अपनी ही मुश्किलों को बढ़ाते रहे
ख़ुमार
भंवर से लड़ो
तुंद लहरों से
उलझो,
कहां तक चलोगे
किनारे-किनारे ।
रज़ा हमदानी
कमाल-ए-तिश्नगी
ही से बुझा
लेते हैं प्यास
अपनी
इसी तपते हुए
सहरा को हम
दरिया समझते हैं
जिगर मुरादाबादी
कटी हुई है
ज़मीं कोह से
समुंदर तक
मिला है घाव
ये दरिया को
रास्ता दे कर
अदीम हाशमी
मंजिलें लाख कठिन
आये, गुजर जाऊँगा,
अगर हौसला हार जाऊंगा
तो मर जाऊँगा
।
इन चराग़ों का हौसला
देखो
आंधियों को ये
मुँह चिढ़ाते हैं
-Meenakshi
केहदो मुश्किलों से थोड़ा
और कठिन हो
जाए,
केहदो चुनौतियों से थोड़ा
और कठिन हो
जाए
अगर नापना चाहते हो
हमारी हिम्मत
तो केहदो आसमान से
थोड़ा और ऊपर
हो जाए
वही हक़दार हैं किनारों
के,
जो बदल
दें बहाव धारों
के।
रास्ता
सोचते रहने से
किधर बनता है
सर में सौदा
हो तो दीवार
में दर बनता
है
-जलील आली
इन्ही ग़म की
घटाओं से ख़ुशी
का चांद निकलेगा
अंधेरी रात के
पर्दे में दिन
की रौशनी भी
है।
बारे दुनिया में रहो
ग़म-ज़दा या
शाद रहो
ऐसा कुछ कर
के चलो याँ
कि बहुत याद
रहो
(बारे अंततः, आख़िरकार, शाद-ख़ुश, याँ-यहाँ)
मीर तक़ी मीर
आसान कब था
दौड़ना दरिया की मौज
पर,
कश्ती की ताक
में कोई तूफ़ान
कब न था।
राजेश रेड्डी
कल ज़मी पर
था अब उसका
आसमां घर हो
गया,
देखते ही देखते
क़तरा समुंदर हो
गया।
राजेश रेड्डी
हर गाम पे
शिकस्त ने यूँ
हौसला दिया
जिस तरह साथ
साथ कोई हमसफ़र
चले
गाम = कदम, शिकस्त = हार
मंज़िलों से कह
दो अभी पहुँचा
नहीं हूँ मैं
मुश्किलें जरूर है
मगर ठहरा नहीं
हूँ मैं
अल्ताफ़ हुसैन हाली
दरिया को अपनी
मौज की तुग़्यानियों
से काम
कश्ती किसी की
पार हो या
दरमियाँ रहे
सैलाब , बाढ़
रफ्तार मेरी धीमी ही
सही ।
पर उड़ान मेरी
लंबी होगी ।।
सामने तन के
जिस दिन खड़ी
हो गई,
एक पर्वत से राई
बड़ी हो गई।
किशन तिवारी
गिरते हुए पत्तों
ने हमको समझाया
है ,
बोझ बन जाओगे
तो अपने भी
गिरा देते हैं..
कि
फैसला होने से
पहले मैं भला
हार क्यों मानू
।
चिराग हो के
ना हो दिल
जला के रखते
हैं,
हम आंधियों में भी
तेवर बला के
रखते हैं।
हमें पसंद नहीं
जंग में भी
चालाकी,
जिसे निशाने पर रखते,
बता के रखते
हैं
-हस्ती
सफ़र में धूप
तो होगी जो
चल सको तो
चलो
सभी हैं भीड़
में तुम भी
निकल सको तो
चलो
किसी के वास्ते
राहें कहाँ बदलती
हैं
तुम अपने आप
को ख़ुद ही
बदल सको तो
चलो
यहाँ किसी को
कोई रास्ता नहीं
देता
मुझे गिरा के
अगर तुम सँभल
सको तो चलो
कहीं नहीं कोई
सूरज धुआँ धुआँ
है फ़ज़ा
ख़ुद अपने आप
से बाहर निकल
सको तो चलो
यही है ज़िंदगी
कुछ ख़्वाब चंद
उम्मीदें
इन्हीं खिलौनों से तुम
भी बहल सको
तो चलो
Nida Fazli
अंजाम उसके हाथ
है आग़ाज़ कर
के देख,
भीगे हुए परों
से ही परवाज़
करके देख।
नवाज़ देवबंदी
दोनों ही पक्ष
आए हैं तैयारियों
के साथ,
हम गर्दनों के साथ
हैं वो आरियों
के साथ।
कुँवर बेचैन
शह-ज़ोर अपने
ज़ोर में गिरता
है मिस्ल-ए-बर्क़
वो तिफ़्ल क्या गिरेगा
जो घुटनों के
बल चले
मिर्ज़ा अज़ीम बेग
'अज़ीम'
ऐ ग़मे ज़िन्दगी
न हो नाराज़
मुझको आदत है
मुस्कुराने की
अब्दुल हमीद 'अदम'
घबराएँ हवादिस से
क्या हम जीने
के सहारे निकलेंगे
डूबेगा अगर ये
सूरज भी तो
चाँद सितारे निकलेंगे
फ़िरदौस-ए-नज़र
के दीवाने तारीक
फ़ज़ा से क्या
डरना
तू शम-ए-नज़र को
तेज़ तो कर
ज़ुल्मत से नज़ारे
निकलेंगे
अंजाम-ए-कशाकश
होगा कुछ देखें
तो तमाशा दीवाने
या ख़ाक उड़ेगी
गर्दूं पर या
फ़र्श पे तारे
निकलेंगे
'मसरूर' करें अहल-ए-साहिल
कुछ फ़िक्र न
हिम्मत वालों की
डूबेंगे सफ़ीने जितने भी
इक दिन वो
किनारे निकलेंगे
- 'मसरूर'
बहुत खूबसूरत है उनके
इंतज़ार का आलम,
बेकरार सी आँखों
में इश्क बेहिसाब
लिए बैठे हैं
!!
ख़ुद से हम
इक नफ़स हिले
भी कहाँ|
उस को ढूँढें
तो वो मिले
भी कहाँ|
ख़ेमा-ख़ेमा गुज़ार ले
ये शब,
सुबह-दम ये
क़ाफिले भी कहा
अब त'मुल
न कर दिल-एख़ुदकाम,
रूठ ले फिर
ये सिलसिले भी
कहाँ|
आओ आपस में
कुछ गिले कर
लें,
वर्ना यूँ है
के फिर गिले
भी कहाँ|
ख़ुश हो सीने
की इन ख़राशों
पर,
फिर तनफ़्फ़ुस के ये
सिले भी कहाँ|
अनजान
जला के मिशअल-ए-जाँ
हम जुनूँ-सिफ़ात
चले
जो घर को
आग लगाए हमारे
साथ चले
मजरूह सुल्तानपुरी
हारे हुए परिंदे,
ज़रा उड़ के
देख तो,
आ जायेगी ज़मीन पे
छत आसमान की।
गोपाल दास नीरज
ज़मीं ने कर
लिया क्या तीरगी
से समझौता
ख़याल छोड़ चुके
क्या चराग़ जलने
का
सियाह रात नहीं
लेती नाम ढलने
का
यही तो वक़्त
है सूरज तिरे
निकलने का
शहरयार
घबराएँ हवादिस से क्या
हम जीने के
सहारे निकलेंगे
डूबेगा अगर ये
सूरज भी तो
चाँद सितारे निकलेंगे
अलीम मसरूर
हद इतनी करो
कि हद की
इन्तेहाँ हो जाये
कामयाबी इस तरह
मिले कि वो
भी इक दास्ताँ
हो जाये
नामालूम
इसी पे शहर
की सारी हवाएँ
बरहम थीं
कि इक दिया
मिरे घर की
मुंडेर पर भी
था
~यूसुफ़ हसन
तुमको तो मील
के पत्थर पे
भरोसा है मगर,
मेरी मंज़िल तो मेरे
पाँव के छाले
होंगे।
बेकल उत्साही
क्यों किसी रहबर
से पुछूं अपनी
मंजिल का पता
मौजे-दरिया खुद लगा
लेती है साहिल
का पता।
-'आरजू ' लखनवी
रात तो वक़्त की पाबंद है ढल जाएगी;
देखना ये है चराग़ों का सफ़र कितना है !
अनजान
हर रहगुजर पै शम्अ
जलाना है मेरा
काम,
तेवर हैं क्या
हवा के, यह
मैं देखता नहीं।
ना मालूम
हुज़ूरे यार हुई
दफ़्तरे जुनूँ की तलब,
गिरह में लेके
गरेबाँ का तार
तार चले।
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
जहां चोट खाना,
वहीं मुस्कुराना
मगर इस अदा
से कि रो
दे ज़माना
-वामिक जौनपुरी
है किसको यह मयस्सर
यह काम कर
गुजरना,
इक बांकपन से जीना,
इक बांकपन से
मरना।
-जिगर मुरादाबादी
तपिश फैले ज़माने
में लगा वो
आग सीने में
बिना मकसद बता
क्या रखा है
जीने में
कभी मत छोड़ना
जीवन में अपने
राह मेहनत की
खिलाये पत्थरो पर फूल
वो ताकत है
पसीने में
बरसात में तालाब
तो हो जाते
हैं कमज़र्फ़
बाहर कभी आपे
से समुंदर नहीं
होता
-ऐजाज़ रहमानी
हम फ़क़ीरों का पैरहन
है धूप
और ये रात
अपनी चादर है
आबिद वदूद
खोला है किसने
अपने सफीने का
बादबां,
तूफां सिमट गये
हैं कनारों की
गोद में।
[सफीना=नौका, कश्ती ,बादबां =पोतपट, मरूतपट, जहाज में लगाया जाने वाला पर्दा, जिसमें हवा भरने से जहाज चलता है]
ना मालूम
.
पड़े हैं जो
मुन्तशिर तिनके, उठा-उठा
के सजा रहा
हूँ,
खबर करे कोई
बिजलियों को कि
फिर निशेमन बना
रहा हूँ।
[मुन्तशिर
बिखरे हुए . निशेमन
आशियाना, घोसला, नीड़]
-'नैयर' अकबराबादी
इरादा जब मुकम्मल
हो चला है...!!
किसे परवाह कितना फ़ासला
है...!!
बड़ा है आसमाँ
परवाज़ ऊँची...!!
यही हासिल... हमारा हौसला
है..!!
"तितिक्षा
नन्ही"
: रोज़ रोज़ जलते
हैं ,
फिर भी खाक़
न हुए
अजीब हैं कुछ
ख़्वाब भी
बुझ कर भी
राख़ न हुए..
अनजान
अब थकन पांव
की ज़ंजीर बनी
जाती है
राह का ख़ौफ़
ये कहता है
कि चलते रहिए
~मेराज़ फ़ैज़ाबादी
सभी को छोड़कर
खुद पर भरोसा
कर लिया मैंने
वह जो
मुझमें मरने का
था ज़िंदा कर
लिया मैंने
वसीम बरेलवी
काट कर पर
मुतमइन सय्याद बे-परवा
न हो
रूह बुलबुल की इरादा
रखती है परवाज़
का
हैदर अली आतिश
मैं हर बे
-जान हर्फ़ ओ
लफ्ज़ को गोया
बनाता हूँ
कि अपने फन
से पत्थर को
भी आईना बनाता
हूँ
अनवर जलालपुरी
मैं अपना अज्म
लेकर मंजिलों की
सिम्त निकला था
मशक्कत हाथ पे
रक्खी थी, किस्मत
घर पे रक्खी
थी
चला जाता हूँ
हँसता खेलता मौज-ए-हवादिस
से
अगर आसानियाँ हों ज़िंदगी दुश्वार हो जाए
[(मौज-ए-हवादिस -Wave Of Calamities)]
-असग़र गोंडवी
हौसला है तो
सफ़ीनो के अलम
लहराओ
बहते दरिया तो चलेंगे
इसी रफ़्तार के
साथ
शहजाद अहमद
मेरे टूटे हौंसले
के पर निकलते
देख कर
उसने दीवारों को अपनी
और ऊँचा कर
लिया
आदिल मंसूरी
इम्तिहानों
ने दिलाई मुझे ये
पहचान मेरी
बच के जो
गुजरे खाक़ हुए
बैठे हैं
अज्ञात
पर कटे हैं
भले दिल में
भी दर्द है...!!
ये न समझो
मिरा हौसला ज़र्द
है..!!
जिस्म से आँकना
मत मिरी हैसियत..!!
कोह कदमों तले है
पड़ा गर्द है...!!
"तितिक्षा
नन्ही"
मैं एक शाम
जो रोशन दिया
उठा लाया,
तमाम शहर कहीं
से हवा उठा
लाया।
उस दिन से
पानियों की तरह
बह रहे हैं
हम
जिस दिन से
पत्थरों का इरादा
समझ लिया
सईद अहमद
इरादा था कि
अब के रंग-ए-दुनिया
देखना है
ख़बर क्या थी
कि अपना ही
तमाशा देखना है
हसन अब्बास रज़ा
तमाम उम्र तेरा
इन्तिजार कर कर
लेंगे,
मगर यह रंज
रहेगा कि जिन्दगी
कम है।
-शाहिद सिद्दकी
न जाने किस
लिये उम्मीदवार बैठा
हूँ,
एक ऐसी राह
पर, जो उनकी
रहगुजर भी नहीं।
-फैज अहमद फैज
Congratulations Anand bhai and Raghav kakkar for man behind the curtain for conceptualization. All collections in one place to read in leisure. Great initiative and work and feel lucky to be a part of this kahkashan beautiful journey
ReplyDeleteCongratulations Anand bhai and Raghav kakkar for man behind the curtain for conceptualization. All collections in one place to read in leisure. Great initiative and work and feel lucky to be a part of this kahkashan beautiful journey
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