नज़्म क्या है !!
नज़्म, उर्दू में एक विधा के रूप में, उन्नीसवीं सदी के आख़िरी दशकों के दौरान पैदा हुई और धीरे धीरे पूरी तरह स्थापित हो गई। वैसे तो उर्दू की हर कविता को नज़्म कहा जा सकता है। पर वर्तमान समय में इसका प्रयोग साधारणतः गज़ल को छोड़कर बाकि कविताओं के लिए होता है। वर्तमान समय में यह शब्द किसी भी विषय पर लिखी गई नए ढंग की कविता के लिए प्रचलित है।
नज़्म यानी एक मुकम्मल कहानी। नज़्म उर्दू की एक आज़ाद विधा है जिसमे एक ख़याल या बात ( thought / subject)को ही कविता/ नज़्म की शक्ल दी जाती है।
नज़्म का एक शीर्षक होता है। जैसे हम हिंदी में कविता लिखते हैं वैसे ही उर्दू में नज़्म लिखी जाती हैं।नज़्म बहर और क़ाफ़िए में भी होती है और इसके बिना भी। यानी ये किसी नियम के साथ या किसी नियम के बिना भी लिखी जा सकती है। जिस तरह से आज कविता का रूप सिमटकर गद्य कविता में बदलता जा रहा है। ठीक उसी प्रकार नज़्म के साथ भी ऐसा होता प्रतीत हो रहा है।
ग़ज़ल लिखने वाले को ग़ज़लगो कहते हैं और नज़्म लिखने वाले को नज़्मगो कहते हैं। ग़ज़ल में बड़ी से बड़ी बात को दो मिसरों में कहा जाता है और एक छोटी बात को एक कविता यानी नज़्म के रूप में कहा जा सकता है। एक समीक्षक ने कहा कि नज़्मगो कुँए को तालाब बना देता है और ग़ज़लगो गागर में सागर भर देते हैं।
ग़ज़ल और नज़्म में क्या अंतर होता है !!
• ग़ज़ल में हर शेर में अलग अलग विषय उठा कर उसपे बात की जा सकती है जबकि नज़्म किसी एक ही विषय पर लिखी जाती हैं।
• ग़ज़ल में सारे नियमों के साथ ग़ज़ल को लिखा जाता है जैसे कि: मिसरा, शेर, मतला, क़ाफ़िया, रदीफ़ और मक़्ता का प्रयोग करना अनिवार्य है। जबकि नज़्म इन सब नियमों से आज़ाद होती है।
• नज़्म में यदि कोई नियम न भी हों तो भी वो नज़्म कहलाएगी लेकिन ग़ज़ल में यदि एक भी नियम फॉलो न हुआ तो उसे हम ग़ज़ल नहीं कह सकते।
• ग़ज़ल में बहर का उपयोग अनिवार्य है जिसका मतलब मीटर होता है जो मात्राओं को नियम और सीमा तक ही लगाने की अनुमति देता है जबकि नज़्म में बहर को लेके कोई नियम नहीं हैं।
उदहारणतः गुलज़ार साहब की एक नज़्म पेश है-
आदमी बुलबुला है पानी का
और पानी की बहती सतह पर
टूटता भी है डूबता भी है
फिर उभरता है, फिर से बहता है
न समुंदर निगल सका इस को
न तवारीख़ तोड़ पाई है
वक़्त की हथेली पर बहता
आदमी बुलबुला है पानी का।
आप इसे मुक्त छंद की कविता के रूप में देख सकते हैं।
नज़्म वैसे तीन प्रकार से लिखी जाती रही है। इसके प्रकार के नाम इस तरह है-
1. आज़ाद नज़्म
2. पाबंद नज़्म
3. मुअर्रा नज़्म
3. नासरी नज़्म
Types of nazm
आज़ाद नज़्म- मुक्त छंद कविता को आजाद नज़्म कहते हैं।आजकल सबसे मशहूर नज़्म का रूप है ये। आज़ाद नज़्म वो नज़्म होती है, जिसमें मीटर, काफ़िया और रदीफ़ को ध्यान में रखने की आवश्यकता नहीं होती है। आप चाहे तो इनका प्रयोग भी कर सकते हैं। लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि आप बहर / अरकान से मुक्त होकर इसका ढांचा ही बिगाड़ दें। ऊपर दी गयी गुलज़ार साहब की नज़्म देखिए।
पाबंद नज़्म-
पाबंद नज़्म एक ऐसी नज़्म होती है, जिसमें नियमों की पाबंदी होती है। इस तरह की नज़्म बहर, वज्न में तो होनी ही चाहिए, साथ ही काफ़िया का प्रयोग भी होना चाहिए। निदा फ़ाज़ली की ये नज़्म देखिए-
एक चिड़िया
जामुन की इक शाख़ पे बैठी इक चिड़िया
हरे हरे पत्तों में छप कर गाती है
नन्हे नन्हे तीर चलाए जाती है
और फिर अपने आप ही कुछ उकताई सी
चूँ चूँ करती पर तोले उड़ जाती है
धुँदला धुँदला दाग़ सा बनती जाती है
मैं अपने आँगन में खोया खोया सा
आहिस्ता आहिस्ता घुलता जाता हूँ
किसी परिंदे के पर सा लहराता हूँ
दूर गगन की उजयाली पेशानी पर
धुँदला धुँदला दाग़ सा बनता जाता हूँ
मुअर्रा नज़्म -
इस प्रकार की नज़्म में एक बहर व वज़न को हर मिसरे में दोहराने की पाबंदी होती है। इस नज़्म में काफ़िया और रदीफ़ नही पाए जाते।
नासरी नज़्म-
इसका अर्थ कहीं न कहीं गद्य कविता या english में prose poetry से सम्बंधित है और यह फ्रांसीसी से अंग्रेज़ी भाषा से होकर उर्दू में आया है। इस तरह की नज़्म में काफ़िया, रदीफ़ और वज्न आदि ध्यान में नहीं रखा जाता है। सिर्फ एक ख़्याल को शब्दों के जाल में बन दिया जाता है।
......To be continued.......
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