Sunday, 10 May 2020

Week 1: Chapter 1: गज़ल की महत्ता और उपयोगिता - आनंद कक्कड़

शायरी की महत्ता और उपयोगिता-आनन्द कक्कड़

मित्रो,
शायरी आखिरकार इतनी प्रचलित क्यो है कि कोई भी संबोधन इसके बगैर पूरा नही होता। फिर वो चाहे दिल की बात किझि तक पहचानी हो, ओशो रजनीश के प्रवचन हो, नेतागिरी हो या फिर सेल्स मीटिंग या पुरुस्कार समारोह। 
जीवनके हर मोड़ पर जैसे आपका दमन पकड़े कोई हमसफर हो ऐसे जो साथ निभाती है शायरी।
या यूं कहें कि आपको जीवन को जीवन से जोड़ने का काम करती है शायरी।
हाँ ये भी एक पहलू हो कि शायरी की समझ किझि तो आता ही न हो। अमूमन कहते हुए लोग मिल जाएंगे कि मुझे तो समझ ही नही आती शायरी। ये सिर्फ उस आशीर्वाद की कमीं जैसा है जो प्रकर्ति ने उन्हें नही आता किया।
मेरे खयाल से ज़रा से शायरी पड़ने समझने के झुकाव से इस खूबसूरत विधा को आसानी से समझा जा सकता है। 
आनंद कक्कड़

शेर-ओ-शायरी, शायरी या सुख़न भारतीय उपमाामहाद्विप में प्रचालित एक कविता का रूप हैं जिसमें उर्दू-हिन्दी भाषााओं में कविताएँ लिखी जाती हैं।[1] 

शायरीमें संस्कृतफ़ारसीअरबी और तुर्की भाषाओँ के मूल शब्दों का मिश्रित प्रयोग किया जाता है। शायरी लिखने वाले कवि को शायर या सुख़नवर कहा जाता है।

शेर ओ शायरी आम प्रयोग में प्रचतिल है-

भारतीय उपमहाद्वीप की संस्कृति में ऐसा होता आया है कि अगर कोई शेर लोकप्रीय हो जाए तो वह लोक-संस्कृति में एक सूत्रवाक्य की तरह शामिल हो जाता है। उदाहरण के लिए:

  • इब्तेदा-ए-इश्क़ है, रोता है क्या - इसकी दूसरी पंक्ति है, 'आगे-आगे देखिये होता है क्या'। यह अक्सर किसी मुश्किल काम (जिसमें प्रेम-प्रयास भी है) के करते समय कहा जाता है। इसका अर्थ है कि 'अभी तो मुश्किल काम शुरू हुआ है, अभी और कठिनाई आएगी, अभी से क्या रोना?'[2]
  • ख़ुदी को कर बुलन्द इतना - यह इक़बाल का शेर है जिसके आगे का भाग है 'के हर तक़दीर से पहले, ख़ुदा बन्दे से ख़ुद पूछे, बता तेरी रज़ा क्या है'। इसका अर्थ है कि 'इतने लायक़ बनो कि जीवन के हर मोड़ पर भगवान तुम्हारा भाग्य लिखते हुए तुम्ही से तुम्हारी जो मर्ज़ी हो पूछ कर लिख दे'।
  • ख़ाक़ हो जाएँगे हम तुम को ख़बर होने तक - इसका पहला जुमला है 'हमने माना के तग़ाफ़ुल न करोगे लेकिन'। इसमें प्रेमी अपनी प्रेमिका से कह रहा है कि वह जानता है कि उसकी व्याकुलता के बारे में सुनकर वो बिना विलम्ब (तग़ाफ़ुल) किये आ जाएगी; लेकिन डर यह है कि उसका दुख इतना भारी है कि वह प्रेमिका को ख़बर मिलने से पहले ही मर जाएगा'। यह भारतीय संसद में एक सांसद ने भूतपूर्व प्रधान मंत्री नरसिंहराव से अपने क्षेत्र के लिए मदद मांगते हुए कहा था। नरसिंहराव का उत्तर था- " घबराइये नहीं! हम आपको ख़ाक़ नहीं होने देंगे।"
  • और भी ग़म हैं ज़माने में - यह फैज़ अहमद फैज़ के एक शेर का हिस्सा है, पूरा शेर है: 'मुझ से पहली सी मुहब्बत मेरे महबूब न मांग और भी दुख हैं ज़माने में मुहब्बत के सिवा'। इसका अर्थ है कि दुनिया में इतनी मुश्किलें-तकलीफ़ें हैं कि आदमी हर समय आनंद देने वाली चीज़ों पर ध्यान नहीं दे सकता।[3]
  • तुम्हें याद हो के न याद हो - इसका पूरा शेर है 'वो जो हम में तुम में क़रार था, तुम्हें याद हो के न याद हो' और इसी ग़ज़ल का एक और अंश है 'मुझे सब है याद ज़रा-ज़रा, तुम्हें याद हो के न याद हो'। यह ऐसे दोस्तों-प्रेमियों को शर्मिंदा करने के लिए कहा जाता है जो किसी के साथ अपना पुराना सम्बन्ध भूल गए हों।[2]
  • References:
  • !1 Culture of Hindi, Malik Mohammad, Kalinga Publications, 2005, ISBN 978-81-87644-73-6
  • 2↑   Master couplets of Urdu poetry, K. C. Kanda, Institute of Southeast Asian Studies, 2002, ISBN 978-81-207-2356-6... Ibteda-e-ishq hai rota hai kya, Aage aage dekheye hota hai kya ... Woh jo hum mein tum mein qaraar tha tumhen yaad ho ke na yaad ho, Wohi waada yaani nibah ka, tumhen yaad ho ke na yaad ho ...
  • 3 Masterpieces of Urdu nazm, K. C. Kanda, Sterling Publishers Pvt. Ltd, 2009, ISBN 978-81-207-1952-1... Aur bhi dukh hain zamane mein mahabbat ke siwa, Raahaten aur bhi hain wasal ki raahat ke siwa
  • (सभार विककिपीडिया)

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