Anand Kakkar: दिल
तो आखिर दिल
है........
दिल सबसे मक़बूल
विषय रहा है
शायरी में। अनगिनत
शेर कहे गए
दिल के बारे
में और बात
यहां तक की
गई कि...टूटे
दिल वाले ही
शायरी समझ और
लिख पाते है....।।
दिल शायरी के इस
इन्तिख़ाब को पढ़ते
हुए आप अपने
दिल की हालतों,
कैफ़ियतों और सूरतों
से गुज़़रेंगे और
हैरान होंगे कि
किस तरह किसी
दूसरे, तीसरे आदमी का
ये बयान दर-अस्ल आप
के अपने दिल
की हालत का
बयान है। इस
बयान में दिल
की आरज़ुएँ हैं,
उमंगें हैं, हौसले
हैं, दिल की
गहराइयों में जम
जाने वाली उदासियाँ
हैं, महरूमियाँ हैं,
दिल की तबाह-हाली है,
वस्ल की आस
है, हिज्र का
दुख है।
दिल ए
नादां तुझे हुआ
क्या है
आखिर इस दर्द
के दवा क्या
है
आइये आज अपने
शेरो-सुखन के
कलेक्शन को पलटें
और दिल की
इस महफ़िल में
चिराग रोशन करें।
दिल भी पागल
है कि उस
शख़्स से वाबस्ता
है
जो किसी और
का होने दे
न अपना रक्खे
अहमद फ़राज़
दिल की
वीरानी का क्या
मज़कूर है
ये नगर सौ
मर्तबा लूटा गया
मीर तक़ी मीर
दिल ना-उमीद
तो नहीं नाकाम
ही तो है
लम्बी है ग़म
की शाम मगर
शाम ही तो
है
कुछ ठोकरों के बाद
नज़ाक़त आ गई
मुझ में,
अब दिल के
मशवरों पे मैं
भरोसा नहीं करता
तू भी खामख्वाह
बढ़ रही है
ऐ धूप,
इस शहर में
पिघलने वाले दिल
ही नहीं रहे।
यूँ तसल्ली दे रहे
हैं हम दिल-ए-बीमार
को,
जिस तरह थामे
कोई गिरती हुई
दीवार को।
आप पहलू
में जो बैठें
तो सँभल कर
बैठें
दिल-ए-बेताब
को आदत है
मचल जाने की
जिस नगर भी
जाओ किस्से हैं
कमबख्त दिल के
कोई ले के
रो रहा है
कोई दे के
रहा है
वो अंदाज़-ए-इल्म-ओ-अदब
खो गया
ग़ज़ल से ग़ज़ल
का सबब खो
गया !!
मिरे साथ ही
था मिरा हम-सफ़र
मगर भीड़ में
जाने कब खो
गया
हमेशा तो ऐसा
है होता नहीं
हाँ इक बार
दिल ये ग़ज़ब
खो गया
अँधेरा है छाया
वजह से किसी
उजाला मगर बे-सबब खो
गया
ज़माने को करदे
जो पल में
सही
वो लगता है
ग़ैज़-ओ-ग़ज़ब
खो गया
बचा है किसी
का तो अच्छी
है बात
हमारा तो अपना
लक़ब खो गया
!
वो पहले सी
मस्ती, मुसर्रत, बहार
मज़ा ज़िंदगी का तो
सब खो गया
चलो आओ
ढूँढें जहाँ में
'जेहद'
कहाँ पर हमारा
अदब खो गया
जावेद जेहद
दिल कहीं, ज़ेहन कहीं,
जिस्म कहीं, रूह
कहीं
आदमी टूट के
बिखरा कभी ऐसा
तो न था
अनवर जलालपुरी
ना जाने कौन
सी दौलत हैं
कुछ लोगों के
लफ़्जों में,
बात करते हैं
तो दिल ही
खरीद लेते हैं।
नामालूम
बहुत देता है
तू उसकी गवाहियाँ
और सफाईयां,
समझ नहीं आता
तू मेरा दिल
है या उसका
बकील।
नामालूम
दिलों में ज़ख्म
लबों पर हंसी
ज़ियादा है
हमारे अहद में
बे चेहरगी ज़ियादा
है
अनवर जलालपुरी
ग़म मुझे हसरत
मुझे वहशत मुझे
सौदा मुझे
एक दिल दे
कर ख़ुदा ने
दे दिया क्या
क्या मुझ
सीमाब अकबराबादी
शब्दों से ही
लोगों के दिलों
पे राज
किया जाता है,
चेहरे का क्या,
वो तो किसी
भी
हादसे मे बदल
सकता है।
दिया ख़ामोश है लेकिन
किसी का दिल
तो जलता है
चले आओ जहाँ
तक रौशनी मा'लूम होती
है
ये दिल बच
कर ज़माने भर
से चलना चाहे
है लेकिन
जब अपनी राह
चलता है अकेला
होने लगता है
वसीम बरेलवी
दिल लज़्ज़त-ए-निगाह
करम पा के
रह गया
कितना हसीन ख़्वाब
नज़र आ के
रह गया
शकील बदायूंनी
बुत-ख़ाना तोड़ डालिए
मस्जिद को ढाइए
दिल को न
तोड़िए ये ख़ुदा
का मक़ाम है
Haider Ali Atish
तुम्हारा नाम किसी
अजनबी के लब
पर था
ज़रा सी बात
थी दिल को
मगर लगी है
बहुत।
- सादिक नसीम
दिल क्या मिलाओगे
कि हमें आ
गया यक़ीं,
तुमसे तो ख़ाक
में भी मिलाया
न जाएगा।
- अज्ञात
तड़पूँगा उम्र-भर
दिल-ए-मरहूम
के लिए
कम-बख़्त ना-मुराद
लड़कपन का यार
था
बेख़ुद देहलवी
दिल में किसी
के राह किए
जा रहा हूँ
मैं
कितना हसीं गुनाह
किए जा रहा
हूँ मैं
- जिगर मुरादाबादी
अभी तक मौजूद
हैं इस दिल
पर तेरे कदमों
के निशान,
हमने
तेरे बाद किसी
को इस राह
से गुजरने नहीं
दिया…
नामालूम
तेरे क़दमों की आहट
को ये दिल
है ढूँढता हर
दम
हर इक आवाज़
पर इक थरथराहट
होती जाती है
हां, कोई और
होगा तूने जो
देखा होगा
हम नहीं आग
से बच-बचके
गुज़रने वाले
मीना कुमारी
दिल पर हम
बेवज़ह इल्ज़ाम लगाते
हैं ,
धोखा तो
अक्सर धड़कन दिया
करती है I
भूल शायद बहुत
बड़ी कर ली
दिल ने दुनिया
से दोस्ती कर
ली
आस डूबी तो
दिल हुआ रौशन
बुझ गया दिल
तो दिल के
दाग़ जले
आप पेहलू मे जो
बैठे तो संभल
कर बैठे,
दिल -ए-बेताब
को आदत है
मचल जाने की
जलील मानीकपूरी
न हम-सफ़र न
किसी हम-नशीं
से निकलेगा
हमारे पाँव का
काँटा हमीं से
निकलेगा
राहत इंदौरी
अंदर का
ज़हर चूम लिया
धुल के आ
गए
कितने शरीफ़ लोग थे
सब खुल के
आ गए...
राहत इंदौरी
कहीं अकेले
में मिल कर
झिंझोड़ दूँगा उसे,
जहाँ जहाँ से
वो टूटा है
जोड़ दूँगा उसे...
कुछ कह
रही हैं आप
के सीने की
धड़कनें
मेरा नहीं तो
दिल का कहा
मान जाइए...
किसी के दिल
को यहां कैसे
कोई समझेगा
मुहाल ख़ुद से
अगर ख़ुद की
हो शनासाई
हर धड़कते पत्थर को
लोग दिल समझते
हैं
उम्रें बीत जाती
हैं दिल को
दिल बनाने में
मुद्दत के ब'अद
आज उसे देख
कर "मुनीर"
एक बार तो
दिल धड़का मग़र
फ़िर संभल गया....!
शाम से ही
,बुझा सा रहता
है
दिल हुआ है
चिराग़ मुफ़्लिस का
मीर तक़ी मीर
बे-समझे ना
जाम -ए-गम
पिया था मैने,
यह काम तो
जान कर किया
था मैने।
अंजाम पे थी
नजर जो रोया
था बहुत,
जिस रोज की
तुझ को दिल
दिया था मैने।
बाहसत राहा अली
कलकतवी
''आप की
याद आती रही
रात भर''
चाँदनी दिल दुखाती
रही रात भर
मेरे दिल में
तू ही तू
है दिल की
दवा क्या करूँ
दिल भी तू
है जाँ भी
तू है तुझपे
फ़िदा क्या करूँ...
कैफी आजमी
सोज़िश ए दिल
को अपने साज़
भला कैसे करे,
कोई इस दर्द
का अंदाज़ भला
कैसे करे।
इश्क़ जब हर्फ़
ए हक़ सा
दिल में जगह
पा जाए,
फिर ज़माना ख़लल अंदाज़
भला कैसे करे।
इस क़दर रंज
ओ ग़म से
साबक़ा हो जब
मेरा,
ख़ुद को दिल
ज़मज़मा परदाज़ भला
कैसे करे।
है पसोपेश में वो दोस्त
नया है शायद,
दिल का दर
यूँ ही तुझपे
वाज़ भला कैसे
करे।
जो साफ़ तौर
से बहके हुए
से हैं 'महरम'
नीयत ए दिल
उन्हें हमराज़ भला कैसे
करे।
मधुप 'महरम'
दरमियाँ अपने
जुस्तजू क्या
है
बोलिये दिल के रूबरू क्या
है
जब छलक आये
दर्द-ए-दिल
जानाँ
इससे बेहतर कोई वज़ू क्या है
समीर लखनवी
शाम होते ही
चरागों को को
बुझा देता हूँ,
दिल ही काफ़ी
है तेरी याद
में जलने के
लिए......!
शायर नामालूम
आबादी भी देखी
है वीरानी भी
देखें है,
जो उजड़े और फिर
न बसे...दिल
वो निराली बस्ती
है
फानी
दिल -ए-मुज़्तर को समझाया
बहुत है
हुआ तन्हा तो घबराया
बहुत है
(# anxious heart, impatient heart)
मिरे दिल का
ये आलम भी
अजब है
कि जिस पर
आ गया आया
बहुत है
शाबाश समीर
दिल धड़कने का सबब
याद आया
वो तिरी याद
थी अब याद
आया
आज मुश्किल था सँभलना ऐ दोस्त
तू मुसीबत में अजब याद आया
बस इतना उपहार
मुझे दो।
अपने हृदय का
प्यार मुझे दो।।
ले लूँ सारा
लोचन नीर।।
बस इतना अधिकार
मुझे दो।
अपने हृदय का
प्यार मुझे दो।।
डा.लवलेश
दत्त
मुंह की बात
सुने हर,
कोई दिल के
दर्द को जाने
कौन,
आवाजो के बाजारो
में,
खामोशी पहचाने कौन।।
निदा फाजली
हर धड़कते पत्थऱ को
,लोग दिल समझते
हैं,
उमर बीत जाती
हैं ,दिल को
दिल बनाने में।।
बशीर बदर
हमारा दिल सवेरे
का सुनहरा जाम
हो जाए
चराग़ों की तरह
आँखें जलें जब
शाम हो जाए।
बशीर बदर
हसीं तो और
हैं लेकिन कोई
कहाँ तुझ सा
जो दिल जलाए
बहुत फिर भी
दिलरुबा ही लगे
बशीर बदर
फिर तेरा वादा
ए शब याद
आया
दिल धड़कने का सबब
याद आया
आँख से पूछा
हाल दिल का
....
एक बुंद टपक
पड़ी लहू की।।
मीर तकी
मीर
लोग सुनते रहे दिमाग़
की बात
हम चले दिल
को रहनुमा कर के
राजेश रेड्डी
तुम ज़माने की राह
से आए
वर्ना सीधा था
रास्ता दिल का
बेखुदी ले उड़ी
हवस कही,
है कोई दिल
के आस पास
कहीं।।
-सैफुद्दीन
सैफ
जिस नगर भी
जाओ, किस्से हैं
कमबख़्त दिल के,
कोई ले के
रो रहा है,
कोई दे के
रो रहा है।।
नामालूम
ये बात
सच है कि
मरना सभी को
है लेकिन
अलग ही होती
है लज़्ज़त निगाह-ए-क़ातिल
की..
रास्तों का इल्म
था हम को
न सम्तों की
ख़बर
शहर-ए-ना-मालूम की चाहत
मगर करते रहे
हम ने ख़ुद
से भी छुपाया
और सारे शहर
को
तेरे जाने की
ख़बर दीवार-ओ-दर करते
रहे
बहस नहीं हो
पायी है, आइन्दा
रखा जाय
हुक्म हुआ है
मिरा मसअला ज़िंदा
रखा जाय
उल्टे सीधे
लोग यहाँ कैसे
रह सकते है
दिल है इसमें
दिल का ही
बाशिन्दा रक्खा जाए
सरदार आसिफ़
तुझ को पा
कर भी न
कम हो सकी
बे-ताबी-ए-दिल
इतना आसान तिरे
इश्क़ का ग़म
था ही नही
Firaq Gorakhpuri
दर्द से कह
दो की कोई
ओर मकॉ ढूँढ
ले,
मेरे दिल ने
बेबसी को पनाह
देना बंद कर
दिया है।।
नामालूम
सिर्फ़ हल्की सी बे-क़रारी है
आज की रात
दिल पे भारी
है
- फ़हमी बदायूनी
दिल की तस्कीन
पूछते हैं आप
हाँ मिरी जान
हो गई होगी
सैफुद्दीन सैफ़
बस एक
निगाह से लुटता है क़ाफ़िला दिल का
-फराज़
वो बात
बात पे देता
है परिंदों की
मिसाल
साफ़ साफ़ नहीं
कहता मेरा शहर
ही छोड़ दो
-फ़राज़
अदा से देख
लो जाता रहे
गिला दिल का
बस इक निगाह
पे ठहरा है
फ़ैसला दिल का
- अरशद अली ख़ान
क़लक़
ये जो
दीवार पे कुछ
नक़्श हैं धुँदले
धुँदले
उस ने लिख
लिख के मेरा
नाम मिटाया होगा
साग़र आज़मी
हर सदा
पर लगे हैं
कान यहाँ
दिल सँभाले रहो ज़बाँ
की तरह
किसी सूरत भी
नींद आती नहीं
मैं कैसे सो
जाऊँ
कोई शय दिल
को बहलाती नहीं
मैं कैसे सो
जाऊँ
-अनवर मिर्ज़ापुरी
जिस्म की बात
नहीं थी उन
के दिल तक
जाना था
लम्बी दूरी तय
करने में वक़्त
तो लगता है
हमारे दिल न
देने पर ख़फ़ा
हो
लुटाते हो तुम्हीं
ख़ैरात कितनी
- नूह नारवी
सैफ़ ख़ून ए
जिगर पड़ा पीना
ऐसे बुझती है दिल
की प्यास कहीं
-सैफ़
बेरुख़ी का है
सिलसिला कितना
दिल से है
दिल का फ़ासिला
कितना
अक़्ल से भी
सुलझ नहीं पाता
सख़्त है दिल
का मरहला कितना
दर्दे
दिल दर्द आशना
जाने और बेदर्द
कोई क्या जाने
कर दिया
एक निगाह में
बेखुद चश्मे-काफ़िर है क्या
खुदा जाने
-बहादुर शाह
ज़फर
दिल
ही तो है
न संग-ओ-ख़िश्त दर्द से
भर न आए
क्यूँ
रोएँगे हम हज़ार
बार कोई हमें
सताए क्यूँ
जो
निगाह-ए-नाज़
का बिस्मिल नहीं
दिल नहीं वो
दिल नहीं वो
दिल नहीं
आप अब पूछने
को आए हैं
दिल मिरी जान
मर गया कब
का
अर्ज़ ए नियाज़
ए इश्क़ के
क़ाबिल नहीं रहा
जिस दिल पे
नाज़ था मुझे
,वो दिल नहीं
रहा
तजुर्बा कहता है
मोहब्बत से किनारा
कर लूँ...
और दिल
कहता है ये
तज़ुर्बा दोबारा कर लूँ
.
नामालूम
धडकनो को भी
रास्ता दे दीजिए
जनाब
आप तो
सारे दिल पर
कब्जा किए बैठे
है..
अज्ञात
नया इक
रिश्ता पैदा क्यूँ
करें हम?
बिछड़ना है, तो
झगड़ा क्यूँ करें
हम?
ख़ामोशी से अदा
हो रस्म-ए-दूरी
कोई हंगामा बरपा क्यूँ
करें हम??
अदा से देख
लो जाता रहे
गिला दिल का,
बस एक निग़ाह
पे ठहरा है
फ़ैसला दिल का…!!
तुम्हारा दिल मिरे
दिल के बराबर
हो नहीं सकता
वो शीशा हो
नहीं सकता ये
पत्थर हो नहीं
सकता
दाग़ देहलवी
दिल दे
तो इस मिज़ाज
का परवरदिगार दे
जो रंज की
घड़ी भी ख़ुशी
से गुज़ार दे
दौलत जहाँ की
मुझको तू मेरे
खुदा न दे
पूरी हों सब
जरूरतें इसके सिवा
न दे
वरना तू धड़कनों
को कोई सिलसिला
न दे
सदा अम्बालवी
हर धड़कते
पत्थर को लोग
दिल समझते हैं
उम्रें बीत जाती
हैं दिल को
दिल बनाने में
बशीर बद्र
कह दो
इन हसरतों से
कहीं और जा
बसें
इतनी जगह कहाँ
है दिल-ए-दाग़-दार
में
सांस भरने को
जीना नहीं कहते
या रब,
दिल ही दुखता
है ना अब
आस्तीन तर होती
हैं
मीना कुमारी
सीने में
इक खटक सी
है और बस
हम नहीं जानते
कि क्या है
दिल
बड़ा शोर
सुनते थे पहलू
में दिल का
जो चीरा तो
इक क़तरा-ए-ख़ूँ न
निकला
यह गुस्ताख दिल न
जाने क्या कर
बैठा
मुझसे पूछे बिना
ही फैसला कर
बैठा
इस धरती पर
टूटता सितारा भी
नही गिरता
और ये पागल
चाँद से मुहब्बत
कर बैठा
दिल में अब
यूं तेरे भूले
हुए ग़म आते
हैं
जैसे बिछड़े हुए काबे
में सनम आते
हैं
शबे फ़ुरक़त से कहो
,और देर से
गुज़रे
दिल भी कम
दुखता है, वो
याद भी कम
आते हैं
दुरुस्त रस्म है...
दिलबर... अज़ीज़-ए-दिल ही
रहे...!!
दिल सुने... दिल की
ज़बाँ... चाहे... वो कहे
न कहे...!!
"तितिक्षा
नन्ही"
अदब से बैठे
हैं... अंजुम में.. अदू
ए उल्फत...!!
बात ये है
के... अपना दिल...
निसार उनपे हुआ..!!
आईना आज फिर
रिशवत लेता पकडा
गया,
दिल में
दर्द था ओर
चेहरा हंसता हुआ
पकडा गया..
कुछ खटकता
तो है पहलू
में मिरे रह
रह कर
अब ख़ुदा जाने तिरी
याद है या
दिल मेरा
आओ... के इबादत
की... अब आदत...
बना ले हम...!!
तुम... रू-ब-रू होते
हो... तो... सजदे
में... दिल झुके...!!
कपड़े सफ़ेद धो
के जो पहने
तो क्या हुआ
धोना वही जो
दिल की सियाही
को धोइए
शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम
एक दफ़ा... दिल के
तार छेड़ दो...
तुम लब हिलाकर...!!
कितनी ख़ामोश है... ये
ज़िन्दगी... तुम्हारे बिना...!!
"तितिक्षा
नन्ही"
तुम कहाँ
वस्ल कहाँ वस्ल
की उम्मीद कहाँ
दिल के बहकाने
को इक बात
बना रखी है
आग़ा शाएर क़ज़लबाश
अक़्ल ओ दिल
अपनी अपनी कहें
जब 'ख़ुमार'
अक़्ल की सुनिए
दिल का कहा
कीजिए
पेंच-ओ-ख़म...
गेसुओं के... ग़र सुलझे...!!
उनके... अटके हुए...
दिल का... क्या
हो...??
"तितिक्षा
नन्ही"
आह जो दिल
से निकाली जाएगी,
क्या समझते हो कि
ख़ाली जाएगी...
अकबर इलाहाबादी
मुझे तो
उन की इबादत
पे रहम आता
है
जबीं के साथ
जो सज्दे में
दिल झुका न
सके
ख़ुमार बाराबंकवी
लाजवाब सर्द शामें थीं... सुबह
बूंदों को... बरसा पाया...!!
किसी के
वास्ते... दिल... इस क़दर
भी रोया है...??
खूब ज़रा सी बात
जो फैली तो
दास्तान बनी
वो बात ख़त्म
हुई दास्तान बाक़ी
है
बंध गई थी
दिल में कुछ
उम्मीद सी
ख़ैर तुम ने
जो किया अच्छा
किया
जावेद अख़्तर
बहुत ख़ूब अहसास।बहर
दुररुस्त हो तो
शेर हो जाये।
बहुत ख़ूब अहसास।बहर
दुररुस्त हो तो
शेर हो जाये।
दूर बैठे कब
तलक तड़पाओगे
इश्क़ है सच्चा
तो मिलने आओगे
दर्द तो लाज़िम
है ज़िंदा हो
अगर
ज़ख्म दिल का
कब तलक सहलाओगे
नाम उसका सुन
के जी उठता
है दिल
या-ख़ुदा क्या
इश्क़ में मरवाओगे
(लाज़िम- indispensable, compulsory)
- समीर 'लखनवी'
आज दिल की
ज़ेरोक्स निकलवाई,
सिर्फ बचपन वाली
तस्वीरें ही रंगीन
नज़र आई!
गुलजार
काफिले पहुंचे हजारों
मंजिले मकसूद तक।
हम अकेले रह गए
नक्शे कफेपा देखते।
तमाम लोगों
को अपनी अपनी
मंजिल मिल चुकी,
कम्बखत हमारा दिल है
कि अब भी
सफर में है
ना मालूम
कैफ़' का दिल
'कैफ़' का दिल
है मगर
वो नज़र फिर
वो नज़र है
क्या करूँ
'कैफ़' मैं हूँ
एक नूरानी किताब
पढ़ने वाला कम-नज़र है
क्या करूँ
- कैफ़ भोपाली
अभी आखों
में शमाये जल
रही है प्यार
जिन्दा है,
अभी
मायूस मत होना
अभी बीमार जिन्दा
हैं,
हजारों जख्म खाके
भी मैं दुश्मन
के मुकाबिल हूँ,
ख़ुदा का शुक्र
है अब तक
दिल-ए-खुद्दार
जिन्दा है
दिल को जब
दिल से राह
होती है
आह होती है
वाह होती है
इक नज़र दिल
की सिम्त देख
तो लो
कैसे दुनिया तबाह होती
है
जिगर मुरादाबादी
सब्र तो
आने दिजिये दिल
को
अपना पाना मुहाल
तो रखिये!!
जौन एलिया
आज किसी ने
दिल तोड़ा तो
हम को अचानक
ध्यान आया
जिसका दिल हमने
तोड़ा था ,वो
जाने कैसा होगा
जावेद अख़्तर
यूँ ग़म के
अंधेरों से मायूस
न हो ऐ
दिल
हर शाम के
दामन में एक
सुबह दरख़्शां है
दिल ही न
शगुफ़्ता हो तो
कैसे कहूँ 'राही'
मौसम की नवाज़िश
है फैज़ान-ए-बहाराँ है
रामचंद्र लाल 'राही
बीसलपुरी
(दरख़्शां-shining,
प्रकाशमान, शगुफ़्ता-खिला हुआ,
फैज़ान-favour, generosity बहाराँ-बसंत ऋतु)
दिल भी
पागल है कि
उस शख़्स से
वाबस्ता है
जो किसी और
का होने दे
न अपना रक्खे
कभी उदास बैठे
हो तो बता
देना....
हम फिर से
अपना दिल देंगे
खेलने के लिए
मेरे दिमागो दिल पे
वो इस तरह
छा गये
मुझको मेरे वुजूद
का साया बना
गये
दिल देके उनसे
इश्क़ की बाज़ी
ही जीत ली
दुनिया समझ रही
है कि हम
मात खा गये
- रामचन्द्र
लाल 'राही बीसलपुरी'
टूटे हुए दिल
भी धड़कते है
उम्र भर,
चाहे किसी की
याद में या
फिर किसी फ़रियाद
में..!!
नामालूम
ज़ब्त अपना शिआर
था,न रहा
दिल पे कुछ
इख़्तियार था,न
रहा
दिले मरहूम को ख़ुदा
बख़्शे
एक ही ग़मगुसार
था, न रहा
[ज़ब्त- नियंत्रण, शिआर- स्वभाव]
दिल के लिये
हयात का पैगाम
बन गईं
बैचैनियाँ सिमट के
तेरा नाम बन
गईं
ज़रूरी तो नहीं
जो ख़ुशी दे
उसी से प्यार
हो।
क्योकि…
सच्ची मोहब्बत अक्सर दिल
तोड़ने वालो से
ही होती है….!!
दिल टूटा
है सम्भलने में
कुछ वक्त तो
लगेगा,
हर चीज़
इश्क़ तो नहीं
कि एक पल
में हो जाये।
तुम पूछो और
मैं न बताऊँ
ऐसे तो हालात
नहीं
एक ज़रा सा
दिल टूटा है
और तो कोई
बात नहीं
क़तील शिफ़ाई
आज फिर दिल
ने एक तम्मना
की
आज फिर दिल
को हमने समझाया
गुजरा फिर यादों
का झोंका ,
दिल ने फिर साँसों
को रोका….
कि किसी को
चाहने से कोई
अपना नहीं होता.
फ़राज़
दिल को ख़ुदा
की याद तले
भी दबा चुका
कम-बख़्त फिर भी
चैन न पाए
तो क्या करूँ
- हफ़ीज़ जालंधरी
ये आग
और नहीं दिल
की आग है
नादां
चिराग
हो के न
हो, जल बुझेंगे
परवाने.
जो गुज़ारी न जा
सकी हम से
हम ने वो
ज़िंदगी गुज़ारी है
'जौन' दुनिया की चाकरी
कर के
तूने दिल की
वो नौकरी क्या
की
जौन एलिया
कोई आहट,
कोई आवाज़, कोई
छाप नहीं
दिल की गलियाँ
बड़ी सुनसान है
आए कोई
परवीन शाक़िर
काश की खुदा
ने दिल शीशे
के बनाये होते,
तोड़ने वाले के
हाथों में जख्म
तो आए होते।
Agyat
बिछड़ना है तो,
रूह से निकल
जाओ,
रही बात दिल
की, उसे हम
देख लेंगे।
इश्क़ हारा है
तो दिल थाम
के क्यों बैठे
हो,
तुम तो हर
बात पर कहते
थे कोई बात
नहीं।
कुछ अपने दिल
की ख़ू का
भी शुक्राना चाहिए
सौ बार उन
की ख़ू का
गिला कर चुके
हैं हम
क़रार दिल को
सदा जिस के
नाम से आया
वो आया भी
तो किसी और
काम से आया
जमाल एहसानी
कल रात
में शिकस्त-ए-सितम्गर से खुश
हुआ,
वो रो पड़ा
तो दिल मेरा
अंदर से खुश
हुआ,
खुश वो है
जिसके वास्ते दुनिया
सराब है
उसकी खुशी भी
क्या जो मयस्सर
से खुश हुआ...
जमाल एहसानी
आँखों में जो
बात हो गई
है
इक शरह-ए-हयात हो
गई है
जब दिल की
वफ़ात हो गई
है
हर चीज़ की
रात हो गई
है
ग़म से छुट
कर ये ग़म
है मुझ को
क्यूँ ग़म से
नजात हो गई
है
मुद्दत से ख़बर
मिली न दिल
की
शायद कोई बात
हो गई है
दरे ए
कफ़स पे अंधेरे
की मोहरें लगती
हैं
तो 'फ़ैज़' दिल
में सितारे उतारने
लगते हैं
दिलों का इज्तेराब
निगाहों की___ चुभन
जहां की लज्जतों
में नहीं इसका
कोई हल
दुनिया की महफ़िलों
से उकता गया
हूँ या रब
क्या लुत्फ़ अंजुमन का
जब दिल ही
बुझ गया हो
अल्लामा इक़बाल
दिया ख़ामोश
है लेकिन किसी
का दिल तो
जलता है
चले आओ जहाँ
तक रौशनी मा'लूम होती
है
NUSHUR WAHIDI
यूँ तसल्ली
दे रहें हैं
हम दिल-ए-बीमार को,
जिस
तरह थामे कोई
गिरती हुई दीवार
को ।
कतील शिफई
यूँ भी
होने का पता
देते हैं
अपनी ज़ंजीर हिला देते
हैं
पहले हर बात
पे हम सोचते
थे
अब फ़क़त हाथ उठा
देते हैं
दिल में जब
बात नहीं रह
सकती
किसी पत्थर को सुना
देते हैं
एक दीवार उठाने के
लिए
एक दीवार गिरा देते
हैं
गर इंतिज़ार
कठिन है तो
जब तलक ऐ
दिल
किसी के वादा-ए-फ़र्दा
की गुफ़्तुगू ही
सही
-फ़ैज़
वीरान खंडर हो
चुका है ये
दिल का मकान
इसकी तामीर अब मुम्किन
नहीं इसको आबाद
ना करो
कब तक
दिल की ख़ैर
मनाएँ कब तक
रह दिखलाओगे ।
कब तक चैन
की मोहलत दोगे
कब तक याद
न आओगे ।
आप की
देन है कि
मुझे शेर-ओ-शायरी में इतनी
दिलचस्पी हो गयी,
अभी मेरे योगदान
का स्तर काफी
नीचे है पर
जल्दी ही सुधर
जायेगा
नज़र से
दिल का रास्ता
है मुख्तसर
बड़ा दुश्वार है लेकिन
चाहतों का सफर
-दानिश
फूंक दूँगा किसी रोज
दिल की दुनिया,
यह तेरा खत
तो नहीं है
की जला भी
न संकू ।
राहत इंदोरी
आज मुझी
पर खुल गया
मेरे दिल का
राज़
आई है हँसते
समय रोने की
आवाज़
निकाल लाया हूँ
एक पिंजरे से
इक परिंदा
अब इस परिंदे
के दिल से
पिंजरा निकालना है
-उमैर नजमी
तुम पूछो और
मैं न बताऊँ
ऐसे तो हालात
नहीं
एक ज़रा सा
दिल टूटा है
और तो कोई
बात नहीं
कातिल शिफाई
अदा से
देख लो जाता
रहे गिला दिल
का
बस इक निगाह
पे ठहरा है
फ़ैसला दिल का
अरशद अली
ख़ान क़लक़
कल शब
दिल-ए-आवारा
को सीने से निकाला...!!
ये आख़िरी काफ़िर भी
मदीने से निकाला...
अब जिस के
जी में आए
वही पाए रौशनी
हम ने तो
दिल जला के
सर-ए-आम
रख दिया
-कातिल शिफाई
ये फ़ौज
निकलती थी कहाँ
ख़ाना-ए-दिल से...!!
समुंदरों के उधर
से कोई सदा
आई
दिलों के बंद
दरीचे खुले हवा
आई
सरक गए थे
जो आँचल वो
फिर सँवारे गए
खुले हुए थे
जो सर उन
पे फिर रिदा
आई
उतर रही हैं
अजब ख़ुशबुएँ रग-ओ-पै
में
ये किस को
छू के मिरे
शहर में सबा
आई
अपने ही होते
हैं जो दिल
पे वार करते
हैं फ़राज़
वरना गैरों को क्या
ख़बर की दिल
की जगह कौन
सी है
फराज
आँखों में हया
हो तो पर्दा
दिल का ही
काफी है फ़राज़
नहीं तो नकाबों
से भी होते
हैं इशारे मोहब्बत
के
फराज
मैं ले
के , दिल के
रिश्ते
घर से निकल
चुका हूं -
दीवार ओ दर
के , रिश्ते
दीवार ओ दर
में होंगे ...
जौन eliea
आग़ाज़-ए-मोहब्बत
का अंजाम बस
इतना है
जब दिल में
तमन्ना थी अब
दिल ही तमन्ना
है
जिगर मुरादाबादी
सामने बैठे रहो
दिल को करार
आएगा ,
जितना देखेंगे तुम्हे उतना
ही प्यार आएगा
Agyaat
देख के
मुझको गौर से...
फिर वो चुप
से हो गए
दिल में ख़लिश
है आज तक...इस अनकहे
सवाल की
अब कहाँ जरुरत
है हाथों में
पत्थर उठाने की,
तोड़ने वाले तो
दिल जुबां से
ही तोड़ दिया
करते है
Agyaat
कोई हमनफ़स नहीं है
,कोई राज़दां नहीं
है
फ़क़त एक दिल
था अपना ,सो
वो मेह्बां नहीं
है
उनके दीदार के लिए
दिल तड़पता है,
उनके इंतजार में
दिल तरसता है,
क्या कहें इस
कम्बख्त दिल को..
अपना हो कर
किसी और के
लिए धड़कता है।
इन्हीं पत्थरों पे चल
कर अगर आ
सको तो आओ
मेरे घर के
रास्ते में
कोई कहकशाँ नहीं है
तलाश मेरी थी
और भटक रहा
था वो,
दिल मेरा था
और धड़क रहा
था वो,
प्यार का तालुक
भी अजीब होता
है,
आंसू मेरे थे
सिसक रहा था
वो..
दर्द-ए-दिल
कितना पसंद आया
उसे..!!
मैं ने जब
की आह उस
ने वाह की ...
- आसी ग़ाज़ीपुरी
ज़ख़्म कहते हैं
दिल का गहना
है..!!
दर्द दिल का
लिबास होता है..!!
- गुलज़ार
ये दिल का
दर्द तो उम्रों
का रोग है
प्यारे ..!!
सो जाए भी
तो पहर दो
पहर को जाता
है ..!!
- अहमद फ़राज़
कब ठहरेगा दर्द ऐ
दिल कब रात
बसर होगी..!!
सुनते थे वो
आएँगे सुनते थे
सहर होगी..!!
- फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
हमसे भी पूछ
लो कभी हाल-ए-दिल
हमारा,
कभी हम
भी कह सकें
की दुआ है
आपकी।
Agyaat
दिखाएगी असर दिल
की पुकार आहिस्ता
आहिस्ता
बजेंगे आप के
दिल के भी
तार आहिस्ता-आहिस्ता
निकलता है शिगाफ़ों
से ग़ुबार आहिस्ता
आहिस्ता
थमेगी आँख से
अश्कों की धार
आहिस्ता आहिस्ता
दिल के कहने
पर चल निकला
मैं भी कितना
पागल निकला
आँसू निकले काजल निकला
रोने से कब
कुछ हल निकला
पोंछ सका बस
अपने आँसू
कितना छोटा आँचल
निकला
चूर हुआ पर
झूठ न बोला
दर्पण मुझ सा
अड़ियल निकला
दुश्मन के घर
बूँदें बरसीं
मेरी छत से
बादल निकला
क़त्ल हुई हर
सूरत आख़िर
दिल मेरा इक
मक़्तल निकला
बाहर से था
ख़ार ‘सदा’ तू
अंदर फूल सा
कोमल निकला
सदा अम्बालवी
चराग़-ए-दिल...
हथेलियों पे... जला रखे
हैं मैंने...!!
राह-ए-उल्फ़त
में... अँधेरा... तुम्हे... एक
पल न मिलेगा...!!
ज़ेह्न ओ दिल
में ये बरहमी
लेकर
क्या करे
इश्क़ बेबसी लेकर
आइये मंज़िलें तलाश करें
हमसफ़र एक गुमरही
लेकर
अपूर्व 'अशेष'
दिल
पागल है रोज़
नई नादानी करता
है
आग में आग
मिलाता है फिर
पानी करता है
इफ़्तिख़ार
आरिफ़
एक अदद चेहरे...
मुस्कुराते हुए... आए हैं...!!
हर एक... दिल है...
हक़ीक़त में... ज़ार
ज़ार यहाँ...!!
"तितिक्षा
नन्ही"
इस... असीरी से... रिहाई... हो
उसे.. हासिल अब...!!
घुट रहा है...
दिल-ए-मेहमान
भी... अंदर मेरा...!!
चीर कर... सीना... निकल
आए... क़ल्ब-ए-पिंजर से...!!
कोई... ले आओ...
इसके वास्ते... खंजर
मेरा..!!
"तितिक्षा
नन्ही"
मैं
हूँ दिल है
तन्हाई है
तुम भी होते
अच्छा होता
उन्हें
अपने दिल की
ख़बरें मिरे दिल
से मिल रही
हैं
मैं जो उन
से रूठ जाऊँ
तो पयाम तक
न पहुँचे
-शकील बदायुनी
फ़क़त
निगाह से होता
है फ़ैसला दिल
का
न हो निगाह
में शोख़ी तो
दिलबरी क्या है
दिल
में न हो
जुरअत तो मोहब्बत
नहीं मिलती
ख़ैरात में इतनी
बड़ी दौलत नहीं
मिलती
मेरी
क़िस्मत में ग़म
गर इतना था
दिल भी या-रब कई
दिए होते
दिल ही तो
है ,सियासत ए
दरबां से डर
गया
मैं ,और जाऊं
दर से तेरे
बिन सदा किये
-ग़ालिब
ऐ
जुनूँ फिर मिरे
सर पर वही
शामत आई
फिर फँसा ज़ुल्फ़ों
में दिल फिर
वही आफ़त आई
-आसी ग़ाज़ीपुरी
दिल की बात
लबों तक ला
कर ,अब तक
हम दुख सहते
हैं
हमने सुना था
इस बस्ती में
दिल वाले भी
रहते हैं
दिल
पर चोट पड़ी
है तब तो
आह लबों तक
आई है
यूँ ही छन
से बोल उठना
तो शीशे का
दस्तूर नहीं
-अंदलीब शादानी
क्या बात है।वाहहहहह
इश्क़
की चोट का
कुछ दिल पे
असर हो तो
सही
दर्द कम हो
या ज़ियादा हो
मगर हो तो
सही
जो
दिल रखते हैं
सीने में वो
काफ़िर हो नहीं
सकते
मोहब्बत दीन होती
है वफ़ा ईमान
होती है
कोई वादा नहीं
किया लेकिन
क्यो तेरा इंतज़ार
रहता है।
बेवजह जब करार
मिल जाए
दिल बडा़ बेकरार
रहता है
गुलजार
न
वो सूरत दिखाते
हैं न मिलते
हैं गले आ
कर
न आँखें शाद होतीं
हैं न दिल
मसरूर होता है
-लाला माधव राम
जौहर
एक
सफ़र वो है
जिस में
पाँव नहीं दिल
दुखता है
-आगाह देहलवी
कहूं क्या वो
बड़ी मासूमियत से
पूछ बैठे हैं
क्या सचमुच दिल के
मारों को बड़ी
तकलीफ़ होती है
-गुलज़ार
किस
किस तरह की
दिल में गुज़रती
हैं हसरतें
है वस्ल से
ज़ियादा मज़ा इंतिज़ार
का
दिल
सुलगता है तिरे
सर्द रवय्ये से
मिरा
देख अब बर्फ़
ने क्या आग
लगा रक्खी है
-अनवर मसूद
मसअला
ये है कि
उस के दिल
में घर कैसे
करें
दरमियाँ के फ़ासले
का तय सफ़र
कैसे करें
-फ़र्रुख़ जाफ़री
लाखों
में इंतिख़ाब के
क़ाबिल बना दिया
जिस दिल को
तुम ने देख
लिया दिल बना
दिया
कोई शोला है
कि शरारा है,कि हवा
है यह कि
सितारा है
यही दिल जो
लेके गड़ेंगे हम,तो लगेगी
आग मज़ार में
दिल
को ग़म रास
है यूँ गुल
को सबा हो
जैसे
अब तो ये
दर्द की सूरत
ही दवा हो
जैसे
ना चाहत
के अंदाज़ अलग
ना दिल के
अंदाज़ अलग
तेरे हाथ अलग
, मेरे हाथ अलग
- पियूष मिश्रा
मचल के जब
भी आँखों से
छलक जाते हैं
दो आँसू
सुना है आबशारों
को बड़ी तक़लीफ़
होती है
खुदारा अब तो
बुझ जाने दो
इस जलती हुई
लौ को
चरागों से मज़ारों
को बड़ी तक़लीफ़
होती है.
कहूँ क्या वो
बड़ी मासूमियत से
पूछ बैठे हैं
क्या सचमुच दिल के
मारों को बड़ी
तक़लीफ़ होती है
तुम्हारा क्या तुम्हें
तो राह दे
देते हैं काँटे
भी
मगर हम ख़ाकज़ारों
को बड़ी तक़लीफ़
होती है
Gulzar
हमदम यही है
रहगुज़र-ए-यार-ए-ख़ुश-ख़िराम
गुज़रे हैं लाख
बार इसी कहकशाँ
से हम
- असरार उल हक़
मजाज़
कोई क्यूँ किसी का
लुभाये दिल, कोई
क्या किसी से
से लगाए दिल
वो जो बेचते
थे दवा ए
दिल, वो दुकान
अपनी बढ़ा गए..........!
सलाम साहब
रोशन रहता है ये शहर अपने तरीके से
यहाँ चिरागों से ज़्यादा दिल जलते हैं
- आयुष्मान खुराना
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