पिछले 3 modules में आप पढ़ चुके कि उर्दू, शेर, ग़ज़ल और नज़्म क्या है। इन पर आधारित विस्तृत आलेख ब्लॉग पर संकलित हैं।
पुनः अवलोकन:-
उर्दू ज़ुबाँ अपने आप में बेहद मीठी ज़ुबाँ है और फिर इसमें शायरी का क्या कहना यह तो सोने पे सुहागा होती है | उर्दू शायरी वैसे तो खालिस उर्दू में लिखी जाती है परन्तु शुरुवात से इसमें दो तबके चले आ रहे है एक इसे क्लिष्ट (कठिन) शब्दों में लिखता है और एक तबका कुछ इस तरह की यह हर आम-ओ-खास की जुबान हो जाए हर आम व्यक्ति की समझ में आ जाए | उर्दू भाषा में रचना लिखने वाले रचनाकार को शायर कहा जाता है | प्राय: यह परंपरा रही है की शायर या कवि /लेखक अपने नाम के साथ एक उपनाम भी लिखता है जिसे उर्दू में तखल्लुस कहा जाता है | जैसे मिर्ज़ा असद-उल्ला खान अपने नाम के साथ तखल्लुस ग़ालिब लिखते थे रघुपति सहाय "फिराक" लिखते थे | मिर्ज़ा ग़ालिब को पहले तबके में रखा जा सकता है वो काफी कठिन और खालिस उर्दू शब्दों में लिखा करते थे | इसी कारण उन्हें जौक और बाकि समकालीन शायरों की आलोचना का शिकार होना पड़ा पर उनकी शायरी की मिठास और रुमानियत के कारण आज उर्दू शायरी का मतलब मिर्ज़ा ग़ालिब हो गए है |
हम्द :- यह एक तरह की अल्लाह/खुदा की तारीफ में कही जाने वाली रचना है | हम्द (अरबी : حمد ), अंग्रेजी में "स्तुति", एक शब्द है जो विशेष रूप से भगवान की प्रशंसा करता है - चाहे लिखा हो या बोला गया हो। [1] इस प्रकार, "हम्द" शब्द का पालन हमेशा भगवान (अल्लाह) के नाम से किया जाता है - एक मुहावरा जिसे तहमीद के रूप में जाना जाता है - "अलमदुलिल्लह" (अरबी: الحَمْد لله) (अंग्रेजी: "भगवान की प्रशंसा")। एक हमद आमतौर पर अरबी, फारसी, तुर्की, बंगाली, पंजाबी या उर्दू में लिखा जाता है। कव्वाली के प्रदर्शन में आमतौर पर कम से कम एक हम्द शामिल होता है, जो पारंपरिक रूप से प्रदर्शन की शुरुआत में होता है।
हम्द
ऐ खुशी की धनक
रहमतों की फ़लक़
ज़िन्दगी तूने दी
आंगही तूने दी
जब अंधेरे हुए
रोशनी तूने दी
तूने मिट्टी को भी कर दिया मोहतरम
ऐ खुदा ऐ खुदा तेरे बंदे हैं हम
ख़्वाब बख्शे हंसी
नींद आंखों में दी
दिल के इस साज़ में
धड़कने भी रखीं
कोई तुझ सा सफ़ी ऐ खुदाया नहीं
कैसे कैसे किये तूने हम पे करम
ऐ खुदा ऐ खुदा तेरे बंदे हैं हम
इस रचना में ऐसे कई बैंड होते हैं ऊपर सिर्फ 2 दिए गए हैं।
नात :- इस्लामी पद्य साहित्य में एक पद्य रूप है, जिस में पैगंबर हज़रत मुहम्मद साहब की तारीफ़ करते लिखी जाती है। इस पद्य रूप को बडे अदब से गाया भी जाता है। अक्सर नात ए शरीफ़ लिखने वाले आम शायर को नात गो शायर कहते हैं और गाने वाले को नात ख्वां कहते हैं।
मौला ! मेरी सुन ले दुआ
तू ही है हाजत-रवा
सब का दाता है तू, सब को देता है तू
तेरे बंदों का तेरे सिवा कौन है
किस से मांगें, कहाँ जाएं, किस से कहें
और दुनिया में हाजत-रवा कौन है
सब का दाता है तू, सब को देता है तू
तेरे बंदों का तेरे सिवा कौन है
कौन मक़बूल है, कौन मरदूद है
बे-ख़बर ! क्या ख़बर तुझ को ! क्या कौन है !
जब तुलेंगें अमल तेरे मीज़ान पर
तब खुलेगा के खोटा-खरा कौन है
सब का दाता है तू, सब को देता है तू
तेरे बंदों का तेरे सिवा कौन है
कौन सुनता है फ़रियाद मज़लूम की
दस्त-ए-क़ुदरत में कुंजी है मक़्सूम की
रिज़्क़ पर किस के पलते हैं शाह-ओ-गदा
मसनद-आरा-ए-बज़्म-ए-अता कौन है
सब का दाता है तू, सब को देता है तू
तेरे बंदों का तेरे सिवा कौन है
मेरा मालिक मेरी सुन रहा है फ़ुग़ाँ
जानता है वो ख़ामोशियों की जुबाँ
अब मेरी राह में कोई हाइल न हो
नामा-बर क्या बला है, सबा कौन है
सब का दाता है तू, सब को देता है तू
तेरे बंदों का तेरे सिवा कौन है
इब्तिदा भी वही, इंतिहा भी वही
नाख़ुदा भी वही है ख़ुदा भी वही
जो है सारे जहानों में जल्वा-नुमा
उस अह़द के सिवा दूसरा कौन है
सब का दाता है तू, सब को देता है तू
तेरे बंदों का तेरे सिवा कौन है
शायर:
पीर नसीरुद्दीन नसीर
नातख्वां:
अल्लामा हाफ़िज़ बिलाल क़ादरी
मंक़बत :- मंक़बत वलियो की शान में कही जाने वाली रचना को कहते है | इसमें पांच (५) पंक्तियों आआआ से शुरू होती है | मंक़बत पैगम्बर मोहम्मद के बेटे इब्न अबी तालिब की शान में कही जाती है | इसके आकार पर भी कोई पाबन्दी नहीं है |
इस बार हम आपको उर्दू शायरी के कुछ प्रकार बताने जा रहे है हो सकता है इसमें मुझसे कुछ गुस्ताखी हो जाए तो इसे सही करने में मेरी मदद कीजियेगा ।
मर्सिया :- मर्सिया शहीदों की शान में कही जाने वाली रचना कहलाती है | इस रचना का विषय मुख्यत: हसन और हुसैन ( अली इब्न अबी तालिब के पुत्र और पैगम्बर मोहम्मद के प्रपोत्र ) की मृत्यु पर शोक मनाना होता है | इसका आकार कितना भी बड़ा हो सकता है | इस साहित्त रूप को लखनऊ में विशेष रूप से अनुकूल वातावरण मिला, मुख्य रूप से क्योंकि यह दक्षिण एशिया के शिया मुस्लिम समुदायों के केंद्रों में से एक है, जिसने इसे क्रियाकलापों के लिए पवित्रता और धार्मिक कर्तव्य का कार्य माना जाता है और करबाला की लड़ाई के शहीदों को याद किया जाता है। इस कविता रूप को मीर बबर अली अनीस के लेखन से अपने चरम पर पहुंच गया।
हलचल थी कि तलवार चली फौज में सन से
ढालें तो रहीं हाथों में सर उड़ गये तन से
तायर भी हवा हो गये सब जुल्म के बन से।
आगे था हिरन, शेर से और शेर, हिरन से।।
आयी जिस गोल पे, लाखों से ज़मीं पाट गयी।
हाथ मुँह सद्र व कमर सीना ओ सर काट गयी।
चोट ऐसी थी कि लहू की साफ़े चाट गयी।
देखी तेगों की जिधर बाढ़, उसी घाट गयी।
- अनीस
क़सीदा :- इसमें किसी व्यक्ति की प्रशंसा की जाती है मुख्य रूप से राजा या समर्थक की | इसे ग़ज़ल प्रारूप में लिखा जाता है | कुछ शायर अपने बेहतरीन कसीदो के लिए जाने जाते है उनमे मिर्ज़ा सौदा भी है | क़सीदा मुख्य रूप से अरब संस्कृति में लिखा जाता है जहाँ यह इस्लाम आने के पूर्व से लिखा जाता रहा है| क़सीदों में हर शेर का दूसरा मिस्रा एक ही रदीफ़ और क़ाफ़िये (तुकान्त) में होता है। क़सीदे दो प्रकार के होते हैं। एक वह, जिसमें कवि प्रारम्भ से ही प्रशंसा करने लगता है और दूसरा वह जिसमें प्रारम्भ में एक तरह की भूमिका दी जाती है और कवि और बातों के अलावा वसंत, बहार, दर्शन, ज्योतिष आदि के विषय में कुछ कहता है। इन प्रारम्भिक वर्णनों को "तश्बीब" कहते हैं। तश्बीब के बाद कवि प्रशंसा करने की ओर अपने शेरों को मोडता है। इस मोड को गुरेज़ कहते है। इसका वर्णन बहुत मुश्किल समझा जाता है और इसी के द्वारा शायर के कमाल का अनुमान होता है। अच्छी गुरेज़ वह है जिसमें कवि 'तश्बीब' से 'तारीफ' (प्रशंसा) पर इस तरह आ जाए कि पढने वालों को यह पता ही न चले कि प्रशंसा का विषय ठूँस-ठाँसकर लाया गया है। क़सीदे के तीसरे अंग 'मदह' (प्रशंसा) के बाद चौथा अंग 'दुआ' होता है, जिसमें कवि 'ममदूह' (प्रशंसित व्यक्ति) के लिए शुभकामनाएँ करता हुआ उससे कुछ याचना करता है। इसी के बाद क़सीदा समाप्त हो जाता है।[4]
लखनऊ के प्रसिद्ध शायर 'नासिख़' द्वारा लिखे किसी घोड़े पर एक क़सीदे का अंश इस प्रकार है -[5]
रफ़्तार में औरंग-ए-सुलेमान है ये घोड़ा
पा' सीरत-ओ-ख़िलक़त में तो इंसान है ये घोड़ा
चमकाते ही जाता है ज़मीं से जो फ़लक पर
सब कहते हैं ख़ुरशाद-ए-दरख़्शाँ है ये घोड़ा
है जलवा, तमाशा-ए-जहाँ चाँद की मानिंद
रुतबे में फ़लक से भी दो-चन्दन है ये घोड़ा
गर्दन ये बुलंद उसकी है गुलशन में जो गुज़रा
क़ुमरी ने कहा सर्व-ए-ख़िरामाँ है ये घोड़ा
आता है पसीना जो उसे, आब-ए-बक़ा है
हैवाँ है तो क्या, चश्मा-ए-हैवाँ है ये घोड़ा
रफ़्तार में यह घोड़ा तख़्त-ए-सुलेमान१ है
चरित्र और प्रकृति से तो यह इंसान जैसा है
अर्थ- ज़मीन से आसमान पर जो जाता है२
सब कहते हैं कि यह घोड़ा एक चमकता (दरख़्शाँ) सूरज है
इसका जलवा दुनिया पर चाँद की तरह प्रकट होता है
लेकिन इसका ऊँचा स्थान आसमान से भी दुगना है
अपनी गर्दन ऊंची कर के जब बाग़ से गुज़रादेखकर क़ुमरी३ ने कहा सनोबर४ की तरह सुन्दर हिलता है
उसका पसीना ऐसे है जैसे अमृत५जानवर है तो क्या हुआ, जीवनदायी पानी का चश्मा है६
[ १. सुलेमान बहुत न्याय प्रीय राजा था, यानि उसके तख़्त (सिंहासन) से इंसाफ़ बरसता था२. घोड़े की तेज़ी पकड़ने की तुलना सूरज के उदय होने से की जा रही है३. क़ुमरी एक चिड़िया होती है जिसे 'कपोत' भी कहते हैं और अंग्रेज़ी में 'डव' (dove) कहते हैं४. सनोबर (फ़ारसी में 'सर्व') के वृक्ष जैसा लम्बा और सजीला५. आब-ए-बक़ा यानि 'अमरत्व का आब या पानी', जिसे अमृत भी कह सकते हैं६. मूल वाक्य में 'हैवाँ' शब्द के साथ खेला गया है - पहली बार इसका मतलब 'हैवान' यानि 'जानवर' है और दूसरी बार 'जीवन' (हयात) है]
मसनवी :- मसनवी का अर्थ निकाले तो मतलब होता है “दो” | इसे शेर के रूप में लिखा जाता है इसमें शेर के दोनों मिसरे (पंक्तिया) एक ही रदीफ और काफिए में होते है | शेर के रदीफ और काफिये आपस में अलग-अलग हो सकते है | इसमें शेरो की संख्या की कोई सीमा नहीं है ये 8, 10 बारह या और भी ज्यादा हो सकती है | यहाँ मुख्य रूप से प्रेम को प्रदर्शित करती है |
ग़ालिब की अब तक मिली शाइरी के अनुसार, उन्होंने सबसे पहले पतंग पर मस्नवी कही थी जिसे 1812 की रचना बताया जाता है। उसी मस्नवी के कुछ शेर यूं हैं
ये जो महफ़िल में बढ़ाते हैं तुझे
भूल मत इस पर उड़ाते हैं तुझे
एक दिन तुझको लड़ा देंगे कहीं
मुफ़्त में नाहक़ कटा देंगे कहीं
- आनन्द कक्कड़
सभार व संदर्भ:
A Shahr-ashob of Sauda, translated by Mark Pegors
• विकिपीडिया pages न उर्दू साहित्य
↑ Poetry and Drama: Literary Terms and Concepts, Britannica Educational Publishing, The Rosen Publishing Group, 2011, ISBN 978-1-61530-539-1, ... The qasida (Arabic qas·īdah) is a poetic form that was developed in pre-Islamic Arabia and perpetuated throughout Islamic literary history into the present. It is a laudatory, elegiac, or satiric poem ...
↑ Qasida Poetry in Islamic Asia and Africa: Classical traditions and modern meanings, Stefan Sperl, C. Shackle, BRILL, 1996, ISBN 978-90-04-10295-8, ... The term is derived from the verb qasada, 'to aim at, to intend' ...
↑ Encyclopaedic dictionary of Urdu literature, Global Vision Publishing House, 2007, ISBN 978-81-8220-191-0, ... Madh (eulogy) is the main component of a qasida. The poet extols his mamduh, putting together in his person all possible qualities ...
↑ Calcutta review, Volumes 72-73, University of Calcutta, University of Calcutta. Dept. of English, University of Calcutta, 1881, ... Raftar men aurang-i-Sulaiman hai yih ghora ...
• jakhira.com/2016/11/types-of-urdu-poetry
Quite enriching experience with you sir being connected through a group of literature lovers. Hats off to your efforts and ability to influence a larger audience
ReplyDeleteVery nice implimrntation..
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