ग़ज़ल की संरचना व शिल्प
आनंद कक्कड़
ग़ज़ल केवल शिल्प नहीं है इसमें कथ्य भी है। यह संगम है तकनीक और भावना का। तकनीकी रूप से ग़ज़ल काव्य की वह विधा है जिसका हर शे'र अपने आप मे कविता की तरह होता है। हर शे'र का अपना अलग विषय होता है। लेकिन यह ज़रूरी शर्त भी नहीं, एक विषय पर भी गज़ल कही जाती है ।
गज़ल को समझने के लिये इसके अंगों को जानना आवश्यक है। आईये ग़ज़ल को समझने की शुरुआत मिर्जा ग़ालिब की एक ग़ज़ल के साथ करते हैं, और सारी परिभाषाओं को इसी ग़ज़ल की रौशनी में देखने की कोशिश करते हैं: -
दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है
आख़िर इस दर्द की दवा क्या है
हम हैं मुश्ताक़ और वो बेज़ार
या इलाही ये माजरा क्या है
मैं भी मुँह में ज़बान रखता हूँ
काश पूछो कि मुद्दा क्या है
जब कि तुझ बिन नहीं कोई मौजूद
फिर ये हंगामा ऐ ख़ुदा क्या है
हम को उन से वफ़ा की है उम्मीद
जो नहीं जानते वफ़ा क्या है
जान तुम पर निसार करता हूँ
मैं नहीं जानता दुआ क्या है
मैं ने माना कि कुछ नहीं 'ग़ालिब'
मुफ़्त हाथ आए तो बुरा क्या है
मिसरा - शे'र की पंक्ति के लिए यह भी एक नाम है। उदाहरण के लिए ' दिल-ए-नादां तुझे गया क्या है।
शेर - दो मिसरों से मिलकर एक शे'र या बैंत बनता है। दो पंक्तियों में ही अगर पूरी बात इस तरह कह दी जाये कि तकनीकी रूप से दोनों पदों के वज़्न समान हो। उदाहरण के लिये:
दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है
आख़िर इस दर्द की दवा क्या है
शेर की दूसरी पंक्ति का तुक पूर्वनिर्धारित होता है (दिये गये उदाहरण में “क्या है” तुक) और यही तुक शेर को ग़ज़ल की माला का हिस्सा बनाता है।
शेर की सँरचना को समझने के लिये, हमने उदाहरण में जो शेर लिया था उसे दो टुकडो में बाँटें यानी –
पहला हिस्सा - 'मिसरा ऊला' - दिले-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है
दूसरा हिस्सा - 'मिसरा सानी' -आख़िर इस दर्द की दवा क्या है
इन दोनो पंक्तियां स्वतंत्र मिसरे हैं।
अर्थात दो मिसरे ('मिसरा उला' + 'मिसरा सानी') मिल कर एक शे'र बनते हैं।
प्रथम पंक्ति (मिसरा ऊला) पुन: दो भागों मे विभक्त होती है प्रथमार्ध को मुख्य (सदर) और उत्तरार्ध को दिशा (उरूज) कहा जाता है। भाव यह कि पंक्ति का प्रथम भाग शेर में कही जाने वाली बात का उदघाटन करता है तथा द्वितीय भाग उस बात को दूसरी पंक्ति की ओर बढने की दिशा प्रदान करता है।
इसी प्रकार द्वितीय पंक्ति (मिसरा सानी) के भी दो भाग होते हैं। प्रथम भाग को आरंभिक (इब्तिदा) तथा द्वितीय भाग को अंतिका (ज़र्ब) कहते हैं।
रदीफ- काफ़िया के तुक (अन्त्यानुप्रास) और उसके बाद आने वाले शब्द या शब्दों को रदीफ़ कहते है। रदीफ को पूरी ग़ज़ल में स्थिर रहना है। ये एक या दो शब्दों से मिल कर बनती है और मतले मे दो बार मिसरे के अंत मे और शे'र मे दूसरे मिसरे के अंत मे ये पूरी ग़ज़ल मे प्रयुक्त हो कर एक जैसा ही रहता है बदलता नहीं।
उदाहरण के लिये ली गयी ग़ज़ल के हर शेर को देखें इस में “ क्या है ” ग़ज़ल की रदीफ़ है।
काफ़िया - वह शब्द जो मत्ले की दोनों पंक्तियों में और हर शेर की दूसरी पंक्ति में रदीफ के पहले आये उसे ‘क़ाफिया’ कहते हैं। क़ाफिया बदले हुए रूप में आ सकता हैं। लेकिन यह ज़रूरी हैं कि उसका उच्चारण समान हो, जैसे दवा, दुआ, हुआ, बुरा, वफ़ा इत्यादि।
काफ़िया ग़ज़ल की जान होता है और कई बार शायर को काफ़िया मिलने मे दिक्कत होती है तो उसे हम कह देते हैं कि काफ़िया तंग हो गया।
मतला [बैत]-.ग़ज़ल के प्रारंभिक शे'र को मतला कहते हैं | मतले के दोनो मिसरों मे काफ़िया और रदीफ़ का इस्तेमाल किया जाता है।। गज़ल का सौंदर्य मतले पर निर्भर करता है।
उदाहरण ग़ज़ल में मतला है:-
दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है
आख़िर इस दर्द की दवा क्या है
हमारे इस मतले के दोनों मिसरों यानि पंक्तियों पर ध्यान दीजिए दोनों मिसरों में काफ़िया और रदीफ़ हुआ क्या है और दवा क्या है का प्रयोग किया गया है। सही मायने में यही एक मतला होता है।
आप तो जानते हैं कि मतले के बाद जो भी हम गज़ल के शे‘र लिखते हैं उनमें हम पहले मिसरे में काफ़िया रदीफ़ नहीं लेते हैं और उसकी दूसरी पंक्ति में लेते हैं। जैसे-
आप तो जानते हैं कि मतले के बाद जो भी हम गज़ल के शे‘र लिखते हैं उनमें हम पहले मिसरे में काफ़िया रदीफ़ नहीं लेते हैं और उसकी दूसरी पंक्ति में लेते हैं। जैसे-
जब कि तुझ बिन नहीं कोई मौजूद. फिर ये हंगामा ऐ ख़ुदा क्या है
हम को उन से वफ़ा की है उम्मीद जो नहीं जानते वफ़ा क्या है
हुस्न ए मतला
इसके बावजूद अगर हम गज़ल का दूसरा शे‘र ये ना लिख करके वापस एक और मतला लिख देते हैं तो इसे हम हुस्न ए मतला कहते हैं।
उदाहरण अतीक इलाहाबादी कि गज़ल देखिए-
जिक्र तबस्सुम का आते ही लगते हैं इतराने लोग
और ज़रा सी ठेस लगी तो जा पहुंचे मैख़ाने लोग
और ज़रा सी ठेस लगी तो जा पहुंचे मैख़ाने लोग
|| इस गज़ल का ये है मतला ||
मेरी बस्ती में रहते हैं ऐसे भी दीवाने लोग
रात के आँचल पर लिखते हैं दिन भर के अफ़साने लोग
रात के आँचल पर लिखते हैं दिन भर के अफ़साने लोग
|| और ये शेर है हुस्ने मतला ||
प्रस्तुत अश'आर में पहला शे'र मतला है तथा दुसरे शे'र के मिसरा उला (पहली पंक्ति) में भी रदीफ़़ क़ाफ़िया का निर्वहन हुआ है इसलिए यह शे'र हुस्ने मतला है।
प्रस्तुत अश'आर में पहला शे'र मतला है तथा दुसरे शे'र के मिसरा उला (पहली पंक्ति) में भी रदीफ़़ क़ाफ़िया का निर्वहन हुआ है इसलिए यह शे'र हुस्ने मतला है।
एक से अधिक मत्ला आने पर बाद वाला मत्ला यदि पिछले मत्ले की बात को पुष्ट अथवा और स्पष्ट करता हो तो वह मत्ला-ए-सानी कहलाता है।
मैने माना कि कुछ नहीं 'ग़ालिब'। मुफ़्त हाथ आए तो बुरा क्या है ।।
शायर कोशिश करते हैं कि यह शेर सब से ज्यादा भावुक और प्रभावशाली हो, इसीलिए कोई ग़ज़ल अंत करते हुए शायर अक्सर कहते हैं 'मक़ता अर्ज़ है' (यानि, 'ध्यान दीजिये, ग़ज़ल का अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण शेर पढ़ने वाला हूँ')।
मतला का अर्थ है उदय और मकता का अर्थ है अस्त। उर्दू ग़ज़ल के नियमानुसार ग़ज़ल में मतला और मक़ता का होना अनिवार्य है वरना ग़ज़ल अधूरी मानी जाती है।
मुरद्दफ़ ग़ज़ल = रदीफ़़वार वो ग़ज़ल जिसमें रदीफ़ होता है उसे मुरद्दफ़ ग़ज़ल कहते हैं उदाहरण ग़ज़ल से -
दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है
आख़िर इस दर्द की दवा क्या है
जब कि तुझ बिन नहीं कोई मौजूद. फिर ये हंगामा ऐ ख़ुदा क्या है
प्रस्तुत अश'आर में 'क्या है' रदीफ़़ है इसलिए यह मुरद्दफ़ ग़ज़ल है
ग़ैर मुरद्दफ़ ग़ज़ल = जिस ग़ज़ल में रदीफ़ नहीं होता है उसे ग़ैर मुरद्दफ़ ग़ज़ल कहते हैं
उदाहरण :शाज़ तमकनत का शेर-
ग़ैर मुरद्दफ़ ग़ज़ल = जिस ग़ज़ल में रदीफ़ नहीं होता है उसे ग़ैर मुरद्दफ़ ग़ज़ल कहते हैं
उदाहरण :शाज़ तमकनत का शेर-
जाने वाले तुझे कब देख सकूं बारे दीगर
रोशनी आँख की बह जायेगी आसूं बन कर
रो रहा था कि तेरे साथ हँसा था बरसों
हँस रहा हूँ कि कोई देख न ले दीदा-ए-तर
रोशनी आँख की बह जायेगी आसूं बन कर
रो रहा था कि तेरे साथ हँसा था बरसों
हँस रहा हूँ कि कोई देख न ले दीदा-ए-तर
प्रस्तुत अश'आर के पहले शे'र में मिसरे 'दीगर' व 'कर' शब्द से समाप्त हुए हैं जो कि समतुकांत हैं तथा अलग अलग हैं । इसलिए स्पष्ट है कि यह रदीफ़़ के न हो कर क़ाफ़िया के शब्द हैं और इस शे'र में रदीफ़ नहीं है। इस प्रकार आगे के शे'र में भी क़ाफ़िया को निभाते हुए तर शब्द आया है ।इससे सुनिश्चित होता है कि यह ग़ैर मुरद्दफ़ ग़ज़ल है |
मुसल्सल ग़ज़ल = ग़ज़ल का प्रत्येक शे'र अपने आप में पूर्ण होता है तथा शायर ग़ज़ल के प्रत्येक शे'र में अलग अलग भाव को व्यक्त कर सकता है परन्तु जब किसी ग़ज़ल के सभी अश'आर एक ही भाव को केन्द्र मान कर लिखे गए हों तो ऐसी ग़ज़ल को मुसल्सल ग़ज़ल कहते हैं|
ग़ैर मुसल्सल ग़ज़ल = ग़ज़ल के प्रत्येक शे'र अलग अलग भाव को व्यक्त करें तो ऐसी ग़ज़ल को ग़ैर मुसल्सल ग़ज़ल कहते है।
हासिले-ग़ज़ल शेर-
ग़ज़ल का सबसे अच्छा शेर ‘हासिले-ग़ज़ल शेर’ कहलाता हैं।
हासिलें-मुशायरा ग़ज़ल-
मुशायरे में जो सब से अच्छी ग़ज़ल हो उसे ‘हासिले-मुशायरा ग़ज़ल’ कहते हैं।
ग़ज़ल का सबसे अच्छा शेर ‘हासिले-ग़ज़ल शेर’ कहलाता हैं।
हासिलें-मुशायरा ग़ज़ल-
मुशायरे में जो सब से अच्छी ग़ज़ल हो उसे ‘हासिले-मुशायरा ग़ज़ल’ कहते हैं।
बहर, वज़्न या मीटर (meter)
शेर की पंक्तियों की लंबाई के अनुसार ग़ज़ल की बहर नापी जाती हैं। इसे वज़्न या मीटर भी कहते हैं। हर ग़ज़ल उन्नीस प्रचलित बहरों में से किसी एक पर आधारित होती हैं। बोलचाल की भाषा में सर्वसाधारण ग़ज़ल तीन बहरों में से किसी एक में होती हैं-
१. छोटी बहर-
अहले दैरो-हरम रह गये।
तेरे दीवाने कम रह गये। ।
२. मध्यम बहर–
उम्र जल्वों में बसर हो यो ज़रूरी तो नहीं।
हर शबे-गम की सहर हो ये ज़रूरी तो नहीं। ।
३. लंबी बहर-
ऐ मेरे हमनशीं चल कहीं और चल इस चमन में अब अपना गुज़ारा नहीं।
बात होती गुलों की तो सह लेते हम अब तो कांटो पे भी हक़ हमारा नहीं। ।
उपरोक्त परिभाषाओं की रौशनी में साधारण रूप से ग़ज़ल को समझने के लिये उसे निम्न विन्दुओं के अनुरूप देखना होगा:
शेर की पंक्तियों की लंबाई के अनुसार ग़ज़ल की बहर नापी जाती हैं। इसे वज़्न या मीटर भी कहते हैं। हर ग़ज़ल उन्नीस प्रचलित बहरों में से किसी एक पर आधारित होती हैं। बोलचाल की भाषा में सर्वसाधारण ग़ज़ल तीन बहरों में से किसी एक में होती हैं-
१. छोटी बहर-
अहले दैरो-हरम रह गये।
तेरे दीवाने कम रह गये। ।
२. मध्यम बहर–
उम्र जल्वों में बसर हो यो ज़रूरी तो नहीं।
हर शबे-गम की सहर हो ये ज़रूरी तो नहीं। ।
३. लंबी बहर-
ऐ मेरे हमनशीं चल कहीं और चल इस चमन में अब अपना गुज़ारा नहीं।
बात होती गुलों की तो सह लेते हम अब तो कांटो पे भी हक़ हमारा नहीं। ।
उपरोक्त परिभाषाओं की रौशनी में साधारण रूप से ग़ज़ल को समझने के लिये उसे निम्न विन्दुओं के अनुरूप देखना होगा:
ग़ज़ल विभिन्न शे'रों की माला होती है। ग़ज़ल के शेरों का क़ाफ़िया और रदीफ की पाबंदी में रहना आवश्यक है। ग़ज़ल का आरंभ मतले से होना चाहिये। ग़ज़ल के सभी शे'र एक ही बहर-वज़न में होने चाहिये। ग़ज़ल का अंत मक़ते के साथ होना चाहिये।
संदर्भ सभार:
1.विकिपीडिया
2.ज़रीना सानी वेबपेजके आलेख गज़ल क्या है-
डॉ अरशद जमाल 11 सितंबर 2012।
3.आर॰पी॰सिंह 'महर्षि'. यश खन्ना 'नीर' (संपा॰). ग़ज़ल निर्देशिका. अम्बाला छावनी: तारिका प्रकाशन. पपृ॰ 13–15 ।
आर॰पी॰सिंह 'महर्षि'. यश खन्ना 'नीर' 2. (संपा॰). ग़ज़ल निर्देशिका. अम्बाला छावनी: तारिका प्रकाशन. पपृ॰ 13–15
आज की ग़ज़ल -सतपाल ख़्याल
4. बेयरमेंन ब्लॉग ग़ज़लगो बारेमा (नेपाली)
Thank you Anand ji ..
ReplyDeleteArticle ghazal ke roop ka varnan samjhane mein poori trah samarth hai....padhne se aasani se sab samajh aa gaya...Thank for making all this easy..